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Saturday, 11 January 2025

स्वादिष्ट चाय मसाला


                                  ॥ॐ॥
घर पर बना हुआ चाय का मसाला बनाने मिलावट के जहर से स्वयं को बचायें -

सामग्री 
3 बड़े चम्मच लौंग 
1/4 कप इलाइची 
1/2 कप काली मिर्च 
2 टुकड़े दालचीनी 
1/4 कप सौंठ 
1 चम्मच जायफल 
2 चम्मच सौंफ 
1 चम्मच सूखी तुलसी 
2 बड़ी इलायची 

विधि 
1.चाय का मसाला बनाने के लिए, एक चौड़े नॉन-स्टिक पॅन में लौंग, इलायची, काली मिर्च और दालचीनी डालकर 1 मिनट के लिए मध्यम आँच पर सूखा भुन लीजिए।
2.एक प्लेट में पलटकर उसे पूरी तरह से ठंडा होने के लिए एक तरफ रख दीजिए।
3. ठंडा होने के पश्चात उसमें सौंठ जायफल और तुलसी डालकर मिक्सर में मुलायम होने तक पीस लीजिए।
4.चाय का मसाला हवा-बंद डिब्बें मे भर कर रख दीजिए और आवश्यकतानुसार प्रयोग कीजिए।

महत्वपूर्ण सुझाव
हवा-बंद डिब्बें में भरकर रखा हुआ यह चाय का मसाला 4 महीनों तक ताज़ा रहता है।

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साभार 
वंदे मातृसंस्कृतम् 

ईश्वर कैसा है, कहाँ रहता है, उसका रुप रंग कैसा है ?

                              ॥ॐ॥
ईश्वर कैसा है, कहाँ रहता है, उसका रुपरंग कैसा है ?

       याज्ञवल्क्य ने एक बार गार्गी से कहा था-
"ब्रह्म के जाननेवाले उसे अक्षर, अविनाशी, कूटस्थ कहते हैं । वह न मोटा है, न पतला । न छोटा है, न लम्बा । न अग्नि की तरह लाल है । यह बिन स्नेह के है, बिना छाया के और बिना अंधेरे के है । न वायु है, न आकाश है । वह अप्रसंग है । रस से रहित, गन्ध से रहित है । उसके नेत्र नहीं, कान नहीं, वाणी नहीं, मुख नहीं, मात्रा नहीं ।"
(बृह० ३/७/७) में लिखा है -
"वह महान है, दिव्य है, अचिन्त्य रूप है । सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर प्रतीत होता है । वह दूर से अधिक दूर है ।तथापि यहां ही हमारे निकट है ।देखनेवालों के लिए वह यहीं (हृदय की गुफा में) छिपा हुआ है ।"
     यो ह वै शिशुꣳ साधानꣳ सप्रत्याधानꣳ सस्थूणꣳ
सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्ध्ययं वाव
शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाऽऽधानमिदं प्रत्याधानं
प्राणः स्थूणाऽन्नं दाम ॥ (बृह०२/२/१) में लिखा है -
"वह हर जगह प्रकट है, निकट है । गुहाचर (हृदय की गुफा में विचरनेवाला) प्रसिद्ध है । वह एक बड़ा आधार है, जिसमें यह सब पिरोया हुआ है, जो चलता है, सांस लेता है और आंख झपकता है । यह सारा स्थूल और सूक्ष्म, जो तुम जानते हो, यह सब उसी में पिरोया हुआ है । वह पूजा के योग्य है । सबसे श्रेष्ठ है । प्रजाओं की समझ से परे है ।"

वेदों में उसका वर्णन इस प्रकार है :-
       "एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुष:।
      पादोअस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।"
            (ऋ० १०/९०/३, यजु० ३१/३)
        इतनी बड़ी (भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल से सम्बद्ध जितना जगत है, यह सारी) इस प्रभु की महिमा है और प्रभु स्वयं इससे बड़ा है । (तीनों कालों में होने वाले) सारे भूत इसका एक पाद है और इसका (शेष) विपाद जो अमृत एवं अविनाशी-स्वरूप है, "वह अपने प्रकाश में है ।"
      प्रयोजन यह है कि उसकी तो कोई सीमा है नहीं । हां, कुछ दिग्दर्शन कराने के लिए कह दिया कि यह सारी दुनिया, ये सारे लोक, ये सारी पृथ्वियाँ, ये सारे नक्षत्र इत्यादि, ये सब उसके एक पैर में आते हैं । बाकी तीन पैर अभी और हैं ।

 "इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान् ।
 एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु: ॥"
                 (ऋ० १/१६४/४६)
"उस एक शक्ति को अनेक रूपों में वर्णन करते हैं; इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं । वही दिव्य सौन्दर्य का भण्डार है । उसी प्रकाशस्वरूप प्रभु को यम और मातरिश्वा कहते हैं ।"
 "तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा: ।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आप: स प्रजापति: ॥"
                 (यजु० ३२/१)
       वही अग्नि, वही आदित्य, वही वायु, वही चन्द्रमा, वही शुक्र, वही ब्रह्म, वही जल और वही प्रजापति है ।

