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Sunday, 22 December 2024

योगदर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (६)


                           ॥ॐ॥
                          योग दर्शन
   योग दर्शन पर पष्ठम् दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
     ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
      मंगलवार मार्गशीर्ष कृ ११विक्रम संवत २०८१ 
                26 नवंबर 2024 ईस्वी
        (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )

आज हम सब षष्ठम दिन के योग दर्शन पर चर्चा करें 
इससे पूर्व आचार्य आवृत्ति जी का भजन 

ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए॥ 

संसार में ही दिन रात आसक्त रहकर, दिन रात अपनी ही मतलब की कहकर ।
सुख के लिए लाख दुःखों को सहकर, ये दिन अब तक यूं ही बिताये ।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए।
ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं‌ ॥
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 
ऐसा जगा दो फिर सो न जाऊं अपने को निष्काम प्रेमी बनाऊं।
ऐसा जगा दो फिर सो ना जाऊं अपने को निष्काम प्रेमी बनाऊं ।
तुम को ही चाहूं तुम को ही पाऊं, संसार का भय कुछ रह न जाये ।
तुम को ही चाहूं तुम को ही पाऊं, संसार का भय कुछ रह न जाये ।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं‌ ॥
हे नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 

वो योग्यता दो सद्कर्म कर लूं अपने हृदय में सद्भाव भर लूं
वो योग्यता दो सद्कर्म कर लूं अपने हृदय में सद्भाव भर लूं ।
नर तन हैं साधन भव सिंधु तर लूं ऐसा समय फिर आये न आये।
नर तन हैं साधन भव सिंधु तर लूं ऐसा समय फिर आये न आये।
हे नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। यह मन न जाने क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं।
है यह नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 

                     नमस्ते धन्यवाद।
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आइए आरंभ करते हैं।  मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे - 
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
        तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
              ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


सभी श्रेष्ठ मनीषी महान पुरुषों महानुभावों को नमन ।
योग दर्शन की चर्चा में हम यहां तक आए थे की हेय दुख
हेय का मतलब दुख और दुख का कारण और दूसरा था सुख और सुख का उपाय यहां जो हान शब्द आया हैं -
 योग दर्शन में हेय, हेयहेतु हान हानोपाय 
हान हानोपाय हेय हेतु  । तो यह जो हान है जिसको सुख कहा गया हैं यह परमात्मा का सुख है हान आनंद ।
सांसारिक सुख को योग दर्शनकार ने दुख की कोटी में रखा है । संसार में सुख नहीं है, वैसे सांसारिक दृष्टि से विचार करेंगे तो संसार में सुख है, क्योंकि प्रकृति के तीन अवस्थाएं हैं तीन गुण हैं सतोगुण रजोगुण तमोगुण। इन तीन गुणों के आधार पर हम विचार करेंगे तो सुख की प्रतिती होगी और इन तीन गुणों के बारे में महर्षि पतंजलि में यहां पर कहा हैं -
प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम्।  ( योग दर्शन २/१८)
तो इस दृश्य इस जगत को इस संसार को इस रूप में ऋषि कहते हैं कि प्रकाश, प्रकाश का मतलब है ज्ञान प्रकाश का मतलब रोशनी आप भी सब जानते हैं । तो वह सतोगुण जो होते हैं वह प्रकाशशील है । स्वभाव सत्व का कैसा है प्रकाश।  तो जब हमारे चित्त में सतोगुण प्रधान होता है तो हम सत्य सत्यता यथार्थ को जानते हैं । प्रकाशित होता है सब बातें सही कौन है ? गलत कौन है ? यह हमें प्रतीत होने लगता है ।और फिर कहा क्रिया, रजोगुण का क्रिया है, की राजोगुण यदि बढ़ा हुआ है चित्त में जीवन में तो व्यक्ति बड़े चंचल होते हैं क्रियाशील होते हैं बहुत एक्टिव होते हैं । और रजोगुण दुःख भी प्रदान करता है । और सतोगुण सुख देता हैं । दुख देता है रजोगुण चंचलता को लाता है क्रियाशीलता को लाता है खूब व्यक्ति भागता है दो चार दस प्रकार के बिजनेस भी करेंगे कि भागेंगे भी राजनीति में भी जाएंगे 
वहां जाएंगे बहुत .. तो कहते कि इसमें रजोगुण उभरा हुआ है । और सतोगुण वाले व्यक्ति होते हैं वह शांत चित्त होकर के एकांत में रहना पसंद करते हैं विवेक भाव से किसी कार्य को करते हैं इस कार्य को करने में क्या लाभ है क्या हानि हैं ?और हमें क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ? इन सारी बातों का प्रकाश उसके मन में रहता है । 
लेकिन तमोगुण वाले व्यक्ति - तो तमोगुण का जो फल है वह स्थिति वाला है मूढ़ अवस्था । "प्रकाश क्रिया स्थिति"  स्थिति का मतलब यहां पर पड़े रहना । तो तमोगुण यदि बढ़ा हुआ है व्यक्ति के अंदर तो किंकर्तव्यविमूढ़म् वह क्या करें ? क्या ना करें ? उसको वह समझ नहीं रहता उसके पास मूढ़ अवस्था में मूर्छित अवस्था जैसा बना रहता है तो ना कुछ करने की इच्छा है ना कुछ करेगा । तो इस प्रकार से यह तमोगुण की बात यहां पर आई है । फिर कहा यह जो तीनों गुण मिलकर के "भूत इंद्रियात्मक" भूत क्या है ? इन तीनों गुणों से ही यह सृष्टि की रचना हुई तो यह जो पंचमहाभूत है तो यह भी त्रिगुणात्मक है और जो इंद्रियां है, इंद्रियां हमारी यह भी त्रिगुणात्मक हैं। लेकिन विचार करके देखेंगे तो यह संसार जो है तमोगुण प्रधान है भूत । अब हम थोड़ा सा सांख्य दर्शन में ले चलेंगे आपको तो सांख्य दर्शनकार ने यहां पर क्या कहा की
  सत् रज तम साम साम्यवस्था प्रकृति:
प्रकृतय महान महत्व अहंकारों अहंकारत पंचतत्व मात्राणि उभय इंद्रियं स्थूलभूतानि पुरुषेरिति पंच - त्रिगुणां ..  सूत्र के आधार पर अब सत् रज तम साम यहां पर आप देखेंगे तो क्योंकि प्रकृति की चर्चा आई तो सत्व रज तम तीनों की जो साम्यावस्था होती है इसको हम प्रकृति कहते हैं, प्रकृति में समता होती हैं । मूल कारण में जो आंख का विषय नहीं बनेगा और जब वह प्रकृति निर्माण कार्य के रूप में आगे बढ़ती है परमात्मा की शक्ति से परमात्मा उसको जब आगे बढ़ता डेवलपमेंट करता है तो वहां पर वै-साम्यावस्था आती है साम्यावस्था नहीं रहती है । इसको समझिए की प्रकृति के निर्माण में जब प्रकृति सम भाव में रहेगा अपने-अपने स्वरूप में सतोगुण तमोगुण रहेगा तो वह प्रलय की स्थिति होगी मूल कारण होगा और सृष्टि निर्माण जब आरंभ होता है तो परमात्मा की शक्ति उसमें काम करती है और वह वैसमव्य  अवस्था में आ जाता है वैसमव्य का मतलब विक्षोभ ।
जैसे नदी में एक पत्थर फेंके तो देखिये पानी में लहरें उठती है विक्षोभ होता है उथल-पुथल होता है । तो सत्व रज तम  में जब उथल-पुथल होता है परमात्मा जब उसको मिक्स करता है कम ज्यादा करके निर्माण करता है तो फिर सृष्टि बनना आरंभ हो जाता है । तो पहला स्टेप जब बनता है पहले कार्य जो है वह सांख्य दर्शन के आधार पर क्योंकि यहां पर भूत और इंद्रिय शब्द आया है उसकी व्याख्या करने के लिए मैं वहां पर सांख्य दर्शन में गया उसको समझते हुए आज को हम समझेंगे तो पहले कार्य जो बनता है उसकी मह तत्व कहते हैं । क्या कहते हैं ? महतत्व और महतत्व पहला सृष्टि का कार्य है उसको बुद्धि तत्व भी कहते हैं।
बुद्धि इसी महतत्व के द्वारा हम आत्मा सत्या-सत्य का निर्णय कर पाते हैं । तो सत्या-सत्य निर्णय करने का जो इंस्ट्रूमेंट है साधन है उसे महतत्व कहते है वह बुद्धि तत्व है और बुद्धि से महतत्व से सृष्टि जब और आगे बढ़ी अहंकार बन गया। अहंकार.. फिर इसको अहंकार को दो प्रकार से देखेंगे फिर यह चर्चा जब विषय बढ़ जाएगा,क्योंकि विषय को हम यहां योग दर्शन पर केंद्रित करना चाहते हैं ।
अहंकार एक पदार्थ है अहंकार एक सृष्टि का कार्य है अहंकार से व्यक्ति जो अपना सत्ता का बोध कराता है अपने आत्मा का बोध करता है अपने कर्तव्य का बोध करता है ।
अहंकारत पंचतत्व मात्राणि ..तो अहंकार से दो विभाग बन गये इसको समझिए ..
अहंकार से दो विभाग बना अहंकार में सत्व गुण की प्रधानता से इंद्रियों का निर्माण हुआ और इंद्रियां कितने हैं? तो इंद्रियां 10 इंद्रियां और एक मन इंद्रियों है और ये 11 हैं ।
इंद्रियों का निर्माण सत्व अहंकार से हुआ और सत्व अहंकार से परमात्मा ने इंद्रियों को बनाया है तो विचार करके देखिए यह जो इंद्रियां हमारी है सात्विक है मन सात्विक हैं, मन का जो स्वरूप है सतोगुण प्रधान है । इंद्रियों का जो सामर्थ्य है वह सत्व प्रधान है । लेकिन आपके मन में प्रश्न आ गया होगा की मन चंचल होता है मन को रोके भी नहीं रुकता ।
तो मन सतोगुण कैसे माना जाए तो आप सोचेंगे कि मन को चंचल करने के लिए जो रजोगुण उसमें उभरा है उसका कारण हमारा आहार है, हमारा व्यवहार है, हमारी आदतें हैं, बहुत सारे ऐसी आदतें ऐसा आहार ऐसा व्यवहार जो मन को जीवन को रजोगुण - तमोगुण से भर देता है । तो अब मन में रजोगुण प्रधान हो गया या तमोगुण प्रधान हो गया उसका कारण हम मनुष्य हम आत्मा हैं कि हमारा खान-पान कैसा है व्यवहार कैसा है । यदि आप मन को अपने स्वरूप में रहने देना चाहते हैं की मन को जैसा परमात्मा ने डिजाइन किया है इंद्रियों को जैसा डिजाइन किया है निर्माण किया है उसको हम छेड़छाड़ ना करें तो आपको उसके अनुरुप सतोगुण के अनुसार यदि आहार आदि व्यवहार करते हैं तो मन इंद्रियों अपने स्वरूप में रहती है नहीं तो अपने स्वरूप को छोड़ देती है । तो यहां पर इंद्रियां शब्द पढ़ा हुआ है योग दर्शन में तो इंद्रियां सातोगुण है और उसमें मन भी एक इंद्रिय है वह आंतरिक इंद्रिय उभय इंद्रिय है । मन को क्या कहा "उभय इंद्रिय" क्यों कहा ? आप सायंकाल और प्रातःकाल जो हवन करते हैं दैनिक उसके अलग-अलग मंत्र हैं लेकिन आठ मंत्र उभय कालीन मंत्र उसको आप सब जानते हैं कि वह प्रातः कालीन वाले मंत्र के साथ भी जुड़ते है और सांयकालीन मंत्रों के साथ भी वही मंत्र जुड़ते है इसलिए वह उभय-कालीन हैं , वह अलग नहीं है, सेम है । तो मन जो है वह उभय इंद्रिय इसलिए मन को कहा जाता है की मन जो है ज्ञान-इंद्रियों के साथ भी जुड़ता है और कर्म-इंद्रियों के साथ भी मन जुड़ जाता है इसलिए मन का नाम उभय इंद्रिय है और जिस जिस इंद्रिय के साथ मन जुड़ेगा वही इंद्रिय काम करेगी ।
मन का स्वभाव है मन का धर्म है कि एक बार में एक ही काम मन करता है दो काम नहीं करेगा । तो मन जिस इंद्रिय के साथ जुड़ता है वह इंद्रिय एक्टिव होती है वह विषय को ग्रहण कर पाती है और जिसके साथ मन नहीं जुड़ेगा वह इंद्रिय ग्रहण नहीं करेगी विषय को । तो अब इस पर प्रश्नआएगा की मन तो एक बार में कितने काम हम कर लेते हैं कितने इंद्रियों से काम कर लेते हैं तो यह विषय आप सब जानते हैं कि मन इतना सूक्ष्म है इतना गतिमान है इतना पावरफुल है कि उसके अंदर इतना सामर्थ्य है कि वह बहुत कम समय में अपने कई इंद्रियों को प्रयोग कर सकता हैं।
और हमें लगता है कि एक साथ वह कई पर कार्य कर रहा है, लेकिन उसमें क्रमभेद हैं । उसमें क्रम भेद हैं जैसे हाथ में आप पांच बॉल उछालें अभ्यास हो तो पांचों बॉल्स को आप गिरने नहीं देंगे इतनी तेज गति से आपका अभ्यास है कि आप क्रम से एक के बाद एक पांचों गैंदो को क्रम से पकड़ कर उछाल देते हैं और गिरने नहीं देते हैं तो मन का इतना सामर्थ्य है कि वह क्रम से होने दें रहा है लेकिन हमें लगता है एक साथ हो रहा हैं । पंखा जब घर में चलाते हैं तो पंखुड़ियां तीन या चार होती है लेकिन जब वह घूमते हुए गति पकड़ लेती है तो लगता है एक ही हैं, वो तीन या चार नहीं दिखाई देती तो मन जब स्पीड में काम करता है तो हम साधारण मनुष्यों को ऐसा प्रतीत होता है कि मन एक साथ कई कामों को कर रहा है, लेकिन वो क्रम से हो रहा है वो क्रम इतना फास्ट है कि लगता है मन सबके साथ जुड़ रहा है।
तो इंद्रियां मन यह सात्विक है परमात्मा ने सात्विक बनाया है, इसको सात्विक ही रहने देना चाहिए और वह यदि हम व्यवहार आहार सात्विक करेंगे तो मन सात्विक रहेगा ।
फिर कहा "भूत और इंद्रियां"  तो भूत क्या है ?  भूत का निर्माण जो पंच महाभूत हैं अग्नि वायु जल आकाश पृथ्वी की यह पांचो महाभूत तमस अहंकार से बनाएं । क्योंकि पहले सूक्ष्म भूत है रुप रस गंध स्पर्श शब्द, इससे फिर पंचमहाभूत बना है अग्नि वायु जल आकाश पृथ्वी ।
तो यह तमस अहंकार से इसकी उत्पत्ति हुई तो यह संसार तमोगुण प्रधान और इंद्रियां सत्गुण प्रधान है ।
अब कहेंगे तो रजोगुण प्रधान क्या है ? तो रजोगुण जिसके साथ जुड़ जाए । तमोगुण में रजोगुण चला जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । सतोगुण में रजोगुण चला जाए तो प्रभावित कर देता है अर्थात चंचल कर देता है ।
तो इस प्रकार से सृष्टि के बारे में थोड़ा सा हमने चर्चा आपके बीच में थोड़ी रखी। 

तो ऋषि कहते हैं महर्षि पतंजलि कि - भोग अपवर्ग दृश्य..
  आप के मन में प्रश्न आ रहा होगा कि परमात्मा में संसार बनाया इंद्रियां बनाई और यह सब कुछ दिया । पिंड और ब्रह्मांड । यह क्यों बनाया ? कई लोगों के मन में ऐसा प्रश्न आता है कि परमात्मा ने संसार बना करके हमको दुख में डाल दिया संसार नहीं बनता तो हम बढ़िया से पड़े रहते आत्मा अपना मुर्छित अवस्था में रहे, सोए हुए रहे, जैसे रहे इतना घर बनाओ, धन कमाओ, भोजन पकाओ, रोज भोजन करो यह फिर बुढ़ापा रोग इतना दुख है तो यह क्यों परमात्मा ने आत्मा को झंझट में डाल दिया ? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि यदि एक व्यक्ति मुर्छित अवस्था में एक आत्मा पड़ी हो तो वह कोई मुर्छित अवस्था में पड़ा रहना नहीं चाहता है । सभी अपने आप को जानना चाहते हैं, संसार को देखना चाहते है या अपने स्वरूप को जानना चाहते है प्रकाश में रहना चाहते हैं अंधकार में पड़ना नहीं चाहते है रात्रि कोई पसंद नहीं करता है रात्रि कितना ही सुखद क्यों ना हो किसी को अच्छा क्यों नहीं लगता हो लेकिन रात्रि जो है वह सुख कारक नहीं होता दिन शुभ कारक होता जहां प्रकाश और जहां अंधकार है वह तो दुख कारक होता है । तो आत्मा यदि मूर्छित अवस्था में पड़ी रहती तो ना तो आत्मा का प्रयोजन सिद्ध होता कुछ जान पाती और परमात्मा का ज्ञान परमात्मा का सामर्थ्य उसका भी कोई प्रयोजन नहीं रहता क्योंकि परमात्मा का जो सामर्थ्य है शक्ति है परमात्मा का जो ज्ञान है परमात्मा का क्रिया-बल है यह सब परोपकार के लिए है, दूसरे के हित के लिए है।  तो परमात्मा ने कल्याण की भावना से आत्मा के कल्याण हो जाए तो सृष्टि निर्माण कर दिया की आत्मा मुर्छित हैं, सोयी हुई है, समर्थ तो है लेकिन वह चल नहीं सकती है, देख नहीं सकती है, तो चलो हम इसके लिए कुछ हेल्प करते हैं सहायता करते हैं - तो परमात्मा ने सृष्टि बना करके आत्मा को दे दिया अब आत्मा के पास जैसे सृष्टि को जोड़ा अब आत्मा चलने लगी दौड़ने लगी बोलने लगी कि देखने लगी और वेद आदि पढ़ करके अपने को समझने लग गई कि मैं कौन हूं परमात्मा कौन है यदि मूर्छित अवस्था में आत्मा रहती है सृष्टि निर्माण नहीं होता इंद्रियां हमें प्राप्त नहीं होती, संसार नहीं होता तो अपने को तो नहीं जानते परमात्मा को भी नहीं जानते। परमात्मा का कितना बड़ा आनंद है " मोक्ष " उसको भी नहीं जान पाते।
परमात्मा करुणानिधान है तो उन्होंने यह इंद्रियां दी यह शरीर और संसार बना कर दिया कि तुम मुर्छित मत रहो मेरे आनंद को भोगों । स्वछंद होकर निश्चिंत हो कर जहां जाना है घूमों 
३१ नील ४० खरब १० अरब वर्ष तक ये परमात्मा की कितनी बड़ी कृपा है उपकार है आत्माओं पर मोक्ष प्राप्ति के लिए। तो संसार क्यों बनाया परमात्मा ने ? भोग अपवर्ग दृश्यम् .. अब यह मैं नहीं कह रहा हूं यह महर्षि पतंजलि कह रहे हैं कि भोग और अपवर्ग के लिए परमात्मा ने इस दृश्य को इस संसार को बनाया। भोग क्या हैं? सुख और दुःख।
संसार के विषय जो है भोग है रुप रंग गंध स्पर्श शब्द इसमें हम कोई सुखी होते हैं तो कोई दुःखी होते हैं। 

भोग या फल को भोगने के लिए संसार का होना जरूरी है, शरीर का होना जरूरी है, नहीं तो कर्म फल नहीं मिलेगा भोग नहीं मिलेगा अब अच्छा भी होगा, बुरा भी हो सकता है।
और अपवर्ग मोक्ष भी हमें नहीं मिलता यदि यह संसार ना होता यदि हमारे पास शरीर ना होता क्योंकि शरीर है तभी हम मोक्ष के लिए तैयारी करते हैं तो शरीर हमारा साधन है मोक्ष के लिए और कर्म फल को सुख और दुख को भोगने का एक साधन है यह शरीर यह दोनों प्रकार की फलों को चाहे मोक्ष प्राप्त करना चाहे चाहे संसार के सुख और दुख को भोगना हो तो शरीर का होना अनिवार्य है, इसलिए परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की । 
फिर कहते हैं कि इस संसार की रचना करके परमात्मा ने हम आत्माओं का कल्याण किया अब हम इस संसार के भोग से हम बचना चाहते हैं सुख-दुख से बचना चाहते हैं, जो बुद्धिमान होगा जो बुद्धिमान व्यक्ति है संसार में वह स्थाई सुख चाहता है और जो अज्ञानी है कम बुद्धि वाले हैं वह तात्कालिक सुख चाहता है विचार करके देखिए की दो प्रकार के लोग हैं संसार में - कल किसने देखा है ? आज खूब खाओ छककर के खाओ चाट-पकोड़े जो भी मिला खूब बढ़िया भोजन खाओ । 

तो अभी एक इंटरव्यू में देख रहा था वह सिद्धू जी जो है अपनी पत्नी के कैंसर को जैसे उनकी पत्नी हरा दिया,  फोर्थ स्टेज का कैंसर और वह क्लीयर हो गया, समाप्त हो गया तो लोगों ने पूछा मीडिया वालों ने की कैसे हुआ,क्या खाया  आपने तो उन्होंने कहा कि कैंसर का दो रीजन है एक तो गेहूं का जो प्रयोग करते हैं की उसमे कैंसर होने की खतरा अधिक रहती है तो गेहूं की रोटी अधिक नहीं खाए गेहूं तो सदा के लिए छोड़ दे तो अच्छा है और मोदी जी को धन्यवाद करिए क्योंकि श्री अन्न का उन्होंने प्रोत्साहन किया है श्री अन्न जो मोटे अनाज है जौ बाजरा कोदो समा चावल और फिर मक्का यह जो मोटे अनाज है उसका प्रयोग हमें करना चाहिए । खाली गेहूं ( केवल गेहूं) नहीं खाना चाहिए । गेहूं तो ना खाए तो अच्छा है । और फिर उन्होंने कहा कि रिसर्च में यह भी आया है कि जो चीनी है शुगर तो शुगर हमारे बॉडी में कैंसर का सेल्स डेवलप करता है तो शुगर को भी न ले और जो फिर मिल्क प्रोडक्ट और मिल्क वह भी दूध यदि शुद्ध मिलता है अपने घर का और वह भी गाय का हैं और देशी गाय का दूध तो अमृत है। वह हमारे बॉडी के लिए लाभदायक है, परंतु मार्केट में जो दूध आ रहा है प्रायः हानिकारक हैं  ..।

