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Friday, 25 April 2025

वॉटर ट्रीटी सिंधु जल समझौता भारत पाकिस्तान 1960 और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का पाकिस्तान के प्रति प्रेम तथा भारत के प्रति द्वेषपूर्ण भावना

उच्चायुक्त ही खरीद लिया...

वॉटर ट्रीटी सिंधु जल समझौता में एक बड़ी इंटरेस्टिंग खबर आ रही है, खबर बताता हूं उससे पहले समझिए कि वॉटर ट्रीटी थी क्या ?

सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी, जिसमें सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों - सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज के पानी के उपयोग को नियंत्रित किया जाता है।
 इस सन्धि में विश्व बैंक ने मध्यस्थता की। इस संधि पर कराची में 19 सितंबर, 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।

सबसे बड़ी बात नेहरू ने भारत को धोखे में रखते हुए संधि की जिसके अनुसार सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों का पानी भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित किया गया था।
भारत को सिंधु नदी प्रणाली का 20% पानी और पाकिस्तान को 80% पानी का अधिकार मिला।

नदिया निकली भारत से ओर पानी 80% मिलेगा पाकिस्तान को 

क्यों भाई पाकिस्तान में ऐसा क्या किया कि उसे ही पानी मिलेगा भारत 20% में संतुष्ट हो जाएगा यह कहते हुए कि भारत के पास तो बहुत पानी है
हम 20% में खुश है
यह नेहरू की मक्कारी ही थी

 2016 में उड़ी में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को पानी देने से इनकार कर दिया था।

इंटरेस्टिंग बात यहीं से शुरू होती है कि आप किसी भी जल समझौते को और रोक या तोड़ तो सकते हो पर उसके प्रभाव को कैसे रोकोगे
पानी कहा ले जाओगे

मसलन आप पानी देने से इनकार कर सकते हो मगर जो नदियों का पानी आ रहा है उसको आप कैसे रोकोगे और कहां पर इकट्ठा करोगे 

तो मोदी सरकार ने एक बड़ा अच्छा काम किया पाकिस्तान की जो उच्चायुक्त थे उसको ही खरीद लिया था 

समझ रहे हो आप किसको खरीदा पाकिस्तान के उच्चायुक्त को

 2016 से 2019 तक भारत की सरकार उसे नदी पर धीरे-धीरे अपने बांध (बिजली परियोजना नाम देकर) बनाने का काम शुरू कर दिया और फिर पानी भारत की तरफ मोड़ने के अपने प्लान पर काम चालू कर दिया 

जिस पर कोई चर्चा ना मीडिया में हुई ना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई और जिस उच्चायुक्त को खरीदा था उसने पाकिस्तान सरकार को धोखे में रखा कि यहां पर कोई ऐसा निर्माण नहीं हो रहा है ऐसा कुछ नहीं है 

अब क्योंकि सारी व्यवस्थाएं हो चुकी हैं तो भारत सरकार भी इस ट्रीटी के लिए तैयार बैठी थी और जैसे ही उसे मौका मिला उसने इस समझौते को तोड़ दिया
और 
तो फिर उसे उच्चायुक्त का क्या हुआ कल के बाद जिसे खरीदा गया था 
वह पूर्व उच्चायुक्त भारत से भी गायब है और पाकिस्तान से भी गायब है और वह कनाडा में सुरक्षित अपना राजनीतिक संरक्षण ले चुका है
और शायद उसे यह करवाने में भी भारत की ही सरकार थी 

अब समझिए कि मोदी सरकार ने 2016 मैं बांध बनना शुरू किया और लक्ष्य रखा था 2026 तक सभी बांध बन जाए

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई सिंधु जल संधि के तहत, 
भारत को सतलुज, ब्यास और रावी (पूर्वी नदियाँ) का पूर्ण उपयोग अधिकार मिला है,

 जबकि पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब (पश्चिमी नदियाँ) के पानी का अधिकार है।

 2016 के बाद भारत ने अपनी जल संसाधनों के उपयोग को बढ़ाने के लिए कई बांध परियोजनाएँ शुरू कीं या तेज़ कीं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं:

1. किशनगंगा जलविद्युत परियोजना (झेलम की सहायक नदी पर)

स्थान: बांदीपोरा, जम्मू-कश्मीर

क्षमता: 330 मेगावाट

परियोजना विवरण: यह रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना है, जो किशनगंगा नदी (पाकिस्तान में नीलम नदी) के पानी को झेलम बेसिन में मोड़ती है। पाकिस्तान ने इस पर आपत्ति जताई थी, लेकिन 2013 में पंचाट ने भारत को न्यूनतम 9 क्यूमेक्स प्रवाह बनाए रखते हुए परियोजना को जारी रखने की अनुमति दी।

परिचालन प्रारंभ: मई 2018 में बनकर तैयार 

2. रतले जलविद्युत परियोजना (चिनाब नदी पर)

स्थान: किश्तवाड़, जम्मू-कश्मीर

क्षमता: 850 मेगावाट

परियोजना विवरण: यह परियोजना 133 मीटर ऊँचे ग्रेविटी डैम के साथ चिनाब नदी पर बन रही है। पाकिस्तान ने इसके डिज़ाइन पर आपत्ति जताई थी, लेकिन विश्व बैंक ने 2017 में भारत को निर्माण की अनुमति दी।

निर्माण प्रारंभ: 2022, अपेक्षित पूर्णता 2026

3. शाहपुरकंडी बांध परियोजना (रावी नदी पर)