"य: पृथिवीं व्यथमानामदृंहद्य: पर्वतान् प्रकुपितां अरम्णात् ।
यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तभ्नात् स जनास इन्द्र:॥"
                   (ऋ० २/१२/२)
       जिसने (आदि में पिघली हुई होने के कारण) लहराती हुई पृथ्वी को दृढ़ जमा दिया और जिसने प्रकुपित हुए (आदि में अग्नि-वर्षण करते हुए) पर्वतों को शान्त किया, जिसने अन्तरिक्ष को बड़ा विशाल बनाया, जिसने द्यौ को धारण किया, हे मनुष्यों ! वही शक्तिशाली प्रभु है ।
 "यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरमुतेमाहुर्नैषो अस्तीत्येनम् ।
सो अयं पुष्टीर्विज इवा मिनाती श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्र:॥"
                  (ऋ० २/१२/५)
       जिसके विषय में पूछते हैं, वह कहाँ है और कई यहां तक कह देते हैं कि वह नहीं है, वही है जो कि भयंकर बनकर ऐसे शत्रुओं (घमण्ड में उनकी प्रजा की पीड़ित करनेवालों) की पुष्टियों को शक्तियों की तरह मरोड़ डालता है, उसके लिए श्रद्धा रखो । हे मनुष्यों, वही शक्तिशाली प्रभु है ।

"यो रघ्रस्य चोदिता य:कृशस्य यो ब्रह्मणो नाधमानस्य कीरे:।
युक्तग्राव्णो योअविता सुशिप्र: सुतसोमस्य स जनास इन्द्र:॥"
                  (ऋ० २१२/६)
        जो दीन-दुःखियों को हिम्मत बंधाता है, जो विपद्ग्रस्त भक्त की पुकार सुनता है, जो यज्ञमय जीवन-धारियों का प्रतिपालक है, लोगों ! वही सुन्दर और छबीला देव इन्द्र है ।

"यस्य भूमि: प्रमान्तरिक्षमुतोदरम् ।
विवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नम:॥"
              (अ० १०/७/३२)
       भूमि उसकी पाद-प्रतिष्ठा है ।अन्तरिक्ष उसका उदर है । द्युलोक उसका माथा है । उस परम ब्रह्म को प्रणाम हो !
"यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णव: ।
अग्निं यश्चक्र आस्य तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नम:॥"
               (अ० १०/७/३३)
        सूर्य और नित्य नया चन्द्रमा उसकी आंखें हैं, आग उसका मुख है । उस परम ब्रह्म को नमस्कार हो !
"प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते।
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्ध कतम: स केतु:॥"
                (अ० १०/८/१३)
       वह प्रजापति (सबके) अन्दर विराजमान है । वह दिखाई नहीं देता (पर) नाना प्रकार से प्रकट हो रहा है । सकल संसार उसकी (शक्ति) के एक भाग का फल है । शेष भाग की क्या कहें ? और कैसे कहें ?

 "यत: सूर्य उदेत्यस्तं यत्र च गच्छति।
तदेव मन्येअहं ज्येष्ठं तदु नात्येति किं चन॥"
             (अ० १०/८/१६)
        सूर्य उसी से उदय होता और उसी में लीन हो जाता है । सचमुच वही सबसे बड़ा है । उसके बराबर और कोई नहीं हो सकता ।

     ऐसा ईश्वर रहता कहाँ है ? कोई भी तो ऐसा स्थान नहीं, जहां वह न रहता हो । परन्तु उसके दर्शन हृदय ही में होते हैं ।
    उपनिषद् ने उसका पूरा पता भी बता दिया है :-
"सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय: ।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगत: शिव:॥"
              (श्वेताश्वतर ३/११)
    वह भगवान् सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावाला है । सर्वव्यापी है और समस्त प्राणियों की हृदयरूपी गुफा में निवास करता है । इसलिए वह (शिव) कल्याण-स्वरूप प्रभु सब जगह पहुंचा हुआ है ।
"अंगुष्ठमात्र: पुरुषोअन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्ट:।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥"
                  (श्वेताश्वतर ३/१३)
   अंगुष्ठ-मात्र परिणामवाला अन्तर्यामी परम पुरुष (परमेश्वर) सदा ही मनुष्यों के हृदय में सम्यक् प्रकार से स्थित है । मन का स्वामी है तथा निर्मल हृदय और शुद्ध मन से ध्यान में लाया जाता है (प्रत्यक्ष होता है)। जो इस परब्रह्म परमेश्वर को जान लेते हैं; वे अमर हो जाते हैं ।
"अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोअस्य जन्तो:।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमीशम् ॥"
                   (श्वेता० ३/२०)
        वह सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म और बड़े से भी बहुत बड़ा परमात्मा, जीव-हृदयरूपी गुफा में छिपा हुआ है । उस सबकी रचना करने वाले, प्रभु की कृपा से (जो भक्त) इस संकल्प-रहित प्रभु को और उसकी महिमा को देख लेता है, वह सब प्रकार के दुःखों से रहित हो जाता है ।
 "एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नात: परं वेदितव्यं हि किञ्चित्।"
                      (श्वेता० १/१२)
        इसको जानो, जो सदा तुम्हारे आत्मा में वर्तमान है । इससे परे कुछ जानने योग्य नहीं है ।
शंकर भगवान ने 'शिवधर्मोत्तर' से जो श्लोक आत्मदर्शन के सम्बन्ध में प्रमाण दिए हैं, उनमें से पहले श्लोक में यह लिखा है :-
      "शिवमात्मनि पश्यन्ति प्रतिमासु न योगिन: ।"
       योगीजन शिव को अपने आत्मा में देखते हैं, न कि प्रतिमाओं में ।
                     
