योग दर्शन
योग दर्शन पर द्वितीय दिन का व्याख्यान/ प्रवचन
( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से )
शुक्रवार - मार्गशीर्ष कृ ७ विक्रम संवत २०८१
22नवंबर 2024 ईस्वी
(आर्यो का महाकुंभ कुंभ - अंतर्जाल सभा )
आइये मंत्र पाठ करते हैं -
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवाव है। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
सादर अभिवादन ! योग दर्शन पर चर्चा हम सुन रहे हैं सभी को सादर नमन् सभा में गरिमा मय उपस्थित सभी आर्य श्रेष्ठ मनीषिगणआप सब सौभाग्यशाली हैं और यह वैदिक सत्संग आर्यों का महाकुंभ कई वर्षों से और बड़े धैर्य पूर्वक चला रहे हैं तो यह भी एक ऋत की पहचान है धैर्य की पहचान है आप सब धर्मात्मा है बड़े धीर वीर हैं और मेरी शुभकामनाएं हैं कि आप इसे आगे भी निरंतर चलाते रहें ।
कभी संख्या कम होती है कभी संख्या ज्यादा हो जाती है इसका परवाह किए बिना अच्छी चर्चा जितने होती रहे उतना ही हम जीवात्माओं के लिए लाभप्रद है क्योंकि -
"वादे-वादे तत्वबोधो जायते.. " जब आपस में चर्चा करते हैं तो तत्व जान होता है और किसी भी बात को बार-बार जब सुनते हैं तो उसका संस्कार पड़ता है और उस पर चलने की इच्छा होती है उसपर हम कार्य कर पाते हैं, आचरण कर पाते हैं, इसलिए "स्वाध्यायान्मा प्रमद:।" अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए । महर्षि दयानंद जी ने भी कहा उपनिषद के ऋषि ने भी कहा यह स्वाध्याय है स्वाध्याय के क्रम में हम योग दर्शन सुन रहे हैं और योग दर्शन बहुत ही उपयोगी ग्रंथ है हम मनुष्यों के लिए और जिसमें वृतियों की चर्चा कल के प्रसंग में हमने सुना वृत्तियां जो पांच प्रकार की हैं प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति इन पांच वृत्तियों में दो वृतियों की चर्चा हुई थी प्रमाण वृत्ति और विपर्यय वृत्ति। तो प्रमाण तीन है प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम । इसके द्वारा जो संस्कार पड़ता है और उस संस्कार के अनुसार जो हमारे अंदर व्यापार- व्यवहार वृत्तियां होती है विचार चलता है। तो वह प्रमाण वृत्ति के अंतर्गत ऋषि ने उसको माना और वह क्लिष्ट भी हो सकता है और अक्लिष्ट भी हो सकता है । तो क्लिष्ट और अक्लिष्ट को समझाते हुए यह कल हमने चर्चा में बताया था कि जिन वृत्तियों में क्लेश मिला हुआ है, क्लेश युक्त है- अविद्या है अस्मिता है राग है द्वेष है अभिनिवेश है वह वृति क्लिष्ट होगी और जिन वृत्तियों में ये पांच कलेश नहीं है वह वृति अक्लिष्ट होगी । अक्लिष्ट वृति सुखकारी होती है और क्लिष्ट वृत्ति दुःख देती है, इनमें कभी-कभी सुख का अनुभूति होती है लेकिन वह प्रायः दुख ही होता है क्योंकि आगे जब आप चर्चा सुनेंगे की
" परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः।"
जो वृत्ति आपको सुख प्रतीति हो रही है ऑलरेडी वह दुख ही होताहै । सुख को भी दुख वृत्ति विवेकी लोगों ने माना तो अभी हम वृत्ति पर रहेंगे तो आप विपर्यय वृति के बारे में भी कल चर्चा हुई थी कि ..
जो मिथ्या ज्ञान है विपरीत ज्ञान है कहते हैं उसे विपर्यय वृति कहते हैं ।
" विपर्ययो मिथ्याज्ञानम् अतद्रूपप्रतिष्ठम् ।"
जो वस्तु जैसा है वैसा उस रूप में प्रतिष्ठित ना हो उसको विपर्यय वृत्ति मिथ्या ज्ञान अविद्या उल्टा ज्ञान कुछ भी कह लीजिए ।
उल्टा ज्ञान या जानकारी मिथ्या ज्ञान के लिए विपर्यय ज्ञान कह लें, अविद्या कह ले । अब विपर्यय वृत्ति बहुत ही क्लिष्ट होती हैं क्लेश देने वाला होती है। आगे हम वृत्तियों की चर्चा में विकल्प वृति पर चर्चा करेंगे । विकल्प वृत्ति क्या हैं ?
" शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।"
शब्द ज्ञान हमारे पास रहता है लेकिन वस्तु नहीं रहती है, वस्तू शून्य होता है विपर्यय वृति में था " अतद्रूपप्रतिष्ठम् " वस्तु जो है अपने रूप में प्रतिष्ठित ना होना भिन्न रूप में दिखना वह भी विपर्यय था और विकल्प वृत्ति में वास्तु शून्य है, वस्तु है ही नहीं ..शब्द ज्ञान ही हैं। तो शब्द जान को विकल्प वृत्ति के अंतर्गत लिया गया ।
उदाहरण से समझे जैसे आकाश का फूल, बंध्या के पुत्र का विवाह होते हुए हमने देखा, मनुष्य के माथे पर सींग, हनुमान सूर्य को निकल गए, कुंती के कान से कर्ण की उत्पत्ति हुई.. अब यह सारी बातें शब्द तो है बोलने में कोई आपतित हो रहे हैं बोलिए लेकिन वस्तु स्थिति शून्य है ।
ऐसा होता ही नहीं रेत से तेल निकला गया । अब बोलने का तो बोल सकते हैं ना बोलिए ना मान भी सकते हैं कि जब मृत्यु होती है तो परमात्मा की मीटिंग होती है आत्मा वहां जाती है उनको जजमेंट सुनाया जाता है फिर उबलता हुआ कड़ाहे तेल में उसको जो पाप करते हैं उसको तला जाता है आरे से काटा जाता है पौराणिक कथाकार कहते हैं तो गप्प मारना है । शब्द बोलिए उसमें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन ऐसी स्थिति होती ही नहीं ये एक सब काल्पनिक हवा हवाई बाते । जितनी भी हवा हवाई बात है उस सब विचार सब व्यापार विकल्प वृत्ति के अंतर्गत लिया जाता है ।
आप परीक्षण करके देखिए हमारे अंदर भी तो कोई ऐसे विचार नहीं है । ऐसे थॉट्स ऐसे विचार जो विकल्प रूप में है शब्द रूप में है कल्पना रूप में है वस्तु ऐसी होती नहीं है तो जो हमें मुक्ति में बाधक हो। तो विकल्प वृत्ति को पहचान पहचान करके जान समझ करके चुन चुन करके अपने चित्त से हटा देना चाहिए क्योंकि हम सब वैदिक धर्मी है हम सब सत्य सनातन वेद को मानने वाले यथार्थ में विश्वास करते कल्पना में नहीं । विकल्प वृत्ति तो हमारे अंदर रहनी ही नहीं चाहिए तो मित्य ज्ञान अलग है और विकल्प ज्ञान अलग है। विकल्प जान के बाद ऋषि कहते हैं की निद्रावृति -
निद्रा वृत्ति क्या है देखिए अन्य वृत्तियों के साथ वृत्ति शब्द नहीं जुड़ा हुआ .. विकल्प के साथ वृत्ति नहीं है जुड़ाहुआ विपर्यय के साथ वृत्ति नहीं जुड़ा हुआ है बस विपर्यय यह कह दिया, विकल्प कह दिया, प्रमाण कह दिया लेकिन निद्रा के साथ महर्षि पतंजलि वृत्ति शब्द जोड़ कर पढ़ा है और कहा
" अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा । "
अब इस पर विचार करें ऋषि ने वृत्ति शब्द क्यों पढ़ा यहां क्योंकि निद्रा को हम शून्य मानते हैं कोई विचार कोई व्यापार हमारे मन में ना होना उसको नींद मानते प्रायः लोगों के मन में यही कॉन्सेप्ट होता है यही भावनाएं होती है कि जब हम सो जाते हैं तो हमारे मन के सारे विचार रुक जाते हैं, कुछ भी व्यापार नहीं होता है, गाढ़ निद्रा में सोया हुआ मनुष्य के मन में कोई विचार न चलना । विचार नहीं होगा तो वृत्ति नहीं बनेगी, संस्कार भी नहीं पड़ेगा इसलिए महर्षि पतंजलि को निद्रा के साथ वृत्ति शब्द जोड़ कर पढ़ा, कहना पड़ा सूत्र में कि हम एक पल भी एक क्षण मात्र भी हम बिना कर्म किए हुए नहीं रहते कर्म से ही हमारा जीवन युक्त हैं ।
कर्म - अब कर्म करने के तीन साधन हैं - शरीर, वाणी और मन । यह तीनों से किसी ने किस रूप में कर्म हर पल होता है और एक ऑप्शन जो हमारे पास था कि नींद में जब हम सो जाएंगे अभी जब यह आनलाइन कार्यक्रम सम्पन्न होगा तो हममें से कुछ लोग भोजन करेंगे और सो जाएंगे..
कुछ लोगों ने भोजन भी कर लिया होगा तो वह उसमें कोई कर्म नहीं होता है ऐसा हमारा विचार बन जाता हैं। लेकिन ऋषि कहते नहीं सोना भी कर्म है निद्रा भी कर्म है और वह कर्म कैसा है ? तो ज्ञान का अभाव । पहले तो निद्रा के बारे में एक्सप्लेन कर दिया निद्रा आती कैसे ? निद्रा होती कैसे ?
"अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा।"
अब यहां अभाव शब्द है प्रत्यय शब्द है आलंबना = आलंबन का ना होना युक्त ना होना प्रत्यय का अर्थ होता है ज्ञान विचार और अभाव का मतलब होता है शून्य ।
आलंबन मतलब उससे युक्त ना होना, अभाव प्रत्यय आलंबना = आलंब जो था उसका अभाव होगा ज्ञान के अवलंबन का अभाव हो जाना "प्रत्यय आलंबन अभाव:" "स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा।"
ज्ञान के आलंबन, ज्ञान से युक्त का अभाव यह नींद हैं ।
आप बिस्तर पर चले गए और मन में ज्ञान बनाए हुए वो बुरा ज्ञान भी हो सकता है और सुज्ञान अर्थात् अच्छा ज्ञान भी हो सकता है अच्छे विचार भी हो सकते हैं बुरे विचार भी हो सकते हैं वह ज्ञान के अनुसार संस्कार के अनुसार जो विचार मन में वृत्तीयां उठा रहे हैं व्यापार कर रहे हैं उसके साथ आप युक्त हैं तो नींद नहीं आएगी नींद को लाने के लिए ऋषि कहते हैं कि प्रत्यक्ष जो ज्ञान चल रहा है जो ज्ञान के आधार पर व्यापार मन में हो रहा है उसका आलंबन जो से जुड़े हुए हैं उससे युक्त हैं कनेक्ट हैं इसका अभाव कर दीजिए उसको डिस्कनेक्ट करिए तो डिस्कनेक्ट करेंगे कैसे ?