 तो मैंने यहां पर भोग की बात आई थी कि व्यक्ति अपने खान-पान के कारण अपने जीवन को दुख में डाल देता है ।जो मन में आने सो खाओ चाहे मिठाई खा लो चाहे पूरी खा लो खूब तेल वाली सब्जी का खा लो खूब खाइये तो आपको दुख मिलेगा रोग होगा इससे बच नहीं सकते तो रोगों से बचने के लिए यह तो रोग का कारण बताया कैंसर अधिक सेल्स डेवलप होते बॉडी में लेकिन इसका फिर बचाव क्या है नीम का पत्ता कच्ची हल्दी आंवला और फिर एक आता है वह नींबू का पानी का नींबू का पानी भी पीना चाहिए सुबह-सुबह खाली पेट जितना उपवास करेंगे उतना कैंसर का सेल्स मर जाता है तो यह कितनी बड़ी बात है कि हम खाये चले जाते हैं खाते जाते खाते जाते हैं और यह हमारी बीमारी है कि भूखा रहना नहीं चाहते खूब भूख लग रही है ना उपवास करिए व्रत करिए पानी पर रहिए पेट साफ रखिए तो वह अपने आप हमारा बॉडी रिकवर करता है तो इस प्रकार से भोग जो है यदि सुखी होना चाहते हैं तो अच्छा भोग हमें मिले सुख मिले और स्वस्थ रहें तो खान-पान पर अपने को ध्यान रखना होगा यदि खान पान का बिगाड़कर लिया आदत हमने बिगाड़ ली - भूख नहीं है लेकिन फिर भी खा रहे हैं ... जीव्हा पर नियंत्रण नहीं है हमने बचपन में , आज मैंने गलती कर दी मैं बचपन में मक्की की रोटी और दूध और उसके साथ गुड़ खा लेता था आज जबकि मैंने पेट सफाई की आज क्लोलिंग भी किया और जीव्हा पर, मन पर नियंत्रण नहीं किया आया अभी जस्ट आपके से जुड़ने से पहले मक्के की रोटी दिख गई और दूध गाय का और फिर वह गुड़ डाल करके मैं खा
लिया और खाने के बाद तत्काल मुझे लगा कि मैंने बड़ी गलती की आज तो मुझे  खाना नहीं था फल फ्रूट पर रहना चाहिए था तो अब यह क्यों ऐसा हुआ क्योंकि आदत बचपन में खाया था मां हमको खूब खिलाती थी संस्कार था और वह दिख गया और अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाया और जब खाया तब पश्चाताप हुआ तो व्यक्ति की आदतें कुछ ऐसी बन जाती है कि हम अपने गलती को समझ नहीं पाते हैं अपने इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं उसका परिणाम फिर हमें दूरगामी भोगना पड़ता है । महानुभावों मैं इस बात को इसलिए बता रहा हूं कि हमारे जीवन में दुख आता क्यों है ? यह सुख आएगा कैसे ? यह आएगा अपने जीवन में सुख वाणी इंद्रियां और मन आदि के नियंत्रण करने से ।
आपको वही चीज लेना है विचार करके "बिना विचारे जो करें सो पाछे पछताय.. " कहावत हैं आपको किसी भी काम को करने से पहले हजार बार सोचना पड़ेगा और चाहिए कि हम इस कार्य को करने जा रहे हैं इसका दूरगामी परिणाम कितना होगा  ? और महर्षि पतंजलि इसी बात को आगे कहेंगे -
 " वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् । " ( सा० पा० ३३)
वितर्क बाधने प्रतिपक्ष भावनम् तो वितर्क क्या है ?
अगला सूत्र है साधन पाद का-  
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ।
( सा०पा०३४ )
तो यहां पर महर्षि पतंजलि कहते हैं वितर्क हैं  कि व्यक्ति अपने जीवन में जो लोभ हैं क्रोध है यह बुराई है कमजोरी है यह वितर्क है । तो वितर्क को रोकने के लिए क्या करना चाहिए ? तो ऋषि कहते हैं प्रतिपक्ष भावनम् . तो प्रतिपक्ष भावनम् का क्या अभिप्राय है ? कैसे समझेंगे उसको?? समझते हैं एक उदाहरण से समझेंगे जैसे मन में यदि किसी विषय को भोगने की इच्छा हो जाए और वह संस्कार है हमने उसको भोग रखा है, खा रखा है, चख रखा है,  देख रखा है वह संस्कार है । तो उसके पीछे और क्या परिणाम हो सकता है मुझे रामायण कुछ बात की स्मृति आ रही है मैं उसको कहना चाहता हूं एक बार ऐसा एक कहानी बनाई गई की माता सीता को हनुमान जी और जामवंत जी, अंगद आदि वानर सैना बनाई और को खोजने के लिए निकले और सुग्रीव ने उनको आदेश दिया था कि माता सीता को यदि ढूंढ करके नहीं लाये एक महीने के अंदर तो तुम्हें मृत्यु दंड दिया जाएगा । ऐसे यह बात रामायण में नहीं है यह लोगों ने बनाया है लेकिन प्रतिपक्ष भावनाम् पर घटना है मुझे बड़ा अच्छा लगा,  इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि कोई भी कहानी जो होती है वह किसी अच्छी बात को किसी अच्छे मैसेज को देने के लिए की शिक्षा मिल जाए कहीं सुनी जाती हैं।
तो एक महीने का डेडलाइन दिया गया तो अब एक महीना गुजर गया माता सीता नहीं मिली समुद्र किनारे जाकर के सभी ने आमरण अनशन कर दिया कि अब लौट करके खाली हाथ नहीं जाना यहीं पर प्राण त्याग देंगे अन्न जल छोड़कर के । क्योंकि वहां जाएंगे तो सुग्रीव राजा है हमें उसका काम किया नहीं माता सीता को खोज नहीं पाया तो मृत्यु दंड देंगे तो वहां भी मरना है यहां भी मरना है और वहां मारेंगे तो और हानि होगी । क्या क्या हानि होगी वहां करने से वहां जाने से रिपोर्ट मिलेगा भगवान राम को कि सीता जी मिली  नहीं, भगवान राम सीता से बहुत स्नेह करते हैं तो वह भी प्राण त्याग देंगे अपनी पत्नी के वियोग में और भगवान राम प्राण त्याग देंगे तो फिर लक्ष्मण भी प्राण त्याग देंगे तो दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न भी प्राण त्याग देंगे।  अच्छा भाई नहीं रहेंगे तो तीनों माताएं जब महाराज दशरथ भी नहीं अब संसार में है तो तीनों माताएं प्राण त्याग देंगे और यह तीनों माताएं सारे भाई प्राण त्याग देंगे तो अयोध्या के नर नारी प्राण त्याग देंगे अयोध्या के नर नारी प्राण त्याग देंगे तो पशु पक्षी भी उतनी भगवान राम से प्यार करते हैं पशु पक्षी भी प्राण त्याग देंगे पेड़ पौधे वनस्पतियां यह सूख जाएंगे तो बहुत नहीं प्रेम करते कितनी बड़ी आग लग जाएगी और हमें तो मरना ही है असफल होने पर राजा छोड़ेंगे नहीं, यदि हम यहां पर प्राण त्यागते हैं समुद्र किनारे भूखे प्यासे रह करके तो यह सूचना है वहां तक नहीं जाएगी माता-सीता नहीं मिली तो पता मिलने की आस में तो कम से कम भगवान राम तो बैठे रहेंगे मरेंगे नहीं और  इतनी बड़ी आग तो नहीं लगेगी हानी तो नहीं होगी हम मरेंगे तो हम लोग ही केवल मरेंगे तो यह अच्छा है कि यहीं पर हमें इसको आग को बुझा देनी चाहिए आगे बढ़ने नहीं देना चाहिए ।
तो इससे हमें क्या शिक्षा मिलती है -
हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो हमारी आदतें हैं बुरी आदतें अपने इंद्रियों पर हम नियंत्रण नहीं कर पाते फिसल जाते तो उससे होने वाली हानि का विचार व्यक्ति को बार-बार करें हानि पर हानि हानि पर हानि उसके बाद इसके बाद यह हानि उसके बाद यह हानि उ इस प्रकार से यदि हानि होने का उससे होने वाले विनाश का यदि अधिक दिग्दर्शन मन में किया जाए तो संभव है कि हम उस कमजोरी से बच सकते हैं, और विचार करेंगे मुझे कोई भी काम करने से पहले हजार बार सोचना चाहिए कि मैं यह करूं या ना करूं यह करूं या ना करु  चाहे वह भोजन हो, व्यवहार हो, कोई विषय हो, उसका लाभ और हानि पर विचार बार-बार करना चाहिए यह प्रतिपक्ष भाव है । तो यदि वितर्क हिंसा आदि काम क्रोध लोभ मोह आदि जो हमारी कमजोरी है क्या यह हमें बाधित करता है हमें मजबूर करता है आदत के कारण संस्कार के कारण तो प्रतिपक्ष भावनम् यदि हम उठाते हैं तो उसका लाभ हमें यह मिलेगा कि हम उस बुराई से उस कमजोरी से अपने को बचा सकते हैं । और यदि प्रतिपक्ष विचार नहीं करते उससे होने वाले साइड इफेक्ट हानि पर विचार नहीं करते तो हम फिसल जाएंगे और पतंगे की तरह जो आग पर जल करके मरता है इस तरह से हम भी जल करके मर जाएंगे तो विचार करना चाहिए मनुष्य को जो हमारी कमजोरी है उसे मैं कैसे बचे और उसका कमजोर पक्ष को ढूंढते रहो हानि पक्ष को मन में लाते रहे जिससे हम बच सके । तो यहां पर भोग की बात चल रही थी यह ।
अब अपवर्ग क्या है ? अपवर्ग "मोक्ष" हैं।
संसार में यह केवल कहानी नहीं है यह केवल किस्सा नहीं है कि किसी ने कहा होगा पता नहीं होता है कि नहीं ? पर यह रियलिटी है, वास्तविकता है कि मोक्ष होता है ।
और मोक्ष क्यों होता है ?  हम ऐसा क्यों कहते हैं, मोक्ष को हमने देखा नहीं परमात्मा को हमने देखा नहीं लेकिन हम यह कह रहे हैं तो आपको शब्द प्रमाण से ऋषि के भजन गा रहे थे आदरणीय प्रेम जी की " ऋषियों की बात मान लो कि हम अपने जीवन को सुंदर बनाना चाहते हैं ... ।" तो ऋषि कभी असत्य भाषण नहीं करते योग दर्शन को लिखने वाले महर्षि पतंजलि वह असत्य भाषण कैसे करेंगे ? क्योंकि वह समाधि में थे आत्म दृष्टा थे और आत्म दृष्टा होने से वह जो कुछ भी लिखा है वह शब्द प्रमाण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हमें कि हमारा "मोक्ष" होता है, और यह यथार्थ है, ईश्वर है । तो अब आज कल के आधुनिक जो बच्चे हैं वह बच्चे कहते हैं कि जी मैं नहीं मानता इस बात को वेद में लिखा हुआ है दर्शन में लिखा हुआ है मैं नहीं मानता वहां तो ऐसे ही लिख दिया होगा क्या इसका प्रमाण है कि इसका यह मोक्ष होता होगा ?  परमात्मा है  ? 
यह जो बातें लिखी है वह सही है तो उनको समझाइए कि देखो शब्द प्रमाण को आप भी मानते हो ।
हम जितने लोग हैं बिना शब्द प्रमाण के अपने जीवन का व्यवहार नहीं कर सकते, तो फिर कहेंगे शब्द प्रमाण के बिना जीवन व्यवहार नहीं चलेगा । अब हम जन्म लिए उदाहरण समझिए हमने जन्म लिया और बाल्यावस्था में अबोध अवस्था हमारी कौन माता है ? कौन पिता है ? कौन दादा है ? कौन दादी है ? माता-पिता यह कहते हैं कि देखो बड़ा हो गया तो मैंने तुम्हें जन्म दिया है मैं तुमहारा पिता हूं मां कहती है मैं तेरी मां हूं अच्छा अरे तुम्हें जन्म दिया है अब यह उस बालक को शब्द के आधार पर जन्म देते समय तो बोलना नहीं क्योंकि अबोध था तो अब बड़ा हुआ तो मां कहती है कि मैं तुम्हारी मां हूं यह तुम्हारे वह दादा है और परदादा, दादा के दादा परदादा और उसके भी पीछे दादा का वह फोटो लगे हैं वह दादा है तो अब इस पर हम विश्वास करते हैं। यह सही बात है तो आप विचार करिए दादा परदादा को हमने नहीं देखा अब मां बाप तो चलो प्रत्यक्ष है वह कह रहे हैं तो मान लेते हैं, आपने मुझे जन्म दिया है इसलिए माता-पिता हो आपके शब्दों पर विश्वास करते हैं आप प्रत्यक्ष भी हो। अब जो नहीं है उस पर विचार करें तो वही दादा है परदादा है कैसे माने ? हमारे साथ माता-पिता ने कहा तो झूठ नहीं बोलेंगे वहां उनके शब्द पर आप विश्वास कर रहे हैं, तो क्या ऋषि जो बात कह गये, जो पिता के समान हमारे ऋषि थे जिन्होंने आप्त-भाव से, कल्याण की भावना से ग्रंथ लिखा वेद का आधार पर प्रमाण देते हुए तो वह कभी झूठ बोल सकते है?  वह समाधि में जाकर के उन्होंने प्रत्यक्ष किया और मैं इस बात को यहां पर सिद्धि के प्रकरण में इस बात को स्पष्ट करूंगा कल थोड़ी सिद्धि की बातें आएगी कि जैसे इन इंद्रियों से आंख आदि इंद्रियों से हम सांसारिक वस्तुओं को प्रत्यक्ष करते हैं तो ठीक उसी प्रकार से ऋषि लोग समाधिस्थ आप्तजन अपने ज्ञान चक्षु से अदृश्य सत्ता का प्रत्यक्ष करता है उसके लिए असंभव नहीं हैं। वह प्रत्यक्ष अनुभव करता है तो आत्मा का प्रत्यक्ष, परमात्मा का प्रत्यक्ष  "प्रत्यक्ष = प्रति अक्षर प्रत्यक्ष: ।" जो कहते हैं कि अक्षय इति आंख, तो इस प्रकार से प्रत्यक्ष जैसे साधारण मनुष्य अपने इंद्रियों से करता है इस तरह से ऋषि लोग अपने आत्मज्ञान से प्रत्यक्ष करता है और उस प्रत्यक्ष को जान करके वह जो बातें लिखता है उसे शब्द प्रमाण कहते है और शब्द प्रमाण हम जैसे लोक व्यवहार में हम प्रयोग का आधार पर मानते हैं और उसको अनुभव करते हैं इस तरह से ऋषि की बातों का अनुभव करना चाहिए ।
अब आगे थोड़े से बढ़ेंगे कि अब जो आठ शब्दों में योग दर्शन की बातें आई थी यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि योग की चर्चा हो और अष्टांग आठ अंगों की चर्चा ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी क्योंकि अब इतने कम समय में पूरे योगदर्शन के सारे सूत्र पर हम चर्चा नहीं कर पाएंगे क्योंकि 195 सूत्र हैं। इन 195 सूत्र पांच-सात दिन में नहीं कर सकते 
( क्योंकि यहां पर एक दिन में लगभग एक घंटे ही व्याख्यान हो रहा है ) तो मुख्य या मूल मूल सूत्र हम ले रहे हैं तो इस दूसरे पद में (साधन पाद में) अष्टांग योग में जो आया है जो आठ अंग वाले अष्टांग योग। 
तो आठ अंग वाले जो आठ हैं उसमें से आरंभ के पांच अंग बहिरंग है और अंत के तीन अंग अंतरंग हैं।
बहिरंग जो पांच है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार यह बहिरंग इसलिए है कि यह शरीर से संबंध रखते है स्थूल शरीर से स्थूल इंद्रियों से यहां इनका व्यवहार संबंध होता हैं ।और धारणा, ध्यान, समाधि यह मन का विषय है, आंतरिक भाग से सूक्ष्म शरीर से इसका संबंध हैं इसलिए इसको अंतरंग कहा जाता है ।
अब मैं सीधे वहां ले चलता हूं समय हो गया हैं कुछ मिनट और है तो मैं इस आठ अंगों की व्याख्या नहीं करूंगा आप सबको पता है क्योंकि इतना तो हम आर्यों को पता ही होता नाम भी याद है और यम पांच है नियम पांच है नाम भी याद है उनका व्याख्या भी परिभाषा भी हमें पता है भले व्यवहार में कितना लेते हैं वह अपना व्यक्तिगत विषय होगा लेकिन शाब्दिक रूप से तो अवश्य सबको पता हैं। तो उसके रिजल्ट (परिणाम) की थोड़ी-थोड़ी चर्चा करके मैं आज समापन करता हूं। 
परिणाम (रिजल्ट) क्या है तो पहले यम है और नियम है तो यम नियम की थोड़ी महत्वता बता दे -  दो शब्दों में कहते हैं कि जो व्यक्ति केवल यम का सेवन करता है और नियम का सेवन नहीं करता है उसके भी हाथ कुछ नहीं लगता जो कोई नियम का सेवन करता है यम का पालन नहीं करता उसको भी कोई हाथ नहीं लगता, कुछ भी हाथ में लगता है क्योंकि दोनों आपस में जुड़ा हुआ है ।
नियम व व्यक्तिक है व्यष्टि है और यम सामाजिक हैं समष्टि है।
इसको समझिए - यह जो मनुष्य समाज है मनुष्य समाज की भित्तियां / दीवार/ वॉल वह क्या है ? तो यम और नियम है । इसी पर मनुष्य समाज टिका हुआ है । 
तो यम और नियम यह हमारे समाज की दीवार है, आधार है। यदि भित्ति को तोड़ दिया जाए तो घर गिर जाएगा तो उसी तरह से समाज यदि ध्वस्त होता है यम नियम का पालन न होने से सत्य आदि आचरण न करने से व्यक्ति का जीवन दोषपूर्ण हो जाता है और उस समाज की स्थिति चरमरा जाती है ।
तो यम-नियम बड़ा ही महत्वपूर्ण हैं, जोगियो ( योगीयो ) के लिए तो और भी महत्वपूर्ण है । महर्षि दयानंद का जीवन यम-नियम से ओतप्रोत था उनको यम-नियम का पालन करने की इस पर फोकस करने की आवश्यकता ही नहीं थी उनको तो जीवन ही  यम-नियम था ।
अब यम-नियम के बाद है - "आसन" आसन तो आप सब जानते हैं आसन बहुत प्रकार के होते 350, 500 प्रकार के 600 प्रकार के आसन..
लेकिन एक आसन जो महर्षि पतंजलि ने बताया -
              " स्थिरसुखमासनम् । " ( सा०पा० ४६ )
इस तरह सुखपूर्वक यदि एक आसन में बैठा जाए और एक अभ्यास कर लिया जाए उसी से सिद्धि मिलेगी समाधि मिलेगी अन्यथा नहीं मिल सकती ।
तो यम के बारे में आया है अहिंसा - अहिंसा में यदि प्रतिष्ठित हो जाए तो क्या मिलेगा तो महर्षि कहते हैं 
    " अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः । " 
        ( योगदर्शन २/३५)
अहिंसा में प्रतिष्ठित होने से आस-पड़ोस के लोगों का प्राणियों का वैर त्याग हो जाता है । तो प्रश्न तो बहुत आएगें पर समय नहीं हैं जो मैं यहां बोलूं .. 
अहिंसा क्या है ?अहिंसा..
तो देखिए 81प्रकार की हिंसा , 81 टाइप्स हिंसा का योगदर्शन में वर्णन किया गया है, और उसका विश्लेषण करेंगे तो आपको अलग से फिर थोड़ा समय निकालना होगा एक - एक घंटा उस पर चर्चा चलेगी 81 टाइप्स हिंसा क्या है उसके ऑपोजिट अहिंसा है तो अहिंसा का पालन करने से अहिंसा क्या है ? अब मैं इसमें इस बात को जोड़ दूंगा कि यम का जो पहला पाठ अहिंसा है वह अहिंसा को ही पुष्ट करता है अहिंसा को ही पूर्ण करता है सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यह जो अगले चार चरण है वह अहिंसा को पक्का करता है अहिंसा के लिए ही है यदि आप अहिंसा को अलग मानेंगे सत्य को अलग मानेंगे तो नहीं बात बनेगी , सत्य जो अहिंसा को पूर्ण करता है जैसे पांच क्लेश में अविद्या मूल है और अविद्या का ही विस्तार राग द्वेष आदी है तो उसी तरह से अहिंसा मूल है अहिंसा का ही विस्तार है सत्य , अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ।आगे आया है - 
     " सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । " 
        ( योगदर्शन २/३६)
अब आज का प्रसंग समापन कर रहा हूं " सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । " महर्षि  पतंजलि का सूत्र हैं - सत्य में व्यक्ति प्रतिष्ठित हो जाए तो सब क्रियाओं की सिद्धि होती हैं।
आप व्यवहार भानु में पढ़िए -  बजाज और एक झूठे ग्राहक कैसे कपड़े खरीदने गए और कैसे लड़ाई झगड़ा हुआ। व्यवहार भानु में बड़े सुंदर ढंग से ऋषिवर ने लिखा है अब कहानी कहानी कहां हैं दृष्टांत ही दृष्टांत हैं व्यवहार भानु में । तो लोग कहते हैं कि बिजनेस करने वाले को झूठ बोलना पड़ता है तो ऋषि दयानंद ने सब बातों को खोल कर रख दी कि झूठ पर तो कुछ भी बात टिकती नहीं है जो सत्यनिष्ठ होगा उसी का बिजनेस चलता है और सत्य व्यवहार करने वाला व्यक्ति वह सब क्रियाओं की सिद्धि कर लेता है जो चाहता है जिस कार्य में हाथ डालेगा उसको सफलता मिलेगी सत्य पर जो व्यक्ति चलेगा "सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । "  कि सत्य में प्रतिष्ठित होने वाला व्यक्ति जो भी काम करेगा उसका फल प्राप्त होगा वह निष्फल नहीं हो सकता वह कभी व्यर्थ नहीं जाएगा,वह फल मिलेगा उसको असफल नहीं होगा । फिर कहते हैं - 
        "अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।" 
                     (योगदर्शन २/३७)
अस्तेय में प्रतिष्ठित हो गए तो सारे रत्न अर्थात सब प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति व्यक्ति को होता हैं ।
अस्तेय मतलब चोरी त्याग यदि चोरी का त्याग कर दिया चोरी नहीं करते हम तो आपको किसी चीज की कमी नहीं रहेगी अभाव नहीं रहेगा यह मैं नहीं कह रहा हूं  यह महर्षि पतंजलि का सूत्र हैं। अब आगे देखें ब्रह्मचर्य पालन से लाभ 
         " ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । " 
                  ( योगदर्शन २/३८)
ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित होते हैं तो शक्तिशाली होंगे बलशाली होंगे । अब अंतिम बात  -
        " अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ।" 
                ( योगदर्शन २/३९)
अब इसको विचार कर लीजिए - मैं कौन हूं? और मेरे पिछले मां-बाप कौन थे ?  यह जानना चाहते हैं आगे मैं मरकर के फिर शरीर में किस कुल में जाऊंगा ? इस विषय को समझना चाहते हैं , आपके मन में यह प्रश्न यदि आ रहा है तो इसका समाधान ऋषि ने कर दिया‌ - "अपरिग्रहस्थैर्ये जन्म कथा संबोध: ।" अपरिग्रह में स्थित हो जाए । अपरिग्रह का मतलब होता है कि जितनी आवश्यकता है उतने ही विचार व्यवहार साधन उसको आप लाए । अब इतने सारे कपड़े इतने बड़े-बड़े घर इतनी सारी व्यवस्थाएं इतने सारे विचार इतने प्रकार के भोजन व्यंजन तो यह अपरिग्रह नहीं है, परिग्रह हैं और परिग्रह करने वाले व्यक्ति को समय कहां है इस संसाधनों में उलझा हुआ है उनके विचारों में उलझा हुआ है उनके पास समय कहां है कि मैं विचार करूं कि मेरे पिछले के मां-बाप कौन थे ? मेरा स्वरूप क्या है ? मैं आगे जब शरीर छूटेगा मेरी आत्मा किस कुल में जाएगी किस शरीर में जाएगी ? इसको काम कब करेगा वर्कआउट कब करेगा समाधि कब लगाएगा ध्यान कब करेगा इतने सारे काम उलझा रखा है विचार व्यवहार साधन यह सारे राजनीति यह पार्टियों वह पार्टियां यह वह, अब कैसे बैठेंगे 2 घंटा 3 घंटा ध्यान लगाने पर कम से कम एक घंटा सुबह एक घंटा शाम पर समय ही नहीं हमारे पास ध्यान करने का .. तो ऋषि कहते हैं आप अपरिग्रह में स्थित हो जाइए आपको सारा परिचय मिल जाएगा पिछले 100 जीवन पीछे मेरे बाबा कौन थे किस-किस योनि में मैं गया आगे मैं किस-किस योनि में जाऊंगा इसका परिचय आपको दिग्दर्शन होगा समाधि प्राप्त होगी इसी जीवन में यदि सूत्रों पर विश्वास पूर्वक आचरण करें तो ।
 इसलिए आर्य महानुभावों आप सबसे मेरा एक निवेदन है प्रार्थना है कि आप संसार की समस्याओं को सुलझाने में महारत हासिल कर लिए अपने जीवन में पारिवारिक सामाजिक समस्याओं को सुलझाते रहते हैं लेकिन अपनी समस्या को सुलझा लो कि मैं कौन हूं ?  कहां से आया हूं ?  आगे कहां जाऊंगा ? इस प्रश्न पर काम किया जाए थोड़ा सा भी समय लगाया जाए तो जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है और यह मानव जीवन सफल होगा आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद कल कुछ सिद्धियों की बात करूंगा विभूतियां और केवल्य दो पाद विभूति पाद और कैवल्य पाद उस पर कुछ दो-चार सूत्र आपके बीच में प्रमुखता से रख करके अपनी बात रखेंगे और समापन इस विषय का करेंगे ।
           आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद ।
क्रमशः        

योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।

योग दर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (५)

                             ॥ॐ॥
                           योग दर्शन
   योग दर्शन पर पंचम दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
     ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
      सोमवार मार्गशीर्ष कृ १०विक्रम संवत २०८१ 
                  25 नवंबर 2024 ईस्वी
       (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )
आज हम सब पंचम दिन में योग दर्शन पर चर्चा करें 
        इससे पूर्व बहन आचार्य आवृत्ति जी द्वारा 
                   नश्वर शरीर पर भजन 

जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।

रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां । गम के सांचे में ढ़लना पड़ेगा 
रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां गम के सांचे में ढ़लना पड़ेगा
वक्त ऐसा भी आएगा माना  वक्त ऐसा भी आएगा माना तुझको कांटों पर चलना पड़ेगा वक्त ऐसा भी आएगा माना तुझको कांटों पर चलना पड़ेगा ।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा मौत
जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा । 

बाप बेटे यह भाई भतीजे , बाप बेटे यह भाई भतीजे 
तेरे साथी है जीते जी के 
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
बाप बेटे यह भाई भतीजे, बाप बेटे यह भाई भतीजे तेरे साथी है जीते जी के अपने आंगन से उठाना पड़ेगा अपने आंगन से उठाना पड़ेगा अपनी चौखट से चलना पड़ेगा अपनेआंगन से उठाना पड़ेगा अपनी चौखट से चलना पड़ेगा 
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा 
मौत जब तुझको आवाज देगी मौत जब तुझको आवाज देगी  घर से बाहर निकलना पड़ेगा 

ऐसी हो जाएगी तेरी हालत ऐसी हो जाएगी तेरी हालत काम आएगी दौलत ना ताकत ऐसी हो जाएगी तेरी हालत काम आएगी दौलत ना ताकत 
छोड़कर अपनी ऊंची हवेली छोड़कर अपनी ऊंची हवेली तुझको बाहर निकलना पड़ेगा छोड़कर अपनी ऊंची हवेली तुझको बाहर निकलना पड़ेगा 
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा 
मौत जब तुझको आवाज देगी मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा घर से बाहर निकलना पड़ेगा ॥ 
          इसी कटुसत्य के साथ धन्यवाद।
             --- ---- --- ००००० --- --- ----

                      आचार्य प्रभामित्र जी
आइये आरंभ करते हैं।  मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे - 
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
          तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
                 ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

सभी को सादर नमस्ते ।
आइये हम सब मिलकर योग दर्शन के ऊपर अपनी बात को सुने कि महर्षि पतंजलि ने हमारे लिए क्या-क्या कहा ? कल के चर्चा में हमने आपके बीच में बातें रखी थी योग दर्शन को एक शब्दों में समझना हो तो "ईश्वर प्राणिधान " शब्द से समझ सकते हैं। तीन शब्दों में यदि योग दर्शन को समझने का प्रयास किया जाए - तो "तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान क्रियायोग:" तो तीन शब्दों के द्वारा हम योगदर्शन को समझ सकते हैं। आत्मसात कर सकते हैं योग को, और सामान्य लोगों के लिए आठ शब्दों में यम,नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि  ये आठ शब्दों में हम योग दर्शन को समझ सकते हैं । तो द्वितीय पाद जो साधना पाद है किन-किन साधनों का उपाय करने से हमें मुक्ति मिलेगी मोक्ष का द्वारा खुलेगा तो आज साधना पाद का प्रथम सूत्र आया है -
        तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥
क्रिया योग के अनुष्ठान से हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं । जीवन के दुखों से छूट सकते हैं, जन्म मरण के चक्र से हम छूट सकते हैं।
तप क्या है ? इस बात को आप सब भलीभांति जानते हैं। महर्षि दयानंद के शब्दों में मैं कहना चाहूंगा की श्रेष्ठ कार्यों को करते हुए जो विघ्न बाधा उपस्थित हो उसे सह लेना यह तप कहलाता हैं ।
श्रेष्ठ कार्य क्या हैं ? तो श्रेष्ठ कार्य यज्ञ है, श्रेष्ठ कार्य साधना है, श्रेष्ठ कार्य वेद-विद्या का अध्ययन है, तो इन कार्यों को करते हुए जो कुछ कष्ट आता है उसको सहन करना यह तप है । तो तप शरीर का, वाणी का और मन का-यह तीन प्रकार के तप है, इसका अनुष्ठान करना चाहिए । मौन रहते हैं-वाणी का तप है, मन पर नियंत्रण करते हैं-यह मन का तप है,  शरीर में जो भोजन आदि से अपने शरीर को साधते हैं-यह शारीरिक तप है।
तो हम सभी प्रकार के तपस्याओं को करते हुए अपने इस साधन रूपी शरीर मन आदि को अनुकूल बनाएं । और स्वाध्याय ..
स्वाध्याय जैसा कि आप सब जानते हैं की अपना अध्ययन करना, अपने जीवन को पढ़ना, यह स्वाध्याय है।  स्व्श्च अध्ययनम् स्वाध्याय।
प्रतिदिन अपने कमियों को ढूंढना और उन कमियों को बार-बार अपने विवेक से समझकर के उसे निकालने का प्रयास करना महर्षि दयानंद जी का प्रिय मंत्र -
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । 
यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥

इस मंत्र को जब हम समझते हैं तो ऋषि को यह मंत्र प्रिय क्यों था ? तो जब तक हमारे अंदर कमियां रहेगी तब तक हम इस संसार में दुःख भोगते रहेंगे या सांसारिक सुख को हम भोगते रहेंगे दुख मिलता रहेगा क्षणिक सुख मिलता रहेगा, इससे यदि परे होना चाहते हैं तो एक भी बुराई हमारे अंदर ना हो । दुरितानि परासुव विश्वानी दुरितानी
जो भी जितने भी दुरित है दुर्गुण हैं वो सब हमसे दूर हो जाए। अब यहां पर यदि व्याकरण की दृष्टि से देखा जाए तो सर्वानी दुरितानी परासुव  ऐसा भी मंत्र में आ सकता था, सर्वानी शब्द नहीं विश्वानी शब्द हैं यहां पर विश्वानी शब्द विश्ववरी व्याप्तो शब्द से बना इसका प्रयोग करेंगे तो विश्वानी शब्द बनेगा जो व्याप्त है तो विश्वानी दुरितानी का मतलब हमें यह समझना चाहिए कि वह दुरित चाहे आत्मिक दोष हो या मानसिक दोष हो या शारीरिक वाचिक दोष हो उन सभी दोषों में विश्वानी जो व्याप्त दोष है जिसको हम स्थूल रुप से नहीं समझ सकते हमें पता भी नहीं चलता कि हमारे अंदर क्या डिमेरिट (दुर्गुण) दोष हैं । तो विश्वानी का मतलब जो व्याप्त है मन में आत्मा में शरीर में वाणी में सूक्ष्म रुप से हैं उन सारे जो दुरित दुर्गुण हैं वो दूर हो जाए।
और यद् भद्रं जो भद्र हैं, अच्छाई है कल्याणकारी है जो भी है यद् भद्रं .. तन्न आ सुव अर्थात् हममें आ जाये। तो अब हम यह समझ सकते हैं कि मनुष्य जब तक पूर्ण रुप से पवित्र न हो जाए मनसा वाचा कर्मणा आत्मा से पवित्र हो जाए तभी वे मोक्ष के अधिकारी होते हैं। तो स्वाध्याय का पहला मतलब मैं आपको समझा रहा हूं - कि यह अपना अध्ययन करना कि मुझ में कौनसी कमियां हैं खाने पीने के दोष है, बोलने का दोष है सोचने का दोष है या व्यवहार दोष है - बहुत सारे दोष हैं । इन दोषों को बारीकी से निकलना।और स्वाध्याय मोक्ष शास्त्रों को पढ़ना । मोक्ष शास्त्र - महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं कि -
जपो प्रणवों वा मोक्ष शास्त्र अध्ययनं वा । अर्थात् प्रणव का जप करना भी स्वाध्याय है और मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन करना भी स्वाध्याय है। तो मोक्ष शास्त्र जो वेद है, योगदर्शन है, उपनिषद हैं, सत्यार्थ प्रकाश जो ऋषि कृत ग्रंथ हैं आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिए। और स्वाध्याय एक तो यह विचार करके देखें कि अपने से पढ़ना यह स्वाध्याय है। और गुरुमुख से भी पढ़ना यह भी एक प्रकार का विद्या प्राप्ति का एक मार्ग है ।
महाभाष्यकार ने कहा- "चतुर्भी प्रकारेण विद्या उपयोगिता भवति" चार प्रकार से विद्या आती है- और वह पहले आगम कालेन, स्वाध्याय कालेन, प्रवचन कालेन, व्यवहार कालेन इति। महाभाष्य की उक्ति हैं यह । कि महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि और महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन की रचना की महर्षि पतंजलि ने ही  महाभाष्य की रचना की और महर्षि पतंजलि ने आयुर्वेद शास्त्र की भी रचना की । अब कहते हैं ऐसे ऋषि को नमन हैं जिन्होंने योगदर्शन की रचना करके चित् के मन के मलो को धो दिया। आयुर्वेद शास्त्र की रचना करके शरीर के मलों को धो दिया और व्याकरण शास्त्र महाभाष्य की रचना करके वाणी के मलों को धो दिया ऐसे ऋषि को नमन हैं। तो महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य में क्या कहा " विद्या चतुर्भी प्रकारेण उपयुक्ता भवति "
विद्या चार प्रकार से आती हैं (आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहार कालेन); पहले आगम काल 
(१) आगम काल का अभिप्राय है की गुरु मुख से पढ़ना "आगम इति वेद:" अगम-निगम तो वेद को आप गुरु मुख से पढ़ रहे हैं और यह आगम काल है और फिर है
(२) स्वाध्याय काल - स्वाध्याय काल में विद्या कैसे आती है कि आपने एक शब्द भी सुना होगा "श्रवण मनन निदिध्यासन और साक्षात्कार" यह  इसमें घट जाएगा । श्रवण होता है गुरु मुख से सुनना यह हो गया आगम काल और मनन हो गया स्वाध्याय काल कि आप केवल गुरु मुख से विद्या को आपने सुना श्रवण किया और उसको स्वाध्याय नहीं किया मनन नहीं किया तो लाभ नहीं होता । इसलिए एकांत में बैठकर के पढ़े हुए सुने हुए विषयों पर मनन करना चिंतन करना यह स्वाध्याय काल है। अलग हटकर के पढ़ना, अपने आप पढ़ना यह स्वाध्याय है। ध्यान रहे गुरु मुख से पढ़ना स्वाध्याय काल नहीं वह आगम काल हैं, वह श्रवण में आयेगा। और फिर कहा गया प्रवचन काल।
(३) प्रवचन काल -  प्रवचन काल क्या है ? महर्षि दयानंद जी ने व्यवहार भानु पुस्तक में इस बात को स्पष्ट से लिखा है इसको पढ़ा जाए ऋषिवर ने कहा कि प्रवचन कालेन - प्रवचन भी करना चाहिए, आप हम सब एक उपदेशक हैं प्रवचन का मतलब यह पढ़ाना जो कुछ अपने गुरुमुख से आगम काल में पढा है एकांत में बैठकर कर आपने चिंतन किया है मनन किया है विचार किया है और उसको आप प्रवचन कर दीजिए, दूसरे को पढ़ा दीजिए । तो पढ़ाना चाहिए आप जो कुछ भी पढ़ते हैं वह दूसरे को पढ़ाइए दूसरे को बताइए प्रवचन करिए तो प्रवचन करने से भी विद्या आती है । इसलिए लिखा ऋषि दयानंद जी ने लिखा प्रवचन करने से पढ़ने से जितनी अधिक विद्या आती है उतनी पढ़ने से नहीं.. पढ़ने से कम विद्या आती, पढ़ाने से विद्या अधिक आती है यह महाभाष्यकार ने कहा और ऋषि दयानंद जी ने इसकी व्याख्या की । तो हमें प्रवचन भी करना चाहिए पढ़ाना भी चाहिए पकड़-पकड़ के पढ़ाइए और यह तो अच्छा अवसर हैं आर्यों का महाकुंभ है यह वर्षों से चल रहा है इसमें सबको अवसर मिलता है क्योंकि यह लंबे काल से चल रहा है हमारे आदरणीय भ्राता आर्य लखन जी ने यह हम सबको बहुत ही सुअवसर प्रदान किया है प्रवचन करने का ... तो हम सबको भी प्रवचन करते रहना चाहिए जो कुछ आप पढ़ते हैं दूसरे को पढ़ाइए उससे विद्या पक्की हो जाएगी तो यह हैं प्रवचन कालेन । फिर है व्यवहार कालेन 
(४) व्यवहार कालेन - "व्यवहार कालेन विद्या उपयुक्ता भवति" व्यवहार काल में आप उस विद्या को कितना जीवन में उतारते हैं ।
इस पर हमें ध्यान रखना चाहिए, उस पर हम कितना आचरण या अमल में लाते हैं, व्यवहार में लाते हैं । यह साक्षात्कार होगा । 
श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार इस प्रकार से भी कह सकते हैं या आगम काल, स्वाध्याय काल प्रवचन काल और व्यवहार काल  महाभाष्यकार के शब्दों में। 
तो व्यवहार में जब आप उस विद्या को लाने लग जाते हैं, उससे भी विद्या आती हैं और वो पक्की होती है, जीवन में उसका लाभ फल हमें मिलने लगता हैं। तो  स्वाध्याय के बारे में आपने सुना - मोक्ष शास्त्रों को पढ़ना, ओम् का जप करना, अपना आत्मनिरीक्षण करना ये सारी व्यवस्थाएं हैं जो स्वाध्याय काल में आ जाती हैं।
             तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि  
ईश्वर प्राणिधान - ईश्वर प्राणिधान का अभिप्राय आप सब समझ रहे होंगे कि समर्पण कर देना सरेंडर बोल देना समर्पित कर दिजिए ।
" तुभ्यं वस्तु -तुभ्यं समर्पयामि " मेरा कुछ भी नहीं । अभी भजन आवृत्ति जी बड़ा सुंदर गा रही थी कि "एक दिन निकालना पड़ेगा मौत जब तुमको आवाज देगी .." तो मैं और मेरापन इसको छोड़ दीजिए, समर्पण कर दिजिए कि हे प्रभु! ये शरीर भी मेरा नहीं हैं।और जो कुछ भी साधन आपने दिया है ईश्वर के द्वारा हमें मिला है - धन परिवार व्यवस्थाएं ये सब ईश्वर का हैं ईश्वर अर्पण अपने आप को कुछ भी न समझना शून्य समझना और अपने कर्तव्य में कि हे प्रभु हम आपके आनंद को पाना चाहते हैं , आपके आनंद के लिए ही मेरा जीवन है । और मुझे धन नहीं चाहिए पद नहीं चाहिए आयु नहीं चाहिए संसार का सुख नहीं चाहिए कुछ नहीं चाहिए बस एक ही इच्छा मन में हो कि प्रभु अपनी गोद में ले लो अपने आनंद रुपी अमृत का पान करा दो । ये भाव मन में ला करके सरेंडर बोल दीजिए सम्पूर्ण समर्पण कर दीजिए और ईश्वर के आदेश अनुसार व्यवहार करें वेद के अनुसार आप चले और अपने हर एक पल को जीये तो उसकी आज्ञा में अपने को चलाते हुए यही ईश्वर प्राणिधान हैं । और ईश्वर प्राणिधान जिन्होंने कर दिया अपने प्रकृति लय योगी कहते हैं न कि अपने चित्त को लय कर देता है उसके मन में काम क्रोध लोभ संसारिक कोई चाहना है ही नहीं । ईश्वर प्राणिधान इस प्रकार से हमें जीने का प्रयास करना चाहिए - तप करें स्वाध्याय करें ईश्वर प्राणिधान। अब कहते हैं कि ये जो आप तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान करते हैं इसका फल क्या मिलेगा? तो समाधि की भावना बनेगी । वैसे अभी तक यहां पर सच्चे हृदय से अपने आप को पूछिए कि कितने व्यक्ति हैं यहां मैं अपने आप को भी जोड़ता हूं कि समाधि की भावना से जीते हैं? कि मुझे जीवन में समाधि प्राप्त करना हैं ।
तो यह भावनाएं नहीं बनती है। वैसे साधना के समय तो मेरी भावना बन जाती है मैं बनाता हूं मुझे समाधि प्राप्त करनी है मोक्ष में जाना है फिर भूल जाते हैं दिनभर फिर सांसारिक कार्य में ये वो.. याद नहीं रहता कि समाधि में जाना है।
(टिप्पणी -" तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग" का फल क्या हैं ?  - "तप स्वाध्याय" से समाधि लगने का भाव और मार्ग सुगमता पूर्वक प्रशस्त होगा ..और "ईश्वर प्राणिधान" से तात्पर्य है स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर देना .. तेरा तुझको को अर्पण भाव से रहना। 
तो प्रश्न यह हैं कि यहां मुझ सहित कितने श्रोता /पाठक हैं जो समाधि भाव में रहने का सुख निरंतर लेना चाहते हैं ?  सत्य यह हैं कि चाहते हम सब हैं परंतु महत्वपूर्ण यह हैं कि इस ओर जाने का प्रयास हम कितना करते हैं .. मैं स्वयं का अनुभव कहूं तो साधना के समय समाधि में जाने का भाव मेरा बनता हैं पर सामान्य जीवन में लौटने पर यह समाधि भाव क्षीण हो जाता हैं अर्थात लगभग नहीं रहता और मै संसार के व्यवहार में संलग्न हो जाता हूँ ।. ..) 
तो तप करेंगे स्वाध्याय करेंगे ईश्वर प्राणिधान करेंगे तो समाधि की भावना बनेगी ।
" समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च "  कल आचार्य आनंद पुरुषार्थी जी बड़ी अच्छी बात कह रहे थे कि क्लेश जो है उदार विच्छिन्न तनु और प्रक्षिप्त यह चार बातें आई थी यहां पर तनु आया है "अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् "- यदि आप तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान का अनुष्ठान करते हैं यह लाभ होगा एक तो समाधि की भावना बन जाएगी कि मुझे समाधि प्राप्त करना है दूसरा लाभ होगा कि क्लेश जो है यह तनु हो जाएगा छोटा हो जाएगा  तनु का मतलब होता है छोटा होना, क्षीण हो जाना, दुर्बल हो जाना, तो क्लेश "अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः"  अविद्या राग द्वेष अभिनिवेश यदि यह क्षीण हो जाता है । यह उदार नहीं है उभरा हुआ नहीं है वरन् दबा हुआ है कमजोर पड़ा हुआ है जैसे जब घोड़ा बेलगाम हो जाता है उसको दो-चार दिन भोजन देना बंद कर दे अर्थात् घोड़े को पालन करने वाला या जो घुड़सवारी करता है वह सज्जन वह जब घोड़े को भोजन उसको देना बंद कर दे तो वह बेलगाम घोड़ा कमजोर हो जाता हैं अब उसे आराम से पकड़ सकते हैं तो उसी प्रकार से यह मन जब भी बेलगाम होता है अविद्या जब उठी हुई थी तो यह मन अपने आप में तांडव नृत्य करता है तो तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान करने से मन एकदम दुर्बल हो जाता है क्षीण हो जाता है यह अविद्या अस्मिता राग द्वेष आदि क्षीण हो जाते है, सब कमजोर हो जाता है और चाह के भी आप विषय सुखों को लेना चाहेंगे इच्छा नहीं होगी क्यों क्योंकि तप कर रहे हैं स्वाध्याय कर रहे हैं ईश्वर प्राणिधान कर रहे हैं तो यह मन जो कभी उभरा हुआ होता था अब यह क्षीण पड़ गया दुर्बल हो गया । तो यह ऋषि की दी एक बहुत अच्छी (टेक्निक) तरकीब एक विज्ञान यहां पर प्रदान कर रहे हैं बता रहे हैं । अब वह क्लेश क्या है मैं इसकी चर्चा नहीं करूंगा क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) आप सब जानते हैं।
यहां अविद्या की थोड़ी चर्चा करेंगे फिर आगे बढ़ेंगे .. तो अविद्या क्या हैं? ऋषि के शब्दों में "अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या। "
अनित्य , अशुचि , दुःख , अनात्मसु , नित्य , शुचि , सुख , आत्म-ख्याति: , अविद्या इसमें यह बात समझनी हैं कि अनित्य को नित्य समझना, अशुचि को शुचि समझना,  दुःख को सुख समझना और अनात्मा को आत्मा समझना यह अविद्या हैं। ये चार विभाग वाले अविद्या हैं, अविद्या को चार भागों में बांट कर ऋषि ने बता दिया -
अनित्य को नित्य समझना इसका उदाहरण लें लिजिए एक भजन है कि - " जब तुमको मृत्यु आवाज देगी.. " अर्थात् यह शरीर मरण-धर्मा है और इस संसार का नाम मृत्युलोक हैं तो मृत्युलोक में हम सब आये है एक दिन मरने के लिए, सदा के लिए जीवित रहने के लिए नहीं आये.. परंतु सामान्य लोगों से आप मृत्यु की बात बोलिए.. कहेंगे कि क्या अशुभ बोल रहे हैं ? यह मृत्यु न बोलिए यह मृत्यु अशुभ है.. तो वह सुनना नहीं चाहते .. हैं मृत्युलोक में शरीर मिला है मरने के लिए.. लेकिन मृत्यु को सुनना पसंद नहीं करते क्यों ?
किसी कवि ने बड़ी अच्छी बात कही है - 
" दो बातो को भूल मत जो चाहे कल्याण ।
नारायण एक मौत को दूजे श्री भगवान॥ " 
ये दो बातों को लोग भूले हुए रहते हैं- एक तो ईश्वर को भूले हुए रहते हैं और दूसरी मृत्यु को भूले हुए रहते हैं। तो अपना कल्याण कैसे होगा? तो कवि ने बड़ी अच्छी बातें कही हैं की यह मृत्युलोक हैं इसमें हम मरने के लिए आये है और प्रतिदिन हम थोड़ा थोड़ा मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं.. एक ही दिन में श्मशान भूमि नहीं पहुंच जाते .. एक कदम हमारा प्रतिदिन बढ़ रहा है आज का दिन आपका निकल गया रात्रि हो गई तो एक दिन आप मृत्यु की ओर बढ़ गये, आपके जीवन से एक दिन कम हो गया और मृत्यु की ओर एक पग बढ गया .. आप - हम इस बात को नहीं समझते ? आज हम मर गये ( आयु का एक दिन बीत गया ) अर्थात् आज का दिन हमारे लिए मर ( बीत ) गया । हमारे शरीर के सेल समाप्त हो रहें हैं .. उदाहरण के लिए एक मिट्टी का घड़ा ले लिजिए .. माना आप आज कुंभकार से एक नया घट जल भरने के लिए खरीद कर लाते है, एक वर्ष, दो वर्ष तीन.. चार पांच वर्ष.. ऐसे कुछ वर्ष बीतने पर जब एक दिन घड़े को भर कर ऊपर से किनारा पकड़ कर उठाते समय ऊपर का भाग आपके हाथ में रह जाता है और नीचे का भाग टूट कर नीचे रह जाता हैं..  ध्यान दें जब घट नया खरीद कर लाये थे तो यह मजबूत था और ऐसे उठाने पर नहीं टूटा .. और जब तक नहीं टूटा जब-तक इसमें पर्याप्त मजबूती बनी रही .. पर एक दिन यह टूट गया इससे समझना चाहिए कि प्रतिदिन उस घट में क्षय हो रहा था, परिवर्तन हो रहा था उसमें विघटन हो रहा था कमजोर पड़ रहा था और एक दिन ऐसा आया कि उसको छूते ही अलग अलग हो गया।
ऐसे वस्त्र, पुस्तक के कागज भी लंबे समयांतराल के बाद क्षीण हो कर कट फट जाते है।
ये सब पदार्थ एक दिन में कमजोर नहीं हुए प्रतिदिन कमजोर होते होते क्षय होते होते एक दिन ऐसी स्थिति इस अवस्था में आये हैं ठीक उसी प्रकार से हमारा यह शरीर है, हम एक दिन में बूढ़े नहीं हो रहे है धीरे-धीरे मन शरीर में इंद्रियों में क्षीणता आ रही हैं यह कमजोर हो रहा है और अंत में एक दिन हमें यह मृत्यु की स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है, तो हम प्रतिदिन मृत्यु को प्राप्त कर रहे हैं । लेकिन मृत्यु को सुनना नहीं चाहते, अनित्य पदार्थों को नित्य मान करके जीना यह महा मूर्खता है अब मैं कठोर शब्दों का प्रयोग कभी-कभी करता हूं क्योंकि ऋषि दयानंद का प्रभाव कुछ ज्यादा ही मेरे ऊपर आ जाता है आज मैं व्यवहार भानु पढ़ा रहा था कि किन्हीं सज्जन को तो पढ़ते-पढ़ते वहां पर कई एक बार "महामूर्ख" का शब्द आया तो ऋषि दयानंद जैसे कड़वा सत्य बोलते थे । तो हम लोग को महामूर्ख हैं ।
क्यों है ? क्योंकि इस सत्य को स्वीकार नहीं करते की अनित्य साधनों को हम नित्य मानकर के जी रहे हैं कि मैं कभी मरुंगा ही नहीं यह मेरा घर "यह हवेली.." भजन में आया था, यह हमारे पास हमेशा रहेगा ऐसा मान करके ऐसी भावना से शब्दो में भले कह देते जी यह तो धर्मशाला है हमें तो भगवान का दिया हुआ है, लेकिन अंतरात्मा मन से अपना मानता हैं । सब तेरा है मैं रहूंगा ऐसी तैयारी करते तो अनित्य साधनों से नित्य साधनों की उपलब्धि करना ही बुद्धिमानी हैं ।हम सबको बड़ा चिंतित होना चाहिए बहुत बेचैन होना चाहिए कि मैं आज मेरा दिन चला गया एक दिन मैं मृत्यु की तरफ बढ़ गया आज मैंने क्या किया कितने घंटे साधना की कितने घंटे स्वाध्याय किया या हमने आज कौन से पुण्य इकट्ठा किया 50-50 का बैलेंस बनाना पड़ेगा हमारे एक मित्र हैं आदरणीय वशिष्ट जी वह पढ़ते रहते हैं और वह कहते है आचार्य जी इस पर चर्चा होनी चाहिए कि महर्षि दयानंद जी ने यह कहा सत्यार्थ प्रकाश में 50% शुभ कर्म और 50% अशुभ कर्म और दोनों बराबर होगा तो फिर से मनुष्य जीवन मिलेगा । शुभ कर्म अधिक होगा तो बहुत अच्छी बात है देवता के जीवन मिलेंगे और शुभ कर्म कम हो गया तो पशु-पक्षी के जीवन में जाना पड़ेगा । तो पुण्य कर्म कैसे अधिक से कमाये इस पर विचार किया जाए पुण्य कर्माशय कैसे बनाया जाए, और पुण्य कर्म से वह क्या होगा आज हमने कौन-कौन से पुण्य कर्म किए तो व्यवहार-भानु में महर्षि दयानंद जी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में लिखा आज ही प्रसंग में आया था कि जो मनुष्य दूसरे के दुख को अपना दुख समझ करके उसके दुख को दूर करने का प्रयास करता है, और अपना तन मन धन विद्या की वृद्धि में अपने संतानों को और दूसरे मनुष्यों को वेद विद्या की प्राप्ति में लगता है वह मनुष्य बड़े भाग्यशाली है वह अपने पुण्यात्मा है वह अपने पुण्य को बढ़ा रहा हैं ।अब विचार करके देखे ऋषि ने एक मोती की तरह अपने पुस्तकों में चाहे छोटी पुस्तक हो या बड़ी पुस्तक हो शब्दों को पिरो दिया कि पुण्य हमें कितना अधिक से अधिक इकट्ठा करना चाहिए, क्योंकि पुण्य यदि हम इकट्ठा नहीं करते, माना साधन नहीं कर पा रहे हैं चलिए कोई बात नहीं । यह सुक्ष्म विषय है । तो पुण्य तो इकट्ठा करिए ना क्योंकि पुण्य इकट्ठा नहीं होगा तो मनुष्य जीवन छिनते ही आपको दोबारा फिर मनुष्य जीवन नहीं मिलेगा पशु पक्षी की योनि में जाना पड़ेगा । अब आप पूछेंगे इस बात को मैं क्यों कहता हूं क्योंकि बड़े दार्शनिक विद्वानों से भी आप सुनेंगे हमारे गुरुजी हैं आदरणीय मुनि सत्यजीत जी वह भी कहा करते हैं इस बात को की एक बार मनुष्य जीवन यदि हमें प्राप्त हो गया तो करोड़ों की संख्या में लाखों करोड़ों की संख्या में पुण्य कर्मों का समूह घाटे में (माईनस में) चला गया क्योंकि परमात्मा ने फ्री में/ मुफ्त में मनुष्य जीवन नहीं दिया है, मनुष्य जीवन पाने के लिए हमारा पुण्य कर्म व्यय हुआ है, पुण्य कर्म था और वह पुण्य कर्म फल जाति आयु भोग के रूप में आ गया ... बोले यहां योग दर्शन में लिखा हुआ है जाति आयु भोग में, जो हमारा कर्माशय में था वह पुण्य कर्म वो विपाक रूप में आ गया जाति आयु भोग में ।
तो जाति आयु भोग प्राप्त हुआ तो अब वह पुण्य कर्म‌ कर्माशय में बैलेंस था वह समाप्त हो गया क्योंकि फल मिल गया, मुझे मनुष्य जीवन ( जाति ) मिल गया, आयु मिल गई भोग सामग्री मिल गई अब वह तो माईनस में / घाटे में चला गया पहले तो बैलेंस में था बैंक बैलेंस था और मनुष्य जीवन में आकर के हम ना साधना की, ना निष्काम कर्म किया, ना पुण्य प्राप्ति के लिए सकाम-कर्म किया । हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहे, धन को बैंक-बैलेंस में, बैंक में पड़े रहने दिया उससे बड़े-बड़े यज्ञ नहीं किये, विद्या - वेदविद्या के वृद्धि में दान नहीं किया, वेद का प्रचार नहीं किया, गरीबों की सेवा नहीं की, असहाय  निर्धन लोगों की रक्षा नहीं की, अपने परिजनों की हित सहायता नहीं की तो फिर हम जैसे महामूर्ख महाअज्ञानी कौन होगा ?  क्योंकि उसे यह समझेंगे निष्काम कर्म करके साधना भी नहीं की तो मनुष्य जीवन तो मिलना मुश्किल है - इसलिए हमें मोक्ष में नहीं जाने की इच्छा है नहीं जाने की भावना बनती है उतना समझ नहीं है तो पुण्य कर्म का तो समझ है। हमें अपने जीवन में पुण्य कर्म को बढ़ाकर के अपने जीवन को फिर से सुरक्षित कर ले आप रिजर्व कर ले कि हमें नेक्स्ट जीवन अगला जीवन फिर से मनुष्य का ही मिलेगा क्योंकि हमने बैलेंस को बनाया है । और एक दिन में हजारों पाप कर्म हो गए आप विचार करके देखिए ना आज आप अपने हमने यज्ञ नहीं किया यज्ञ किया भी तो शुद्ध घी सामग्री का प्रयोग नहीं किया पाप हो गया, पुण्य की जगह हमसे पाप हो गया और संध्या नहीं की पाप हो गया अपने समय का प्रयोग उसे नहीं किया पाप हो गया अपनी ड्यूटी नहीं की पाप हो गया कितना पाप हुआ दिन भर में हजारों पाप हम कर जाते हैं हमें पता भी नहीं चलता है और पुण्य तो बहुत प्रयास पूर्वक थोड़ा सा कर पाते हैं, वह भी नहीं करते तो इस प्रकार से हमें विचार करना चाहिए।
तो मैं चर्चा कर रहा था कि हम सब विवेकी बने अनित्य साधनों से नित्य  ।। ऋषि दयानंद का वाक्य है अनित्य साधनों से नित्य सत्ता की उपलब्धि करें और नित्य है आत्म स्वरूप, नित्य है परमात्मा का स्वरूप उसको उपलब्ध करना उसको जानना या आप पुण्य कर्म को बढ़ाएं जिससे अगला जीवन मनुष्य का सुरक्षित हो जाए । क्योंकि यह सब कुछ अनित्य है हमारे पास नहीं रहेगी यह व्यवस्थाएं । फिर कहा अनित्य साधनों के बाद अनित्य असुचि - असुचि क्या है ? असुचि हैं कि यह शरीर अपवित्र है । 
      "शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः।"