            साभार - ✍️प्रियांशु सेठ 
                         वयं राष्ट्रे जागृयाम

ओ३म्‌कार माहत्म्य

                           ll‌ ॐ ll 
                  ओ३म्‌कार माहत्म्य 

आजकल लोग  ईश्वर को छोड़ कर किसी अन्य देवी देवताओं का स्मरण अनेकों नामों से करने लगे हैं, जबकी सभी प्रमाणित धर्म ग्रंथों शास्त्रों उस अदृश्य शक्ति का नाम "ओ३म" कहा गया है  जानिए :- 

१) ओ३म् प्रतिष्ठ ।  यजुर्वेद २-१३  

हे मनुष्य, ओ३म् पर विश्वास रख । 

२) ओ३म् खं ब्रम ।  यजुर्वेद ४०-१७
   ओ३म् परमात्मा सर्वव्यापक (खं) ओर सबसे महान (ब्रह्म) है । 

३) ओ३म् क्रतो स्मर ।  यजुर्वेद ४०-१५
   हे मनुष्य, ओ३म् का स्मरण कर । 

४) ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं l  
      भूतं भवद्भविष्यदिति  सर्वओ३म्‌कार एव । यच्चान्यतत्रिकालातीतं, तदप्योओ३मकार एव ll 

माण्डुक्योपनिषद प्रथम मंत्र 
‘ओ३म्’ यह अक्षर है उस ओ३म् का ही यह सब फैलाव है l भूत वर्तमान और भविष्य यह सब ओ३म्‌कार ही है l और जो इसके सिवा तीनों काल से बाहर है () वह भी ओ३म्‌कार ही है l 

५) ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत l ओमिति ह्युद्गायति l तस्योव्याख्यानम् l 

अर्थ –इस अविनाशी उच्च स्वर से गाये जाने वाले (ओ३म् + इति) ओ३म्‌कार की उपासना करें, क्योकि ओ३म्‌कार ही ऊंचे स्वर से गाया जाता है l उस (ओ३म्) का (आगे) व्याख्यान किया जायेगा l  

६) ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ll 
मुण्डकोपनिषद् द्रितीय खंड – ६
अर्थात् : उस आत्मा का ध्यान ओ३म् समझकर ध्यान करो, वह अन्धकार से परे और पार होने के लिए हैं। तुम्हारा कल्याण हो ll 

७) प्रणवो धनु: शरो आत्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते l 
अप्रमतेन वेद्रव्यं शरवत्त्‌न्मयो भवेत् ll
मुण्डकोपनिषद् द्रितीय खंड – ४
अर्थात् – ओ३म्‌कार धनुष है, जीवात्मा बाण हैं और निश्चय ही वह ब्रह्म लक्ष्य कहा जाता हैं । अप्रमाद (आलस्य रहित) चित्त से बींधना चाहिए बाण के तुल्य तन्मय होना चाहिए l 

८) ओमिति ब्रम l ओमितिदमं सर्वम् । ओमत्येतदनुकृति ह स्म वा अप्यों श्रावयेत्या श्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओम् शोमिति शस्त्राणि शंसन्ति । ओमित्यध्वर्यु: प्रतिगरं गृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रस्तौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मण: प्रवक्ष्यन्नाह । ब्रह्मोपाप्नुवानीति। ब्रह्मोवोपाप्नेति । 
तैत्तिरीयोपनिषद्‍ अष्टमोड्नुवाक : १ 

ओ३म् ही ब्रह्म है, ओ३म् ही सब कुछ है, संसार ओ३म् ही की रचना है । गुरु शिष्य को जब भी पाठ सुनाने कहते है तब शिष्य ओ३म् कहकर ही पाठ सुनाता है । ओ३म् कहकर ही सामगान करता है । ओ३म् कहकर ही शास्त्र पाठ का आरंभ करता है, और ओ३म् कहकर ही पूर्णाहुति करता है । ओ३म् कहकर ही यर्जुर्वेद का पाठ करता है और ओ३म् कहकर ही अग्निहोत्र करन के करने के लिए कहता है । वैदिक ब्राह्मण ओ३म् कहकर ही प्रवचन करते है और कहते है ओ३म् के द्वारा मे ब्रह्म को प्राप्त कर रहा हुं और वो ओ३म् के द्वारा ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं । 