तो मन को निर्देश (कमांड) करना पड़ेगा । मन पर कमांड करिए मुझे अभी नहीं सोचना है कल के विषय में इस विचारों के बारे में कोई मंथन चल रहा है बेड पर लेटे हुए हैं और कोई योजनाएं बना रहे हैं कोई समस्या का समाधान ढूंढ रहे हैं कोई चिंता कर रहे हैं चिंतन कर रहे हैं सब को छोड़ देना नहीं सोचना । देखा जाएगा कल जागेंगे तो विचार करेगे । जैसे मन को दो-तीन बार आपने ऐसे डाट लगाई मन को समझाया, और मन आपके उन विचारों से डिस्कनेक्ट हो गया विचारों का ज्ञान का अभाव कर दिया नींद आ जाएगी।
अब प्रश्न आकर खड़ा होता है कि नींद आ गई अब नींद तो आ गई आप कहते हैं कि नींद में आप कोई विचार नहीं चलेगा नींद कोई करम नहीं है तो ऋषि ने कह दिया नहीं निंद्रा भी एक करम है जब आप गाड़ी निद्रा में सो करके उठाते हैं । जैसे तीन प्रकार की अवस्थाएं होती जागृत स्वप्न और सुषुप्ति.. और एक अवस्था और है वह योगी की होती है जिसको तुरीय अवस्था कहते हैं समाधि अवस्था .. वो न जगे हुए हैं न स्वप्न में है न सोये है समाधि अवस्था में हैं यह सौभाग्यशाली मानव जो होते हैं उस अवस्था को प्राप्त करते हैं यह चौथी अवस्था । और तीन अवस्थाओं में तो हम लोग आते हैं साधारण लोग हैं । अभी जगे हुए हैं तो इंद्रियां काम कर रही है इंद्रियों, इंद्रियों से मन जुड़ा हुआ है और इंद्रिया विषयो से जुड़ी हुई है - इंद्रियां मन को और मन से आत्मा को विषयों का ज्ञान हो रहा है ।
सोने पर स्वप्न में कौन सा विचार चलता है जो पहले से रिकॉर्ड है, पहले से जो हमने देखा है सुना है अनुमान - अनुभव किया है तो उसके अनुसार स्वप्न अवस्था में कल्पना और ज्ञान होता हैं, इस अवस्था में इंद्रियों के द्वारा बाहर से कोई विषय हमारे चित्त में नहीं आ रहा है पहले से जो संस्कार था उसी का मन उठना है और स्वप्न आते है।
सपने में घटना क्रम घटपट होते है या गोलमोल होते हैं ..कि " कहां की ईट कहां का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा " ऋषि का वाक्य कि कैसे कैसे किसी सिर किसी का पैर हवा हवाई बातें जुड़ जाती है, संसार एक घोर है वह स्वप्न बन जाता है ।
जागृत और सपने से भी एक विलक्षण अवस्था है सुषुप्ति अवस्था और सुषुप्ति अवस्था में जो पहले भी आपने सुना है की " समाधि सुषुप्ति सुएकरूपता .." ऋषि का वाक्य - कि समाधि और सुषुप्ति अवस्था में एक जैसा मानना चाहिए। आत्मा और परमात्मा एक हो जाता है एकत्व भाव में ।
वैसे एकत्व भाव तो हमेशा रहता है, आत्मा से परमात्मा ना कभी अलग हुआ ना कभी अलग होगा " भूतों ना भविष्यति " । लेकिन हम वृत्तियों में जब होते हैं आत्मा को भूले हुए हैं तो परमात्मा को भी भूले हुए हैं .. बस भूला हुआ है ।
जैसे कोई सामान अपने बैग में रख दी, यह कहीं पर रख दिया और भूल गए तो वह वस्तु वह पदार्थ आपके लिए नहीं के बराबर हैं।
आप उसको भले ढूंढते रहे परेशान होते रहे और जहां रहते हो याद तो वह आपके कोई काम का नहीं है उसे आप पास में रहते हुए भी आप उसे वस्तु से दूर है उसका उपयोग नहीं ले सकते । ठीक उसी प्रकार सेआत्मा और परमात्मा दोनों साथ रहते है और आत्मा जब अपने को भूल हुई रहती है तो अपना होना या ना होना प्रभु के साथ होना या ना होना एक ही बराबर हैं। हम "हैं" लेकिन "नहीं है" क्योंकि हम भूले हुए हैं । कहां है ? विचारों में खोए हुए हैं, खाने-पीने इधर-उधर की बातें संसार की उलझन के विचार में अपने आप को खोए रहते हैं..24 घंटे ।
तो सुषुप्ति अवस्था और समाधि अवस्था दोनों को एक इक्वल एक जैसा माना ऋषि ने सुषुप्ति में आत्मा परमात्मा एकत्व भाव में इसलिए माना गया ऐसा हमेशा रहते हैं लेकिन उस अवस्था में आत्मा में यदि चाहे तो अपना और परमात्मा का बोध कर सकता है लेकिन निद्रा जो सुषुप्ति होती है सामान्य मनुष्य में तमोगुण प्रधान होता है और तमोगुण की वर्चस्वता होने के कारण साधारण जीवात्मा का ध्यान नहीं होता है कि मैं अपने स्वरूप को जान लूं और तमोगुण का वहां पर प्रभाव रहता है निद्रा में तो वह आत्मा अपने को नहीं जान सकते क्योंकि अपने को समर्थवान नहीं बनाया, अभ्यास नहीं किया हुआ है और तमोगुण का प्रभाव और समाधि अवस्था में सतोगुण प्रधान होता है तमोगुण नहीं रहता है तो समाधि अवस्था सतोगुण प्रधान हैं। क्योंकि समाधि जो प्रथम समाधि है संप्रज्ञात वह सत्गुण प्रधान होता है और सतोगुण प्रकाशशील होता है इसलिए जो भी योगाभ्यास करना चाहिए उनको सात्विक होना पड़ेगा सात्विक आहार लेना पड़ेगा सात्विक व्यवहार करना पड़ेगा सात्विक वातावरण में लाना पड़ेगा । जब तक सतोगुण की प्रबलता नहीं होगी तब तक आप समाधि की कल्पना ध्यान की कल्पना छोड़ दे इसलिए आहार, स्थान, विचार, व्यवहार ये सब सात्विक होना चाहिए क्योंकि सतोगुण की प्रबलता "सत्वप्रज्ञा शीलम" जब सत्व प्रधान होगा तो फिर अपना बोध हम कर पाएंगे कि मैं कौन हूं और अपने स्वरूप का बोध सतोगुण अवस्था में आत्मा कर पाता है मन को टिका पाते हैं ।अपने आत्मभाव में और वह परमात्मा का आनंद की अनूभूति कर पता वहां सिद्धियां भी आती है तो यह तुरीय अवस्था जो है वह समाधि अवस्था है ।