स्थान: पठानकोट, पंजाब

क्षमता: 206 मेगावाट

परियोजना विवरण: यह परियोजना रावी नदी के पानी को भारत में उपयोग करने के लिए बनाई गई है, जिससे पाकिस्तान को जाने वाला अनियंत्रित प्रवाह रोका जा सके। इससे पंजाब और जम्मू-कश्मीर में सिंचाई सुविधा भी बढ़ेगी।

निर्माण प्रारंभ: 2014, बांध निर्माण पूर्ण: फरवरी 2024

4. पकल डुल बांध (चिनाब की सहायक नदी पर)

स्थान: किश्तवाड़, जम्मू-कश्मीर

क्षमता: 1,000 मेगावाट

परियोजना विवरण: यह बांध मरुसुदर नदी पर बन रहा है, जो चिनाब की सहायक नदी है। परियोजना का उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन है।

निर्माण प्रारंभ: 2018, अपेक्षित पूर्णता 2023

5. लखवार-व्यासि परियोजना (यमुना नदी पर)

स्थान: देहरादून, उत्तराखंड

क्षमता: 927 मेगावाट (लखवार: 300 मेगावाट, व्यासी: 120 मेगावाट)

परियोजना विवरण: यमुना नदी पर यह परियोजना बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए बनाई जा रही है। हालांकि यमुना सिंधु प्रणाली का हिस्सा नहीं है, लेकिन यह परियोजना भारत के जल संसाधनों के समग्र उपयोग की दिशा में एक कदम है।

निर्माण प्रारंभ: 2018, अपेक्षित पूर्णता: 2022

इन परियोजनाओं के माध्यम से भारत ने अपने जल संसाधनों के उपयोग को बढ़ाया है, जिससे पाकिस्तान को जाने वाले पानी की मात्रा में कमी आई है। पाकिस्तान ने इन परियोजनाओं पर आपत्ति जताई है, लेकिन भारत का कहना है कि ये परियोजनाएँ सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुरूप हैं।

अब आप सोचिए कि 2016 में मोदी सरकार ने आते ही सबसे पहले काम यही किया था जो यह बांधों की लिस्ट है यह 2016 में बनना शुरू हुए थे और 2026 तक लगभग सारे बांध बन जाने थे पर 2025 तक बना लिए गए।

अब सबसे कम की बात सुनिए भारत सरकार ने तो यह बांध बना भी लिए और पानी रोक भी लगा मगर आप स्क्रीनशॉट ले लो।

इस संधि विराम पर भारत का सुप्रीम कोर्ट स्टे देगा और इस संधिविराम परियोजना के खिलाफ कांग्रेस मैदान में उतरेगी।

और कांग्रेस के वकील केस लड़ेंगे की पाकिस्तान को पानी दिया जाए।

( आप मेरी इस पोस्ट का स्क्रीनशॉट रख लो एक महीने के भीतर आपको वह होता भी दिख जाएगा। साहिल पटेल)

           साभार - आँखों देखी - साहिल पटेल के साथ
           ( फेसबुक पोस्ट 25/04/20250)

Thursday, 24 April 2025

चित्त − लक्षण और कार्य

                  चित्त − लक्षण और कार्य
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( सभी प्रमुख प्राचीन एवं मध्ययुगीन संस्कृत ग्रन्थों में “चित्त” के बारे में जो कुछ भी है उस सबका निचोड़ प्रस्तुत है जो आधुनिक लेखकों द्वारा “चित्त” की भ्रामक परिभाषा आदि पर भ्रान्तियों का निवारण करेगा,प्रस्तुत वस्तु में एक भी विचार मेरा नहीं है किन्तु संस्कृत ग्रन्थों का सन्दर्भ नहीं दे रहा हूँ ताकि विस्तार न हो । )