(९) सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्रदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यम चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत॥
कठो उपनिषद द्रितियवल्ली ॥१५॥ 

अर्थात् – चारो वेद जिस पदका वर्णन करते हैं  सारे तप और नियमादि जिस पद का कथन करते है, जिस पद की  इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य के नियमों का आचरण करते है उस पद को तेरे लिए संक्षेप से ओ३म् है यह कहता हुं । 

(१०) तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्रान ।
यत च्छान्तमजरमृतमभयं परच्चेति ॥
- प्रश्र्नोपनिषद ५-७
अर्थात् :- ओ३म् के आवलंबन से ही विद्वान लोग ब्रह्मलोक को प्राप्त होते है । जो ब्रह्म शांत, अजर, अमर, अभय और सर्वश्रेष्ठ है । ओ३म् का ध्यान करता हुआ जो प्राण का त्याग करता है वो ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है । 

(११) तस्य वाचक : प्रणव : । (योगदर्शन १/२७ )
       उस ईश्वर का वाचक ओ३म् (प्रणव) है ।
(१२) तज्जपस्तदर्थभावनम् । (योगदर्शन १/२८)
        उस परमात्माका जप अर्थ के साथ (ओ३म् इश्वर की)           और साथ में भावना साथ साथ करनी चाहिये । 

(१३) अकारं चाप्युकारं च् मकारं च प्रजापति : ।
वदत्रयान्निरदुयद् भूभर्व: स्वरितीति च् ॥
मनुस्मृति २/७६
परमात्माने ओ३म् अक्षर के अ, उ, म् इन तीन अक्षरो को तथा भू:, भुव:, स्व: गायत्री मंत्र की इन तीन महाव्याहुतिओ को तीनो वेदों में से साररूप निकाला है । 

(१४) एकदक्षरमेतां च जपन्व्याहुतिपूर्विकाम् ।
संध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन पुज्यते ॥  
- मनुस्मृति २-७८
इस ओ३म् अक्षर को और भू:, भुव:, स्व:, इन महाव्याहुतियों सहित साधक को गायत्री मंत्र जपना चाहिए तथा प्रातः सांय संध्योपासनाविधि और वेदाध्ययन के पुण्य़ का सहभागी बनना चाहिये । 

(१५) ओमित्यकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन मामनुस्मरन ।
       य: प्रयाति त्यबन् यह् स् याति परमां गतिम् ॥
         भगवदगीता ८/३१
जो साधक ओ३म् इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ ओ३म् ही का स्मरण करता हुआ देह त्याग करता है वह परमगति को पाता है । 

(१६) वेधं पवित्रमोंकारम् ऋक् साम यजुरेव च ॥  भगवदगीता ९/१७
यह ओ३म्‌कार् पवित्र है, जानने योग्य है,
उस ब्रह्म का उपदेश प्राप्त करने 
ऋग्वद, यजुर्वेद, सामवेद भी जानने योग्य है । 

(१७) ओ३म् तत्सदितिनिर्देशाद ब्राह्मणस्त्रिविध: स्मृत: ॥                भगवदगीता १७/२३
ओ३म् तत् सत् इन तीन पदो मे ब्रह्म का निर्देश है । 

(१८) तस्मादोमित्युदाहत्य यज्ञदानतप: क्रिया ।
        प्रवर्तन्ते विधानोक्ता: सततं ब्रह्म वादिनम् ॥ 
          भगवदगीता १७/२४
ओ३म् इस अक्षर का उच्चारण करके ब्रह्मवेता साधक को विधिपूर्वक यज्ञ, दान, तप इत्यादि कार्य करे अर्थात् ब्रह्मवेत्ता साधक हर काम ओ३म् के साथ ही करें । 

(१९) न नामनीरयित्वा ब्रामण : ब्रह्म वदेयु : ।
        यदि वयपुरब्रम स्यात ॥
        गोपथ ब्राह्मण १-१३
ओ३म् का उच्चारण किये बिना कोइ वेदाध्ययन न करे, अगर ओ३म् का उच्चारण किये बिना वेदाध्ययन किया तो वेदाध्ययन निष्फल होगा । 

(२०) एतद्रयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्रयेवाक्षरं परम् ।
एतद्रयेवाक्षरं सात्वा थो यदिच्छति तस्य तत् ॥
कठोपनिषद  १।२।१६
यह ओ३म् अक्षर ही ब्रह्म है, ओ३म् अक्षर ही सर्वोतम है । इस अविनाशी ओ३म् अक्षर ब्रह्म को जानकर कोई भी जो कुछ भी चाहता है हव उसे प्राप्त कर लेता है । 