समाधि - योगी जागृत अवस्था में रहते हुए, तमोगुण अवस्था रहित, सतोगुण अवस्था में आत्मा अपने बोध में परमात्मा का आनंद के रसास्वादन में निबंध रहता है ।
अच्छा एक और में बात बता दूं तो आज मुझे कुछ अनुभूति हुई - जैसे हम आप दूरदर्शन देखते हैं टीवी पर समाचार (न्यूज) देखते हैं तो दूरदर्शन जब देखते हैं तो पूरे दुनिया का में कहां-कहां क्या हो रहा है आपको सब पता होता है या अभी आप हम सब जुड़े हुए हैं इंटरनेट के माध्यम से जूम एप के माध्यम से आदरणीय लखन लाल आर्य जी का धन्यवाद करते हैं हम लोग सबको जोड़ देते हैं तो आप एक दूसरे को हम देख रहे हैं सबका घर भी दिखाई दे रहा है जो जो दिख रहे है बाकी लोग तो छोटे स्क्रीन पर भी दिख रहे हैं लेकिन जितने लोग दिखाई दे रहे हैं आप एक दूसरे के सब स्थिति को हम देख रहे हैं और हम लगते हैं हम एक दूसरे के साथ लेकिन जैसे डिस्कनेक्ट होंगे सब अपने अपने घर में सीमित हो जाएंगे एक दूसरे को देखना बंद हो जाएंगे।
( अब इस ब्लॉग के माध्यम से पढ़ रहे हैं, जो पं० चंद्रशेखर शर्मा जिन्होंने इस आनलाइन सभा में प्रवचन को सुनकर लिखा । )
तो समाधि में या समाधि अवस्था में आत्मा पूरे संसार से ब्रह्मांड से जुड़ (कनेक्ट हो ) जाते है और सब कुछ दिखाई देने लगता है सूर्य की निकटता चंद्रमा की निकटता पूरी ब्रह्मांड की निकटता शरीर से डिस्कनेक्ट हो गए वृतियों से डिस्कनेक्ट हो करके ऐसा लगता है कि मैं पूरे वर्ल्ड को जान रहा हूं और हमारे लिए कुछ दूर नहीं सब निकट है समाधि अवस्था में यह अनुभूति क्योंकि परमात्मा के साथ संपर्क होता है और परमात्मा सर्व व्यापक है । तो परमात्मा सर्वव्यापी है तो परमात्मा की सामर्थ्य से आत्मा सबको जानने लग जाता है जो जानना चाहते है जान जाता हैं।
तो वहां पर अगर हम चर्चा करेंगे तो निद्रा के ऊपर चर्चा कर रहे थे तो निद्रावृत्ति जो है वह वृति है ऋषि ने इसलिए कहा कि निद्रावृति क्यों है क्योंकि जब हम सो करके उठते हैं तो हम कहते हैं कि सुख पूर्वक, सोया दुख पूर्वक सोया या अच्छी नींद नहीं आई ऐसा भी कहते हैं तो सोने से एक संस्कार हमारे चित्त में पड़ा कर्म हुआ वहां पर क्यों कि सोना भी एक कर्म है तब हम उससे वृत्ति उठाते हैं कि मैं अच्छे पूर्वक सोया सुखपूर्वक सोया कब कहते हैं चित् में संस्कार पड़ा है तो उसकी स्मृति आती है यदि चित्त में संस्कार नहीं पड़ता तो स्मृति भी नहीं आती तो अब समझ में आ गया की निद्रा का भी संस्कार पड़ता है और उसके भी वृत्तियां बनती है । आगे सूत्र में आप दर्शन पूरा पढ़ेंगे
"स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा।" आप सोने में जो आनंद लेते हैं हमारे जो नौजवान है अभी 16 साल से ऊपर वाले जो युवक युवतियों और 25 - 30 से नीचे वाले उनको सोने में बड़ा आनंद बहुत मजा आता है इसलिए कहा है कि -
"बचपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया, बुढ़ापा देख कर रोया । " तो निद्रा प्रिय हैं, निद्रा कैसेअच्छी होती है वह जवान लोगों से पूछिए । पूछो सोना छोड़ दे .. पर नहीं क्योंकि खूब आनंद लेता है 18 - 18 घंटे तक सो सकते वो। तो निद्रा सुखद होता है और उसका संस्कार चित्त पर पड़ता है और सुखपूर्वक यदि आपने एक बार सोया और सीधे 5:00 बजे जागे या 4:00 बजे जगे 9:00 बजे के बाद सो जाइए 9:30 बजे तक 10:00 बजे तक और सीधे चार से पांच के बीच में उठ जाइए इस बीच में एक बार भी टॉयलेट के लिए नहीं उठना गाढ़ी निद्रा में फिर देखिए कितने फ्रेश कितना आनंदित अनुभव करते हैं वाह .. अच्छी नींद आई। तो आप वह जो सुख मिला अब ध्यान में बैठ गए या स्वप्न में कोई सुखद सपना देखा बहुत अच्छा लगा और बार-बार मन करता है उसको फिर से देखें, याद करें,क्या देखा मैंने ? अच्छा लग रहा था । तो मन यदि विषयों में भाग रहा है तो आप ध्यान के समय में निद्रा में जो सुख मिला सपने जो अच्छा सु सपना देखा था वह सुख मिला था उसकी स्मृति में ले आए मन रुक जाएगा मन विषय से संसार में भाग रहा है एक मिनट में 15 से 20 प्रकार के विचारों को हम रोटेटिंग करते हैं घूमाते हैं पढ़िए अपने मन को एक मिनट में कितने विचार बदल (चेंज हो ) गये ओहो .. तो इतना सारा विचार मन में आ रहा है एक विषय में मन रुकता नहीं तो अभ्यास करने के लिए प्रेक्टिस करने के लिए