शौैचात संसर्ग प्रेरक संसर्गा.. आगे आएगा साधना पाद के अंत में आएगा सूत्र ४०। 
शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः का क्या अर्थ होता है ? इसका क्या अर्थ होता है कि योगी जन साधक अपने शरीर का शोधन करता है और जब शरीर का शोधन करता है तो अपने शरीर से घृणा हो जाती है । अभी मैं अपने एक माह से लगभग संजीवनी क्रिया जिसको एनीमा कहते हैं अंग्रेजी में वो लेता हूं और अन्न लगभग प्रायः नहीं ले रहे हैं फल फ्रूट या कुछ स्प्राउट्स आदि साग ले लेते हैं सब्जी लेते हैं । एनिमा लेते ही इतना मल निकलता था मुझे लगता था की मलका कारखाना है। वाह प्रभु यह कहां मल मूत्र बैठा रखा है ? तो आप विचार करें कि यह मल मूत्र का पिंड इतना गंद है इस शरीर में इतनी बदबू आती है मुख से आ रही है नाक से अपान वायु से पेट साफ नहीं है इतनी गंदगीयां भरी पड़ी हैं ।अब हम सब इस शरीर को देवालय,  शिवालय पता नहीं क्या-क्या मान करके बैठे हैं यह शुद्ध है वाह वाह कितना अच्छा है मधुबन है मधु टपक रहा है यह सब मानना तो यह एक प्रकार से मोक्ष मार्ग में अविद्या है ।
जब योगी को साधक को अपने शरीर से घृणा हो जाती हैं, से प्रभु इतनी गंद हैं हमारा शरीर गंद का घर है दूसरे शरीर से स्पर्श कैसे करु ? असंसर्ग वैराग्य होता है अपने शरीर से वैराग्य होता है घृणा हो जाती हैं। आशुचि और इसको शुचि मानकर के और मैं तो कह रहा हूं कि यह दुनिया में धोखा का कोई प्रकाष्ठा नहीं हद कर दी लोगों ने  आप जितने भी ब्यूटी पार्लर यह सब लोगों को धोखा देना यह शरीर उसकी सजा करके परफ्यूम लगाकर के इतना अच्छा पैकिंग करके परफ्यूम लगाकर सेंट लगा घूम रहे हैं  क्या मायाजाल  है लोगों को फंसा रहें है लोग फंस रहे हैं। और अपने शरीर को सजा कर प्रेस करके चश्मा लगा कर के सेंट परफ्यूम लगा कर घूम रहे हैं ..भाई यह गंदगी है लोगों को धोखा दे रहे हो उसको ऐसे .. क्या करें जी ?
तो यही तो है कि गलत चीजों को, अपने कमजोरी को छुपा रहे हैं, सच्चाई को जब आप उसको देखेंगे इसके अंदर जाकर के तो पता चलेगा की सच्चाई कुछ और है इसको चमक धमक करके रंग रोगन करके इसको दुनिया को दिखाया कुछ और जा रहा है । 
वाह .. संसार की क्या माया है, क्या धोखा है इस संसार में तो यह धोखे में जो पडझ रहे हैं हम सब सच्चाई को जाने स्वीकार करें यह शरीर अशुचि है और इसको हम शुचि पवित्र मान करके जी रहे हैं, तो यह है अविद्या दूसरा रूप अनित्य शुचि दुःख - दुःख को सुख मानकर जी रहे हैं, अब मैं लोगों से यह कहता हूं तो कई लोग यह कहते हैं कि संसार में सुख भी है मैं कहता हूं दयानंद जी ने भी तो लिखा है थोड़ा सा सुख है - अच्छा सतोगुण हो जाता है तो थोड़ा सुख है, सांसारिक चर्चा में ऋषिवर ने लिखा है मैं मानता हूं लेकिन विवेकी की दृष्टि से तत्व ज्ञान की दृष्टि से यदि चर्चा सुन रहे हैं, योग दर्शन पढ़ रहे हैं तो यहां पर अभी आया है 15 वां सूत्र है - "परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः"
सब कुछ दुख ही है विवेक की दृष्टि में, तत्वज्ञान की दृष्टि से यह संसार दुःख ही है । "ही" शब्द लगा हुआ हैं और "ही" जहां लग जाए निश्चयात्मक हो जाता है, फिक्स हो जाता है, उसमें कोई अपवाद नहीं रहता । तो यह संसार दुःख है, और इसको सुख समझ कर के जीना यह कितनी बड़ी अज्ञानता है हम जीव्हा का स्वाद, नासिक का सुख या स्पर्श सुख यह सब सुख हमारा माना हुआ है सुख की अनुभूति सुखाभाष है, सुख नहीं है ।  यह मृगतृष्णा है, संसार दुःख और इसको सुख मान करके जी रहे हैं । तो यह अविद्या का तीसरा रूप हैं । और अविद्या की बात करें, अंतिम बात तो कहा अनात्म सु आत्म सु आत्म ख्याति .. अनात्मा को आत्मा मान कर जी रहे हैं।
अब वह क्या है ? उदाहरण से समझते हैं - मन जड़ हैं, बुद्धि जड़ है लेकिन इसको चेतन मान रहे हैं । कोई कहे मैं तो नहीं मानता मैं तो आर्यसमाजी हूं मैं तो दर्शन पढ़ा हूं .. मैं तो मन को जड़ ही मानता हूं। अच्छा जी तो आपको कहा जाये कि मन जड़ हैं, तो आप ध्यान करिए मन को एक घंटा समाधि लगा लीजिए  आत्म भाव में रोक दीजिए । मन को एक विषय में रोक दीजिए। तो कहते है मन नहीं रुकता जी तो मन जड़ कहां हैं? ये तो चेतन हो गया न । मन को आप नहीं रोक पा रहे हैं तो वह चेतन हो गया न इसका मतलब वह अपने आप भाग रहा है ।
मन जड़ होता .. गाड़ी को अपने ब्रेक लगा दी माना आप कार चला रहे हैं और ब्रेक लगा दिया तो क्या गाड़ी आगे चली जाएगी, बंद कर दिया है स्टार्ट नहीं है तो क्या गाड़ी चलेगी..
आप कहेंगे की गाड़ी को कार को इतनी ऊंचाई पर ले गए कि अब वह ढ़लान पर है गाड़ी बंद भी है ब्रेक भी लगा दी फिर भी फिसलता जा रहा है आगे जो जड़ है। तो अभ्यास हो गया मन को भगाने का प्रेक्टिस हो गया ऑलरेडी मन जड़ है तो मन जड़ है उसको चेतन मान करके की मन पर नियंत्रण नहीं कर पाता हूं जी ।
तन्न्मे मन शिव संकल्प अस्तु  .. भूत भविष्य में जाने वाला मन  शिव संकल्प वाला हो जाए प्रार्थना कर रहे हैं परमात्मा से वेद में 
तो अब यह मन जड़ है इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं, बुद्धि  जड़ हैं इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं शरीर जड़ है इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं अनात्म ..
और एक उदाहरण दे दूं - एक सेठ जी थे तो सेठ जी की फैक्ट्री में आग लग गई। तो उनको सूचना मिली कि फैक्ट्री में आग लग गई
और वो छाती पीट पीट कर रोने लगे मर गया मर गया मर गया 
बगल में कुछ लोग थे बोले  सेठ जी तो जिंदा है कहते हैं मर गया ?
तो बोले भाई मेरी फैक्ट्री जल गई मैं जल गया.. फैक्ट्री में आत्मभाव..इतना अटैचमेंट ।
अभी अभी अपने 50 लाख का कार शो रूम से लिया है और थोड़ा सा तो कुछ लग स्क्रेच जाए तो लगता हैं हृदय पर तलवार चल गया हो,  बाप रे बाप अरे वह कितना नाश हो गया हो तो आत्म भाव जड़ वस्तु में आत्मभाव आ गया अनात्मा में आत्म भाव आ जाता हैं , खरोंच लगी कार पर स्क्रेच आया कार पर और आत्मा में पीड़ा और सीने में दर्द शुरू हो गया परेशान हो रहे हैं हम आत्मभाव ..
अनात्मा में आत्मा बुद्धि करना जड़ में चेतन भाव ले आना यह अविद्या का चौथा रुप हैं।अटेचमेंट .. एक दिन तो निकलना पड़ेगा घर छोड़ कर इसलिए घर को जो जड़ है,  जड़ समझा जाए .. नष्ट हो गया हो गया करोड़ों रुपए गये तो गये ये सब जड़ हैं नाशवान है ऐसे नहीं तो वेसे नाश होता..तो इस भाव से हमें रहना चाहिए।
तो समय  भी आगे बढ़ रहा है और अविद्या के स्वरूप की चर्चा मैंने आपके बीच में थोड़ी विस्तार से रखने का प्रयास किया ।
तो दुख संसार है और इसको सुख ना समझा जाए तो अभी तो चार प्रकार के हम लोगों ने समझा लेकिन क्लेश की दृष्टि से राग द्वेष अस्मिता अभिनिवेश यह सब आप जानते हैं ।
अभिनिवेश का मतलब है मृत्यु का भय ।  तो यह सब जो दुख है अविद्या है क्लेश है । यह संसार ही दुःख सागर है तो अंतिम बात मैं यह आपसे निवेदन करके आज के सत्संग को आज की कक्षा को अब विराम करेंगे । तो यहां पर है चार बातें मैं आपको बोलता हूं -
चार पैर वाले योग दर्शन है चार पंखों वाले चार विभाग वाले एक है
हेय, दूसरा हैं भेय, तीसरा है हान और चौथा है हानोपाय ।
इसलिए रोग, रोग का कारण और उसका उपचार और उसकी औषधि तो अब यहां योगदर्शन में देखिए कि पहले दुख है । हेय का मतलब होता है छोड़ने योग्य । हेय क्या है ? किसको छोड़ जाए ? दुःख को छोड़ा जाये । दुःख हेय हैं उस  दुख का कारण क्या है ? पहला है दुःख, हेय का मतलब दुख जिसको हमे छोड़ना है ।
तो दुख होगा हेय त्याज्य । कारण क्या हैं जिसको हम छोड़ना चाहते हैं ? अब हैं हान = सुख । उस  सुख का उपाय क्या है ? सुख का कारण क्या है ?ये चार चीजो को व्यक्ति यदि को समझ लिया तो योगदर्शन की यथार्थता को समझ लिया। इसमें चार सूत्र आये इसी द्वितीय पाद में साधना पाद में - 
पहला हैं - " हेयं दुखं अनागतम् "और बड़े मजे की बात है क्योंकि दर्शन जो है यह फिलासफी अंग्रेजी में रहते हैं इसमें दार्शनिक बात  लिखा हुआ है एक दुःख जो अभी हमको मिल गया उसको ऋषि ने दुःख नहीं माना .. कि अनागतम्  - आने वाले को दुःख मानते
अब कहेंगे आने वाले क्या ? अब ज्वर हमें हो गया, कोई कष्ट रोग आ गया तो वह तो भोग ही लिया आपने दुःख तो आ ही गया और भोग लिया आपने । दुःख वो जो अभी आने वाला अभी भी बस एक मिनट के बाद थोड़ी देर के बाद वह दुख जो आएगा फ्यूचर में उसको वह दुख है तो कहते हैं हेयं दुखं अनागतम् कौन से दुख को हेय किया जाएगा , छोड़ा जाएगा तो कहा है जो आने वाला है जो दुख भोग लिया है उसको तो भोग करके ही छूटेगा जो जाति आयु भोग प्राप्त हो गया है तो वह तो मिल गया आपको आप चाहकर भी नहीं भाग सकते आप जो भोग फल कर्मफल कर्म  विपाकि जाति के रूप में आयु के रूप में भोग के रूप में मिल गया मनुष्य जीवन के रुप में कैसे भाग जाएंगे आप ? मनुष्य जीवन कैसे छोड़कर भाग जाएंगे मां-बाप को कैसे बदल लेंगे ? अपने जो बुद्धि शरीर व्यवस्था भोग है कर्माशय हैं कैसे बदल लेंगे? इसको तो भोगना ही पड़ेगा ।
योगी भी यदि असंप्रज्ञात समाधि में चला जाए वेदेही भी बन जाए तो भी इसको इग्नोर नहीं कर सकता है इसको छोड़ नहीं सकता इस शरीर को त्याग नहीं कर सकता उसको भोगना पड़ेगा शरीर के रहने तक रहना पड़ता हैं , प्रतीक्षा ( वेट ) करना पड़ता है ।
तो जो दुख हमें मिल गया/ आ गया है उसके लिए तो कुछ चिंता ही नहीं करें क्योंकि आ गया तो भोग लो । 
अब जो भोग के रूप में अभी आया नहीं है अभी कर्माशय में है बीज रुप में हैं वह फल रुप में ना आए उसके तैयारी अनागतम् तो पीछे जो हमारी प्रिवियस लाइफ में जो पहले का हमारा जीवन हुआ उसमें कितना अपराध हुआ पाप इस जीवन में पीछे हमने कितना पाप किया तो उसको बिना भोगे मैं फिर बोल रहा हूं, अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश को समाप्त कर दिया जाये तो उसको नष्ट किया जा सकता है ।

