"तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानम् उपसंहरत्येवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति।"
यहाँ उपनिषद संकेत कर रहा है कि मृत्यु के बाद दूसरा शरीर प्राप्त होने में इतना ही समय लगता है, जितना एक कीड़ा एक तिनके से दूसरे तिनके पर जाने में लगाता है। अर्थात् मृत्यु के बाद दूसरा जन्म प्राप्त होने में कुछ ही क्षण लगते हैं। (आचार्य सोमदेव, परोपकारिणी सभा)
शचीन्द्र - आर्यसमाज का कोई सामान्य व्यक्ति हो या आचार्य, ये जो भी प्रमाण देते हैं, उसका पूर्वापर छिपा देते हैं अथवा स्वयं शास्त्र नहीं पढ़ते हैं। किसी अन्य आर्यसमाजी पुस्तक में अपने पक्ष का प्रमाण देखकर गद्गद होकर, आनंद के आँसू बहाते हुए, उसे कॉपी-पेस्ट कर देते हैं।
बृहदारण्यक उपनिषद का यह जो प्रमाण आर्यसमाजी प्रस्तुत करते फिरते हैं, इसमें पारलौकिक सूक्ष्म देह के ग्रहण की बात है। अर्थात् किसी की जब मृत्यु होती है, तब वह यदि देवलोक जाएगा तो देव-शरीर की प्राप्ति होगी। पितृलोक जाएगा तो पितृ-शरीर की प्राप्ति होगी। अर्थात् जिस भी लोक में व्यक्ति जाएगा, उसी लोक की देह के ग्रहण में ही इस श्रुतिवचन का तात्पर्य है। मृत्यु के बाद सभी जीवों का पुनर्जन्म इसी लोक में तुरंत नहीं होता है।
उपनिषद के इस प्रमाण को आर्यसमाजी जो प्रस्तुत करते हैं, उसके आगे ही पारलौकिक शरीर के ग्रहण की स्पष्टता का वचन साथ में है। उसे किसी एक आर्यसमाजी ने छिपाकर यह आधा-अधूरा प्रमाण किसी पुस्तक में लिख दिया और तब से अब तक आर्यसमाजी आचार्य भी मूर्खतावश इस अधूरे प्रमाण को प्रस्तुत करते फिरते हैं। वह प्रमाण देखें -
"एवमेव अयमात्मा इदं शरीरं निहत्य, अविद्यां गमयित्वा, अन्यद् नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते - पित्र्यं वा, गान्धर्वं वा, दैवं वा, ब्राह्मं वा, प्राजापत्यं वा, अन्येषां वा भूतानाम्।"
यहाँ स्पष्ट कर दिया गया है कि मृतक को तत्काल मिलने वाला पारलौकिक शरीर पितृलोक या देवलोक का पितृ-देवादि शरीर होता है। इस प्रमाण से पितृलोक भी सिद्ध हो जाता है और जीव का पितृयोनि में जाना भी सिद्ध हो जाता है। मृतक पितर भी सिद्ध हो जाते हैं, जिनके लिए मृतक-पितृ श्राद्ध की भी सिद्धि हो जाती है। इस पितृलोक का वर्णन यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण (१४.४.३.२४ तथा ३.७.१.२५) में दिया गया है।
इस तत्क्षण पुनर्जन्म के सिद्धान्त को लेकर भी आर्यसमाजियों में विवाद होता है। आधे आर्यसमाजी अपनी मूर्खता से उपनिषद के इस अधूरे प्रमाण से तत्क्षण पुनर्जन्म सिद्ध करते हैं, तो कुछ समाजी कहते हैं कि "१२ दिन बाद आत्मा का पुनर्जन्म होता है।"
स्वामी दयानन्द ने यजुर्वेद के ३९.९ मंत्र की व्याख्या में कम-से-कम १२ दिन बाद जीव का पुनर्जन्म माना है। इसलिए आधे आर्यसमाजी १२ दिन बाद पुनर्जन्म मानते हैं। अब पहले पक्ष वाले समाजी, जो तत्क्षण पुनर्जन्म मानते हैं, वे कहते हैं कि स्वामी जी ने १२ दिन नहीं कहा है, बल्कि बारह क्रम की बात कही है।
स्वामी दयानन्द ने भावार्थ में लिखा है -
"हे मनुष्यों! जब ये जीव शरीर को छोड़ते हैं, तब सूर्यप्रकाश आदि पदार्थों को प्राप्त होकर कुछ काल भ्रमण कर अपने कर्मों के अनुकूल गर्भाशय को प्राप्त हो, शरीर धारण कर उत्पन्न होते हैं।"
इससे स्पष्ट होता है कि आधे आर्यसमाजी तो दयानन्द के लिखे को भी न मानकर तत्क्षण पुनर्जन्म के अवैदिक सिद्धांत पर अडिग हैं।
कुल मिलाकर स्वामी दयानन्द से लेकर अब तक के आर्यसमाजियों का एक सिद्धांत यह है कि अपनी-अपनी कल्पना करके सिद्धांत गढ़ो और छल आदि से शास्त्रों में उसे खोजकर निकालो; लेकिन जो वास्तव में सत्य शास्त्रीय सिद्धांत हो, उसे किसी भी हाल में मत मानो।
पितृलोक में जाने के प्रमाण वेद में भी हैं -
"जीवानामायुः॒ प्र तिर त्वमग्ने पितॄ॒णां लोकमपि॑ गच्छन्तु॒ ये मृ॒ताः।" (अथर्ववेद १२.२.४५)
यहाँ पर मृतक का पितृलोक में जाना कहा गया है। इसी प्रकार -
"परा॑परैतावसु॒विद्वो॑ अ॒स्त्वधा॑ मृ॒ताः पि॒तृषु॒ सं भ॑वन्तु।" - (अथर्ववेद १८.४.४८)
यहाँ भी मृतकों का पितृलोक में जाना सूचित किया गया है। ये दोनों वेदप्रमाण आर्यसमाज की परलोक-संबंधी सब मान्यताओं को ध्वस्त कर देते हैं।
लेकिन अपनी अवैदिक मान्यता को ऊपर रखने के लिए आर्यसमाजी इन सब प्रमाणों को अनदेखा कर देते हैं, छिपाते हैं अथवा इनका अनर्गल अर्थ करने का प्रयास करते हैं।
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