ऋषि ने कह दिया स्वप्न के (सुखद स्वप्न के) विचारों को मन में कल्पना करिए स्मृति में लाइए गाढ़ी निद्रा में जो सुख मिला था उस सुख की मन में कल्पना करिए उसे सुख में मन टिकने लग जाएगा और जब मन का प्रेक्टिस थोड़ा रुकने लग जाए फिर ईश्वर में लगा दीजिए फिर आत्मा में लगा दीजिए । और कल मैंने कहा था कि संसार में दोष दर्शन करना आरंभ करिए आपका मन वही जाता है जहां सुख अनुभव करते हैं आप चाहे वो भोजन, वस्त्र, धन-संपदा, सम्मान, पद प्रतिष्ठा उसमें हमें सुख अनुभूति होती है कि मैं बिजनेस में अभी व्यापार में बैठूंगा तो धन मिलेगा पैसा कमाऊंगा मन में सुख दिख रहा है तो मन रेस्टोरेंट में चला जाएगा, किचन में चला जाएगा क्यों क्योंकि उसमें सुख वृत्ति है । तो दुःख वृत्ति कर लिजिए कि धन कमा कर क्या होगा ? बड़े-बड़े पैसे वाले कमाकर सब यही छोड़ गए । भोजन 1 मिनट के बाद टेस्ट आएगा फिर वह टेस्ट खत्म हो जाएगा अधिक खा लेंगे तो कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाएगा बीपी और शुगर पता नहीं क्या-क्या हो जाता है । खाना ही बंद कर दीजिए क्यों खाना खाकर लोगों की मृत्यु होती है और जो कम खाते हैं उसकी मृत्यु बहुत देर से होती है भोजन पर नियंत्रण जीव्हा पर नियंत्रण धन पर नियंत्रण पद सम्मान के पीछे मत भागो । बड़े-बड़े विश्वविजेता सिकंदर जैसे खाली हाथ आए और खाली हाथ चले गए उसका कोई नाम लेने वाला भी नहीं है । चक्रवर्ती सम्राट कितने आए हैं और चले गए आज कोई उनका नाम ले भी रहा है तो उनको क्या फर्क पड़ा उनको कोई याद भी नहीं है वो तो दूसरे लोक में होंगे दूसरे जीवन में होगें उनको कैसे याद होगा कि कोई मेरा नाम ले रहा है मेरा स्टेच्यू ( मूर्ति) बना रखीं हैं, उनको तो कोई बोध ही नहीं होगा।
मुक्ति में होंगे तो हो सकता हैं संभवतः वो देख रहे हो कि लोग मुझे याद कर रहे हैं ।
तो थोड़ा देख लो हम किसके पीछे भाग रहे हैं जिसको हम देख नहीं सकते जो मेरे साथ मेरे मरने के बाद मैरे साथ रहेगा नहीं तो जितनी आवश्यकता है उसको हमें जरूर करना चाहिए समाज की भलाई के लिए काम जरुर करना चाहिए पुण्य भावना से ईश्वर के आदेश की भावना से लेकिन सम्मान के लिए धन के लिए पद के लिए ना भागे ।और आवश्यकता पूरी हो जाए तो जिसके लिए मनुष्य जीवन मिला है वह काम हमें करना चाहिए यही शास्त्र उपदेश करता है और परमात्मा का भी आदेश यही है कि तुम अपनी आवश्यकताओं को पूरा करके धर्म अर्थ काम अपने कामना को पूर्ण करें । जीने के लिए मुझे धन चाहिए जीने के लिए घर चाहिए कपड़े चाहिए उतना हो गया अब उतना हो गया फिर क्यों उसके पीछे भागे ? क्या उद्देश्य है ? क्योंकि वह तो मेरे पास रहेगा नहीं आँख बंद होते ही छूट जाएगा ..
तो हम मूर्ख हैं अज्ञानी है जो उसके पीछे भाग रहे हैं जो हमारे साथ रहेगा ही नहीं.. फिर भी पीछे भाग रहे हैं जो हमारे साथ नहीं देगा वह हम ज्ञानी है, हम समझदार हैं तो हमें अपने आवश्यकताओं का प्राथमिकताओं का ध्यान रखना चाहिए तो निद्रा की बात में कर रहा था प्रसंग में थोड़ा सा मैं कुछ बोल देता हूं उपदेश का गुण तो है तो उपदेश भी कर देता हूं पढ़ते बढ़ाते.. तो ऐसा है निद्रा एक वृति है और निद्रा का चित्त पर संस्कार पड़ता है इसलिए ऋषि ने कहा निद्रावृत्ति । आगे चलते सूत्र को लेते हैं यहां पर एक और वृत्ति है "स्मृति" और स्मृति वृत्ति जो है सबका संचय है या कहेगे यह सबका रस सारस है ।
" अनुभूतविषयासंप्रमोष: स्मृतिः। " स्मृति - स्मृति अब बुढ़ापे में स्मृति कमजोर हो जाती है सौभाग्यशाली है आपकी संसार को भूलने लग गए तो समझिए परमात्मा के विशेष कृपा हो गई संसार को भूलना ही मोक्ष का द्वार खुलता है लेकिन संसार को भूल रहे हैं और अपना भी भूल रहे हैं कि मैं कौन हूं तो गलत हो जाएगा अपना याद रखिए अपने आत्मभाव में जाइए और संसार को भुला दीजिए । स्मृति वृत्ति क्या है ? " अनुभूतविषयासंप्रमोष: स्मृतिः ।"अनुभूत क्या हैं अब इसको देख लेते हैं - अनुभूत कहते हैं अनुभव किया हुआ । आप एयरपोर्ट पर इतनी भीड़ देखते हैं प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ देखते हैं..
अब तो प्लेटफार्म पर कम होती है एयरपोर्ट पर अधिक हो रही है । अब उस भीड़ में इतने सारे लोग हैं और अपने यात्रा की और यात्रा करके आप आगे चले गए कोई याद नहीं है कितने लोगों ने देखा था उनमें कोई विशेष व्यक्ति लंबे हैं या कोई और है गुणविशेष जो आपके हृदय को छू लिया बुरी दृष्टि से या अच्छी दृष्टि से अनुभूत कर लिया उसकी स्मृति रह जाएगी और जो अनुभव में नहीं आया हृदयग्राही नहीं हुआ ऊपर ऊपर देखा और निकल गए उसकी स्मृति नहीं बनती । तो स्मृति भी एक वृति है । स्मृति कब बनती है ?