(२१) एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥
कठोपनिषद  १।२।१७
ओ३म्‌कार आश्रय ही श्रेष्ठ है, सर्वोतम है । इसी आश्रय के सहारे मोक्षप्राप्ति होती है । 

(२२) ऋग्निरेतं यजुर्भिरन्त रिक्षं स्
सामभिर्यत्कवयो वदपन्ते ।
तमोओ३म्‌कारे णैवायतनेनाविति विद्वान
यच्छान्तमबर् ममृतमभयं परं चेति ॥
प्रश्रोपनिषद ५।७
जब मनुष्य ऋग्, यजु : और साम् (ज्ञान, कर्म और उपासना) तीनो का कामो मे लाता हुआ इस लोक तथा परलोक से उपर ओ३म् इस् ब्रह्म को प्राप्त कर लिया करता है तो शान्त, अमर तथा जरा अवस्था से रहित् होता हैं तभी उसे परमानंद की प्राप्ति होती है । 

(२३) तस्मै स हावाच । इतद्वै सत्यकाम । परं
चापरं च ब्रह्म यादोओ३म्‌कार:
तस्माद्विद्वानेतेनैवाडडयतनेनैकतरमन्वति ॥
प्रश्रोपनिषद ५।२
प्रश्र्नकर्ता को बताया कि जो पर और अपर ब्रह्म है वह ओ३म्‌कार ही है ।
इसीलिए साधक इसी ओ३म्‌कार के सहारे पर ब्रह्म और अपर ब्रह्म दोनो मे से जिसे चाहे उसे प्राप्त कर लेता है । 

(२४) आत्माभैषज्यमात्मकैवल्यमौकार : ।
गोपथ ब्रामण प्रथम प्रपाठक ३० वी कण्डिका 

ओ३मकार आत्मा की चिकित्सा और आत्मा की मुक्ति देने वाला है। 

(२५) अमृतं वै प्रणव: अमृतनैव तन्मृत्यु चरति ।
तध्यथा मंत्रेण वा वंशेन वा गतं संक्रमेत एवं तत्प्रणवनोपसन्तनोति ।।
गोपथ ब्राह्मण तीसरा प्रपाठक ११ वी कण्डिका 

प्रणव = ओ३म् जीवन है जीवन ओ३म् के द्वारा मृत्यु को पार करता है ।  जैसे बांस के द्वारा गढ़ को लांधा जाता है ऐसे ही ओ३म् के द्वारा जीवन मोक्ष को पाता है ।
ओ३म् ही भवसागर से पार लांघनेवाला है । मानव जीवन का आदि और अन्त ओ३म् ही है । शास्त्रो मे ऐसा विधान है जब बालक अथवा बालिका का जन्म हो, तो स्नान के पश्चात सबसे पहेले स्वर्ण की शलाका से मधु तथा धी के साथ बच्चे की जिह्वा पर “ओ३म्” लिखो जन्मकाल से ही मानव को आदेश मिला की तेरी वाणी मे सदा ओ३म् ही रहे, यही तेरे जीवन का आधार है । 

(२६) अद्रष्टविग्रहो देवी भावग्राह्यो मनोमय: ॥
तस्योओ३म्‌कार: स्मुतो नाम तेनाडडहुत: प्रसीदति ॥
योगी याज्ञवल्क्य कहते है,
जो ब्रह्म अद्रश्य है इन इन्द्रियो से देखा नही जाता, जो भावमात्र से गृहित होता है और मनन द्वारा जिसका परिचय होता है उसका नाम ओ३म् है । इस नामसे पुकारने से वह प्रसन्न होता है ।
२७) गुरू नानक देवजी ने भी "ओ३म्" को जपने का आदेश दिया है ।
ओ३म्‌कार ब्रह्म उत्पति, ओ३म्‌कार किया जीन पिता ओ३म्‌कार् सैल जुग भए, ओ३म्‌का वेद् निरमण ओ३म्‌कार शब्द जप रे, ओ३म्‌कार गुरूमुख तेरो ओ३म्‌कार अखर सुनह विचार, ओ३म्‌कार अखर त्रिभुवने सार । 

प्रणवो आदि एक ओ३म्‌कारा, जलथल महीथल कीयो पसारा ॥ 

ओ३म्‌कार् अर्थ विचार 

ओ३म् अक्षर मे परमात्मा के वो सब अर्थ आ जाते है जो परमात्मा के गुणॊ मे आते है । ओ३म् के तीन विभाग अकार, उकार, मकार 

अ - विराट्, अग्नि, विश्व आदि ।
जो सब जगत को प्रकाशित करता है ।
इसका अर्थ सत् भी है । 

उ - हिरण्यगर्भ, वायु, तेजस ।
जो तेज प्रधान वस्तुओ का ठिकाना तथा आचार है । अनन्त बलवाला तथा सारे जगत को जानने वाला तथा धारण करने से वायु । इसका अर्थ चित् भी है । 