फिर कहते हैं परमात्मा अन्यायकारी हो जायेगा। प्रश्न उठना चाहिए।

हेयं दुखंअनागतं जो दुख आने वाला है जो कर्म से बीज रूप में है उसको बिना भोगे उससे छुटकारा पाया जा सकता है वह योग मार्ग पर चलकर के अविद्या को नाश करके व्यक्ति को उससे छुटकारा मिल जाएगा। परमात्मा न्यायकारी ही रहेगा क्यों रहेगा या आप लोग प्रश्न करेंगे तो इसका उत्तर में समाधान देंगे । 
तो दुःख समझ में आया। अब दुःख के बाद आता है हेय हेतु 
दुख का कारण, उसका हेतु क्या है ? तो कहां दृष्टि दृश्यो संयोगो हेय हेतु  अब इसको समझिए एक तो कहा दुःख है।और एक आने वाले दुःख को दुःख कहा और उसका कारण क्या है ? 
दृष्टिर दृश्यो संयोग:
आत्मा और दृष्टिर कहते हैं आत्मा को अदृश्य कहते हैं प्रकृति को आत्मा और प्रकृति का संयोग, आत्मा और चित्त का संयोग आत्मा और शरीर का संयोग - संयोग होगा हेय हेतु ।
हेय माने दुःख हेतु माने कारण ऋषि ने कह दिया कि दुख का कारण है जन्म । प्रकृति के साथ संयोग । आत्मा का दृश्य के साथ जगत के साथ प्रकृति के साथ संयोग होना दुख का कारण है ।
अब इस बात को समझिए दुख क्या है तो दुख कह दिया जो आने वाला है वह दुख है ।  जो आ गया उसको भोग लिया इसलिए दुःख नहीं माना जाता । और दुख का कारण प्राकृतिक के साथ आत्मा का संयोग । 
अब हान क्या है ? तो कहते हैं हान - आइये अब अगला सूत्र है 25 नंबर 
"तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्। "
तो किसका अभाव दृष्टिर दृश्य के संयोग का अभाव ।
आत्मा दृष्टिर,  दृश्य माने जगत संसार । आत्मा और जगत के संयोग का अभाव मतलब संयोग हट जाना ये हान है ।
तद् दृशे कैवल्यम् ये कैवल्य रुप है ।
तद् दृशे कैवल्यम् इस जगत में केवल्य क्या है ? 
इस संसार में सुख क्या है ? तो कहा कि हान है ।
हान को सुख कहा , आत्मा और प्रकृति का संयोग का अभाव हो जाए इसका  और फिर कहा अंतिम इसका यह जो सुख है संयोग का अभाव हो जाए आत्मा और प्रकृति अलग-अलग हो जाए तो सुख मिलने लग जाएगा। तो कहेंगे इसमें कौनसा सुख है ये कैसा सुख है ?
आपके पेट मे मल भरा पड़ा है, उदाहरण दे देता हूं और ...? दबाव लगा हैं चार घंटे से आप बस में बैठे हुए थे और बस कहीं रुकी नहीं और टायलेट भी नहीं.. तो जैसे ही बस रुकी या आपको टायलेट की व्यवस्था मिली अब वहां आपने टायलेट में मल को विसर्जित किया मूत्र त्याग किया आपको उस समय कैसा अनुभव हुआ? 
मल या मूत्र को बहुत देर से रोके हुए थे ऐसी विकट परिस्थितियों में फंस गए थे और जैसे ही व्यवस्था मिली आप गये टायलेट लेट्रिंग गये.. आ हा हा बहुत सुख मिला त्याग दिया अलग हो गए तो सुख मिला । तो आत्मा और शरीर के संयोग का जो वियोग होता है एक विशेष सुख मिलता हैं वो विशेष सुख वहीं सुख है इत्याग अलग हो जाना विमुंजति तो उसका अब इसका अलंग होने का , आत्मा और संसार का अलग होना सुख हैं । अलग होने का हेतु क्या हैं? उपाय क्या हैं? अलग कैसे होंगे तो ऋषि ने कह दिया-
 "विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः"
तो ऋषि ने अंतिम बात यह कह दी कि विवेकख्याति मतलब यथार्थ ज्ञान यथार्थ बोध अविप्लव 
एक होता हैं विप्लव और विप्लव का मतलब होता है उथल-पुथल कि विप्लव हो गया जी, जल विप्लव हो गया अच्छा, जल प्रलय हो गया। विप्लव का मतलब उथल-पुथल होना और अविप्लव का मतलब उथल-पुथल न होना । विवेकख्याति (कंटीन्यू) लगातार बने रहना तो हम कभी-कभी मूढ़ अवस्था में चलें जाते हैं, विछिन्न अवस्था में चलें जाते हैं कभी उदार अवस्था में आ जाते हैं कभी तनु अवस्था में आ जाते हैं क्लेश कभी हम विवेकी बन जाते हैं कभी अविवेकी बन जाते हैं कभी किंकर्तव्यविमूढ़ बन जाते हैं। क्या करें क्या न करें? तो विवेकख्याति में बाधा (डिस्टरबेंस) न आना । विवेकख्याति विवेक अवस्था में लागातार बने रहना अविप्लव रहना हमेशा विवेक की स्थिति में बने रहना हान जो मोक्ष है जो सुख है उसका उपाय हैं कि विवेक को न डिगने देना, हमेशा विवेक की स्थिति में बने रहना चाहे लाख परिस्थिति आ जाये अपने को न खोना विवेक को बनाएं रखना वह अभ्यास से होता है - ऋतंभरा प्रज्ञा वो स्थिति बनती है। तो सुख का हान का उपाय है विवेकख्याति कि विवेक का लगातार बने रहना और हान है आत्मा और प्रकृति का अलग हो जाना ही ये सुख है हान है कैवल्य हैं मोक्ष हैं परमधाम हैं परम आनंद है। 

                          बहुत बहुत धन्यवाद । 
                              ओम् शम् 🙏

योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।

योग दर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (४)

                              ॥ॐ॥
                            योग दर्शन
   योग दर्शन पर चतुर्थ दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
  ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
      रविवार मार्गशीर्ष कृ ९ विक्रम संवत २०८१ 
                  24 नवंबर 2024 ईस्वी
        (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )

सभी को सादर अभिवादन आइये मंत्र पाठ करलें -
  ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
            तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
                  ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 

सभी को पुनः अभिवादनयोग दर्शन पर जो चर्चा हम सुन रहे हैं उसको आगे बढ़ाते हुए आज के प्रसंग को हम आगे ले चलते हैं तो कल हमने यहां पर छोड़ा था कि परमात्मा का नाम ओम है, और ओम को प्रणव भी कहते हैं ओम भी कहते हैं प्रणव उसका अर्थ सहित हमें जप करना चाहिए ।
       तस्य वाचक: प्रणव । जपतदर्थ भावनम् ॥ 
यहां तक बातें आई थी तो परमात्मा के ओम का नाम का अर्थ के साथ जप करने से क्या लाभ होगा ? आज इस विषय पर चर्चा करेंगे।
अब प्रश्न यहां पर खड़ा होता है कि ओम का जप हमें करना चाहिए अर्थ के साथ तो अर्थ के साथ ओम का जप करने की विधा क्या है ? कैसे जप करें ? 
तो कल हमने थोड़ी सी बात संकेत की थी शब्द अर्थ संबंध के बारे में कि जिस शब्द का अर्थ हमें पता नहीं होता है तो उस शब्द में ही हम अटके रहते हैं, अर्थ में हम नहीं जाते ओम शब्द का अर्थ यदि हम रट भी ले स्मृति में ले भी आए हैं तो भी वह जिसको हमने रटा है वह भी शब्द ही होता हैं । 
जैसे ओम का अर्थ होता है रक्षक, सर्व व्यापक, आनंदघन। अब यह आनंद भी शब्द ही है सर्व रक्षक भी शब्द ही है व्यापक के शब्द में ही हम रहते तो ओम का जप प्रणव का जप हमें करना है और थोड़ा सा गैप देना चाहिए, यह मैं अपने अनुभूति से बता रहा हूं कि ओम का जप करें और थोड़ा रुक जाए उसके अर्थ पर विचार करें कि वह रक्षक है तो रक्षक में ना अटके रक्षक से आगे बढ़े कि वो मेरी रक्षा कर रहा है, मैं सुरक्षित हूं ; यह अनुभूति में ले आइये तो अर्थ के साथ आप जुड़ गए परमात्मा का जप करें  तो ओम बोले मानसिक या उपांशु और रुक जाए फिर आनंदघन है अब यहां नहीं रुकना है मुझे आनंद मिल रहा है मैं आनंदित हूं ऐसा अनुभव करिए तो अर्थ के साथ आपको अभ्यास करेंगे तो अर्थ के साथ जुड़ेंगे और फिर वह आनंद का अनुभूति भी अनुभव थोड़ी-थोड़ी होने लग जाएगी अभ्यास से तो महर्षि पतंजलि कहते हैं तस्यवाचक: प्रणव तत: जपस्त तदभावनम् । प्रणव का जप करें अर्थ की भावना के साथ । अर्थ के साथ नहीं कहा अर्थ-भावनम्  अब इस पर  विचार करते हैं भावना अनुभूति फीलिंग यह अर्थ की फीलिंग यदि आपको हो रही है आनंद की फीलिंग सुरक्षा की भावना आप ध्यान में बैठे हैं कोई रोग है आप चिंतित है कि मेरा शरीर छूट न जाए या मैं दुखी ना हो जाऊं यह रोग से और  ग्रसित ना हो जाऊं आप डर रहे हैं ओम का जप कर रहे हैं तो डर यदि है तो फिर ओम का अर्थ हमसे जुड़ा नहीं हैं । मैं उससे जुड़ा नहीं,  सुरक्षा के भाव ईश्वर जो करेगा वह मेरे हित में करेगा ईश्वर मेरी रक्षा के लिए करेगा ईश्वर मेरे कल्याण के लिए करेगा ऐसे भाव साधक के मन में आने चाहिए। 
यदि ऐसा अभ्यास लंबे समय तक किया जाए तो उसका फल क्या होगा ?  तो फल के बारे में
      "ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।"
अब इस सूत्र में देखिए तत: उससे (किससे ?) प्रणव के अर्थ सहित ओम के अर्थ सहित भावना के साथ जप करने से प्रत्ये चेतन: अब चेतन कितने हैं ? चेतन दो है - एक आत्मा और एक परमात्मा इसका अधिगम: अधिकार पूर्वक ज्ञान होगा । जान पाएंगे प्रणव के जप से अपने चेतन सत्ता को और परमात्मा रूपी चेतन सत्ता को । प्रत्येक चेतन जितने चेतन है दोनों चेतनों को हम अधिकार पूर्वक जान पाएंगे । और क्या करेंगे ?
च अपि = और भी अंतराय अभावस्य, अंतराय का अभाव होगा । अंतराय = विध्न बाधाएं डिस्टर्बेंस इसका अभाव होगा । यह हमसे दूर हो जाएगा । तो आप कहेंगे अंतराय क्या है ? तो फिर सूत्रकार अर्थ बताएगा कि अंतराय क्या हैं , तो अंतराल के बारे में महर्षि पतंजलि ने स्वयं कहा 
" व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरति
भ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। "
अब देखिए कितने लंबे सूत्र में नौ अंतराय की बात आ गई और नौ प्रकार के अंतराय में पहला शब्द महर्षि पतंजलि का है व्याधि ।  तो व्याधि आधि उपाधि पहले भी कभी चर्चा में हमने इन तीनों शब्दों की चर्चा की थी आज मैं फिर रिपीट कर रहा हूं यह 
व्याधि - हमारे शरीर में जो रोग है वात पित्त कफ इसके विषमता से विकृत होने से जो रोग पैदा होता है उसे व्याधि कहते हैं ।
आधि यहां पर नहीं पढ़ा है लेकिन मैं अनुषांगिक बातों को जोड़कर के व्याख्या कर रहा हूं आधि का मतलब अन्य ग्रंथों से मुझे समझ में आया मानसिक परेशानी काम क्रोध लोभ मोह आदि मानसिक चिंताएं और जिसको आज के अंग्रेजी की भाषा में डिप्रैशन एंजायटी आदि आदि जो मानसिक परेशानियां ज्यादा लोगों में हो रही है तो इसको आधि शब्द से शास्त्रों में वर्णित किया - "आधि" । और उपाधि तो आप सब जानते हैं उपाधि से कोई नहीं बचा श्री श्री १०८, श्री श्री १००८, आचार्य, शास्त्री, डॉक्टर, अजी, यह सब, प्रधान, मंत्री  यह सारे अधिकारी पद प्रतिष्ठा डिग्रियां यह सब उपाधि हैं , और उपाधि में नाम भी एक ले ले "नाम" "पद" "प्रतिष्ठा" । तो यह उपाधि भी एक बीमारी है । 
यह तीन प्रकार की बीमारियों को - एक शारीरिक बीमारी है एक मानसिक बीमारी है एक सामाजिक बीमारी ।
तो सामाजिक बीमारी भी यदि हमारे पास है पद प्रतिष्ठा की चाहना है तो हम मोक्ष के अधिकारी नहीं होंगे भक्ति नहीं कर सकते साधक नहीं बन सकते । पद प्रतिष्ठा को हटा देना पड़ता है अपने को छोटा मान करके एक आत्मा मान करके जीना पड़ता हैं । सभी आत्माओं को एक जैसा अनुभव करने की आवश्यकता होती है बालक में भी आत्मा वही है, बड़ों में भी आत्मा वही आत्मभाव और मानसिक जो आधि है उसे भी उससे भी हमें बचाना होगा और व्याधि यह तो हमें ठीक रखना ही पड़ेगा तो व्याधि को ठीक रखना है आधि को ठीक रखना है, उपाधि से बचाना है । तीनों बिमारियों से बचना हैं। मैं एक बार इस बात की चर्चा अशोक बिहार आर्य समाज में कर रहा था तो वहां पर डॉक्टर सोमदेव शास्त्री जी भी आए हुए थे तो मेरे मुख से यह बातें निकली की साधना करने से ओम का जप करने से शारीरिक रोग भी ठीक होता है । इसका उन्होंने बड़े जोर से खंडन किया था कहा था कि इस बात को जो प्रभामित्र जी कह रहे हैं वह गलत हैं ।शारीरिक रोग तो औषधि से ही ठीक होगा केवल ईश्वर भक्ति करें और रोग ठीक हो जाए यह बिल्कुल अवैदिक बात है ।
तो फिर मैं मंच पर तो मैंने कुछ नहीं कहा था उनसे लेकिन बड़े हैं पितृ तुल्य है तो एकांत में कमरे में थे तब जाकर मिला कहा कि इस सूत्र का क्या अर्थ करेंगे यह महर्षि पतंजलि ने लिखा है - व्याधिस्त्यान संशय..  व्याधि पहले पड़ा है और व्याधि का अर्थ व्यास जी ने भी किया है वात पित्त कफ की विषमता से जो परेशानी है वह अंतराय का समापन होना, किस से ? तद जपत ततर्थ भावनम् ..  ओम् के जप से अर्थ सहित जप करने से व्याधि ठीक होता है अंतराय है ।
कहते हैं मैं इस बात को नहीं मानता । मैंने कहा शास्त्र की बात नहीं मानते आप खैर इस पर अधिक वाद न करके कि वे बड़े हैं उनका आदर किया । कोई बात नहीं ..
तो मैंने यहां पर इस बात का संकेत इसलिए किया कि हमेशा शास्त्र की बातें माननी चाहिए यदि हम साधक हैं ।
उन्होंने उदाहरण भी दिये कई साधकों का कि उनको तो यह रोग हुआ और ईश्वर की भक्ति करते रहे कहां ठीक हुए ।
तो देखिए यदि हमारी साधना ठीक है ईश्वर की भक्ति यदि हम शास्त्र के अनुसार और बिल्कुल विधिवत कर रहे हैं उसका लाभ मिलेगा और हम स्वस्थ होंगे औषधि भी लेनी पड़ेगी औषधि का मानो हम नहीं करते लेकिन औषधि के साथ-साथ यदि ईश्वर-प्राणिधान की भावना से अर्थ सहित ओम का जप साधना आदि व्यक्ति करता है उसको बहुत शीघ्र लाभ मिलेगा और रोग उसे छुटकारा मिलेगा ।
मैं एक उदाहरण आपके बीच में रखना चाहूंगा एक सिडनी के डॉक्टर हैं कैंसर के बहुत बड़े डॉक्टर हैं, साइंटिस्ट भी कहते हैं प्रोफेसर हैं वे हमारे मित्र है उन्होंने महर्षि दयानंद के जीवन चरित्र को अंग्रेजी में अनुवाद किया है और वो वर्षों दर्शन आदि हमसे पढ़ते रहे, उन्होंने अपने अनुभव बताएं कि मैं एक डॉक्टर हूं और कैंसर के रोगीयों का मैं इलाज करता हूं दवाई बताता हूं। लेकिन पहले उनको मेडिटेशन बताता हूं ओम का जप, गायत्री मंत्र का जप, अर्थ के साथ ध्यान करो और यह दवाई भी खाओ । उन्होंने इस बात को कहा कि जो मरीज रोगी यह हमारी बात को मान लेता है वह गायत्री मंत्र ओम का जप ध्यान भी करता प्राणायाम भी करता है योगाभ्यास और एक्सरसाइज आसन वगैराह भी करता है और दवाई भी ले लेता है उसमें जो स्वास्थ्य लाभ है बहुत तेजी से वह स्वस्थ होते हैं उसका इंप्रूवमेंट बहुत जल्दी होता है और जो केवल दवाई लेता है वह बहुत स्लो चलता है ।
तो उन्होंने इस बात को अनुभव किया डॉक्टर होते हुए भी, कि योगाभ्यास का फल मेडिटेशन प्राणायाम और आसन आदि का फल तो बहुत ज्यादा है और दवाई साथ में लिया जाए । तो हमें इस बात को ऋषि की बात को माननी चाहिए और उसे खानपान औषधि का सेवन बिना रोग के भी औषधि का सेवन करते रहना चाहिए । अब आपके मन में यह आ रहा होगा कि बिना रोग के औषधि क्यों लें ? 
 मैं यह कह रहा हूं कि बिना रोग के भी दवाई/औषधि खाते रहना चाहिए तो प्रश्न आ के खड़ा होता हैं कि हमें रोग ही नहीं है तो औषधि क्यों लें ? तो रसायन का प्रयोग करें।
रसायन में जैसे अभी ठंड का समय है तो आंवला का खूब सेवन करिए, आप आंवले का जूस बना कर ले, चटनी बना कर लें या उबाल कर खायें मुरब्बा खा ले जैसे भी आप च्वयनप्राश में ले लेकिन आंवला खायें रसायन है वो।
त्रिफला ले - कोई रोग नहीं है तो भी लेते रहे। और खान पान ही हमारी औषधि है । तो निश्चित रूप से हम रोग से बचने के लिए पथ्य अपथ्य का ध्यान रखते हुए और योगाभ्यास प्राणायाम ध्यान करते रहे, तो बड़ी से बड़ी बिमारी कोई हैं तो उससे छुटकारा मिलेगा और रोग नहीं है तो हम स्वस्थ रहेंगे।
तो व्यधि शब्द यहां ऋषि पतंजलि ने पढ़ा है - ओम् के जप अर्थ के साथ करने से व्याधि ठीक हो जाती है । और आधि उपाधि से भी हम बचने लग जाते हैं।
अब अगला शब्द है स्त्यान -
स्त्यान - अकर्मण्यता किसी भी कार्य को  करने की इच्छा न होना । (अच्छे कार्य) को धर्मानुसार वेदानुसार - यज्ञ करना धर्म है ना करने से पाप होता है। लेकिन हम अकर्मण करने की इच्छा ही नहीं होती हैं । प्रातः हो गया चलो ध्यान करें यज्ञ कर लें स्वाध्याय कर लें इच्छा ही नहीं हो रही । हमको पता है कि यह धर्म है लेकिन करने की इच्छा न होना यह " स्त्यान "। 
और यह भी अंतराय है यदि आप ओम् का जप गायत्री मंत्र का जप अर्थ के साथ भावना के साथ आप करते हैं तो आपके मन में जो अकर्मण्यता हैं, धर्म के कार्यो में रुचि नहीं होती अरुचि है, वह रुचि बनने लग जायेगी । नहीं नहीं मुझे साधना करनी चाहिए मुझे यज्ञ करना चाहिए, यज्ञ नहीं छोड़ना है सब कुछ छूट जाए लेकिन हवन नहीं छोड़ सकते ईश्वर का ध्यान नहीं छोड़ सकते वेद का स्वाध्याय नहीं छोड़ सकते आपकी रुचि बन जायेंगी। स्त्यान रुपी जो बिमारी है वो दूर हो जाएगी। अगला शब्द - व्याधि स्त्यान संशय 
संशय का मतलब होता है भ्रांति दर्शन । हम भ्रम में रहते हैं, हमारे अंदर एक बहुत बड़ी बिमारी है कि मोक्ष होता है या नहीं? इसमें भ्रम पैदा हैं । 
किसने देखा मोक्ष ? किसको मिला है ? हमारे मन में इस प्रकार की भावना आती है। अगला जीवन किसने देखा?
मैंने बड़े बड़े आर्य परिवारों को देखा - अगला जीवन किसने देखा ? इस जीवन में करना है जो कर लो । तो यह जो अगले जीवन को न मानना, ईश्वर को न मानना, मोक्ष में भ्रम पैदा करना - यह जो हमारी एक मानसिक समस्या है ।
यदि आप ओम् का जप अर्थ के साथ लंबे समय तक करने लग जाए तो यह संशय अपने आप मिट जाता है, विश्वास अंदर से आने लगता है कि परमात्मा है, मुक्ति है, और पूर्व जन्म, पर जन्म होता हैं । ये अब तक शब्द में जानते या मानते हैं अब अनुभूति होने लग जाएगी। तो हम संशय करते हैं वेद आदि शास्त्रों के बारे में, अपने जीवन के बारे में वो सब संशय मिट जायेगा।
व्याधि स्त्यान संशय और प्रमाद 
प्रमाद  - प्रमाद हैं लापरवाही देखिए वहां अकर्मण्यता में धर्म आचरण कर्म करने की इच्छा नहीं होती थी । यहां प्रमाद में धर्म आचरण कर्म करने की इच्छा तो है लेकिन लापरवाही हैं। जैसे बच्चे को भेजा कोई सामान लाने के लिए और वो खेलने लग गया पूंछा की भाई कहां भेजा था तू कहां आ गया ? भूल गया जी । लापरवाह 
तो लापरवाह अलंग है लापरवाह का मतलब होता है प्रमाद और प्रमाद हैं लापरवाह । हमें प्रतिदिन हवन करना है ध्यान करना है स्वाध्याय करना है अपने शरीर का ध्यान रखना है। अब इसमें लापरवाही करते हैं खाने पीने में लापरवाही करते हैं । अब हमें डाक्टर ने बता दिया ये खाना है ये नहीं खाना है लेकिन जिव्हा पर नियंत्रण नहीं लापरवाह है जो सामने आया खा लिया हमने यह लापरवाही हो गई।  ध्यान करना चाहिए लेकिन आज हमने छोड़ दिया कहीं घूमने चले गए आज नहीं करना लापरवाही कर दिया, तो यह प्रमाद है ।
तो प्रमाद भी हमारे जीवन से हटने लगेगा यदि आप ओंकार का जप अर्थ के साथ करते हैं तो । अब है आलस्य - आलस्य और प्रमाद को लोग एक ही मानते है आलस्य अलग हैं। आलस्य है शरीर में भारीपन का होना तमोगुण का बढ़ना शरीर में ऐसे टूट रहा है लग रहा है कि मैं पड़ा रहूं बहुत दर्द हो रहा है इसको कहते आलस्य । शारीरिक विकार को तमोगुण आदि के बढ़ जाने से थकावट आदि, अधिक परिश्रम आदि करने से जो शरीर में कमजोरी आदि आती है उसको कहते आलस्य । और प्रमाद हो गया लापरवाही / लापरवाह हम ठीक हैं, हम बैठ सकते हैं ध्यान में, यज्ञ-हवन कर सकते हैं, समय भी है सब साधन भी है हमारे पास पर छोड़ो आज क्या करना हैं कल कर लेगें आज छोड़ देते हैं , थोड़ा लेट हो गये । आलस्य में शरीर में जो कष्ट हैं तमोगुण आदि बढ़ने से वह भी ठीक होने लगता है ईश्वर की भक्ति करने से इसलिए हमें आलस्य से बचने के लिए भी ओम का जप करना चाहिए । 
तो आलस्य प्रमाद अविरति ..
अविरति एक बहुत बड़ी समस्या है अविरति है- विषयासक्ति ( विषयों में आसक्ति ) पांच विषय है रुप रस गंध स्पर्श शब्द इन पांचो विषयों के प्रति अनुराग होना अनुरक्त होना । कोई न कोई एक दो विषय के प्रति तो हम कमजोर होते ही हैं चाहते हुए भी नहीं छूटता है, काम क्रोध लोभ मोह में सब भी आसक्ति हैं। विषयासक्ति - अविरति और जो व्यक्ति विषय में आसक्त होगा तो वह साधक कैसे बनेगा ? खाने जीव्हापर नियंत्रण नहीं है, नेत्र पर नियंत्रण नहीं है, नासिका पर नियंत्रण नहीं है, स्पर्श इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं है, तो नियंत्रण रखना ना रखना अविरति और नियंत्रण रखना अविरति से दूर होना । तो ओम का जप को अर्थ के साथ यदि लंबे समय तक हम आप करते हैं तो आपको विषयों के प्रति अरुचि पैदा हो जाएगी, जो आसक्ति थी उसे चाह कर भी नहीं छोड़ सकते थे उसकी गिरफ्त में थे ।आप साधना के कठोर नियम का पालन करें, ओम का जप करें एक व्रत अनुष्ठान के रूप में, अर्थ के साथ आप देखेंगे कुछ ही दिनों में मास दो मास (माह महिने ) के अंदर आप में इतना चेंज आएंगे इतना बदलाव .. अरे हमारे मन में इन विषयों के प्रति इतना अनुराग हुआ करता था देखो मैं इससे अलग होने में सक्षम हो गया । ऋषि का यह उपदेश है योग दर्शन इसमें कहा अविरति से भी निजात हम पा लेते हैं, छुटकारा मिल जाता हैं । तो यह भी हमारे एक अंतराय है एक विध्न है एक बाधा है । अविरति अब अगला है भ्रांति दर्शन यह तो हो गया था संशय, संशय हो गया कि यह चीज है या नहीं ।
भ्रांति दर्शन का मतलब होता है मिथ्या ज्ञान या उल्टा ज्ञान संशय हो गया कि यह है या नहीं है ?  मोक्ष होता है या नहीं होता है ? और भ्रांति दर्शन को समझ लें कि जो वस्तु जैसा है उसे उल्टा मानना, अविद्या विपरीत ज्ञान यह भी समाप्त हो जाता है । 
अलब्ध-भूमिकत्व का अर्थ यहां पर यह लेना चाहिए कि लंबे समय से हम साधना कर रहे हैं और कुछ हाथ नहीं लग रहा है कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा हैं , तो निराशा आ जाती और व्यक्ति साधना करना छोड़ देता है । तो ऋषि कहते हैं अलब्ध-भूमिकत्व ( अलब्ध =अन लब्ध  = प्राप्त न होना लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं। ) तो आप साधना करते रहे श्रद्धा से निराश ना हो,  धैर्य पूर्वक यह स्थिति समाप्त हो जाएगी एक दिन प्राप्त हो जाएगी ।और अनवस्थितत्व यानी प्राप्त तो होता है लेकिन थोड़ी देर के लिए जैसे आकाश में बिजली कौंधती हैं ,चमकती है और प्रकाश एक सेकंड के लिए आया और फिर प्रकाश समाप्त हो जाता हैं । साधना करते हैं हम आज 20 -25 साल हो गए तो एक बार कभी ऐसी स्थिति बनती है कि लगता हैं - वाह .. ! हम आनंद में खो गए !! वह स्थिति फिर से प्राप्त हो इसमें 15 दिन, 20 दिन, मास ही लग जाते फिर परमात्मा की कभी कृपा हो जाती हैं तो ऐसे आनंद की पुनः प्राप्ति होती हैं।
यहां अनुभव की बात बताऊं.. साधना में भी राग हो जाता है  अविद्या भी जुड़ जाती हैं कि मैं तो इस स्थिति को प्राप्त करके ही रहूंगा तो यह अहंकार आ गया बीच में, फिर नहीं मिलेगा । 
( क्या नहीं मिलेगा? उत्तर हैं परमात्मा का आनंद - कृपा )
मैं ऐसा करता था पहले .. अभी भी कभी-कभी हो जाता हैं , तो फिर बाद में पश्चाताप होता है कि मैं साधना में राग  अविद्या  राग तो अविद्या है राग पैदा कर दिया या द्वेष पैदा कर दिया। और नहीं हुआ तो बहुत दुखी होने लग गए मन उदास हो गया कि इतने दो-तीन घंटे बैठे स्थिति अच्छी नहीं बनी उदास हो गए, दुखी होना द्वेष होना यह अविद्या हैं ।
मैं कर लूंगा ऐसे आज तो प्राप्त करके ही रहूंगा यह अहंकार आ गया यह राग हो गया तो यह समझ में बातें बहुत दिन के बाद आई कि ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए मैं तो यत्न किया प्रयास किया और ईश्वर का आनंद है ईश्वर की जब कृपा होगी जब मुझे पात्र समझेगा जिस समय जिस दिन उसे दिन अपना आनंद वह दे देगा, नहीं दिया तो ईश्वर ने आज हमें पात्र नहीं समझा इसलिए आज नहीं दिया कोई बात नहीं मैं अपना प्रयास नहीं छोडूंगा तो स्थिति थोड़ी बनती है और फिर वह स्थिति स्टेबल नहीं रहती है हट जाती है तो लंबे समय तक यदि ओम का जाप करते रहें पहले तो प्राणायाम करें प्रणायाम से अपने मन को एकाग्रचित्त करने का प्रयास करें प्रणायाम के बाद फिर आप ईश्वर प्राणिधान के भाव में आ कर आप एक प्रकाश दिव्य आनंद की अनुभूति करें कि मन वहां हृदय में कितने देर तक टिक पाता हैं और फिर उसके बाद आपका मन भाग रहा है नहीं टिक पा रहा है तो उसे ओम् जप में लगा दें अर्थ की भावना के साथ करते रहें गायत्री मंत्र के जप में लगादे अर्थ के साथ । घटा दो घंटा करें एकदम तपस्या पूर्वक तो स्थिति अच्छी बनती हैं, व्यर्थ नहीं जाएगा यह, और हमें और लंबे समय के बाद उसका फल भी मिलेगा। 
  अब विक्षेपसहभुवः । विक्षेप जो‌ चार है -
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः।
( समाधि पाद १/३१)
विक्षेप/उपविध्न हैं -  दुःख: , दौर्मनस्य , अङ्गमेजयत्व , श्वास -प्रश्वास। 
दुःख - तो दुःख तीन प्रकार के होते हैं - आधिदैविक, अधिभौतिक ओर आध्यात्मिक। 
और योग दर्शन आप पढ़ रहे हैं यह तो मैंने सांख्य दर्शन की बात कर दी सांख्य दर्शनकार ने तीन प्रकार के दुख बताएं और महर्षि पतंजलि योग दर्शनकार ने दुख चार प्रकार के बताएं । अब चार प्रकार और तीन प्रकार .. तो तीन प्रकार के दुख हम सबको पता है सांख्य में दर्शन पढ़े हैं । आधिदैविक आधिभौतिक अध्यात्मिक यह तीन दुख होते हैं।
आधिदैविक दुःख - जो सृष्टि जन्य दुख हैं, अति गर्मी, अति वृष्टि अधिक सर्दी आदि और अधिभौतिक भूत प्राणियों से  दुःख। आध्यात्मिक मानसिक शारीरिक रोग यह आध्यात्मिक दुख हैं। लेकिन योग दर्शन अभी हम पढ़ रहे हैं योगदर्शनकार ने दुख को कहा कि - अगले अध्याय में, अगले पाद में हम पढ़ेंगे परिणाम ताप संस्कार गुणवृत्ति विरोध 
परिणाम दुख, ताप दुख, संस्कार दुख, और गुणवृत्ति विरोध दुख ।
आगे चर्चा आएगी वहां सूत्र आएगा वहीं पर करेंगे चर्चा ।
तो दुख से किसे ( कैसे  ) छुटकारा मिलेगा ? 
दौर्मनस्य मन की जो चंचलता है वह आपका मिट जाएगा अंगमेंजायत्वा हमारे शरीर में कंपन जो होता हैं, ओम के जप से और लाभ बता रहे हैं - कि शरीर में हम कभी भी स्थिर से नहीं बैठते हैं आप देखेंगे कोई व्यक्ति नाखून अपना कुरेद रहा हैं, कोई पैर हिला रहें हैं कोई भजन गाते है ( या प्रायः बोलते बतलाते हैं तो हिलते डोलते हैं जैसे हमारे पंडित व्यास नंदन शास्त्री जी ) कभी स्थिर नहीं बैठते। और जो व्यक्ति मूर्ति/स्टैचू के तरह (मूर्तिवत = स्टेच्यू की तरह) बैठ नहीं सकता तो फिर वह तो डिस्टर्ब हैं , फिर समाधि कैसे लगेगी  ? अंगमेंजायत्वा । और श्वास - प्रश्वास जिसको अस्थमा के रोग होते हैं या नहीं भी होते हैं तो बहुत शीघ्र शीघ्र श्वास - प्रश्वास चलता हैं, यह सब भी परेशानी जो शारीरिक मानसिक है यह दूर होने लग जाता हैं ।
केवल ओम के जब अर्थ के साथ जप करने से कितना बड़ा लाभ हैं । यदि हमें मोक्ष ना भी मिले तो हम स्वस्थपूर्वक प्रसन्नतापूर्वक जी सकते हैं लंबी आयु प्राप्त कर सकते हैं , यह क्या कम उपलब्धि हैं? बहुत बड़ी उपलब्धि है ।
साधना करिए दोनों हाथ में लड्डू है मोक्ष नहीं मिलेगा तो स्वस्थ जीवन मिलेगा मन प्रसन्न चित्त रहेगा और हंसते मुस्कुराते शरीर को छोड़ेंगे और लंबी आयु भी रहेगी और कहीं अच्छी साधना हो गई तो मुक्ति भी मिल जाएगी तो दोनों हाथ में लड्डू है । साधना करने में कोई घाटा नहीं ।
आगे चलते हैं की 
    " तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः। " 
         ( समाधि पाद १/३२)
.अब यहां -  तत् , प्रतिषेधार्थम् , एकतत्त्व , अभ्यासः ।
उन विक्षेपों को दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए ।
    एकतत्व से तात्पर्य हम एकतत्व अभ्यास।  अब यहां पर हमें विचार करना चाहिए ।
कि एक तत्व कौन हैं ? तीन - क्योंकि हम त्रैतवादी हैं ईश्वर जीव और प्रकृति को मानने वाले लोग हैं, अब इन तीनों में (यहां तीन पदार्थ हैं ) तीनों में एक तत्व कौन है ? तो ईश्वर हैं । 