प्रकृति के तीनों गुणों − सत रज तम − में साम्य रहता है तो प्रकृति अव्यक्त हो जाती है और पुरुष से सम्बन्ध टूट जाता है जिसे मोक्ष कहते हैं । प्रकृति के तीनों गुणों में साम्य नहीं रहता तो वह व्यक्त होती है जो जीवावस्था देती है । बुद्धि अहं मन − इन तीन अन्तःकरणो और दस बाह्य करणों — पाँच कर्मेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों — में जब ईच्छायें जागती हैं तब प्रकृति विषम हो जाती है । ये सारे करण प्रकृति के तत्व हैं,चित्त कोई तत्व नहीं बल्कि दर्पण है जिसपर ईच्छाओं के कारण बाह्य संसार से प्राप्त अथवा मनसंकल्पित वृत्तियाँ उभरती है जिसे जीव देखकर भ्रमित होता रहता है और आत्मज्ञान को भूलकर अहं को आत्म समझकर चित्त का कर्ताभाव से “भोग” करता है,किन्तु इस अस्मिता के टूटने पर जीव में कर्ताभाव नहीं रहता और साक्षीभाव से चित्त को पराया समझकर केवल दर्शन करता है तो वृत्तियाँ क्षीण होने लगती है और अन्ततः चित्त का जाल टूटने लगता है । साक्षीभाव से दर्शन ही समस्त वैदिक दर्शनों का सार है।
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              🔶 चित्त के मूलभूत लक्षण🔶
क्रमांक-लक्षण
❄ व्याख्या
1️⃣ प्रख्या-शीलता 
❄ चित्त ज्ञान-प्रदर्शनशील है, अर्थात विषयों को प्रकट करता है
2️⃣ प्रवृत्ति-शीलता 
❄ चित्त गति में प्रवृत्त होता है — संकल्प, विकल्प, स्पन्दन
3️⃣ स्थिति-शीलता 
❄ चित्त में स्थित होने की प्रवृत्ति है — वह विषयों को धारण कर टिकता है
4️⃣ त्रिगुणात्मकता 
❄ चित्त सत्त्व, रजस, तमस् — इन तीन गुणों से बना है, और उनके अनुपात से बदलता है
5️⃣ परिणामी 
❄ चित्त परिणामशील है — उसमें अवस्थाएँ आती-जाती हैं (क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध)
6️⃣ दर्श्यत्व 
❄ चित्त दृश्य (object) है — यह स्वप्रकाश नहीं, अपितु पुरुष द्वारा प्रकाशित होता है
7️⃣ अनात्मा
❄ चित्त स्व नहीं है, आत्मा नहीं है — यह केवल "प्रकाश में दिखने वाला परदा" है
8️⃣ परार्थत्व
❄ चित्त स्वार्थहीन है — इसका निर्माण केवल पुरुष (भोक्‍ता) के भोग/मोक्ष हेतु होता है
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                    🔶 चित्त के कार्य🔶
क्रमांक - कार्य 
❄ विवरण
1️⃣ वृत्तियों का क्षेत्र 
❄ चित्त में ५ वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं : प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति
2️⃣ प्रतिबिम्बदर्शी 
❄ चित्त पुरुष के चैतन्य का प्रतिबिंब धारण करता है — चैतन्य उसमें प्रतिबिम्बित होता है
3️⃣ विषय-धारक
❄ चित्त शब्द, रूप, रस आदि इन्द्रियविषयों को ग्रहण करता है और उनमें रूपान्तरित होता है
4️⃣ स्मृति-आधार
❄ चित्त संस्कार और स्मृतियों का भण्डार है (इसी कारण इसे लोग कभी-कभी ‘चित्त’ को अलग मान लेते हैं)
5️⃣ वासनाओं का आश्रय
❄ चित्त संख्याहीन वासनाओं का आश्रय है — वही इसके विविध परिणामों को जन्म देती हैं
6️⃣ द्रष्टा से भेद में भ्रम 
❄ चित्त स्वयं को द्रष्टा समझ लेता है, जब पुरुष उसमें प्रतिबिम्बित होता है, यही अविद्या है
7️⃣ विपरीत बोध का कारण 
❄ जब चित्त में रजस् और तमस् प्रधान हो जाते हैं, तब अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य जैसे क्लेश उत्पन्न होते हैं
8️⃣ सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि का माध्यम
❄ चित्त की वृत्तियों के निरोध से सम्प्रज्ञात समाधि, और वासनाओं के पूर्ण क्षय से असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है
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                 🔶 चित्त की अवस्थाएँ🔶
अवस्था ..........गुण-विकास ....विशेषता
① क्षिप्त ........रजस् प्रधान ....चञ्चल, विषयासक्त
② मूढ़ ..........तमस् प्रधान .....मोहग्रस्त, अज्ञानपूर्ण
③ विक्षिप्त ...मिश्रित ..............कभी चञ्चल, कभी रुचि, ध्यान नहीं टिके
④ एकाग्र .....सत्त्व प्रधान ......एकाग्रता, आरम्भिक समाधि
⑤ निरुद्ध .....सत्त्व शुद्ध ........वृत्तिनिरोध, समाधिस्थ
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                  🔶 चित्त बनाम चैतन्य🔶
चित्त ...................चैतन्य (पुरुष)
परिणामी ...........अपरिणामी
दृश्य ...................द्रष्टा
त्रिगुणात्मक .......निर्गुण
वासनामय .........स्वभावतः शुद्ध
परार्थ .................स्व-स्वरूप में स्थित
अनुभूति नहीं ...केवल साक्षी
बिम्ब-धारक .....बिम्बदाता
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               🔶 दर्शन की अन्तर्ध्वनि🔶
"चित्त केवल दर्पण है। उसकी वृत्तियाँ लहरें हैं। जब पुरुष उनमें उलझता है, तब वह स्वयं को भूल जाता है।
जब चित्त शान्त होता है, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।"
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                 🔱 चित्त–तत्त्व–विवेचनम् 
         (संस्कृत-संलिप्त श्लोकपंक्ति श्रृंखला)
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१. **त्रिगुणैः प्रकृतिः व्यक्ता, सम्यग् साम्ये तु सा अव्यक्ता।
तदा मोक्षः स्फुरति हि चेत, यदा च पुरुषात् सैव निवृत्ता॥**

🪔 प्रकृति जब सत्त्व–रजस्–तमस् के असंतुलन में रहती है, तो वह व्यक्त रूप धारण करती है — यही जीवावस्था है। परंतु जब तीनों गुण साम्य को प्राप्त होते हैं, तब प्रकृति पुनः अव्यक्त हो जाती है, और पुरुष से उसका सम्बन्ध टूट जाता है — यही मोक्ष है।
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२. **बुद्धिर्बोधप्रदाता स्यात्, अहङ्कारः 'अहं' स्मृतिः।
मनः संकल्पविकल्पात्मा, चित्तं तु केवलं दर्पणः॥**

🪔 बुद्धि निर्णय करती है, अहंकार ‘मैं’ की भावना है, मन विकल्पों की गूँज है — परन्तु चित्त कोई तत्व नहीं है, वह केवल दर्पण है, जो अनुभवों को परावर्तित करता है।
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३. **इच्छाजागरणे कर्मेन्द्र्यादिभिः, चित्ते वृत्तयः स्फुरन्ति।
प्रकृतिविकाराः ते, पुरुषदर्शने भ्रमं जनयन्ति॥**