म् - ईश्, प्राज्ञ, आदित्य ।
जैसे परमात्माके गुण अनंत है वैसे जैसे ओ३म् के अर्थ भी अनेक है। इसका अर्थ आनंद भी है । 

संक्षेप मे ओ३म् का अर्थ हुआ -
          "सच्चिदान्द स्वरुप परमात्मा"
तो ओ३म् ही जीवन है, ओ३म् ही आधार है, ओ३म् ही बल है, ओ३म् ही ज्ञान है, ओ३म् ही विज्ञान है, ओ३म् ही प्राण है, ओ३म् ही विवेक है, ओ३म् ही प्रकाश है, ओ३म् ही कर्ता है, ओ३म् ही विधाता है, ओ३म् ही सर्व रक्षक है, ओ३म् ही परब्रह्म है, ओ३म् ही अपर ब्रह्म है, ओ३म् ही माता है, ओ३म् ही पिता है, ओ३म् ही सखा है, ओ३म् ही बन्धु है, ओ३म् ही ज्योति है, ओ३म् ही सच्चिदान्द है, ओ३म् ही सृष्टिकर्ता है, ओ३म् ध्यान है, ओ३म् सर्वव्यापक है, ओ३म् सर्वान्तरयामी है, ओ३म् ही सर्वविद है, अन्त में ओ३म् ही सार है ।

                             ॥ ओ३म् शम ॥ 
         साभार - आर्य रत्न पंडित लखन लाल शिक्षक 
                           वयं राष्ट्रे जागृयाम


Wednesday, 8 January 2025

पतंजलि योगदर्शन मूल सूत्राणि

                               ॥ॐ॥
                  अथ पातञ्जल योगदर्शनम्
                           (मूल सूत्राणि)

  ॥卐॥ ꧁◕अथ प्रथमः समाधिपादः◕꧂॥卐॥ 
 
१. अथ योगानुशासनम् । 

२. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः । 

३. तदा दष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् । 

४. वृत्तिसारूप्यमितरत्र । 

५. वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः । 

६. प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः । 

७. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि । 

८. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् । 

९. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः । 

१०. अभावप्रत्ययालम्बनावृत्तिर्निद्रा । 

११. अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः । 

१२. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः । 

१३. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ।

१४. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः । 

१५. दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् । 

१६. तत्परं पुरु षख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् । 

१७. वितर्कविचारानन्दास्मितास्यानुगमात् सम्प्रज्ञातः । 

१८. विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः । 

१९. भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् । 

२०. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् । 

• २१. तीव्रसंवेगानामासन्नः । 

• २२. मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः । 

२३. ईश्वरप्रणिधानाद्वा । 

२४. क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः । 

२५. तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् । 

२६. स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेना- नवच्छेदात् । 

२७. तस्य वाचकः प्रणवः । 

२८. तज्जपस्तदर्थभावनम्

२९. ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमो ऽप्यन्तरायाभावश्च ।
       व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरति- 

३०. भ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानव- स्थितत्वानि
        चित्तविक्षेपास्ते ऽन्तरायाः ।
३१. दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः 

३२. तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः । 

३३. मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां
      भावनातश्चित्तप्रसादनम् । 

३४. प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य । विषयवती वा प्रवृत्तिस्त्पन्ना मनसः 

३५. स्थितिनिबन्धनी । 

३६. विशोका वा ज्योतिष्मती । 

३७. वीतरागविषयं वा चित्तम् । 

३८. स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा । 

३९. यथाभिमतध्यानाद्वा । 

४०. परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः 

४१. क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहण- ग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः । 

४२. तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः सङ्कीर्णा सवितर्का समापत्तिः । 

४३. स्मृतिपरिशुद्धौ स्वस्यशून्येवार्थमात्र- निर्भासा निर्वितर्का । 

४४. एतयैव सविचारा निर्विचारा च- 

सूक्ष्मविषया व्याख्याता । 

४५. सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् । 

४६. ता एव सबीजः समाधिः । 

४७. निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः । 

४८. ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा । 

४९. श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् । 

५०. तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी । 

५१. तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः । 

                     इति प्रथमः समाधिपादः
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  ॥卐॥ ꧁◕अथ द्वितीयः साधनपादः◕꧂॥卐॥  

१. तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः । 

२. समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च । 

३. अविद्याऽस्मिता रागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः । 

४. अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनु- विच्छिन्नोदाराणाम् । 

५. अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचि- सुखात्मख्यातिरविद्या । 

६. दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता । 

७. सुखानुशयी रागः । 

८. दुःखानुशयी द्वेषः । 

९. स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढो ऽभिनिवेशः । 

१०. ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः । 

११. ध्यानहेयास्तवृत्तयः । 

१२. क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः । 

१३. सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भागाः । 

१४. ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् । 

१५. परिणामतापसंस्कारदुःखैःर्गुणवृत्ति- विरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः । 