तो कहते हैं जब अनुभव करते हैं अनुभूत विषय जो होते रूप रस गंध स्पर्श शब्द ये पांचो विषय की जब अनुभूति करते हैं वाह क्या अच्छा स्वाद मिला अनुभव कर लिया एक बार रस लिया बस फस गए वह स्मृति बन गई बार बार उसी स्वाद को लेने की इच्छा होगी इसलिए अनुभूति ना होने दे संसार के विषयों का देखे बिना तो नहीं रह सकते खाए बिना नहीं रह सकते यह पांचों इंद्रियां हमारे काम कर रही है इसका प्रयोग तो संसार में जीने के लिए करना पड़ता है व्यवहार के लिए लेकिन इसमें अनुभूति ना होने देना इसमें सुख अनुभूत ना करना तो संस्कार नहीं बनेगा और संस्कार पड़ा भी तो कमजोर संस्कार पड़ेगा और उससे स्मृति नहीं आएगी वहां मन नहीं जाएगा बार-बार । तो का अनुभव किए हुए विषय की स्मृतियां बनती है ऊपर जो जितनी वृतियां आई थी प्रमाण विपर्य विकल्प निद्रा और अंत में स्मृति यह कर जो ऊपर वाली चार वृत्ति हैं इसमें आप हम यदि रस नहीं लेते हैं अनुभूति में नहीं आने देते तो स्मृति नहीं बनती चार वृत्तियो का बस ऊपर ऊपर व्यवहार कर लेते हैं खाया बस पेट भरना था हमने पेट भर लिया जीव्हा में तो थोड़ा स्वाद अच्छा बुरा लगेगा कि उतनी देर तक ज्यादा नहीं, देखना था देख लिया सुना था सुन लिया बस अनुभूति न बनने दें । मैं जैसे सामाजिक कार्यकर्ता हूं तो लोगों के घर में जाना आना होता है कहीं भोजन के लिए गए तो अपनी दुख सुनाते हैं उसे सुख सुनते हैं और सब की बातें सुननी पड़ती है अब सब की बातें हम अनुभव तो लेकर के बड़े मजे लेकर के सुनेगें अच्छा ऐसा हुआ सोचेंगे तो हम अपनी साधना करेंगे उसी में हमारा मन उलझा रहेगा ऊपर ऊपर सुनना हां जी हां जी ठीक है और उसका जो समाधान भी दे देना उसी फिर समय भूल भी जाना । तो व्यक्ति अपने आवश्यकता अनुसार विचारों को संग्रह करें ।
आवश्यक विचारों का संग्रह करना और अनावश्यक विचारों को संग्रह नहीं करें - ऐसा क्यों किया उन्होंने ऐसा क्यों कहा वह बातें मुझे याद है आपको याद है आपकी याद रखें भैया क्या उसे मिलेगा याद रख करके वेद मंत्र को याद रखेंगे जो हमें काम देगा समाधि लगाने में, मोक्ष में जाने में ।
तो सांसारिक विचारों को अनुभूति में नहीं आने देना है तो चारों वृत्तियो को अनुभूति में नहीं आने देने से स्मृति नहीं बनेगी और आपको फायदा होगा कि समाधि में जाने में आपको आसानी हो जाएगी पांच प्रकार की वृत्तियां है प्रमाण विपर्य विकल्प निद्रा स्मृति इनके पांच विभाग कर दिया की पांचो प्रकार की वृत्तियों का यदि हम निराकरण करना चाहते हैं निरोध करना चाहते हैं, क्या करेंगे ?
तो ऋषि ने कह दिया "अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।" अभ्यास और वैराग्य अभिमान की विभक्ति इस पर अभ्यास और वैराग्याभियान तृतीया विभक्ति का द्विवचन है के द्वारा या से द्वारा अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसका क्या करेंगे तट निरोध उस वृतियों का ऊपर जो वृत्तीयां कही गई पांच उसका निरोध कर रोका जा सकता हैं ।
एक और मैं यहां पर इससे जुड़ी हुई बात कि हमारे आर्य जगत में दो प्रकार के मत चल रहे हैं और इस पर डिबेट भी हो रहा है पीछे हुआ था की आत्मा मोक्ष से लौटती है तो वह अपने पिछले जीवन के मोक्ष में जाने से पहले जो वृत्तियां थी संस्कार शेष था उसके अकॉर्डिंग फिर माता-पिता के घर प्राप्त होता हैं एकपक्ष तो यह है । मैं किसी का नाम नहीं लूंगा.. एक पक्ष हैं कि सारी वृत्तीयां समाप्त हो जाती है और मोक्ष से जो आत्मा लौटी है तो वह परमात्मा की विशेष कृपा से वहां कोई वृत्तीयां नहीं होती कोई संस्कार नहीं होता है अपवर्ग नियम से साधारण माता-पिता के घर में परमात्मा की न्याय व्यवस्था अनुसार आत्मा फिर से मां के गर्भ को प्राप्त करती है और आत्मा को ऐसा क्यों वह समय प्राप्त गर्भ में आना पड़ता है ? क्योंकि आत्मा की इच्छा होती है। आत्मा ही इच्छा करती है 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष, 36000 सृष्टि बनेगी बिगड़ेगी इतने दिनों तक मुक्ति में रहने के बाद आत्मा इच्छा करती है कि हे प्रभु फिर से मां का गर्भ का दर्शन करने फिर से जाना चाहता हूं संसार का सुख देखना चाहता हूं दुख देखना चाहता हूं ऐसा उपनिषद में संकेत मिलते हैं लोग भी कहते हैं ।
चलिए तो मुक्ति से आत्मा इस ईश्वरीय व्यवस्था से लौटती है, तो मेरा भी मत इस पर ज्यादा है कि परमात्मा के न्याय व्यवस्था से आत्मा लौटी है और संस्कार निरोध हो जाता है वृत्तियां निरोध हो जाती है वृत्तीय नहीं रह जाती है ।