🪔 जब इन्द्रियाँ और करण इच्छाओं से संचालित होती हैं, तब चित्त पर अनेक वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं — ये वृत्तियाँ ही जीव को भ्रमित करती हैं, क्योंकि वह उन्हें अपना अनुभव समझ बैठता है।
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४. **साक्षिणं पुरुषं त्यक्त्वा, चित्तं चात्मा इति मन्यते।
अस्मिता जायते तेन, कर्तृत्वभोगयोः कारणम्॥**

🪔 जब पुरुष अपने साक्षीस्वरूप को भूलकर चित्त को ही आत्मा मान लेता है, तब अस्मिता उत्पन्न होती है — यही कर्ता और भोक्ता बनने की प्रवृत्ति है।
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५. **यदा अस्मिता विनश्यति, साक्षिभावः स्फुरति पुनः।
तदा चित्तवृत्तिनाशः, आत्मबोधः उदेति हि॥**

🪔 जब यह झूठा 'मैं' टूटता है, तब साक्षीभाव जागता है। इस साक्षीभाव से चित्त की वृत्तियाँ क्षीण होती हैं, और आत्मज्ञान का उदय होता है।
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६. **वृत्तिक्षये चित्तं शान्तं, गुणसाम्यं प्रकृतौ भवेत्।
प्रकृतेः निवृत्त्याः क्षणे तस्मिन्, मुक्तः स्यात् पुरुषोऽखिलः॥**

🪔 जब चित्त की वृत्तियाँ लुप्त हो जाती हैं, तब प्रकृति के गुण साम्य को प्राप्त होते हैं। उस क्षण प्रकृति पुरुष से निवृत्त हो जाती है, और वही मोक्ष की सिद्धि है।
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                       📜 समापनश्लोकः
**नाहं चित्तं न बुद्धिर्मनः, नाहं कर्ता न भोक्ता च।
साक्षी केवल आत्मा सन्, मुक्तः स्यां यदा वृत्तिशून्यः॥

🪔 “मैं न तो चित्त हूँ, न मन, न बुद्धि, न कर्ता, न भोक्ता — जब मैं केवल साक्षी रूप में स्थित हो जाता हूँ, तब वृत्तिशून्यता के माध्यम से पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है।”
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                      ✍️ साभार - विनय झा
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                          वयं राष्ट्रे जागृयाम
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Friday, 4 April 2025

"जाँगिड़ ब्राह्मण" विश्वकर्मा के वंशज नहीं है विस्तृत स्पष्टीकरण -

 "जाँगिड़ ब्राह्मण" विश्वकर्मा के वंशज नहीं है विस्तृत स्पष्टीकरण - 🙏

देखो भई... किसी कुल से सम्बन्ध का निर्णय हम गोत्र के आधार पर दो तरह से कर सकते है क्यूंकि जैसे कि मैंने कई बार बताया है, गोत्र दो तरह से होता है-
 
प्रथम प्रकार - " किसी कुल में जन्म लेने से रक्त संबंध वाला गोत्र।"

कुल-गोत्र - जिस कुल शाखा में जो महान पूर्वज हुआ होता है उस कुल शाखा के लोग उस महान पूर्वज से अपना सम्बन्ध बताने के लिए उसके नाम को अपने गोत्र के रूप में प्रयोग लेते है...

द्वितीय प्रकार - " किसी गुरु ऋषि से विद्या प्राप्त करने से गुरु - शिष्य वाला गोत्र।" 
गुरु-गोत्र - पहले के समय में शिष्य जिस ऋषि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते थे, उस ऋषि से अपना विद्या सम्बन्ध बताने के लिए उस ऋषि के नाम को अपने गोत्र के रूप में प्रयोग लेते थे..

जैसे गुर्जर गौड़ ब्राह्मण - गौड़ ब्राह्मणों की वह शाखा जिसने गुर्जर देश में गौतम ऋषि के आश्रम में रहकर अपनी वंश परंपरा का विस्तार किया वो कहलाये गुर्जर गौड़ ब्राह्मण l विद्या के संबंध से इनके पूरे कुल का गोत्र गौत्तम हुआ।

 इसी प्रकार कई होते है लेकिन पोस्ट बड़ी हो जायेगी इसीलिए नहीं लिख रही हूं... फिर कभी चर्चा होगी तब बता दूंगी...

अब ये स्पष्ट है कि आप किसी व्यक्ति विशेष से सम्बंधित तब कहे जा सकते हैं, जब या तो आपने उस व्यक्ति विशेष के कुल में जन्म लिया हो या शिक्षा ग्रहण की हो..

अब जांगिड़ ब्राह्मणों में कुल अठारह गोत्र कहे जाते है यथा
 कश्यप, भारद्वाज, गौतम, विद, जातूकर्ण्य, शांडिल्य, ऋक्षु, दीर्घतमा,वशिष्ठ, वात्स्य, वत्स, वामदेव, अघमर्षण, गाविष्टर, कौडिन्य, लोंगाक्षी, मुद्गल, उपमन्यु।

एक शासन और होता है शासन मतलब ग्राम जिस ऋषि गोत्र के जांगिड ब्राह्मण जिस गाँव में बसाये गए वो उनका शासन कहलाया शासन को ग्राम या खेड़ा या अवंटक या अल्लह या उपगोत्र आदि भी कहते है जैसे - खुड़ाणियां, राजोतिया, राजोरा, डेरोलिया, रोलीवाल, तोनगरिया, बांस, कूकसवाल,शिवाड, सहदवाल आदि जांगिड़ ब्राह्मणों के 1444 शासन होते हैं।

अब हमें विश्वकर्मा जी से जांगिड़ समाज के संबंध पर गोत्र पर बात करनी थी तो आओ शुरू करते है।