१६. हेयं दुःखमनागतम् । 

१७. द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः । 

१८. प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम् । 

१९. विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि । 

२०. द्रष्टय दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः । 

२१. तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा । 

२२. कृतार्थम्प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ।

२३. स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः । 

२४. तस्य हेतुरविद्या । 

२५. तदभावात् संयोगाभावो हानं तदृशेः कैवल्यम् । 

२६. विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः । 

२७. तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा । 

२८. योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः । 

२१. यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहार- धारणाध्यानसमाधयो ऽष्टावङ्गानि । 

३०. अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ।

३१. जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् । 

३२. शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वर- प्रणिधानानि नियमाः । 

३३. वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् । 

३४. वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा
       दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् । 

३५. अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः । 

३६. सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । 

३७. अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् । 

३८. ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । 

३९. अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः । 

४०. शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः । 

४१. सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रिय-जयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च । 

४२. सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः । 

४३. कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः । 

४४. स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः । 

४५. समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् । 

४६. स्थिरसुखमासनम् । 

४७. प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् । 

४८. ततो द्वन्द्वानभिघातः । 

४९. तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गति- विच्छेदः प्राणायामः। 

५०. बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकाल- संख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः । 

५१. बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः । 

५२. ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् । 

५३. धारणासु च योग्यता मनसः । 

५४. स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः । 

५५. ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् । 

                   इति द्वितीयः साधनपादः
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  ॥卐॥ ꧁◕अथ तृतीयो विभूतिपाद:◕꧂॥卐॥   

१. देशबन्धश्चित्तस्य धारणा । 

२. तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् । 

३. तदेवार्थमात्रनिर्भासे स्वरूपशून्यमिव समाधिः । 

४. त्रयमेकत्र संयमः । 

५. तज्जयात् प्रज्ञालोकः । 

६. तस्य भूमिषु विनियोगः । 

७. त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः । 

८. तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य । 

९. व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभव- प्रादुर्भावौ
      निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः । 

१०. तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् । 

११. सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः । 

१२. ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता
       परिणामः । 

१३. एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्था- परिणामा
       व्याख्याताः । 

१४. शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी । 

१५. क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः । 

१६. परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् । 

१७. शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्सङ्कर-
       स्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् । 

१८. संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम् । 

१९. प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् । 

२०. न. च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् । ** 

२१. कायरूपसंयमात् तद्‌ग्राह्यशक्तिस्तम्भे
       चक्षुष्प्रकाशाऽसम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् । 

२२. सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म 
       तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा । 

२३. मैत्र्यादिषु बलानि । 

२४. बलेषु हस्तिबलादीनि । 

२५. प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् । 

२६. भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् । 

२७. चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् । 

२८. ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् । 

२९. नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् । 

३०. कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ।

३१. कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् । 

३२. मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् । 

३३. प्रातिभाद् वा सर्वम् । 

३४. हृदये चित्तसंवित् । 

३५. सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासङ्कीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः
       परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् । 

३६. ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वाद- वार्ता जायन्ते । 

३७. ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः । 

३८. बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य
       परशरीरावेशः । 

३९. उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च । 

४०. समानजयाज्ज्वलनम् । 

४९. श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् । 

४२. कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूल-
       समापत्तेश्चाकाशगमनम् । 

४३. बहिरकल्पितावृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः । 

४४. स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद भूतजयः। 

४५. ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च । 

४६. रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् । 

४७. ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्व- संयमाद् इन्द्रियजयः । 

४८. ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च । 

४९. सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं
       सर्वज्ञातृत्वं च । 

५०. तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् । 

५१. स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् । 

५२. क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् । 

५३. जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् - तुल्ययोस्ततः
       प्रतिपत्तिः । 

५४. तारकं सर्वविषयं सर्वथा विषयमक्रमं चेति विवेकजं
       ज्ञानम् । 

५५. सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ।
नोट **   = ५४ ( २० वा सूत्र काटा हुआ है इसलिए ( ५५-१ =५४ सूत्र ही हैं संभवतः)

                  इति तृतीयोः विभूति-पादः।
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॥卐॥ ꧁◕अथ चतुर्थ: कैवल्यपाद:◕꧂॥卐॥   

१. जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः । 

२. जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् । 

३. निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् । 

४. निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् । 

५. प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् । 

६. तत्र ध्यानजमनाशयम् । 

७. कर्माशुक्लाकृष्णं - योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् । 

८. ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर् वासनानाम् । 

९. जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं-
     स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् । 