तो वृत्तियों को जीवित रखने के लिए वृत्तियों को बनाए रखने के लिए वृत्तीय की जो खाद और पानी वह क्या है वह क्लेश अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश वृतियां भी रहेगी संस्कार भी रहेगा लेकिन इन संस्कारों और वृत्तियों के जो मूल है जड़ रस वह है क्लेश उसको मिटा दिया और क्लेश जैसे ही मिटा, क्लेश मिट गया तो अविद्या भी मिटती है ।
अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश और क्लेश जैसे ही नष्ट हुआ तो वृतियां हैं तो हैं, संस्कार है तो है, वह काम नहीं करेगी जैसे शरीर से आत्मा निकल जाने से यह शरीर मृतवत पड़ा है पड़ा ही रहेगा ।
सांप से सांप की आत्मा निकल गई सांप मर गया सांप पड़ा है उसे डरने कोई बात नहीं उसको कुछ नहीं करेगा कुछ नहीं बिगड़ेगा, तो चित्त में वृत्तीयां रहे संस्कार रहे लेकिन अब अविद्या नष्ट हो गई, अविद्या नष्ट हो गई तो वह वृत्तीयां भी वह नष्ट हो जाएगी चित्त के साथ हो वृत्तीय भी समाप्त हो जाएगी शरीर सुक्ष्म शरीर के साथ वृत्तियां भी समाप्त हो जाएगी संस्कार भी समाप्त हो जाएगा क्योंकि मोक्ष में सूक्ष्म शरीर भी नहीं जाता है और यह स्थूल शरीर तो जाता ही नहीं तो वृत्तीयां जो चित्त में थी वह नष्ट हो जाएगी वृत्तिलय हो जाएगा और क्योंकि अविद्या आदि नष्ट हो गये .. मोक्ष में छत्तीस हजार बार सृष्टि बनती बिगड़ती हैं परमात्मा अपना ध्यान रखेगा और मोक्ष से लौटने के बाद कहां से पाप पुण्य आरंभ होगा यह गलत बात है .. क्योंकि उस आत्मा का खाता तो शून्य से ही आरंभ होगा ।
क्यों कि अविद्या नष्ट होगई वृत्तिया मृतवत हो गई तो यहां पर वृत्तियो का निरोध है । अभ्यास और वैराग्याभ्याम अभ्यास क्या है इसको समझ लेते हैं और वैराग्य को फिर समापन करें ।
अभ्यास जिधर मन हमारा नहीं जा पाता है जिधर हमारा मन नहीं जाता है आप विचार करिए कि आज दिन भर में कितने बार अपने आत्मा को याद किया मैं शुद्ध हूं बुद्ध हूं मैं चेतन हूं मैं प्रकाश हूं मैं एक शक्ति हूं परमात्मा सर्व व्यापक है एक एनर्जी है एक प्रकाश है "आदित्यवर्णम् तम सा प्रस्तर ता विद्युतवा .. मृत्युवें " कितने मिनट याद किया आपने हमने 1 मिनट भी नहीं मन उधर गया ही नहीं कभी आज दिन भर सुबह से संध्या में बैठे फटाफट फटाफट मंत्र पाठ कर लिया हवन में ओम् स्वाहा कर लिया बस अपने खाना-पीना इधर गप्पे इधर-उधर काम में लग गए .. कितने देर आपने आत्मा परमात्मा को याद किया कितना मिनट चिंतन किया आपने मन में ? कुछ लोग तो होंगे वे धन्यवाद का पात्र हैं । लगभग लोग (प्रायः) हम अपने को भूले हुए हैं अपने पर विचार लेकर ईश्वर पर विचार नहीं करते । झूठ-मूठ सांसारिक बातों में उलझे रहते हैं उन्होंने क्या किया उन्होंने कहा गये ? तो जिस तरफ हमारा चित्त लगना चाहिए उधर का अभ्यास ( प्रेक्टिस) करना, शांत चित होकर के एकांत देश में
"उप हर-हरी नाम संग में नदी नाम धी य: विप्रो जायते " कितने लोग हैं इस पर काम करते हैं मैं संध्या करु एकान्त देश में चले जाऊ स्वामी दयानंद जी ने कहा संध्या घर में नहीं एकांत देश में चले जाएं अपने घर से दूर निकल के नदी के किनारे जलाशय के पास जंगल में एकांत में पेड़ के नीचे बैठकर समाहित होईये । यह कितना लोग करते हैं ? नहीं करते तो आप इसका अभ्यास करिए । आप घर में एक कोने में बैठ जाइए अभ्यास करिए तो उसका चित्त जहां पर नहीं लगता है उस दिशा में चित्त लगाने का प्रेक्टिस करना यह अभ्यास और जिधर हमारा मन कंटिन्यू लगा रहता है लगातार उधर से वैराग्य करिए उधर से मन हटाइये .. तो किधर मन लगा रहता है - मैं मेरा-मै संसार की उलझनों में विषयों - रुप रह गंध शब्द स्पर्श में विचारों में भूत भविष्य में उधर से वैराग्य करना है। अब वैराग्य कैसे करेंगे
तो कल भी चर्चा में यह कहा था वैराग्य क्रम में कि वैराग्य का मतलब है दोष दर्शन विचार करें कि जो मैं कर रहा हूं उससे क्या मिलेगा मुझे उसमें मेरी हानि होगी उसमें दोष देखिए उसमें कमी ढूंढ़िए जिधर भी आपका मन जा रहा है संसार के सुख में विषयों में शरीर में , इस शरीर को बचाने के लिए कितना जद्दोजहद कर रहे हैं हम लोग फिर भी यह बचने वाला नहीं ये नाव तो डूबने वाली हैं नाव में पानी आ रहा है चारों तरफ छिद्र है पता नहीं कब हार्ट अटैक हो जा ए ब्रेन हेमरेज हो जाए कैंसर हो जाए पता नहीं क्या क्या रोग हो रहे हैं लोग कब मर जाये कोई एटम बम विस्फोट हो जाए एक दिन नाव डूबेगी .. इसलिए ठीक है जब तक जीवन है इस शरीर को सुरक्षित रखने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा
योगाभ्यास एक्सरसाइज भोजन आदि क्यों कि यह साधन है, लेकिन यह सदा नहीं रहेगा इसमें दोष दर्शन करना ..