अब हम जांगिड़ ब्राह्मणों के अठारह गोत्रों के गोत्रकार ऋषियों की उत्पत्ति पर चर्चा करेंगे।

कश्यप- ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक मारीचि के पुत्र हुए।

भारद्वाज - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक अंगिरा(अंगिरस) के पुत्र बृहस्पति के पुत्र हुए।

गौत्तम - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक अंगिरा(अंगिरस) के पुत्र रहूगण के पुत्र हुए।

विद - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक भृगु के कुल में हुए थे।

जातूकर्ण्य - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक वशिष्ठ के पुत्र शक्ति के पुत्र जातूकर्ण्य हुए।

शांडिल्य - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक मारीचि के पुत्र कश्यप हुए जिनके आगे शांडिल्य ऋषि हुए।

ऋक्षु - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक अंगिरस या अंगिरा के बृहस्पति और बृहस्पति के भारद्वाज और भारद्वाज के कुल में कई विख्यात शिल्पाचार्य हुए जिनमे वंदन के मतवचस, मतवचस के अजमीढ़ और पुरमिड हुए, अजमीढ़ के पुत्र ऋक्षु हुए।

दीर्घतमा - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरस या अंगिरा हुए तथा वायुपुराण के अनुसार जिनके पुत्र दीर्घतमा हुए।

वशिष्ठ - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक महर्षि वशिष्ठ हुए।

वात्स्य - वैवस्त मनु के पोते नाभाग के पुत्र अंबरीश ने विद्या सम्बन्ध से अंगिरस गोत्र को स्वीकार कर लिया था इनके पुत्र युवनाश्व, युवनाश्व के पुत्र वात्स्य हुए।

वत्स - भृगु के च्यवन, च्यवन के अप्नवान, अप्नवान के और्व, और्व के ऋचीक, ऋचीक के जमदग्नि और जमदग्नि के कुल में वत्स हुए।

वामदेव - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरस या अंगिरा हुए तथा वायुपुराण के अनुसार जिनके पुत्र वामदेव हुए।

अघमर्षण - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अत्रि हुए, अत्रि के सोम, सोम के बुध,बुध के पुरुरवा, पुरुरवा के विजय, विजय के आगे गाधी और गाधी के विश्वामित्र, विश्वामित्र के मधुच्छन्दा,मधुच्छन्दा के अघमर्षण हुए ।

गाविष्टर- इनका जन्म ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अत्रि के कुल में हुआ।

कौडिन्य - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक वशिष्ठ के कुल में कुण्डिन, कुण्डिन के कौडिन्य हुए।

लोंगाक्षी - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरा के कुल में लोंगाक्षी हुए।

मुद्गल - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरा के भृम्म्याश्वन भृम्म्याश्वन के मुद्गल हुए।

उपमन्यु - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक वशिष्ठ के व्याघ्रपाद और व्याघ्रपाद के महर्षि उपमन्यु हुए।
 
इस प्रकार स्पष्ट है जांगिड़ ब्राह्मणों के पूर्वज (गोत्रकारक) विश्वकर्मा के वंशज कभी थे ही नहीं  (कभी नहीं थे)... इनकी उत्पत्ति विश्वकर्मा वंश (कुल) में नहीं हुई...

जब जांगिड़ ब्राह्मणों के पूर्वज (गोत्र कारक) विश्वकर्मा के वंशज नहीं है, तो आज जो जांगिड़ खुद को विश्वकर्मा की संतान बताने का दावा कर रहे हैं शायद वो जांगिड़ पगला गए है...

अब तुम्हारी आखिरी उम्मीद विद्या सम्बन्ध वाला गोत्र- 

जैसे गुर्जर गौड़ ब्राह्मण, गुर्जर देश के वैसे ही जांगिड़ ब्राह्मण जाङ्गल देश के...
अब पुनः जैसे गुर्जर गौड़ ब्राह्मण गौत्तम ऋषि के आश्रम में रहे वैसे ही जांगिड़ ब्राह्मण अंगिरा (जांगिड़) ऋषि के आश्रम में रहे...

अच्छा ये कैसे पता की जांगिड़ ब्राह्मण विश्वकर्मा के आश्रम में नहीं रहे...?

विद्वानों अगर जांगिड़ ब्राह्मण विश्वकर्मा के आश्रम में रहे होते तो जांगिड़ (अंगिरा) के स्थान पर जांगिड़ ब्राह्मणों के पूरे कुल का विद्या के सम्बन्ध से गोत्र विश्वकर्मा या विश्वकर्मा के पुत्रों मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी, या देवज्ञ नल या नील या इनके वंशज एक सौ पच्चीस गोत्र के नाम आदि के नाम पे रहा होता....!

और हमारी जाति (कुल या वंश) का नाम जांगिड़ है, हमारी जाति की पहचान जांगिड़ शब्द से हैं, फिर जांगिड़ का मतलब अंगिरा होता है न कि विश्वकर्मा।

इसिलए जांगिड़ ब्राह्मणों का विद्या का सम्बन्ध वाला गोत्र हुआ "अंगिरा" ।

इसी प्रकार हमारा सुधन्वा नामक विश्वकर्मा से भी संबंध नहीं है क्योंकि हमारे गोत्रकारक पूर्वजों में सुधन्वा विश्वकर्मा नाम नहीं है। ना ही हमारी जाति का नाम सुधन्वा या विश्वकर्मा के नाम पर है। हमारी जाति का नाम अंगिरा या जांगिड़ है।

वशिष्ठ पुराण आदि के अनुसार विश्वकर्मा ब्राह्मणों के 125 गोत्र होते हैं। जो विश्वकर्मा पुराण से मैं बता रही हूं। मैंने विश्वकर्मा पुराण का तेरहवां अध्याय पढ़ा हैं उसमे भी ये गोत्र है।