१०. तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् । 

११. हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदद्भावः । 

१२. अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद् धर्माणाम् । 

१३. ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः । 

१४. परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् । 

१५. वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः । 

१६. न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् । 

१७. तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताऽज्ञातम् । 

१८. सदाज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् । 

१९. न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् । 

२०. एकसमये चोभयानवधारणम् । 

२१. चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च । 

२२. चितेरप्रतिस‌ङ्क्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् । 

२३. द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् । 

२४. तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् । 

२५. विशेषदर्शिन आत्मभावभावना- विनिवृत्तिः । 

२६. तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं- चित्तम् । 

२७. प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः । 

२८. हानमेषां क्लेशवदुक्तम् । 

२९. प्रस‌ङ्ख्याने ऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः
       समाधिः । 

३०. ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः 

३१. तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् । 

३२. ततः कृतार्थानां परिणाम क्रमसमाप्तिर्गुणानाम् । 

३३. क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिग्रह्यः क्रमः । 

३४. पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं
       स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।

                 इति चतुर्थः कैवल्यपादः । 
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              समाप्तञ्चेदं श्रीमद्भगवन्महर्षि-    
         पतञ्जलिमुनिप्रणीतं योगदर्शनशास्त्रम्। 
      शुक्रवार मार्गशीर्ष शुक्ल १३ विक्रम संवत २०८१ 
                        13 दिसंबर 2024  
                         वयं राष्ट्रे जागृयाम

मस्तिष्क की नियमावली (Manual Of Mind)

                                 ॥ॐ॥
                         ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥
                       ( Manua Of Mind )

          यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
          ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
                                              ( गीता ४/३७ )
   अर्थात -  जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है। उसी तरह हे अर्जुन ज्ञान रूपी अग्नि भौतिक कर्मों के फल को भस्म कर देती है।

        अब यह बात शब्द के रूप में सबको समझ में आ जाती है। परंतु कृष्ण कह क्या रहे हैं इसे समझना दुरूह है। 
     "ज्ञानाग्नि" 
अब यह क्या बला है ? कोई समझाए तो समझाए कैसे ?

     समस्त कर्मों के परिणाम होते हैं यह तो सर्वकालिक सत्य है। कर्मों के परिणाम के कारण ही जन्म जन्मांतर का बंधन निर्मित होता है। परंतु यह कौन सी आग है जिसे भस्म करने की बात योगेश्वर श्री कृष्ण कर रहे हैं? 

     चक्रों के अनुसार आज्ञा चक्र होता है दो भृकुटियों के मध्य में। मेडिकल साइंस के अनुसार वहीं पर prefrontal cortex होता है जिससे समस्त कॉग्निटिव ( संज्ञानात्मक ) या perceptional विचारों का जन्म होता है। अर्थात सोच विचार, गुना भाग, उचित अनुचित, भूत भविष्य सब का सब मस्तिष्क के उसी हिस्से में चलता है। 

       परंतु हमें यह पता नहीं चलता या संभवत: कभी कभार यह पता चलता है कि हम सोच क्या रहे हैं?
है न यह आश्चर्य की बात।

       कभी ध्यान दिया आपने इस बात पर ? इसे अचेतन मन कहा जाता है अध्यात्म की भाषा में। हमारे जीवन का लगभग 99 प्रतिशत भाग अचेतन अवस्था में गुजरता है। 

      कृष्ण कह रहे हैं कि यदि आप चैतन्य रहते हैं और आपको यह पता चलता रहता है कि आपके भौतिक शरीर और मानसिक चेतना में क्या क्या चल रहा है, तो मात्र उसे देखने या जानने से समस्त कर्मों के फलों का दहन हो जाता है जैसे आग में कोई लकड़ी डालने से उकसा दहन हो जाता है।

    पतंजलि ने इसे कहा हैं " स्वाध्याय " । 
यह नियम का अंग है । नियम पांच हैं - 
       शौच, संतोष, तप स्वाध्याय, ईश्वर प्रणनिधान। 

      "स्वाध्याय"  अर्थात अपने मन में क्या चल रहा है निरंतर उसको देखते रहना। 
       मानसिक क्लेशों से घिरे इस संसार में इससे बड़ा उपयोगी कोई मंत्र नहीं है। मेरी बात पर विश्वास न करना। करके देखना। 
        जब कभी भी परेशान हो किसी बात को लेकर, क्लेषित हो किसी कारण वश। आंख मूंदकर बैठ जाओ। और देखो क्या चल रहा है तुम्हारे मन में। मात्र देखो, उसको न छेड़ो न उसका विश्लेषण करो, न उसके बारे में गलत सही का निर्णय लो। मात्र देखो। 
        परेशानी तो खत्म नहीं होगी, क्योंकि संसार में चुनौतियां हैं जिनको तुम्हें जीतना ही है। इसी की दौड़ है जीवन भर में। परंतु उन परेशानियों से परेशान होना कम हो जायेगा। या समाप्त हो जायेगा। इतना निश्चित है। 

                   साभार - ✍️भगवद्गीता समूह 
                          वयं राष्ट्रे जागृयाम