ईश्वर एक है, जीवात्मा अनंत है, प्रकृति तीन भाग में विभक्त (डिवाइड) हैं - सतोगुण रजोगुण तमोगुण । 
परमात्मा अखंड एकरस एकतत्व अभ्यास: । तो महर्षि पतंजलि बहुत बड़े दार्शनिक थे वैज्ञानिक थे उन्होंने शब्द का जो चयन किया है तत्  प्रतिषेधार्थम् वह विध्न उपविध्न अंतराय जो डिस्टरबेंस ऊपर में बताया गया उसका प्रतिषेध करना चाहते हैं उससे बचाना चाहते हैं एक तत्व का अभ्यास ओम् का अर्थ सहित प्रणव परमात्मा जो आनंदघन हैं, उसका अभ्यास करना पड़ेगा, उसका ध्यान करना पड़ेगा, एक तत्व यदि ब्रह्म है तो यह प्रतिषेध हो जाएगा । तो परमात्मा और ओ३म् भी एका-अक्षर "ॐ" हैं, यह आप लोग जानते हैं। ऐसे तीन अक्षर से ओउम् बना है अकार उकार मकार लेकिन अभी हमने कहा एकाक्षर ओम एक तत्व । एकाक्षर ओम् क्यों कह रहे हैं क्योंकि अ और उ दोनों स्वर वर्ण है दोनों को मिला करके एक हो जाता है और म् जो है वह हलंत्  है उसका काउंटिंग नहीं होगी उसकी गिनती नहीं करेंगे क्योंकि हलंत् वर्ण की गणना नहीं की जाती हैं।
दो स्वर मिलकर एक अक्षर हो गया एक अक्षर " ॐ " 
एक अक्षर को तोड़ेंगे तो तीन भाग में डिवाइड हो जाएगा - अकार, उकार, मंकार ।
एक तत्व का अभ्यास हमें करना चाहिए । ब्रह्म का अभ्यास। ब्रह्म सर्वव्यापक है एक तत्व है एक रस है और हमारे हृदय में है वह तो है सब जगह है ।
अब मन को प्रसन्न किए बिना, मन को प्रसन्न रखे बिना, हम ओम् का जप नहीं कर सकते । जिस व्यक्ति का मन दुखी हैं , परेशान है, वह ओम की साधना कैसे कर लेंगे ? ओम का जाप कैसे करेंगे ? तो मन की प्रसन्नता रखने के लिए महर्षि जी ने सूत्र बना दिया - चित्त प्रसाधनम् तो चित् की प्रसन्नता रखती है तो कहा -
मैत्रीकरूणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्त प्रसादनम्। (1/ 33 पा०यो०सू०)
यदि आप साधक हैं साधना करना चाहते हैं तो इनि बातों को, ऋषि की बातों को ध्यान रखना चाहिए जीवन में अपनाना चाहिए । 
मैत्री = मित्रता करना । किस करेंगे मित्रता ? तो सुखी व्यक्ति के साथ । 
करुणा = दया / करुणा की भावना रखना करुणा के भाव में जीना । करुणा करना किसके साथ ?  दुखी व्यक्ति के साथ । और मुदित = प्रसन्न भाव में रहना । पुण्य आत्माओं को देखकर खुश होना ।‌ और उपेक्षा = अवहेलना या अनदेखा करना। उपेक्षा की भावना रखना । किनके प्रति ? पाप आत्माओं के प्रति पाप आत्माओं का दुरात्माओं का कभी दर्शन हो जाता है तो उससे दूरी बना लेना उपेक्षा करना ।
यदि आप साधना करना चाहते हैं ऋषि के बातों को गांठ बांधनी पड़ेगी । इन चार बातों को हमें ध्यान रखना है अपने चित्त की प्रसन्नता के लिए और चित्त हमारा जब प्रसन्न होगा तो हम साधना कर पाएंगे ओम का जप कर पाएंगे और ऊपर जो लाभ बताएं है वो लाभ हम ले पाएंगे । तो मित्रता करनी है सुखी व्यक्तित्व के साथ संसार में सुखी कौन है ?
तो मैं तो यही कहता हूं कि संसार में जिनके पास चार चीजें हैं वह संसार में सुखी होते हैं - (१) जो शरीर से बलवान है, स्वस्थ हैं।
(२) आत्मा से बलवान हैं (३)  ऐश्वर्य से बलवान है और (४) धर्मात्मा हैं।
मन कहते हैं जो व्यक्ति अपने जीवन में चार गुणो को धारण कर रखा है वह संसार में सुखी हैं। और यदि यह तीन है शारीरिक बल है आत्मिक बल है और आत्मिक बल का मतलब आत्मा का ज्ञान तत्व ज्ञान वेदांत को समझने वाला और शरीर में भी रोग रहित बलवान और वह व्यक्ति भौतिक ऐश्वर्य से संपन्न भी हो यह तीन गुण हो और एक चौथा गुण ना हो धर्मात्मा नहीं है तो वह सुखी नहीं हो सकता । 
रावण के पास तीन गुण बताए गए कि वह विद्वान भी थे आत्मा का बल भी था ज्ञानी थे और वह बलवान भी थे ऐश्वर्यशाली भी थे भौतिक धन संपदा भी थी लेकिन वह धर्मात्मा नहीं था इसलिए वह सुखी नहीं था । जो व्यक्ति सुखी होना चाहते हैं उन्हें धर्मात्मा होना ही पड़ेगा ।
और महर्षि देव दयानंद जी ने तो इस बात को बड़े बल देते हुए कहा  कि कोई व्यक्ति कितना ही बलवान विद्वान धनवान क्यों न हो परन्तु धर्मात्मा ना हो उनसे ना डरें उनका मान ना करें उनकी हानी हो ऐसा उपाय करें । और धर्मात्मा चाहे वह विद्या से शून्य हो बल से रहित हो या वह भौतिक धन संपदा से रहित हो परन्तु धर्मात्मा हो उनसे डरें उनका मान करें उनका आदर करें । तो ऋषिवर का यह वाक्य एक स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए, ऋषि ने कितनी बड़ी बात कही तो जो सुखी व्यक्ति है इन तीन गुणों के साथ-साथ धर्मात्मा भी हो उनसे हमें मित्रता करनी चाहिए । 
और यदि आप साधना करना चाहते हैं आप दुखियों को देखकर के मुख फेर लेते हैंआंख मीचकर के आगे बढ़ जाते हैं रोड़ पर हम जा रहे हैं किसी का एक्सीडेंट हुआ और हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी सहायता करें, हम कर सकते हैं लेकिन कहते आप कौन पचड़े में पड़े .. चलो आगे। तो हम कभी हम साधना में आगे नहीं बढ़ सकते ।
हमें तो करुण दुखी व्यक्ति और अहसाय व्यक्ति की उस अवस्था में हमें मदद करने की चेष्टा करनी हैं। महर्षि देव दयानंद के जीवन चरित्र को पढ़ने से पता चलता है वह करुणा-निधान थे, दया के सागर थे, तो हम सब भी ऋषिवर के शिष्य हैं और साधना की भावना रखते हैं तो करुणा के भाव की ऋषि पतंजलि भी कह रहे हैं हमें करुणा के भाव रखते हुए करुणा करनी चाहिए।
 मैत्री और करुणा के पश्चात् "मुदित" को समझें -
"मुदित" का मतलब प्रसन्नता कि धर्मात्माओं को देख कर प्रसन्नता । हमारे बीच आचार्य आनंदपुरुषार्थी भ्राता जी जुड़े हैं, आपका बहुत धन्यवाद है, हमारे परम मित्र हैं मॉरीशस में हम लोग कई बार मिले, भारत में मिलते रहते हैं । तो यह जो आर्यों का महाकुंभ है और इनमें अच्छे-अच्छे विद्वान धर्मात्मा और त्यागी तपस्वियों का दर्शन हमें कर देते हैं आर्य रत्न श्री लखन जी तो आप बड़े धन्यवाद के पात्र हैं जो पुण्य आत्माओं का दर्शन होता है और इसमें हमें प्रसन्नता मिलती हैं । आज मेरा सौभाग्य है ऐसे लोगों का आज दर्शन हुआ ऐसे लोगों की अच्छी बातें हमें सुनने को मिली तो यह मुदित की भावना रखने और जो दुरात्मा पाप-आत्मा है जो गलत कार्यों में लगे हुए हैं उनके प्रति उपेक्षा की भाव रखना दूरी बनाकर रहना यदि इस प्रकार से यदि चार बातों को व्यक्ति ध्यान रखना है तो उसका चित्त हमेशा प्रसन्न रहेगा और चित्त प्रसन्न होने से वह साधना कर पाएगा तो इन बातों को हमें ध्यान रखना चाहिए तो अब मैं कुछ बात संक्षेप से दो-तीन मिनट में कह करके विराम करता हूं योग दर्शन को समझना हो एक शब्दों में आप समझ सकते हैं वह एक शब्द है "ईश्वर प्राणिधान " केवल ईश्वर प्राणिधान करने से आप अपने जीवन को सफल कर सकते हैं जोगी (योगी ) बन सकते हैं। यह बहुत पिछले जीवन के पुण्य संस्कार जिनके पास है वह व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम हो सकता है । यह इसको हम कहेंगे भव प्रत्यय विदेह प्रकृति लयानाम् ऐसे योगी जो पिछले जीवन के पुण्य कर्म शुभ कर्म तपस्या त्याग साधना से परिपूर्ण होते हैं और जीवन में केवल ईश्वर प्राणिधान करके विदेह बन जाते हैं प्रकृति लय कर लेते हैं और कैवल्य लेकर जैसा अनुभव करने लगते हैं, मुक्ति के अनुभव अनुभूति होने लगती है वह एक शब्द के ही धारण से ।
और फिर मध्यम कोटि के जो लोग होते हैं उन्हें तीन शब्दों के ऊपर बल देना पड़ता है वह हैं - तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। इसे क्रिया योग कहते हैं । यह दूसरे साधना पाद में आया है पहला सूत्र है - तप: स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधानानि क्रियायोग: । कल इस पर आगे चर्चा करेंगें कि क्रिया योग के अनुष्ठान से तप स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान से हम मुक्ति तक पहुंच सकते हैं, क्रिया योग अनुष्ठान मध्यम कोटि के व्यक्ति ।
और जो साधारण हम आप जैसे मूढ़ आत्मा है उनके लिए 8 शब्द जो है आठ अंग है यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि इन सबको अनुसरण ( आचरण) में लाते हुए जीवन में धारण करते हुए जब हम चलेंगे कठोर तपस्या करेंगे मुक्ति तक अवश्य पहुंचेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाना चाहूंगा जो लोग इस बात को कहते हैं की मुक्ति पाने में कई  जन्म लग जाते हैं इस बात में मुझे संशय नहीं है उनकी बात ठीक है लेकिन मैं अपने तरफ से इस बात को खंडन करते हुए इस बात को कहना चाहूंगा कि अभी इसी क्षण हमें मुक्ति मिल सकती हैं ।
आप संध्या के मंत्र को पढ़ते हैं -
हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयानेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः॥
सध्य माने आज ही अभी शीघ्र आज ही अभी इसी समय मुझे सिद्धि प्राप्त हो। तो हम उसे भाव से जिए भले का एक जीवन लग जाए इस बात पर हमें निराशा नहीं लानी है और यह जीवन मिला है हमें आर्य परिवार में जन्म मिला हैं या आर्य हम बने हैं और वेद शास्त्र को हम समझ पा रहे हैं और हमारे पास सभी कुछ आयु शेष है तो इसका लाभ हमें ले लेना चाहिए अगला जीवन पता नहीं हमें कहां मिलेगा मनुष्य का मिलेगा या नहीं मिलेगा ? मिलेगा तो किस कुल में जाएंगे कहां जाएंगे अगले जन्म का अनिश्चित पर हमें विश्वास नहीं रखना । निश्चित जो है जो मिला है उसका उपयोग करना चाहिए आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद आप सबका प्यार सदैव हमें हमेशा मिलता रहता है इसलिए मैं आप सबका आभारी हूं ।
   विशेष आचार्य आनंदपुरुषार्थी जी जुड़े हुए हैं हम चाहते हैं भ्राता जी आपको सुनकर हमे प्रसन्नता होगी । 

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                - आचार्य आनंद पुरुषार्थी जी - 
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्, आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ - ( श्वेताश्वतरोपनिषत् ३-८)
इस पावन कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में सम उपस्थित मेरे बड़े अच्छे मित्र भ्राता आचार्य प्रभामित्र जी, और इस सभा में अपनी गरिमा में उपस्थिति दर्ज कर रहे धर्म प्रेमी महानुभावों मैं आप सबका अभिनंदन करता हूँ।