विश्वकर्मा पुराण से विश्वकर्मा वंशी पांचाल ब्राह्मण के 125 गोत्र।👇

http://www.jangidbrahminsamaj.com/puran/puran.asp?i=123

इस लिंक पर विश्वकर्मा पुराण का तेरहवां अध्याय दिया हुआ हैं। यहा विश्वकर्मा वंशी पांचाल ब्राह्मणों के एक सौ पच्चीस गोत्र दिए हैं। Blog पर मैं विश्वकर्मा पुराण कैसे दिखाऊं इसीलिए लिंक दिया है कृपया अपने पास उपलब्ध विश्वकर्मा पुराण के तेरहवें अध्याय में विश्वकर्मा वंशी पांचाल ब्राह्मण के गोत्र अवश्य देखे।

जांगिड़ ब्राह्मण गोत्रावली में लिखा है की "विश्वकर्मा ब्राह्मण टूट गए जिससे उनके 125 गोत्र अलग अलग जातियों में आ गए जिनमे जांगिड़ जाति भी एक है" मतलब जांगिड़ ब्राह्मण गोत्रावली के हिसाब से इन्ही विश्वकर्मा ब्राह्मणों के गोत्र हममें हैं भाई कौनसा गोत्र हैं हम में  ? 😹🤷🏻‍♀️... गांजा फूंकते हो क्या... ??
इनके ये 125 गोत्र तो हमसे अलग है।

विश्वकर्मा परमात्मा को भी कहा गया है तो ऐसे तो सारी सृष्टि ही विश्वकर्मा वंशी हो जाएगी। तो फिर सभी विश्वकर्मा ब्राह्मण हो गए। 😹🤷🏻‍♀️🤫... 

बात ये है कि जिनको शास्त्रों में अलग से बता रक्खा है कि हां ये विश्वकर्मा जी के वंशज हैं, उनको ही विश्वकर्मा ब्राह्मण माना जाएगा। 😏🤫...

तो न तो जांगिड़ ब्राह्मण विश्वकर्मा वंशी हैं और न ही विश्वकर्मा से शिक्षा ली... तो फिर जांगिड़ ब्राह्मण समाज विश्वकर्मा जी से संबंधित कैसे हुआ...?

फिर... जांगिड़ ब्राह्मणों में कुल में जन्म लेने से पहचाने जाने वाले पूरे 20 गोत्र आपको गौड़ ब्राह्मणों में मिल जाएंगे , लेकिन विश्वकर्मा के कुल से 1 भी नहीं मिलेगा...

स्पष्ट है जांगिड़ ब्राह्मणों का विश्वकर्मा से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं...मैं सही बोल रही थी ।

इस लेख की शोधकर्ता, लेखिका कोई अज्ञात महिला है। उनको बहुत बहुत साधुवाद, धन्यवाद, बधाई। 
लेख से जाँगिड़ ब्राह्मणों की आंखें खोली। सही परिष्कृत करके पुनः भेजा।

साभार - छैल बिहारी शर्मा "आंगिरस" जयपुर
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम

Thursday, 13 March 2025

भारतीय जड़ी-बूटियों का रोग निवारण चिकित्सा में प्रयोग

#गोरखमुंडी एक बहुत शखित, संगन्धित वार्षिक जड़ी बूटी वाला पौधा हैं, जिनके तनो मे पंखो जैसे संरचनाये होती हैं, यह अक्सर धान वाले खेतो मे धान कटने के बाद उगते हैं, इनके बैगानी रंग के फूल एक दम गोल मुंडी के सामान दिखयी देते हैं, लोग इनके बारे मे नहीं जानते इन्हे बस खरपतवार घास समझते हैं, पर यह तो बहुत सारे रोगों से हमें मुक्ति प्रदान करती हैं.

#उपलब्धता :-
        यह पुरे भारत मे,बांग्लादेश, चीन ,म्यांमार, नेपाल, उत्तरी क्षेत्र, दक्षिण ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया आदि!

#वास :-
       यह नम घास के मैदान, धान के खेत मे पाया जाता हैं!

#स्वभाव :-

            यह वार्षिक जड़ी बूटी वाला पौधा हैं, यह थोड़ा सुगन्धित होता हैं!

#जड़ :-

         इनके जड़ भूरे रंग की होती हैं!

#तने :-

       तना सीधा होता हैं, तने मे पँख जैसी संरचना होती हैं यह पँख दाँतेदार होती हैं , तने बहुत शखित होती हैं!

#पत्तियाँ :-

            इनकी पत्तियाँ लगभग 1-3 सेंटीमीटर लम्बे होते हैं यह हरे रंग की होती हैं!

#फूल :-
        इनमे बैगनी रंग के फूल लगते हैं, यह गोल संरचना वाली होती हैं, यह 8-15 मिमी. जिसमे कई छोटे फूल लगे होते हैं,इसमें फूल बैगनी और पूंकेसर पीले बैगनी होते हैं!

