विवेक आर्य और स्वामी सच्चिदानन्द नामक आर्यसमाजी लिखते व कहते हैं कि -- " कृष्ण भी अपनी किशोर अवस्था का मान करते हुए रात्रि के समय उनके (गोपियों) साथ रमण किया करते थे। कृष्ण उनके साथ किस प्रकार रमण करते थे, पुराणों के रचयिता ने श्रीकृष्ण को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भागवत पुराण, स्कन्ध १०, अध्याय २९, श्लोक ४५ और ४६ में लिखा है।
"कृष्ण ने यमुना के कपूर के समान चमकीले बालू के तट पर गोपियों के साथ प्रवेश किया। वह स्थान जलतरंगों से शीतल एवं कुमुदिनी की सुगन्ध से सुवासित था। वहाँ कृष्ण ने गोपियों के साथ रमण, बाहें फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ दबाना, उनकी चोटी पकड़ना, जाँघों पर हाथ फेरना, लहँगे का नाड़ा खींचना, स्तन पकड़ना, मज़ाक करना, नाखूनों से उनके अंगों को नोच-नोचकर घायल करना, विनोदपूर्ण चितवन से देखना और मुस्कराना तथा इन क्रियाओं के द्वारा नवयौवना गोपियों को खूब जागृत करके उनके साथ कृष्ण ने रात्रि में रमण (विषयभोग) किया।"
ऐसे अभद्र विचार श्रीकृष्ण महाराज को कलंकित करने के लिए भागवत के रचयिता ने स्कन्ध १० के अध्याय २९ और ३३ में वर्णित किए हैं।
शचीन्द्र -- विवेक आर्य एवं स्वामी सच्चिदानन्द ने दुर्भावना से इन श्लोकों का अनुचित तात्पर्य ग्रहण करके श्रीकृष्ण और भागवत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
स्वयं को हिन्दुओं का हितैषी एवं हिन्दू धर्म का चौकीदार कहने वाले आर्यसमाज को करना तो यह चाहिए था कि इन श्लोकों का वास्तविक तात्पर्य प्रकट करते हुए अन्य विधर्मियों के आक्षेपों का उत्तर देता, किन्तु इन्होंने तो स्वयं ही अर्थ को तोड़-मरोड़कर, अपना नमक-मिर्च-मसाला लगाकर श्रीकृष्ण और पुराणों को बदनाम करना आरम्भ कर दिया। इससे आप समझ सकते हैं कि ये कितने बड़े कृष्णप्रेमी हैं। अब इनकी बात पर आते हैं।
इस श्लोक में प्रत्यक्ष संभोग का तो वर्णन नहीं है, किन्तु 'रमण' शब्द से स्वामी दयानन्द एवं आर्यसमाजी यहाँ विषयभोग का अर्थ ग्रहण करते हैं। अब चूँकि आर्यसमाजी श्रीकृष्ण को मनुष्य ही मानते हैं, अतः उसी दृष्टि से प्रथम विचार किया जाता है।
हमारा प्रश्न है कि श्लोकों में श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था का वर्णन होने पर 'रमु क्रीडायाम्' का अर्थ विषयभोग कैसे होगा? अर्थात् जहाँ बाल्यावस्था का वर्णन हो, वहाँ रमण का अर्थ विषयभोग नहीं होता। यदि विषयभोग अपेक्षित होता, तो 'यम् मैथुने' धातु का प्रयोग होता। अतः ऐसे सभी वर्णनों में प्रकरणानुसार 'रमयन्ति' का अर्थ 'प्रसन्न करना' होगा। अर्थात् बालक कृष्ण नाना प्रकार की उपर्युक्त क्रीड़ाएँ करके गोपियों को प्रसन्न किया करते थे।
धातुपाठ में 'रमु क्रीडायाम्' (भ्वादिगण) का मूल अर्थ क्रीड़ा ही है, तब यहाँ आर्यसमाजियों ने 'विषयभोग' अर्थ ही क्यों ग्रहण किया?
'गोपैः समं रममाणो व्रजे' इसका अर्थ 'गोपबालकों के साथ खेलते हुए' होगा या आर्यसमाजी यहाँ भी विषयभोग ही मानेंगे?
अपनी पुस्तक 'आर्याभिविनय' में स्वामी दयानन्द 'सोम रारन्धि नो ह्वदि' मन्त्र के अर्थ में लिखते हैं, "हे परमात्मा! आप हमारे हृदय में यथावत् रमण कीजिए।" तब हमारा प्रश्न है कि आर्यसमाजी जब इस मन्त्र का उच्चारण करते हैं, तब क्या वे परमात्मा का संभोग हेतु आवाहन कर रहे होते हैं?
इसी प्रकार 'भाष्य-भूमिका' के 'वेदविषय-विचार' में स्वामी दयानन्द 'परमेश्वर एव रथो रमणाधिकरणम्' मन्त्र का अर्थ करते हुए लिखते हैं, "परमेश्वर को सब स्त्री-पुरुषों के रमण का आश्रय कहते हैं।" तब क्या आप यहाँ भी आर्यसमाजियों के ईश्वर को सभी आर्यसमाजी स्त्री-पुरुषों से मैथुन करने वाला मानेंगे?
'सत्यार्थप्रकाश' में भी स्वामी दयानन्द ने अनेक स्थानों पर 'रमण' शब्द का प्रयोग किया है। वहाँ किसी एक स्थान पर भी रमण का अर्थ विषयभोग क्यों नहीं लिया गया?
'सत्यार्थप्रकाश' में ही मनुस्मृति के श्लोक, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः', का अर्थ करते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं, "जिस कुल में नारी लोग रमण अर्थात् आनन्द-क्रीड़ा करती हैं।" तब क्या यहाँ भी विवेक एवं सच्चिदानन्द जैसे दयानन्दी रमण का अर्थ संभोग मानते हुए यह कहेंगे कि दयानन्दियों के कुल की महिलाओं का जब सम्मान होता है, तभी देवता उनके घर संभोग करने आते हैं?
अतः भागवत के इस प्रकरण में बाल्यावस्था के परिप्रेक्ष्य में 'रमण' शब्द का अर्थ क्रीड़ा, आनन्द अथवा प्रसन्नता है, मैथुन नहीं। गोपियाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण से कहती हैं, "सन्त्यज्य सर्वविषयान् तव..." अर्थात् "हम सभी विषयभोगों को छोड़कर भक्त बनकर तुम्हारी शरण में आई हैं।"
गोकुल में श्रीकृष्ण लगभग दस वर्ष की आयु तक रहे थे। ग्यारहवें वर्ष में वे मथुरा चले गए थे। जिस समय का यह प्रकरण है, उस समय उनकी आयु लगभग नौ वर्ष सिद्ध होती है। जब पुराण यहाँ उनकी बाल्यावस्था का वर्णन कर रहे हैं, तब यह लीला विशुद्ध सिद्ध होती है। अतः स्पष्ट होता है कि इस श्लोक तथा इस प्रकरण में लौकिक संभोग का न तो वर्णन है और न ही उसका संकेत। यह विशुद्ध प्रेम का वर्णन है।
No comments:
Post a Comment