हम इसको सुरक्षित रखना स्वस्थ रखना चाहते हैं लेकिन किस लिए ठीक हैं आप प्रातः दो घंटे शरीर पर देते हैं अभ्यास करते हैं स्वस्थ रखने के लिए अच्छी बात हैं लेकिन स्वस्थ किसलिए.. माना आप दो सो वर्ष जीयेंगे तो क्या करेंगे दो सो वर्ष बाद भी शरीर छोड़ना पड़ेगा तो समय जो मिला है उसमें अपने बारे में विचार करें मैं कौन हूं कहां से आया कहां जाना हैं.. विचार करिए और मुक्ति की ओर बढ़ चले .. इस पर मनुष्य जीवन में काम नहीं किया तो स्वास्थ्य के लिए जद्दोजहद करना हमारी मूर्खता ही होगी ।
स्वस्थ हम इसलिए रहे कि अपने को जान पाए कि मैं कौन हूं कहां से आया हूं मेरा स्वरूप क्या है ? ब्रह्म का स्वरूप क्या है इसके लिए समय लगना चाहिए। तो अब संसार से अलग होने के लिए वैराग्य का होना शरीर में भी दोष दर्शन करना इस शरीर में जीने के लिए कितनी परेशानी उठानी पड़ती हैं आहार व्यवहार का ध्यान रखना पड़ता है ।
मैं इस शरीर से एक कदम परमात्मा की ओर नहीं बढ़ा तो मेरे जैसा मूर्ख इस संसार में कौन होगा ? ऐसे विचार करिए मन में .. कभी बच्चों के पीछे भाग रहा हूं संसार में क्या बच्चे मेरे हो जाएंगा अलग आत्मा है वो ठीक है आप कर्त्तव्य पालन करें बच्चे के प्रति परिवाकर के प्रति लेकिन निष्क्रिय/प्रिय भाव से करना है तो -
" अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः। " यहां तक आज की चर्चा में अपनी बात रखी और मुझे एक उदाहरण और याद आ रहा हैं दो तीन मिनट और बात कर लें ,समय तो हो गया पांच मिनट अंधिक तो यहां पर मुझे स्मृति कुछ सांख्य दर्शन की कुछ उदाहरण आ गये ... तो सांख्य दर्शनकार एक उदाहरण दिया है कि मेढकीवत
एक मेंढकी ने सुंदर कन्या का रुप धारण कर एक वन में विचरण करने लगी और उधर एक राजकुमार उसी वन -जंगल में आखेट खेलने आये संयोग मेंढकी बनी सुंदर कन्या राजकुमार से मिली । राजकुमार उसके रुप से मोहित हो गये तो राजकुमार ने कहा तुम मुझ से विवाह करो तो मेंढकी जो सुंदर कन्या के रूप में थी उसने एक शर्त रखी ..
राजकुमार एक शर्त पूरी करो तो मैं विवाह करुंगी, राजकुमार बोला क्या शर्त है बताओं । कहा कि तुम मुझे पानी मत दिखाना नहीं तो तुम मुझे ढूंढ नहीं पाओगे । मैं सदा सदा के लिए तुमसे दूर हो जाऊंगी । राजकुमार बोला यह कौन-सी बड़ी बात है शर्त मान ली बोला तुम्हें पानी नहीं दिखाऊंगा। दोनों का विवाह हो गया । अब कुछ दिन बाद वो मेंढकी बनी सुंदरी राजकुमार से कहती हैं - हे राजकुमार मुझे प्यास लगी है मुझे पानी चाहिए। और राजकुमार इस बात को भूल गया कि इसको पानी नहीं दिखाना तो थोड़ी दूर एक जलाशय था, चलो चलते हैं वहां पानी हैं पानी पी लेना वहां राजकुमार और मेंढकी जो माया से कन्या बनी थी, जैसे ही पानी के पास पहुंचे तो मेंढकी छलांग लगा कर पानी में जल में कूद गई, और जल में विलीन हो ग ई । तो राजकुमार बहुत दुखी रहने लगे। खूब प्रयास किए मेंढकी बनी कन्या खोज कराई जाल डलवाये पर नहीं मिली .. आज तक नहीं मिली । तो आर्य महानुभावों महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन में कहानी का उदाहरण दिया यहां आत्मा एक मेंढकी रुप हैं।
आप कहते हैं तो परमात्मा को मेंढकी का रुप बना लें सुंदर कन्या परमात्मा है और राजकुमार आत्म हैं ऐसे मान लेते है, तो आत्मा और परमात्मा के बीच शर्त लग गई परमात्मा ने कहा हे आत्मा ( राजकुमार) मैं तुम्हें तब सुख देती रहुंगी ( परमात्मा के लिए स्त्री लिंग वाचक ले रहे हैं क्योंकि परमात्मा मां भी होती है, पत्नी भी होती है ) जब तक तुम मुझे जल नहीं दिखाओगे और जल दिखा दोगे तो मैं सदा सदा के लिए मुझे खो दोगे तुम, तुमसे मैं दूर हो जाऊंगी । इस संसार का नाम है भवसागर ( सागर = समुद्र ) तो जैसे ही हम ध्यान में बैठते हैं तो हम संसार को याद कर लेते है तो परमात्मा रुप मेंढकी विलीन ( गायब ) हो जाती हैं और जब संसार जो भवसागर है समुद्र हैं, पानी है, इसको हम भूल जाते है तो मेंढकी रुपी परमात्मा बनीं कन्या हमारे हृदय में प्रगट रहते है, हमें सुख देती रहती हैं।
या तो संसार याद रखिए पानी तो परमात्मा गायब ।
परमात्मा को याद रखेंगे तो संसार को विस्मृत करना पड़ेगा, तो ब्रह्म हमारे को सुख देता रहेगा आनंद देता रहेगा।
(इस संसार रूपी जल को भूलें रहेंगे तो परमात्मा रुपी, ब्रह्म रुपी मेंढ़की का सानिध्य बना रहेगा।)
तो बड़ा अच्छा उदाहरण.. ऋषियों ने कैसे-कैसे उदाहरण लाकर हम मूढ़ आत्माओं को समझाने के लिए प्रस्तुत किए हैं । तो सदा संसार को भूलना संसार की वृत्तियों से अपने आप को अलग करना अपने आत्म स्वरूप को ब्रह्म के स्वरूप को याद रखना इसका अभ्यास करते रहना।और इसका अभ्यास करते रहेगे तो अभ्यास करते-करते एक दिन इतना अभ्यास होगा कि चलते-फिरते देखते सुनते आप ईश्वर को नहीं भूलेंगे संसार को भूले रहेंगे और संसार को भूलना हमारा परम सौभाग्य होगा।
तो आप सब इस बात का ध्यान रखें कि संसार को हमें भुलाना है और ब्रह्म को अपने को याद रखने का अभ्यास करना है प्रैक्टिस करना है ।
आज इतना ही रखते हैं आगे की चर्चा में कुछ नई-नई बातें आएगी उनकी व्याख्या हम करते रहेंगे बहुत धन्यवाद।
क्रमशः
योग दर्शन उपदेशक - आचार्य प्रभामित्र जी
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा
आर्यो का महाकुंभ आयोजित करने के लिए आर्य रत्न श्री लखन लाल जी को और इस प्रवचन को सुनकर लिखने का प्रयास करने वाले पं० चंद्रशेखर शर्मा जी को साधुवाद।
ReplyDeleteआचार्य प्रभामित्र जी की प्रवचन लिखा तो पढ़ने वाले पाठकों के लिए सरलता से समझ आयेगा।
शुभम स्वस्ति🌷💐