#गोरखमुंडी_की_दवा:-

           मधुमेह, गंठिया, बवासीर, गर्भधारण, योनि की खुजली, नपुंसकता, यौन शक्ति, चर्मरोग, प्रमेह, जलोदर, भगंदर, पेट के कीड़े, हृदय की कमजोरी, रक्तपित्त, मुंह की दुर्गंध, नेत्ररोग, सिरदर्द, सफ़ेद बाल, दीर्घायु, सूखी खुजली, उपदंश, घाव, ज्वरदाह, वातरक्त, पेट की वायु, खुनी दस्त, स्वरमाधुर्य, शरीर में कंपकपी आदि बिमारियों के इलाज में गोरखमुंडी उपयोगी हैं। 

#औषधीय_उपयोग :-

🌿#दृष्टिवर्धक_शर्बत -
यह शर्बत नेत्र रोगों के लिए नितान्त लाभकारी है। गोरखमुण्डी बूटी के पाव भर फूल लेकर रात को दो सेर पानी में भिगो दें और प्रात आग पर पकावें । ३ पाव पानी रह जाने पर छान कर ३ पाव मिश्री मिलाकर शर्बत बनालें और नित्य प्रातः 10ml सेवन किया करें।

    🌿आमवात (गंठिया) में गोरख मुंडी फल के साथ समभाग सोंठ चूर्णम उष्णोदक से दोनों समय 3 ग्राम सेवन करें तथा फलों को महीन पीसकर पीड़ा स्थान पर लेप करने से गंठिया की पीड़ा शांत होती है।

      🌿अर्श (बवासीर) में गोरखमुंडी के पत्र का स्वरस और अरंड पत्र का स्वरस 25 ग्राम मिलाकर पिलाने से तथा गोरखमुंडी के पत्तों की लुग्दी मस्सों पर बाँधने से तथा पंचांग की धूनी मस्सों पर लेने से बवासीर में लाभ होता है।

         🌿गर्भधारणार में जायफल के 1 ग्राम चूर्ण के साथ गोरखमुंडी का 2 ग्राम चूर्ण मिलाकर 3 ग्राम लगभग चूर्ण बकरी के दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से स्त्री गर्भधारण करती है।

     🌿योनिशूल (योनि की खुजली) में गोरखमुंडी 10 ग्राम ताजे पंचांग न मिलने पर छाया शुष्क पंचांग को जल से पीसकर पिलाने से योनि की भंयकर खुजली नष्ट हो जाती है। प्रदर में कुछ दिन सेवन करने से लाभ होता है।

       🌿नपुंसकता में गोरख मुंडी की ताज़ी जड़ों के पीसे हुए कल्क, कलई दार पीतल की कढ़ाई में रखकर चौगुना काले तिल का तेल और सोलह गुना पानी डालकर पकायें। तेल केवल शेष रहने पर छान लें। इस तेल की लिंग पर मालिश करने से तथा 10-20 बून्द तक पान में लगाकर दिन में 2-3 बार चाबने से नपुंसकता दूर होती है।

      🌿यौवन में गोरखमुंडी के पौधे को छाया में सुखाकर, पीसकर बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर एक चम्मच सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से मनुष्य का यौवन स्थिर रहता है। तथा उसके बाल सफेद नहीं होते हैं। गोरखमुंडी के चूर्ण को घी के साथ चाटने से बल बढ़ता है। गोरखमुंडी के पौधे की छाया शुष्क चूर्ण में दोगुना मधु मिलाकर 40 दिन तक गर्म दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से शरीरिक शक्ति में वृद्धि होती है।

     🌿चर्म रोग में पत्तों को जल में पीसकर लेप करने अथवा पत्र स्वरस लगाने से अनेक चर्मरोग, उपदंश के व्रण एवं पुराने घाव व पारदजन्य विकारों की शांति होती है।

        🌿प्रमेह में गौदुग्ध के साथ गोरखमुंडी का चूर्ण सेवन करने से प्रमेह नष्ट हो जाता है।

       🌿जलोदर में अरंड तेल 10 ग्राम के साथ गोरख मुंडी चूर्ण 3 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से जलोदर में लाभ होता है।

      🌿भगंदर में गोरखमुंडी चूर्ण को बासी पानी के साथ सेवन करने से भंगदर नष्ट हो जाता है।

      🌿कृमि (पेट के कीड़े) में गोरखमुंडी का चूर्ण 1 ग्राम जल के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पेट के सभी प्रकार के कीड़े मर जाते हैं।

       🌿हृदय की कमजोरी में गोरखमुंडी के फलों का अर्क, नेत्ररोग, दिल की धड़कन और हृदय की कमजोरी दूर करता है। गोरखमुंडी के लगातार सेवन से गीली और सुखी खुजली नष्ट हो जाती है। शुरू में गोरखमुंडी को 15 ग्राम की मात्रा में लेना चाहिए। पथ्य-खट्टी और गर्म चीजें, अधिक परिश्रम व मैथुन से बचना चाहिए।

       🌿रक्त पित्त में गोरखमुंडी के पत्र रस के साथ अडूसा पत्र रस मिलाकर 1 चम्मच दिन में दो तीन बार सेवन करने से लाभ होता है।

       🌿मुख दुर्गंध में गोरखमुंडी चूर्ण को कांजी में मिला थोड़ा-थोड़ा पिलायें या किसी दन्त मंजन में गोरखमुंडी के पुष्प चूर्ण को मिलाकर मंजन करने से मुख की दर्गन्ध नष्ट हो जाती है तथा दांत सफ़ेद हो जाते है।

       🌿नेत्र रोग में गोरखमुंडी की 1 मुंडी प्रातः खाली पेट 1 सप्ताह तक साबुत निगल जाने से 1 वर्ष तक आँख में किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता प्रतिवर्ष चैत्र मास में 4-5 मुंडी के ताजे फल थोड़े दांत से चबाकर पानी के घूंट के साथ हलक में उतार लें तो मनुष्य की आँख की तदुरुस्ती और रौशनी हमेशा कायम रहती है। मुंडी पंचाग के छाया शुष्क चूर्ण में समभाग मिलाकर गाय के दूध के साथ सुबह-शाम खाने से नेत्रों के बहुत से रोग मिटते हैं। तथा नेत्र ज्योति बनाये रखने के लिए अत्यंत लाभप्रद है। नेत्र ज्योति कम हो जाने पर, गोरखमुंडी के पुष्पों या पत्तियों का स्वरस नेत्रों में दिन में दो बार लगाते रहने से नेत्र में लाभ होता है।