 भ्राता जी का प्रवचन बड़ा मार्मिक चल रहा था और बड़े आध्यात्मिक विषय पर चल रहा था ।आज हम सब लोग जो परेशान है दुखी है आकलांत है उसका एक ही समाधान है कि हमारी जो गति है वह आध्यात्म की ओर हो जाए । प्रायः हमारी जो गति होती हैं लोभ की ओर होती हैं पतन की ओर होती हैं ।
हमारा खाना पीना ऐसा होता है हमारा बोलना उठाना ऐसा होता है हमारे मित्र मंडली ऐसी होती है और हमारी दिनचर्या का अधिकतम समय संसार की ऊहापोह में ही प्रायः जाता हैं कई जन्म बात कभी कोई ऐसा अच्छा दिव्य भाव हमारा बन जाता है और हम थोड़े-थोड़े अध्यात्म पर चलते हैं, और फिर इस राह पर चलते हैं तो यात्रा सफल सी हो जाती हैं। हमारे जो क्लेश है उनसे हम बहुत आक्लांत रहते हैं। 
और क्लेशों की अनेक अवस्थाएं शास्त्रकार ने कही हैं। 
एक तो इसमें उदार अवस्था होती हैं हमारे सामने रसगुल्ला आया मिठाई आई कोई स्त्री आई कोई पैसा-थेला और लोभ का कोई कारण कुछ आया और हम एकदम से फिसल गये।ये क्लेश की उदार अवस्था है ये हमारे जीवन में बनी रहती हैं ।
यदि हम साधक नहीं हैं तो यह बहुत नचाती हैं उदार अवस्था इससे थोड़ा सा अलग हुए तो विछिन्न स्थिति में भी हम आते हैं।
विछिन्न स्थिति का मतलब है कि या तो हम रसगुल्ला को देखकर हम फिसल गये जब रसगुल्ले को देख कर हम फिसल रहे थे उससे आक्लांत हो रहे थे उसमें उलझ रहे थे उसी समय कोई दूसरी मिठाई हैं कोई खीर हैं कोई हलवा है उसे समय उसको देखकर हम नहीं फिसल रहे, तो किसी विषय को देखकर हम फिसलते हैं तो कोई दूसरा विषय उसको दबाता रहता है या उपेक्षित सा रहता है । जब हमारे अंदर काम वासना भड़कती हैं तो फिर लोभ की भावना थोड़ी सी दबी रहती है जब हम लोभ में फंसते हैं तो थोड़ा क्रोध से कहीं थोड़े से बचें रहते हैं। 
ये हमारे जीवन में चलता रहता है कभी लोभ है कभी क्रोध है कभी मोह है कभी ईर्ष्या हैं कभी छल हैं कभी कपट हैं पता नहीं कितना मानव जीवन में हमने जन्म जन्म पर की यात्रा में यह हमारी क्लेशों की विछिन्न अवस्था होती हैं ।
एक में फंसे तो दूसरे भाव में वो हमारा दबा है तो वो आ गया तो ये दस गया.. ये चलता रहता है।
तीसरा है तन ( संसाधन) हम साधक बन गए हमने साधना की हम ध्यान चिंतन मनन करने लगे भ्राता प्रभामित्र जैसे विद्वानों को हम ज्यादा सुनाने लगे, हम योग शिविरों में जाने लगे, हमने सत्संगों में ज्यादा से ज्यादा आना-जाना शुरू किया, एकांत सेवन शुरू किया तो हमारे जो क्लेश है वो थोड़े थोड़े कम होने लगते हैं ।
यद्यपि कई करोड़ो जन्मों के है इतनी जल्दी कम नहीं होते लेकिन फिर भी अंतर आने लगता है साधना से समाधि से विचारों से निसिध्यासन से अंतर आता है।  कई बार जिन चीजों के पीछे हम बिल्कुल पागल रहते थे उनको हम थोड़ा कमजोर कर लेते हैं।
और फिर थोड़ी सी स्थिति हमारी बन जाती है ।
और एक होती है - प्रसुप्त स्थिति।  प्रसुप्त स्थिति का मतलब हैं कि एक छोटा बच्चा है लोभ है मोह है क्रोध हैं ईर्ष्या द्वेष सब हैं उसके अंदर लेकिन यह सब दबा रहता है, ये सब भाव हमारे बचपन में दबे रहते हैं जब हम बड़े होते हैं तो दुनिया के समरागण में तो ये हमको जो हमारे सोये हुए से है जाग्रत हो जाते है । ये चार स्थिति क्लेशों की होती हैं।
और एक दग्धबीज अवस्था होती है जिसकी चर्चा योग दर्शनकार ने अपने ढंग से कही है और शास्त्रकार ने भी अपने ढंग से कही है कि हम समाधि लगा लेते हैं और जैसे कोई चने को भून देता है तो फिर वह उपजाऊ नहीं रह जाता है ऐसे हमारे जन्म-जन्म अंतर की इस यात्रा में आर्य सज्जनों हम हमारे क्लेशों को दग्धबीज करदे तो फिर हमारी यात्रा बहुत ही हमें शांति दायक होती है मोक्ष इस मार्ग के ठीक अनुयाई बन पाते हैं भगवान ऐसी कृपा करें किभ्राता जी के उपदेशों को हम लोग सुनते हुए इस पावन राह के पथिक बने ।
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।
 ओम शांति ! शांति !! शांति !!!🙏

योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
                          एवं आचार्य आनंद पुरुषार्थी जी
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।

योग दर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (३)

                               ॥ॐ॥
                             योग दर्शन
     योग दर्शन पर तृतीय दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
       ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
        शनिवार मार्गशीर्ष कृ ८ विक्रम संवत २०८१ 
                   23नवंबर 2024 ईस्वी
      (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )

आज हम सब तीसरे दिन में योग दर्शन पर चर्चा सुनेंगे आइये सबसे पहले मंत्र पाठ करते हैं-
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
         तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
                ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
              सभी को सादर अभिवादन। 
योग दर्शन के विषय में हम सब सुन रहे हैं योग दर्शन को हम आगे देखते हैं क्योंकि चार-पांच 6 दिन 7 दिन का सत्र में पूरा योगदर्शन तो नहीं कर पाएंगे कुछ मुख्य सूत्रों पर हम चर्चा करेंगे और अभी तक तो दो दिन लगातार जो आरंभिक सूत्र था उसे पर हमने देखा तो आज इसी प्रथम पाद में ही कुछ विशेष सूत्रों का दिग्दर्शन करते हुए आगे बढ़ेंगे तो आप अभी तक की समझ पाए कि योग दर्शन का प्रथम पाद जो सामाधि पाद है इसमें वृतियां कितने प्रकार की होती है और उसका निरोध कैसे किया जाए यह सारी बातों की चर्चा की सुनी अब प्रश्न आ कर खड़ा होता हैं योग का कोई टाइम पीरियड होता है की योग कितने दिनों में सिद्धि मिलेगी ? अवधी क्या हैं तो यह निश्चित नहीं हैं .. आपको 1 मिनट में भी समाधि लगा सकती है और कई जन्म लग जाने पर भी समाधि नहीं मिल सकती है । उसमें कोई टाइम फिक्स नहीं होता है अब 3 घंटे आप ध्यान में बैठे हैं वह आपका अच्छा है अभ्यास है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि 3 घंटे बैठे और समाधि लग गई । आपको आधे घंटे में भी समाधि आ सकती हैं, तो इसको कैसे दृढ़ किया जाए और पक्का किया जाए कितने दिनों तक किया जाए तो ऋषि ने एक सूत्र कहा  -
" स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः। "