     🌿सिरदर्द या सूर्यावर्त, आधाशीशी आदि में गोरखमुंडी के 3 से 5 ग्राम स्वरस में मरिच चूर्ण 1/4 ग्राम मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से सिरदर्द शीघ्र शांत हो जाता है।

     🌿सफेद बाल में गोरखमुंडी की जड़ या पंचाग को पुष्पागमन से पूर्व काले भांगरे जो अब प्रायः अनुपलब्ध है, अथवा सामान्य भृंगराज को भी छाया शुष्क करके दोनों के समभाग चूर्ण को 2-8 ग्राम तक शहद व घी से 40-80 दिन तक सेवन करने से बालों के सभी प्रकार के रोग दूर होते हैं तथा सफेद बाल काले होने लगते है।

 🌿दीर्घायु में गोरखमुंडी के बीजों को पीसकर उनमें समभाग चीनी मिलाकर एक हथेली भर प्रतिदिन लगातार सेवन करने से ताकत पैदा होती है और मनुष्य दीर्घायु हो जाता है।

     🌿सूखी खुजली में गोरखमुंडी का लगातार सेवन से गीली और सुखी खुजली मिट जाती है। शुरू में गोरखमुंडी को 15 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए। इसके बाद में प्रयोग बढ़ाते रहना चाहिए। परहेज-खट्टी और गर्म चीजें, अधिक परिश्रम व मैथुन से बचना चाहिए।

   🌿उपदंश में गोरखमुंडी के पत्तों को जल में पीसकर लेप करने अथवा पत्र स्वरस लगाने से अनेक चर्मरोग, उपदंश के घाव आदि रोग नष्ट हो जाते है।

      🌿घाव में गोरखमुंडी के पत्तों को जल में पीसकर लेप करने अथवा पत्र स्वरस का मालिश करने से सभी प्रकार के घाव, उपदंश, पुराने घाव शीघ्र भर जाते है।

       🌿ज्वरदाह में गोरख मुंडी चूर्ण 2 ग्राम को काली मिर्च 1/4 ग्राम चूर्ण मधु या दूध के साथ सेवन करने से ज्वर और दाह मिटता है।

       🌿वातरक्त में गोरखमुंडी 3 ग्राम और कुटकी 1 भाग चूर्ण को शहद के साथ नियमित प्रतिदिन 2-3 ग्राम मात्रा में सुबह-शाम तथा दोपहर चटाने से वातरक्त नष्ट होता है।

      🌿पेट की वायु में बकरी या गाय के दूध के साथ गोरखमुंडी के 3 ग्राम चूर्ण की फंकी लेने से पेट की वायु नष्ट होती है और पेट को आराम मिलता है। इसके अलावा पेट के सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं।

      🌿आम अतिसार (खुनी दस्त) में गोरखमुंडी की जड़ और सौंफ दोनों समभाग 10 ग्राम लगभग पीसकर, मिश्री-युक्त जल के साथ सुबह-शाम सेवन करने से खुनी दस्त में लाभ होता है! 

    🌿मधुर आवाज के लिए गोरखमुंडी फलों के 50 ग्राम चूर्ण में 10 ग्राम शुंठी मिलाकर मधु के साथ डेढ़ ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम तथा दोपहर चटाने से आवाज मधुर और मीठी हो जाती है।

        🌿कम्पवात (शरीर की कंपकपी) में गोरखमुंडी के 50 ग्राम चूर्ण में 100 ग्राम लौंग मिलाकर 3 से 5 ग्राम की मात्र मे शहदमिलाकर सुबह शाम चाटने से शरीर की कनपकपी शांत हो जाती हैं!

     🌿गोरखमुंडी की जड़ या पंचांग को फूल लगने से पहले थोडा सुखा लें। इतनी ही मात्रा में भृंगराज का चूर्ण मिला लें। इसे 2-3 ग्राम तक मधु व घी से 40-80 दिन तक सेवन करें। इससे बालों के सब रोग दूर होते हैं। इसस बाल काले होने लगते हैं।

     🌿आँखों के रोग में:-हर साल चैत्र मास में 4-5 मुंडी के ताजे फल को दांत से चबाकर पानी के साथ खाने से आँख के रोगों में लाभ होता है।

     🌿1-2 ग्राम गोरखमुुण्डी पंचांग के सूखे चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें। इसे 200 मि.ली. गाय के दूध के साथ सुबह-शाम खाने से आँखों के बहुत से रोग ठीक होते हैं।

   🌿आँखों की रोशनी कम हो जाने पर गोरखमुुण्डी के फूल या पत्तों के रस को दिन में दो बार आँखों में लगाते रहने से लाभ होता है।

      🌿गोरखमुण्डी चूर्ण को कांजी में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाएं। इसके अलावा आप किसी दन्तमंजन में इसके फूल का चूर्ण मिलाकर मंजन करें। इससे मुंह से दुर्गन्ध आना बंद होता हैं!

   🌿गोरखमुंडी के पौधों को छाया में सुखा-पीस लें। बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें। इसका 1 चम्मच सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से शारीरिक कमजोरी दूर होती है

       🌿1-2 ग्राम मुण्डी चूर्ण का सेवन करने से शरीर की दुर्गन्ध खत्म होती है।