अपने साधना को स्थिर करनी है पक्का करना है तो लंबे कल तक करना पड़ेगा अब 10 वर्ष से लेकर के 15 - 20 - 50 - 100 वर्ष या पूरा जीवन, दो चार जीवन लंबे समय की जब तक हमें सफलता न मिले तब तक हमें अभ्यास करना है जब तक मुक्ति ना मिल जाए समाधि असंप्रज्ञात ना मिले तब तक हमें साधना नहीं छोड़नी, यह लंबा समय कह दिया ऋषि ने कि जब तक हमें सफलता न मिले तब तक अभ्यास करना है जब तक मुक्ति न मिल जाएं समाधिअसंप्रज्ञात न मिले तक हमें साधना नहीं छोड़नी है। लंबा समय का यह अर्थ निकलेगा।और कहा नैरंतर्य .. निरंतरता होनी चाहिए साधना में गैप यदि हम देते हैं जैसे अपना आर्यों का महाकुंभ इसमें निरंतर प्रवचन शंका समाधान भजन चलाता रहा तो इसमें बहुत कुछ लोगों को मिला और आगे भी मिलता रहेगा ।
तो अभ्यास को हमें नहीं छोड़ना, निरंतरता साधना में निरंतरता बहुत आवश्यक है । अब घर में विवाह है, किसी की मृत्यु हो गई है तो भी साधना नहीं छोड़नी है यह अभिप्राय है लगातार हमें साधना करनी होगी एक दिन यदि गैप हो गया साधना छूटगई तो हम मास डेढ़ मास ( मास = महीने) पीछे हो गये ।
अभ्यास निरंतरता और ऋषि एक बहुत बड़ी बात कहते हैं सत्कार तो यहां सत्कार का अभिप्राय होता है श्रद्धा 
सत सत्य दधाति सा क्रिया श्रद्धा क्या जो सत्य को धारण किया जाए। तो यहां पर सत्कार शब्द लिखा हुआ है सत करोति जो सत कार्य है अर्थात सत्य को धारण करना श्रद्धा है । सत्कार का अर्थ यहां पर श्रद्धा से है कि आपके हमारे मन में श्रद्धा होनी चाहिए किसके प्रति साधना के प्रति और किसके प्रति श्रद्धा होनी चाहिए - ईश्वर के प्रति।
श्रद्धा - अब श्रद्धा को समझने के लिए दो तीन बातों को ध्यान में रखना पड़ता है । तो सबसे पहले लाभ आपके मन में होनी चाहिए, किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा रखनी है किसी वस्तु के प्रति श्रद्धा रखनी है, किसी पदार्थ के प्रति श्रद्धा रखनी हैं, उस व्यक्ति वस्तु पदार्थ से हमें लाभ क्या हैं? लाभ को ध्यान रखना है । लाभ होगा तो प्रेम होगा उस पदार्थ के प्रति प्रेम होगा तो श्रद्धा होगी श्रद्धा होगी तो फिर अनुराग होगा। तो अब ये सब क्रम से है तो परमात्मा के प्रति श्रद्धा अनुराग परमात्मा का नाम सुनते ही आंख में आंसू आ जाए, रोये खड़े हो जाए इतना प्रेम इतना प्यार और इतना प्रेम प्यार और श्रद्धा कब बनेगी जब परमात्मा के उपकारों को परमात्मा से मिल रहे लाभ की हमें स्मृति रहती है हमें याद रहता है। आप रोमांचित हो जाए इस बात को महर्षि वेदव्यास जी ने योग दर्शन के भाष्य को करते हुए इस बात का स्पष्टीकरण किया कि जिस व्यक्ति के जीवन में अश्रुपात  होता है परमात्मा की चर्चा सुनकर कि मोक्ष की बात सुनकर के रोंये खड़े हो जाते हैं आंख में आंसू आने लगते हैं तो इसी जीवन में मुक्ति संभव है समाधि संभव है संस्कार प्रबल है और हमारे माथे के ऊपर से जा रहा है,  क्या यह आध्यात्म की बात करते मोक्ष और ईश्वर अरे कुछ और सांसारिक बात करते तो समझिए हमारा संस्कार अभी सात्विक प्रबल साधना वाली नहीं है साधना के प्रति रोमांच पैदा होता है आंख में अश्रु का हाथ हो रहा है ईश्वर के नाम चर्चा सुनकर के एकदम गुदगुदी सी लगती है व रोमांस होता है तो यह समझिए कि हमारा पिछले जीवन का साधना है स्वाध्याय है, तो इस बात को थोड़ा संकेत किया कि श्रद्धा होनी चाहिए ईश्वर के प्रति और साधना के प्रति प्रातःकाल कब होगा जो मैं ध्यान में बैठूंगा ऐसे मन में उत्साह हो मैं आनंद की अनुभूति करूंगा परमात्मा से दीदार होगा । प्रातः काल कब होगा । प्रातः काल की प्रतीक्षा है, और परमात्मा के प्रति साधना के प्रति और आर्ष ग्रंथ ऋषीकृत ग्रंथ या वेद के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए ।
     एक शब्द है "परब्रह्म" एक है "अपर ब्रह्म" ।
परब्रह्म क्या होता है ? परब्रह्म "परमेश्वर" जो परे हैं संसार से, अदृश्य है, अप्रत्यक्ष है उसको परब्रह्म कहते हैं ।
ईश्वर शक्ति, ईश्वरीय सत्ता ईश्वर की सामर्थ को ईश्वर की सत्ता को परब्रह्म कहते हैं ।और अपरब्रह्म क्या है ? अपरब्रह्म वेद है , सृष्टि है ये संसार जो भी दिखाई दे रहा है अपरब्रह्म है।
ब्रह्म से जो उत्पन्न हुआ है अब इस सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है - ब्रह्म उपादान कारण नहीं है निमित्त कारण हैं। और ब्रह्म के द्वारा संचालित है ब्रह्म की शक्ति से चल रहा है वेद ज्ञान है अपरब्रह्म है, शब्द ब्रह्म है वेद प्रत्यक्ष है वेद मंत्र को हम पढ़ सकते हैं वेद मंत्र को हम इन कर्ण इंद्रियों से सुन सकते हैं इंद्रिय ग्रहीय है तो ब्रह्म शब्दब्रह्म अपर ब्रह्म तो वेद मंत्रों के प्रति श्रद्धा, वेद के माध्यम से परमात्मा का संदेश हमारे कानों में पड़ रहा है उनके संदेशों को मैं अपनी वाणी से बोल पा रहा हूं और बढ़िया से सुंदर कपड़े में लपेटकर के बडे श्रद्धा से उसेपर फूल ना चढ़ाएं लेकिन श्रद्धा सुमन जरूर चढ़ा दीजिए वेद भगवान है वेद ब्रह्म है वेद परमात्मा की वाणी है परमात्मा का साक्षात्कार मैं उस वाणी को पढ़ पा रहा हूं सुन पा रहा हूँ वेद के प्रति श्रद्धा आर्षग्रंथ के प्रति श्रद्धा, ईश्वर के प्रति श्रद्धा । मोक्ष प्राप्ति में जिन जिन साधनों का प्रयोग होता है या हम करते हैं आवश्यक हैं उन सारे पदार्थो के प्रति श्रद्धा रखनी है । और परमात्मा को मैं पदार्थ बार-बार कह रहा हूं महर्षि दयानंद का सबसे प्रिय दर्शन वैशेषिक दर्शन रहा सत्यार्थ प्रकाश उठाकर के देखिए अधिक प्रमाणों का दर्शनों में अधिक प्रमाण वैशेषिक दर्शन का प्रमाण ऋषिवर ने संग्रहित किया हैं।
अक्षरब्रह्म- जैसे शब्दब्रह्म होता है इस तरह से अक्षर से ही शब्द बनता है "अक्षरम नक्षरम विद्या दर्शते ... "  दर्शन ॐ तो अक्षर जो लिपि है अकर उकार मकार तो अक्षर ।
वहां अक्षर को भी ब्रह्म कहा हैं, "अक्षरम नक्षरम .."
जिसका नाश नहीं होता है तो अक्षर ब्रह्म उस वर्ण लिपि को भी कहते हैं और अक्षर ब्रह्म अर्थात जिसका क्षय नहीं होता है "ना क्षयती अक्षरं नाशं न भवती.."  तो वह परमात्मा को भी अक्षर ब्रह्म कहते हैं नाशरहित होने से परमात्मा को ही अक्षर-ब्रह्म और शब्द के साथ यदि अक्षर को जोड़कर के अर्थ समझ रहे हैं तो वह लिपि अक्षरब्रह्म फिर उसी से जो शब्द बना है वह शब्दब्रह्म है । तो अपरब्रह्म को समझिए कि जो परमात्मा के पास ले जाने में सहायक है, यह संसार संसार भी अपरब्रह्म है ।
यह जो सृष्टि देख रहे हैं ( नेचर ) प्रकृति यह सूर्य चंद्र आदि यह सब अपरब्रह्म है इसके माध्यम से हम उस ब्रह्म तक जाने में समर्थ होते हैं । 
तो परमात्मा की रचना वेद भी और सृष्टि भी अपरब्रह्म है, और इसी में अक्षर-ब्रह्म शब्द-ब्रह्म और अंत में परब्रह्म जो परे होते हैं जो अप्रत्यक्ष है स्वयं ईश्वर तो वह परब्रह्म है ।
तो इस प्रकार से यहां पर मैं चर्चा कर रहा था कि वैशेषिक दर्शन में ईश्वर को पदार्थ कहा गया है ब्रह्म को पदार्थ ऐसे छह पदार्थ वैषेशिक दर्शन में आया हुआ है द्रव्य गुण ऐसे छह पदार्थ में वैशैषिक दर्शन में आया हुआ है -
    द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और  समवाय
कभी वैषेशिक दर्शन पर चर्चा आरंभ करेंगे तो यह छह पदार्थ महर्षि कणाद ने माना और इन छह पदार्थ में जो पहले द्रव्य है वह 9 हैं -  5 महाभूत पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश तथा 4 मन,आत्मा, दिशा और काल ।
तो आत्मा शब्द से वहां पर परमात्मा भी ग्रहण होता है आत्मा जैसे द्रव्य है पहले पदार्थ है इस तरह से आत्मा से ब्रह्म भी परमात्मा भी पदार्थ हैं और महर्षि दयानंद जी के वेद भाष्य यजुर्वेद उठा लीजिए सत्यार्थ प्रकाश को उठा लीजिए अनेक जगह आपको मिलेंगे तिनके से लेकर के परमेश्वर पर्यंत पदार्थ । आर्य समाज का नियम उठा लीजिए -
"जो सत्य विद्या और पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है ।" 
 तो यह सब पदार्थ विद्या से जाने जाएंगे तो परमात्मा को पदार्थ इस रूप में देखा जाता है । चेतन पदार्थ को परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखने और एक विशेष बात यह है कि परमात्मा हम सबको सुन रहा है देख रहा है जान रहा है और महर्षि जी का वाक्य है -परमात्मा ईश्वर ब्रह्म हमारे नाम स्थान जन्मों को जानता है ।  इस पर हम कभी चिंतन नहीं करते हमारा क्या नाम है? लोग किस नाम से पुकारते हैं ? हम कहां रहते हैं  ? और हमारा जन्म  कहां हुआ है ? नाम स्थान और जन्म लेकिन हम इस पर विचार नहीं करते कि प्रभु हमको जान रहा है सुन रहा है देख रहा है समझ रहा है हर पल तो इस प्रकार से ब्रह्म के प्रति श्रद्धा होने पर 
   " श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ।"
तो सेवन किया हुआ । जो साधना है उसमें श्रद्धा हो दीर्घकालता हो लगातारता हो तो दृढ़ता हो आपका दृढ़ भूमि वाला बनेगा और दृढ़ भूमि वाला जब हो जाता है तो कोई भी कार्य आसान होता है आपको जब अभ्यास हो गया इतना परफेक्ट प्रेक्टिस है आपके जीवन में कि आप चलते फिरते ईश्वर का चिंतन कर पाते हैं। ईश्वर के प्रति श्रद्धा समाधि साधना भाव में रह पाते हैं तो इसका अभ्यास आपको निरंतर से करते-करते फिर हमारी वृत्तियां वैसी बन जाती है ।  अच्छा जी तो अब यहां पर वैराग्य को समझातेहुए ऋषि ने वैराग्य दो प्रकार के होते एक पर वैराग्य और एक अपर वैराग्य ।  इसको समझ लेते हैं की पर वैराग्य क्या हैं - बाद वाला वैराग्य । और अपर वैराग्य पहले वाला वैराग्य । अपर - पहल, पर बाद में । तो अपर वैराग्य पहला है ।
" दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।" 
देखिए मेरे मन में एक बात आती हैं कि संसार में लोगों को समस्याएं कहां-कहां आती है -
तो जैसा जीवन में हमारा ज्ञान होता है जितना कम ज्ञान होगा उतनी समस्याएं हमारे पास ज्यादा होगी जितना ज्ञान अधिक होगा, गहरा ज्ञान होंगा, तत्व का ज्ञान होंगा, उतना समस्याएं कम होगी । तो अब बच्चे की समस्या ले लीजिए उदाहरण समझने के लिए बच्चों की क्या समस्या होती छोटे बालक की समस्या होती है वह खेल खिलौने के लिए  रोता रहेगा छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई झगड़ा करेगा अब बड़े लोग कहते हैं कि इसकी क्या समस्या है भाई इतना क्यों परेशान हो रहा है कि लोगों को परेशान कर रखा है अब उनकी बाल बुद्धि है आपके लिए समस्या नहीं है बड़े लोगो के लिए, परंतु वह छोटे बालक के लिए समस्या है, उसको वो चाहिए जिसके लिए जिद कर रहा है । तो अब आप विचार करें कि आप हम बड़े लोगों को घर चाहिए तो घर नहीं किसी के पास वह समस्या है, किसी के पास नौकरी नहीं है तो नौकरी समस्या हैं, किसी का विवाह नहीं हुआ तो विवाह करना भी समस्या है ।उसके बाद बच्चा नहीं हुआ यह भी समस्या है ।समस्या बनाया क्यों ? विवाह नहीं करते समस्या खत्म ।
हम जंगल में रहेंगे घर बनाने की समस्या खत्म, हम पत्ते खा लेंगे वेद पढ़ लेंगे पैसे टके की समस्या खत्म। आप हमने समस्या को निर्मित ( क्रिएट ) किया हैं, व्यक्ति की समस्या यह बनाई हुई है हमने समस्या पैदा कर लिया अब समस्या को हमने मान लिया कि मेरी समस्या है। समस्या को मूर्खता से अज्ञान से हम लोगों ने क्रिएट कर लेते हैं और उसमें उलझते रहते हैं मुझे नौकरी करनी है मुझे बड़ी गाड़ी चाहिए बड़ा घर चाहिए
क्यों चाहिए ? हम बिना गाड़ी के रह सकते हैं बिना घर के रह सकते हैं, पत्ते खा कर रह सकते हैं पर समस्या पैदा कर रखा है । तो जैसा हम समाज में देखते हैं, जैसा हमारे पास संस्कार है उसी का अनुरुप अपनी समस्याओं को हम पैदा करते हैं और उसी में उलझते हैं। मैं तत्व ज्ञान की ज्ञान की दृष्टि से चर्चा कर रहा हूं, अन्यथा नहीं लेंगे कोई यहां पर, क्योंकि योग दर्शन पढ़ रहे हैं तो योग दर्शन की दृष्टि से आपको सोचना पड़ेगा ।
 तो समस्याएं का छुटकारा वैराग्य है,  वह यह है कि भौतिक समस्याओं का समाधान कर लेना अपरवैराग्य मुझे कोई स्वाद नहीं चाहिए गंध शब्द रूप रस स्पर्श आदि सुख नहीं लेना ।
जीने के लिए तो कुछ भी पत्ता भी खा सकते हैं कंद मूल फल भगवान ने इतना दिया हैं .. कुत्ते भी अपना पेट पाल लेते हैं तो मैं तो मनुष्य हूं  मैं किसी को पढ़ा दूंगा किसी की सेवा कर दूंगा तो रोटी मिल जाएगी भिक्षा मांगने की वैदिक परंपरा है एक रोटी एक घर से तो दो घर से दो रोटी मिल जाएगी। तो भोजन की समस्या कहा हैं ? 
       "दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा
                            वैराग्यम् ।"
देखें हुए सुने हुए विषयों के प्रति जो इंद्रियों से उसमें जो राग पैदा हुआ कि मुझे वह चाहिए उस पर नियंत्रण कर लेना भौतिक विषयों से उपराम हो जाना अलग हो जाना उसमें अटैचमेंट का ना रहना - मिल गया ठीक है, नहीं मिला ठीक है,  मस्त रहना यह अपर वैराग्य है। अपरवैराग्य यदि साधक के जीवन में आ गया दृष्ट संसार से यदि वैराग्य हो गया तो यह समझ जाइए की एक बहुत बड़ी उपलब्धि एक बहुत बड़ा लक्ष्य (टारगेट) अचीवमेंट हमने कर लिया है । लेकिन हमें जब सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य नहीं होता तो अपरवैराग्य नहीं होगा तो फिर पर वैराग्य भी नहीं होगा, पर वैराग्य नहीं तो मोक्ष की कल्पना नहीं कर सकते मुक्ति कैसे मिलेगी ? जब संसार के वस्तुओं में राग ना रहे ..मिल गया ठीक है नहीं मिला तो भी ठीक  जैसे स्वामी दयानंद  - स्वामी दयानंद जी ने अपने भौतिक ऐश्वर्य को ठुकराकर घर बार छोड़कर के और  बीच में उन्हें कितने  प्रलोभन आए पर कोई उनको प्रलोभित नहीं कर पाया।
तो  अपरवैराग्य तो पहले से ऋषिवर को प्राप्त था । और साधना करके फिर पर वैराग्य भी प्राप्त कर लिया ।
पर वैराग्य क्या हैं उसको समझ लेते हैं - 
अपर वैराग्य की समस्याओं को चुटकी में यू आप समाधान कर सकते हैं तो फिर कहेंगे कैसे करेंगे भाई ? भाई यह तो ज्ञान के ऊपर है अपने मान रखा है कि यह मेरा है मैं इसका हूं । जिस दिन यह मान लीजिए मैं किसी का नहीं न मेरा कोई । ना मेरा कोई ना मैं किसी का मान लीजिए सब समस्या खत्म हो जाएगी तो अपरवैराग्य जैसे ही  हो गया ( सन गया) है।
फिर पर वैराग्य पर काम करना होगा पर मेरा क्या है-
         "तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।"  
अब आपको भौतिक जो विषय था उसके प्रति वैराग्य हो गया वह आपको आकर्षित नहीं करता है लेकिन शरीर के प्रति लगाव (अटैचमेंट) है अपने इंद्रियों के प्रति अटैचमेंट है यह शरीर मेरा ना छूट जाए शरीर में कोई रोग ना हो इतना तक तो ठीक है शरीर रहे क्योंकि हम मोक्ष प्राप्त कर सके इतना तो ठीक है लेकिन राग रखता यह मै जो दिखाई दे रहा हूं वह मैं हूं यह राग है । और यदि आप हम अपने शरीर के प्रति मन इंद्रियों के प्रति राग रखेंगे तो परमात्मा तक न जा पाएंगे आपको यह वहां पर जो तमोगुण रजोगुण सतोगुण से निर्मित जो हमारा शरीर है हमारा चित्त है मन बुद्धि है उनमें भी दोष दर्शन करना कि यह भी हमारे काम का नहीं है यह हमें दुख देगा क्योंकि जब तक शरीर रहेगा जब तक इंद्रीयां रहेगी तो हमें सर्दी गर्मी भूख प्यास और यह रोज सोना है रोज उठाना है रोज उसको खिलाना है रोज नहलाना है यह समस्याएं लगी रहेगी । कि बुढ़ापा आ रहा है फिर मृत्यु का भय है कि जल्दी मृत्यु हो जाएगी फिर से मोक्ष में नहीं जा पाएंगे यह जो समस्याएं हैं यह शरीर के प्रति चित्त के प्रति हम चाहते हैं सतोगुण को लेकिन रजोगुण उभरा  हुआ है अब यह भी एक समस्या हम ध्यान में बैठते हैं कि प्रभु मुझे सतोगुण दो जो मैं समाधि लगा पाऊं लेकिन रजोगुण उभरा हुआ है तो हम डिस्टर्ब हो जाते हैं तो गुणो के प्रति सतोगुण रजोगुण तमोगुण गुणो के प्रति तृष्णा रहित होना वैराग्य होना इसमें अटैचमेंट नहीं रखना इससे उपराम / पृथक/अलग होने की चेष्टा करना भाव बनाना भावना रखना यह परवैराग्य है।
और पर वैराग्य मिल गया तो उसी क्षण मुक्ति मिल गई जीवन मुक्त हो गए बस पर वैराग्य होना ही जीवन मुक्त होना है।यह बहुत गहरी बात है कभी गहराई से समझे तो व्यास जी की सुंदर सी पंक्तियां और बहुतअच्छी-अच्छी बाते‌ पर वैराग्य के बारे में मिलेगी। अब इस पर और चर्चा न करके आगे बढ़ते हैं - 
योगी कितने प्रकार के होते हैं ?
योगी दो प्रकार के होते हैं - अब कहा है कि
        "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।"  
एक योगी होते हैं भव प्रत्यय, एक होता है उपाय प्रत्यय ।
(बीच में एक श्रोता - उपाय प्रत्यय नहीं लिखा )
आचार्य जी - अच्छा उपाय प्रत्यय नहीं लिखा है योग दर्शन में कोई पास में पुस्तक रख कर ढूंढे उपाय प्रत्यय सूत्र निकालिए तो मैं भी नहीं बता पाऊंगा तो यहां पर है देखिए सूत्र संख्या 19 है समाधि पाद का की  "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्" है और मैंने कोई उपाय प्रत्यय अगले सूत्र में  "श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ।"
अब इतरेषाम् जो शब्द है उसे अर्थापट्टी के आधार पर मैंने आपको बताया उपाय प्रत्यय और यह उपाय प्रत्यय शब्द महर्षि वेदव्यास का है, वेदव्यास का भाष्य जब आप पढ़ेंगे वहां पर उपाय प्रत्यय शब्द आ जायेगा। तो आप यहां पर समझने का प्रयास करें कि दो प्रकार के योगी होते हैं।
-  भव प्रत्यय योगी क्या है ?
भव प्रत्यय योगी वो होते हैं जो संसार को देखता है और संसार से विरक्त हो जाता है । संसार को देखा भवति संसार भवसागर है, संसार समस्याओं से घिरा हुआ है, जिस व्यक्ति को देखिए, अपने आसपास देखें, अपने स्वयं को देखिए इतनी सारी समस्याएं और अंगारे पर बैठा हुआ जैसे जल रहा व्यक्ति आग पर लपटें आ रही उसमें जल रहा है ऐसे छटपटा रहे हैं हम सब संसार के दुख को देखकर के संसारकी इस भवसागर को क्लेश क्लिष्ट को देखकर के व्यक्ति को वैराग्य हो गया । ओहो मैं नहीं जा सकता संसार में ..
परंतु हम लोग तो मूढ़ आत्मा है संसार में फंसे हुए हैं चिड़िया शिकारी आएगा जाल बिछाएगा दाना डालेगा खुद से फंसना मत उसी में प्रभामित्र हैं हम तो सुना रहे हैं आप सुन रहे हैं हम सब हैं जाल में फंसे हैं लेकिन हम फंसना नहीं चाहते फंसे हुए हम लोगों की क्या कथा करनी ..
भव प्रत्यय वो ऋषि थे महर्षि दयानंद जी जो संसार को देखा और संसार में जाने से डर गये कि मुझे नहीं जाना संसार में इतना सारा दुःख है और वैराग्य को प्राप्त करके मुक्ति का द्वार खोल लेते हैं ऐसे योगी का नाम है "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।" अर्थात संसार को देखकर के अपनी प्रकृति को चित्त को लय कर दिया और समाधि में चले गए ऐसे योगी जन्मो जन्मानतर के पुण्य कर्म शुभ कर्म या निष्काम कर्म कर पवित्र ह्रदय वाले शुद्ध अंतःकरण वाले योगी भव प्रत्यय प्रकृति लय कर देता है प्रकृति में लय कर देता है अपने चित्त को । फिर ऋषि कहते हैं महर्षि पतंजलि कि भाई जो संसार को देखकर के भी बैराग उत्पन्न नहीं होता है, इतने सारे कष्ट को देखकर के भी वह दुःखी नहीं होता है बैरागी नहीं होता है उसका क्या होगा हम आप लोगों का क्या होगा.. हम मूढ़-मति आत्मा है, हम सब मूढ़ आत्मा तो हमारी क्या गति होगी ? तो उसमें ऋषि कहते हैं - श्रद्धा वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा पूर्वक इसको समझिएगा प्रज्ञा जो है ऐसे अलग से इसको कह सकते श्रद्धा अलग है वीर्य है श्रद्धालु उत्साह है समाधि और प्रज्ञा पांच है लेकिन मेरा चिंतन अभी 2 दिन पहले सूत्र पर आया था की प्रज्ञा को सब में जोड़ना पड़ेगा श्रद्धा-प्रज्ञा वीर्य-प्रज्ञा स्मृति-प्रज्ञा समाधि-प्रज्ञा और प्रज्ञा भी है, ऐसे व्याख्या करते हैं तो श्रद्धा वीर्य स्मृति समाधि प्रज्ञा ये पांच (5 )  माने ।
अर्थात् श्रद्धा होनी चाहिए प्रज्ञा पूर्वक विशेष ज्ञानपूर्वक श्रद्धा अंधश्रद्धा नहीं, वीर्य यानि उत्साह - उत्साह होना चाहिए विवेक पूर्वक उत्साह होना चाहिए ज्ञान पूर्वक, और स्मृति - स्मृति किसकी स्मृति ? क्या खाने पीने की स्मृति ? नहीं ईश्वर की स्मृति समाधि प्राप्ति की स्मृति, समाधि की भावना रखने की स्मृति, मुक्ति में जाने की स्मृति, हम भूल जाते हैं मुझे मुक्ति में जाना है, यह प्रज्ञा पूर्वक होनी चाहिए और समाधि - समाधि भी कहा समाधि किसमें ? क्या भौतिक पदार्थों में समाधि लग गई ? पृथ्वी में समाधि लगेगी जल में भी समाधि लगेगी नहीं समाधि प्रज्ञापूर्वक विवेक पूर्वक आत्मा परमात्मा में होना चाहिए ।
तो यहां पर कहा जो व्यक्ति इन सब बातों को ध्यान रखते हुए कि वह श्रद्धा भी रखता है ईश्वर के प्रति आत्मा के प्रति आर्ष ग्रन्थों के प्रति .. वीर्य भी अर्थात् उत्साह वो बहुत उत्साहित भी है अलसी नहीं हैं और स्मृति भी है अर्थात वह कभी भूलता नहीं मोक्ष को, परमात्मा को ।  हमेशा चेष्टा करता समाधी मिले और ज्ञान यथार्थ हो विवेक, तो व्यक्ति इसी जीवन में मुक्ति में जा सकता है । यह सारे उपाय करने हैं - इसको उपाय प्रत्यय कहते हैं । आपको क्या-क्या उपाय करना है ? ऋषि ने गिना दिया है तो ऋषि ने जो बातें कही है इन सब बातों पर एक-एक शब्दों पर विचार करिए और वह व्यवहार में हमारे जीवन में कितना है इस पर भी हम-आप विचार करते हुए अपना परीक्षण करना चाहिए कि मेरे अंदर श्रद्धा कितनी है मेरे अंदर वीर्य उत्साह कितना है मुझे याद कितना रहता है और समाधि समाधि लेना इसी जीवन में । एक शब्द आएगा आगे जब आपके पढ़ेंगे -
 "समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च।" 
समाधि की भावना और क्लेश तनु करनार्थ क्लेश को क्षीण करने की भावना आपको हमेशा करते रहना चाहिए समाधि प्राप्त करना हैं-  मुझे समाधि प्राप्त करना है यह भावना आपको बनानी पड़ेगी अपने अंदर जो अविद्या, अस्मिता राग द्वेष अभिनवेश आदि क्लेश है उसको क्षीण करना पड़ेगा । तो इस प्रकार की सारी बातों को व्यवहारों को याद रखते हुए अपने जीवन में कितना हमने आगे बढ़े इस पर कितना हमने अचीवमेंट किया कितनी हम ने कितनी उपलब्धि की इस बात का हमें ध्यान रखना होगा। तो दो प्रकार के योगीयो में "उपाय-प्रत्यय" योगी हम लोग बन सकते हैं और "भव-प्रत्यय" योगीजो संसार को देखा और झट से वैराग्य हो गया ।
तो आगे परमात्मा के बारे में आप सब जानते हैं मैं परमात्मा की चर्चा यहां पर थोड़ी सी करके फिर आगे बढ़ जाऊंगा जो बहुत आज सुंदर विषय है इसको एक्सप्लेन में जरूर करना चाहता हूं ।
परमात्मा के पास जाना हैं ... तो जहां जाना है वहां का जीपीएस (GPS) आपके पास होना चाहिए रोड मैप और आपके पास यदि वह जीपीएस नहीं है तो मुश्किल है कि आप वहां पहुंच पाएंगे । तो आपको परमात्मा तक जाना है ?
"हां जाना है।" तो आपको परमात्मा के बारे में आपको पता होनी चाहिए - वह कैसा हैं ? रहता कहां है ??  तो ऋषि ने परमात्मा के बारे में दो सूत्रों के द्वारा स्पष्ट कर दिया जो आप सब जानते हैं मैं केवल रिपीट कर रहा हूं -  क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।
और दूसरा सूत्र है - तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्।
अब संक्षेप से बोलूंगा आप सबको पता है याद भी है सूत्र मुझे यह सब क्लेश कर्म विपाक आश्य क्लेश पांच है और अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनवेश और कर्म विपाक = कर्मफल कुछ भी हम करते हैं उसका फल हमें मिलता है, वह कर्म-विपाक है। और आशय का मतलब होता है अटैचमेंट । तो कर्मफल के साथ परमात्मा का कोई चाहना नहीं है आश्य नहीं है कर्म फल नहीं चाहता अपरामिष्ठ है अलग है कर्म फल के आशय सेअलग है और क्लेश से अलग है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनवेश परमात्मा को टच नहीं करता । और पुरुष विशेष है, विश्वात्मा है । एक आत्मा हमारे शरीर में आपके शरीर में है ; एक विश्वात्मा जो आत्मा का भी आत्मा है, और पुरुष का भी पुरुष है परमपुरुष है, ब्रह्मांड रुपी पुरी में जिसका निवास होता है तो परमात्मा कोई रूप में व्याख्या किया है महर्षि पतंजलि ने कि परमात्मा में कलेश नहीं है परमात्मा कर्म करते हैं पांच, जैसा कि हमारे स्मृति शेष प्रेरणा स्रोत आचार्य ज्ञानेश्वर जी अपने प्रवचन में कहा करते थे और मैंने उनसे ही सुना कि परमात्मा सृष्टि को बनाता है सृष्टि को चलाता है सृष्टि का प्रलय करता है सृष्टि के आरंभ में विवेक ज्ञान देता है और जीवात्मा उचित कर्म फल देता है प्रथम बार में उनके मुख से सुना था पर ऐसा किसी शास्त्र में वर्णित हैं अभी तक मिला नहीं हैं । तो मोटे-मोटे पांच कर्म हम जानते हैं इसके बदले परमात्मा को कोई कर्मफल नहीं मिलता कर्म तो करते हैं पर उन्हें इनका फल नहीं मिलता है - क्योंकि वे निष्काम कर्म करते हैं । अटेचमेंट नहीं है क्योंकि अविद्या नहीं हैं तो आशय नहीं रहेगा । अपरामिष्ठ है तो अलग रहेगा । अंतिम ये जो दूसरे सूत्र में परमात्मा के बारे में  बताया वो बड़ा गजब का है कि "तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्।" अब इसको देखिए कहते हैं कि परमात्मा जो है तत्र उसमें किसमें ब्रह्म में ब्रह्म में निरतिशयम् तत्र वहां पर निर अतिशयं निश्चय करके अधिक से अधिक सर्वज्ञ सब ज्ञान का बीजम् .. बीज हैं । एक बात और मैं बताऊं की वेद पूर्ण है या अपूर्ण हैं ?
तो यहां पर अपेक्षाकृत आत्माओं मनुष्यों की अपेक्षा से वेद पूर्ण हैं , परमात्मा की अपेक्षा से वेद अपूर्ण हैं । यदि मनुष्य की दृष्टि से वेद को देखते हैं तो वेद पूर्ण है परमात्मा की दृष्टि से वेद कहेंगे तो अपूर्ण है । सारा ज्ञान नहीं दिया वेद में जितनी आवश्यक था जीवात्मा के कल्याण में उतना दें दिया परमात्मा ने और यह सूत्र कहता है कि "सर्वज्ञबीजम् "  क्या कहता है सब प्रकार के ज्ञान का बीज परमात्मा में है । और महर्षि दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में एक बहुत बड़ी बात कही की मुक्ति में उसे आत्मा का आनंद उतना उतना बढ़ता जाता है जिसका ज्ञान जितना अधिक होता है उसका आनंद उतना ही बढ़ता जाता है अब देखिए की मुक्ति में भी ज्ञान बढ़ता रहता है यह मत समझिए कि मैं मोक्ष में चला गया तो मेरा ज्ञान बस इतिश्री हो गया, जैसे जल में प्रवेश कर गए नदी में प्रवेश कर गए तो आप नदी में आ गए तो जल में आप हैं आनंद में हैं जल आनंद को मान लीजिए आनंद जल है जैसे-जैसे गहराई में जाएंगे तैरना जो जितना जानेगा उतना गहराई में जाएगा तो उतना उसका आनंद बढ़ता जाएगा । तो परमात्मा अनंत अनादि है मुक्ति में भी आत्मा परमात्मा का अंत नहीं पा सकता 31 नील 10 खराब 40 अब वर्ष भी दौड़ते रहे आत्मा परमात्मा में तो अंत पा लेंगे ?
पा नहीं सकता क्योंकि अंत है ही नहीं अनंत का । तो अब यह विचार करिए कि परमात्मा इतना बड़ा ज्ञानी है सर्वज्ञ सब प्रकार के ज्ञान जहां परमात्मा में है और वह ज्ञान  थोड़ा सा वेद रूप में हमें दिया हमारे कल्याण के लिए हम धर्म अर्थ काम मोक्ष को प्राप्त कर सके इतना ही ज्ञान वेद में परमात्मा ने दे दिया उसके आधार पर हमें मुक्ति मिल जाए और जितना ज्ञान हमारा बढ़ता जाएगा आनंद बढ़ता जाएगा । तो परमात्मा को यहां पर सर्व विद्याओं का बीज कहा और जैसे आप ध्यान करेंगे आपका ज्ञान बढ़ेगा आपका अंदर से ज्ञान उत्पन्न होता चला जाएगा । और परमात्मा का नाम क्या हैं  ? इस पर चर्चा करें और कल मैं चर्चा करूंगा कि परमात्मा के ध्यान से क्या-क्या लाभ होता है ? मैं आज करना चाह रहा था पर समय आदेश नहीं दे रहा है लेकिन नाम पर चर्चा करके मैं अपनी वाणी को विराम करना चाहूंगा तो अब नाम परमात्मा का क्या है "ॐ" या "ओ३म" अर्थात् प्रणव "तस्य वाचक : प्रणव । " अब कहते है प्रणव परमात्मा का नाम है । परमात्मा नहीं है वह, इस बात पर हमेशा बांध करके चलिए मन में । शब्द अर्थ संबंध और ज्ञान । अब आप सब जानते हैं शब्दार्थ संबंध और ज्ञान इसे कैसे समझेंगे तो जैसे गौ शब्द आपने कहा ।  क्या कहा ? गौ ( गऊ ) । "गौ" शब्द है और यह शब्द किसको कह रहा है गौ कमल शासना युक्तमलांगुलम्  जिसके गले में शासन हो मांस लटकता है का कमुद है शासन वह पूछ है तो वह जो गौ (गऊ) गौशाला में बंधी हुई है वह अर्थ हो गया । शब्द मुख में बोला जीभ से और अर्थ है गौशाला में गाय बंधी हुई है चार पैर वाली वो 
अर्थ हो गया -  शब्दार्थ = शब्द अर्थ। 
अब कहते हैं संबंध तो संबंध जो है वह व्यक्ति का संबंध जो बोल रहा है वह गौ के साथ संबंध करें गौशाला में बंधी गाय को जाकर छुए वह संबंध बनेगा और ज्ञान मस्तिष्क में है शब्द मुख में है ज्ञान मन में है गाय अर्थ गौशाला में बंधी हुई है । अब देखिए तीनों तीन जगह यह सब मिश्रित होकर के प्रतिभाषित होता है तीनों में अंतर नहीं कर पाते । शब्द अर्थ ज्ञान । तो इन तीनों में जब अंतर करना सीख जाएंगे तब आपको विशेष ज्ञान होगा की ज्ञान चीज अलग है, शब्द अलग है और अर्थ अलग हैं । तो आप ओम शब्द को लीजिए ओम शब्द हैं - "अकार उकार मकार" इससे ब्रह्म का कोई लेना देना नहीं हैं । अब मैं एक बहुत बड़ी बात कह रहा हूं कि शब्द के साथ अर्थ का नित्य संबंध होता है और नहीं भी होता है ।
 फिर आप कहेंगे दो बात क्यों बोल रहे हैं ? दोनों बातों को एक्सप्लेन करता हूं संक्षिप्त में समझा देता हूँ -
वेद में जो शब्द हैं उसका अर्थ निश्चित (फिक्स) होता है, निश्चित होता है। जैसे अग्नि शब्द के लिए अग्नि के लिए अग्नि शब्द है जल के लिए जल है आप है उस शब्द का अर्थ वही होगा आप हम जल को कह सकते अग्नि को नहीं कह सकते । आग को ही अग्नि कह सकते हैं जल को अग्नि नहीं कह सकते इस रूप में जिस शब्द का जो अर्थ है वैदिक शब्दों का लौकिक शब्दों का अर्थ तो थोड़ा सा आगे पीछे हो जाता है वैदिक शब्दों का अर्थ फिक्स होता है । उसका प्रसंग के अनुसार अर्थ बदलेगा लेकिन प्रायः शब्द का अर्थ फिक्स होता है इसके अर्थ निश्चित है लेकिन शब्दों के साथ अर्थ का संबंध यह निश्चित नहीं हैं ।
यदि शब्द के साथ अर्थ का संबंध शब्द का अर्थ निश्चित है पर संबंध नहीं रहता यदि शब्द और अर्थ का संबंध रहता तो आग कहते ही मुख जलने लग जाता, जल कहते ही हमारी प्यास बुझ जाती । तो संबंध नित्य अनित्य है और अर्थ निश्चित है । तो शब्द आपने कहा "ओम् " शब्द केवल व्यवहार के लिए है कि "ओम् " आपको डायरेक्शन दिया किसको कह रहा है जो सर्वव्यापक हैं, अर्थ अलग हैं - अर्थ के साथ आपको जुड़ना पड़ेगा अर्थ के साथ आपके संबंध बनाना पड़ेगा शब्द ने केवल आपको डायरेक्शन दे दिया इशारा कर दिया अब "ओम्" बोले और रुक जाइए अर्थ पर विचार करिए अर्थ के साथ संबंध बनाइये शब्द को भूल जाइए और अर्थ जो सर्वव्यापक सत्ता है उसके साथ संबंध बनाने के लिए आपको कुछ उहा करनी पड़ेगी कुछ तकनीक अपनानी पड़ेगी ( लोकभाषा में जोगाड़ या जुगाड़ ) । कुछ ऐसा जो उहा  शब्द मैने प्रयोग किया तो टेक्निक अपनाने के लिए अंकुश लगाना कि किस तकनीक से हम परमात्मा से कनेक्ट हो सकते हैं, ध्यान में गहराई जा सकते हैं । तो आपको परमात्मा के साथ संबंध बनाने के लिए कुछ उहा /तकनीक / जुगाड़ अपनाना पड़ता हैं, उस तकनीक को आप डेवलप करें या किसी के द्वारा गाइडेंस के आधार प्राप्त करें जिससे परमात्मा से आपका संबंध बन जाए और वह संबंध बनाने के लिए जैसे मैं अपना चिंतन ले आता हूं कि बीच में लाभ को ले लिए परमात्मा के उपकारों को याद रखिए परमात्मा जो बेनिफिट्स हो रहा है उसको मन में उठाइए आपका संबंध बन जाएगा । तो उसी तरह से आपकी मन में और कोई तकनीक डेवलप हुआ है कि परमात्मा कैसे कनेक्ट हो जाए वह उसे कर सकते हैं तो आप संबंध परमात्मा के साथ बनाएं अर्थ जो परमात्मा है उसके साथ आप कैसे जुड़ पा रहे हैं शब्द केवल डायरेक्शन देगा शब्द के साथ अर्थ का संबंध नित्य नहीं रहता यह बात मैं स्पष्ट किया और बाकी परमात्मा के ध्यान से हमें क्या-क्या लाभ मिलेगा यह कल के प्रसंग में चर्चा करते हुए कल साधना पाद पर हम आएंगे ।
साधना पाद में अष्टांग योग की संक्षिप्त चर्चा करते हुए कुछ और विशेष बात इसमें होगी उस पर चर्चा कर लेंगे कुछ आप लोगों का प्रश्न भी आएंगे अभी भी आ जाए तो उस पर हम चर्चा कर सकते हैं तो कल हम ध्यान करने से, परमात्मा के नाम का जाप करने से हमें क्या-क्या लाभ मिलेगा कौन-कौन से दुख व्याधि आदि संशय कैसे मिटता है उसका क्या-क्या प्रयोजन है कैसे उसका हमें लाभ मिलता है उसे पर थोड़ी चर्चा करते हुए आगे बढ़ेंगे।
    बहुत-बहुत धन्यवाद नमस्ते। शेष कल चर्चा करेंगे । 
                              क्रमशः 

         योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
               लेखन ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा