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Tuesday, 13 January 2026

स्वास्थ्यवर्धक - अजवायन का साप्ताहिक प्रयोग ।

इसे सेव कर सुरक्षित कर लें, ऐसी पोस्ट कम ही आती है..स्मरण रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें : जो आपको हमेशा स्वस्थ और प्रसन्न रखेंगी :-

साधारण छोटे-छोटे प्रयोग जिनको आप अवश्य अपनाए १ प्रयोग नीचे दिया है जो आपके घर में ही उपलब्ध है अजमाए और लाभ ले:-

(1) अजवायन का साप्ताहिक प्रयोग:-

सुबह खाली पेट सप्ताह में एक बार एक चाय का चम्मच अजवायन मुँह में रखें और पानी से निगल लें। चबाएँ नहीं। यह सर्दी,खाँसी,जुकाम, बदनदर्द,कमर-दर्द, पेट दर्द, कब्जियत और घुटनों के दर्द से दूर रखेगा। 10 साल से नीचे के बच्चों को आधा चम्मच 2 ग्राम और 10 से ऊपर सभी को एक चम्मच यानी 5 ग्राम लेना चाहिए।
साभार - प्रेमानंद भक्ति पंथी

        अजवायन के प्रयोग के लिए सावधानियां

अजवायन के प्रयोग के लिए कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए:

1. गर्भवती महिलाओं को सावधानी: गर्भवती महिलाओं को अजवायन का सेवन करने से पहले डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए, क्योंकि यह गर्भपात का कारण बन सकता है।

2. अधिक मात्रा में सेवन नहीं: अजवायन का अधिक मात्रा में सेवन करने से पेट दर्द, उल्टी और दस्त हो सकते हैं।

3. बच्चों को सावधानी से दें: 10 साल से नीचे के बच्चों को अजवायन की आधी मात्रा दें और उनकी प्रतिक्रिया को ध्यान से देखें।

4. अजवायन से एलर्जी: यदि आपको अजवायन से एलर्जी है, तो इसका सेवन न करें।

5. दवाओं के साथ परामर्श: यदि आप कोई दवा ले रहे हैं, तो अजवायन का सेवन करने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

इन सावधानियों का पालन करके, आप अजवायन के लाभों का आनंद ले सकते हैं और इसके दुष्प्रभावों से बच सकते हैं।

Monday, 12 January 2026

माघ : उजास की तपश्चर्या और मौन का उत्तरायण

माघ : उजास की तपश्चर्या और मौन का उत्तरायण 
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सूर्य मकरस्थ होने जा रहे हैं। और इधर हम नीलाचल में भटक रहे हैं। अनजान अनचीन्हे रास्ते। रॉबर्ट फ्रॉस्ट के शब्दों में कहें तो "आई टुक द वन लेस़ ट्रैवल्ड बाई"। नीलाचल कामरूप शैल माघ में नहाया है। "माघ मघ् दीप्तौ"! माघ अपने सम्पूर्ण ऐश्वर्य में विराजमान है यहां। समझ आता है कि क्यों देवराज इन्द्र स्वयं को 'मघवा' कहे जाना पसन्द करते हैं। "मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड़यौ मुनि धीर री सजनी" 

माघ जब आता है, तो कामाख्या का नीलाचल मौन हो जाता है। यह मौन किसी अभाव का नहीं, गर्भस्थ शक्ति के विश्राम का मौन है। जहाँ अन्य तीर्थ उत्सवों से पहचाने जाते हैं, वहाँ कामाख्या की पहचान उसके गुप्त कालों से है—और माघ उन्हीं गुप्त कालों में से एक है।

शाक्त परम्परा में शक्ति का अर्थ सदा उन्मुक्त प्रकट होना नहीं। शक्ति का एक रूप संकोच भी है, निग्रह भी है, अन्तर्मुखता भी है। माघ उसी अन्तर्मुखी शक्ति का महीना है।

माघ आता है तो लगता है जैसे समय स्वयं स्नान करके लौटा हो। आकाश धुला-धुला, पृथ्वी संयमी, और मनुष्य—कुछ भीतर की ओर झुका हुआ। यह महीना न उत्सव की चकाचौंध लाता है, न विरह की चीख—यह मौन का उजास है। माघ भारतीय संस्कृति का वह क्षण है जब जीवन अपने ही प्रश्नों के सामने बैठ जाता है।

ऋतुएँ केवल मौसम नहीं होतीं, वे मनुष्य की भीतरी अवस्थाएँ होती हैं। माघ उसी भीतरी अवस्था का नाम है, जब मनुष्य अपने भीतर की ठंड से परिचित होता है और उसे तप में बदलने का साहस करता है।

भारतीय कालबोध में माघ कोई साधारण महीना नहीं। यह उत्तरायण की देह में स्थित आत्मा है। सूर्य का मकर में प्रवेश केवल खगोल नहीं—यह धर्म का संकेतक है। भीष्म का शरशय्या पर पड़ा रहना और उत्तरायण की प्रतीक्षा करना इसी काल-संस्कार की कथा है।

मकर भारतीय ज्योतिष में धर्म का द्वार माना गया है। उत्तरायण केवल खगोलीय घटना नहीं, वह भीष्म के शरशय्या पर पड़े प्रतीक्षा-काल की स्मृति है—जहाँ मृत्यु भी समय की अनुमति से घटित होती है।
“उत्तरायणं पुण्यं देवयानं प्रचक्षते”
— महाभारत, भीष्मपर्व

यहाँ समय देवपथ बन जाता है। माघ में मनुष्य भी अपने जीवन को देवपथ पर मोड़ने का संकल्प करता है—व्रत, स्नान, मौन और संयम के द्वारा।

भारतीय संस्कृति में समय कभी निरपेक्ष नहीं रहा। यहाँ काल भी नैतिक है, उत्तरदायी है। माघ में समय मनुष्य से पूछता है—"तुम प्रकाश की ओर जा रहे हो या केवल दिन गिन रहे हो"?

 
हमारे पूर्व-पुरूष पुरखे पराशर कह गये कि "मघायां पूर्णिमायां जातः मासः माघः"! अर्थात् मघा नक्षत्र की पूर्णिमा से युक्त मास। और यह मघा नक्षत्र स्वयं पितृदेवता, वंश-स्मृति, और संस्कार-परम्परा का प्रतीक है। इस प्रकार माघ मास स्मृति और संस्कार का काल बन जाता है। तो इसीलिए तो नहीं महर्षि पराशर ने कहा कि "माघ में मघोन बन जाना मेरे पुत्रों "! मघोन: अर्थात दानशील तेजस्विता! क्षमाशील हृदय।‌ विशाल ह्रदय। मैग्नेनिमस। महामना। महात्मा। यजमान। 

माघ-स्नान का दृश्य केवल तीर्थ का नहीं, सभ्यता का दृश्य है। बूढ़े शरीर, काँपते हाथ, और आँखों में विश्वास की गर्मी—यह सब देखकर लगता है कि भारतीय संस्कृति किताबों में नहीं, नदियों में लिखी गई है।
“माघे मासि गङ्गायां स्नानं पापप्रणाशनम्”

यह स्नान शरीर का नहीं, स्मृति का स्नान है। मनुष्य अपने भीतर जमी हुई थकान, अपराध-बोध और अहंकार को ठंडे जल में विसर्जित करता है।
कुंभ और माघ मेला—ये आयोजन नहीं, समूहगत आत्मालोचन हैं। यहाँ कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं—सब शीत में समान रूप से काँपते हैं, और यही समानता भारतीय अध्यात्म की जड़ है।

माघ की खिचड़ी भारतीय लोकबुद्धि का दर्शन है। न उसमें अधिक मसाले, न आडंबर—फिर भी वह सम्पूर्ण है। तिल, गुड़, घी—ये केवल स्वाद नहीं, शिशिर ऋतु की दार्शनिक प्रतिक्रिया हैं।
चरक ने कहा—
“शिशिरेऽग्निर्बलीयान् भवति”

लोक ने इसे पकवान में बदल दिया। यही भारतीय ज्ञान-परम्परा है—शास्त्र का लोक में अवतरण।भारतीय संस्कृति कभी अमूर्त नहीं रही, उसने दर्शन को थाली में परोसा है।

माघ न तो वसंत की तरह चंचल है, न वर्षा की तरह उन्मुक्त। यह साहित्य का संयमी महीना है। संस्कृत काव्य में शिशिर विरह को गाढ़ा करता है, हिन्दी कविता में यह आत्मसंवाद का समय है।
निराला की पंक्तियाँ—
“जमी है धरा हिमकणों में,
भीतर जलता हुआ प्रश्न लिए”

माघ का सौंदर्य इसी प्रश्न में है। यह महीना पूछता है—
क्या तुम्हारे भीतर कुछ जल रहा है, या सब ठंडा हो चुका है? करुण रस कि निष्पत्तियों की तरह माघ भी रोता नहीं, बस चुप हो जाता है।

माघ की भक्ति में शोर नहीं। यह घंटियों का महीना नहीं, श्वासों का महीना है। जप धीमा हो जाता है, शब्द कम और अनुभूति अधिक। शैव परम्परा में माघ-अभिषेक, वैष्णव परम्परा में माघ-सेवा—सबका सार एक है:
ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करो, स्वयं समझो।
यह महीना धर्म का प्रचार नहीं, धर्म की परीक्षा है।

माघ भारतीय सभ्यता का आत्मदर्पण है। अभी किसान आकाश को देखता है। जब उत्सव थमते हैं, तभी मनुष्य स्वयं को सुनता है।
यह महीना सिखाता है कि संस्कृति केवल उत्सवों से नहीं, संयम से बनती है। माघ हमें याद दिलाता है कि प्रकाश पाने के लिए पहले ठंड सहनी पड़ती है।

माघ कोई बीत जाने वाला महीना नहीं। वह हर वर्ष लौटकर हमसे पूछता है—
तुम्हारे भीतर उत्तरायण हुआ या नहीं?
और यदि उत्तर मौन में “हाँ” है,
तो समझिए—माघ सफल हुआ।

अस्तु, कामरूप पर उत्तरायण का सूर्य तमस् से तेजस् की ओर संक्रमण का काल है। स्थूल शीत के भीतर सूक्ष्म अग्नि के प्राकट्य का सुअवसर।‌ शिव-शिवानुभव की तैयारी का समय। शाक्त परम्परा में माघ बीज-काल है। 
शक्ति का गुप्त संचय, वसन्त-प्रसव से पूर्व गर्भकाल। इसलिए कामाख्या में माघ गुह्य साधना और मौन-तप का समय माना जाता है।
तन्त्र कहते हैं- 
“इच्छा शक्तिर्जगत्कारणम्”
इच्छा जब बाहर जाती है, तो सृष्टि बनती है;
और जब भीतर लौटती है, तो साधना बनती है।
माघ वही क्षण है जब कामाख्या की शक्ति बाहर कम, भीतर अधिक प्रवाहित होती है। नीलाचल पर यह समय उत्सव-विराम का है। यहाँ शक्ति नाचती नहीं, संकलित होती है। यह वह महीना है जब शक्ति अपने ही गर्भ में उतरती है।

ऋतु भी देवी है। 
शाक्त परम्परा में काल स्वयं देवी का रूप है—कालिका।
माघ उस कालिका का स्थिर नेत्र है—न उग्र, न करुण, केवल साक्षी। तन्त्रालोक में कहा गया—
“कालेनैव जगत्सर्वं दृश्यते लीयते पुनः”
माघ में सृष्टि जैसे ठहर जाती है। कामाख्या में यह ठहराव अत्यन्त सघन है—न अधिक तीर्थयात्री, न उन्मत्त साधना। यह बीज-काल है। और देखें कि शाक्त मिथक में रक्तबीज केवल असुर नहीं, अनियंत्रित प्रवाह का प्रतीक है—जो बहता ही जाता है। दुर्गा उसे तब जीतती हैं जब वे उसकी धारा को रोकती हैं। माघ उसी रोक का महीना है। यहाँ न उग्र चण्डी का आवाहन है, न कामाख्या का रजस्वला उत्सव (अम्बुबाची)।
यह संयम की दुर्गा का समय है। वास्तव में तो भारतीय संस्कृति में शक्ति को जीतना नहीं, सहेजना आता है। अभी कामरूप की साधना सार्वजनिक नहीं, गुप्त है।
और माघ गुप्तता का ऋतु-संस्कार है।
तन्त्र में कहा गया—
“गुप्तं यत्र साधनं तत्र सिद्धिः शीघ्रं भवति”
माघ की ठंड साधक को एकान्त देती है—देह को स्थिर, श्वास को सूक्ष्म और मन को संकुचित। यह वही अवस्था है जहाँ कुण्डलिनी बिना उछाले उठती है।
यह महीना मन्त्र-जप का नहीं, मन्त्र-स्मरण का है।

कामाख्या की योनि-शिला सदा उर्वरता का प्रतीक मानी जाती है, पर शाक्त परम्परा जानती है—उर्वरता भी विश्राम माँगती है। माघ सृष्टि का विराम-क्षण है।
जैसे भूमि को भी कुछ समय बिना बीज के रहना होता है।
“यत्र शक्तिः विश्रामं प्राप्नोति, तत्रैव महाशक्तिः प्रकटते”
— तान्त्रिक भावसूत्र
यह माघ महीना स्त्री-तत्त्व के स्वाधीन मौन का महीना है।
इसीलिए माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई। क्यों? क्योंकि पृथ्वी की महायोनि है प्रयाग। कुम्भ पर पीछे लिखे एक लेख में इस पर विस्तृत चर्चा हुई थी। 

उपनिषदों में उत्तरायण देवयान है। देवायन है। शाक्त परम्परा में यही ऊर्ध्वशक्ति है—जो मूलाधार से सहस्रार की ओर जाती है।
माघ में यह यात्रा सहज होती है, क्योंकि प्रकृति स्वयं ऊर्ध्वमुखी हो जाती है—सूर्य, प्राण और संकल्प—तीनों ऊपर की ओर। तो, कामाख्या में माघ का अर्थ है शक्ति का आकाश की ओर देखना।

शाक्त परम्परा स्त्री को केवल जननी नहीं, द्रष्टा मानती है।
माघ इसी द्रष्टा-स्त्री का महीना है—जो बोलती नहीं, देखती है। यह महीना बताता है कि शक्ति का सबसे बड़ा रूप उन्माद नहीं, संयत साक्षित्व है। माघ में कामाख्या उत्सव नहीं करती, वह स्वयं को याद करती है। और जो साधक इस स्मृति में सहभागी हो जाता है,
वह जान लेता है कि शक्ति सदा प्रकट नहीं होती, कभी-कभी वह केवल होती है। और वही उसका परम रूप है।

'माघ' भारतीय सभ्यता का स्नानागार है जहां हम अपने मन की बात नहीं करते हैं। ईश्वर के मन की बात सुनने का जतन करते हैं। 

✍️ मधुसूदन पाराशर 
  कामरूप                       माघ कृष्ण ९ वि.सं. २०८२

                          वयं राष्ट्रे जागृयाम 

ग्लेशियरों के सरताज, कर्नल नरेन्द्र "बुल" (नरेंद्र कुमार शर्मा)

भारत को आजाद हुए कुछ ही समय बीता था। देहरादून के इंडियन मिलिट्री ऐकेडमी की ज्वाइंट सर्विसेज विंग में थल सेना, एयरफोर्स और नेवी के कैडेट्स की साझा ट्रेनिंग चल रही थी (क्योंकि उस वक्त तक खडगवासला में नेशनल डिफेंस ऐकेडमी पूरी तरह से बनकर तैयार नही हुई थी) 1950 की बात है 

एक सत्रह साल के कैडेट को बाॅक्सिंग रिंग में अपने सीनियर बैच के कैडेट का मुकाबला करना था। वो सीनियर कैडेट बड़ा ही ब्रिलियेंट और बेहतरीन बाॅक्सर था।

वो सीनियर बैच के कैडेट थे भविष्य का भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष जनरल एस एफ राॅड्रिग्स जिनका बाॅक्सिंग रिंग में दबदबा रहता था।

उसके सामने था सत्रह साल का जूनियर कैडेट नरेन्द्र कुमार शर्मा। पाकिस्तान के रावलपिंडी मे पैदा हुआ वो लड़का, जिसका परिवार देश के विभाजन के समय भारत आया था। घमासान बाॅक्सिंग मैच हुआ और भविष्य के सेनाध्यक्ष ने जूनियर कैडेट नरेन्द्र कुमार शर्मा का भूत बनाकर रख दिया।

वो जूनियर लडका बुरी तरह पिटा, मगर पीछे नहीं हटा। बार बार पलटकर आता, मारता और मार भी खाता मगर पीछे हटने को तैयार ना होता। अंतत: कैडेट एस एफ राॅड्रिग्स ने वो मुकाबला जीत लिया। जूनियर कैडेट बुरी तरह पिटकर हारा जरूर मगर उसी बाॅक्सिंग मैच में मैच देखने वाले कैडेट्स ने उसको एक निकनेम दे दिया। जो जीवन भर उसके नाम से चिपका रहा। वो निकनेम था BULL यानि बैल...

देश के बहुत से एक नायक, वास्तविक हीरो चुपचाप दुनिया से चले जाते हैं... Unknown and unsung... तब जाकर बहुत लोगों को ये मालूम होता है कि नरेन्द्र कुमार "बुल" आखिर थे कौन?

वो बंदा फौज में कर्नल की पोस्ट से आगे नहीं बढ़ सका, क्योकि हमेशा बर्फीले पहाड़ों की चोटिया लाँघते उस बैल के पैरों में एक भी उंगली नहीं बची थी। उसके लगातार मिशन चलते रहे। सारी उंगलियां गलकर गिर गईं। अपंग हुए, मगर उनके मिशन नही रुके।

आज अगर भारत देशसियाचीन ग्लेशियर पर बैठा है, अगर भारत ग्लेशियरों की उन ऊँचाइयों का मास्टर है, एक एक रास्ते का जानकार है, और पाकिस्तान को सियाचिन से दूर रखने में कामयाब रहा है, तो उसका श्रेय मात्र एक ही व्यक्ति को जाता है, वो थे कर्नल नरेन्द्र कुमार शर्मा यानि नरेन्द्र "बुल " कुमार...

उन सुनसान बर्फीले ग्लेशियरों पर शून्य से 60° कम तापमान में अपने देश की खातिर बुल ने ना जाने कितने अभियानों का नेतृत्व किया। नक्शे बनाये, उस दुर्गम क्षेत्र की एक एक जानकारी हासिल की। उनके नक्शे, फोटोग्राफ, भारत की ग्लेशियर पर विजय का आधार स्तंभ बने। 

इलाके में विदेशी पर्वतारोही अभियानों और पाकिस्तानी दखल की जानकारी भारत और दुनिया को दी। उन रास्तों का पता लगाया, उनकी स्थिति नक्शे, फोटोग्राफ जहाँ से पाकिस्तानी सियाचीन पर कब्जा करने की ताक में थे । वो सब अपने सैनिको को दी।

यही वजह थी कि सरकार ने ऑपेरेशन मेघदूत जिसके जरिये सियाचीन पर कब्जा किया था । उस ऑपेरेशन की जिम्मेदारी नरेन्द्र बुल कुमार की अपनी रेजीमेंट यानि कुमायूँ रेजीमेंट को दी थी।

पूरा देश नरेन्द्र "बुल" का ऋणी है। जिन्होंने अपने शरीर के अंगों को बर्फ मे गलाकर, सालों साल दुर्गम ग्लेशियरों में बिताकर, असंख्य चोटियाें पर पर्वतारोही अभियानों में विजय हासिल की। जो सही मायने में Father of siachen glacier कहलाने का हकदार है।
वो शानदार पर्वतारोही, वो ग्लेशियरों के सरताज, कर्नल नरेन्द्र "बुल" कुमार 31 दिसम्बर 2020 में ही यहाँ से विदा हो गए... मगर विडंबना है कि हम अपने देश के देश के इन वास्तविक नायक, हीरो के नाम तक से परिचित नहीं।
History of unfolded 

धतुरा कल्प प्रयोग

धतूरा कल्प प्रयोग 

1. पुष्य नक्षत्र में काले धतूरा के फूल, भरणी नक्षत्र में फल, विशाखा हस्त नक्षत्र में पत्ते, मूल नक्षत्र में जड़ लाकर कपूर में मिलाकर पीसे तथा कुंकुम गोरोचन भी मिलायें और तिलक करने से महावशकारी घटक है। यदि सामाजिक परम्परा में मान सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं तो इस घटक का तिलक लगाये चहुँ ओर मान, सम्मान, उन्नति, कलेशादि, निवारण हो जाता है।

2. कृष्णपक्ष के चौदस के दिन धतूरा की जड़ लाकर कमर में बाँधकर स्त्री पति से रमण करे तो कभी भी गर्भ धारण नहीं करती इसके खोलने से गर्भ की स्थिति बनती है। ऐसा पूर्व में नागार्जुन ने कहा है।

3. काले धतूरा के बीज, पारा, मैनफल तथा सुपारी के साथ मिलाकर तीन प्रकार के लोह से उसको वेष्टित करके साधक द्वारा अपनी जीभ पर रखने से पुरुषत्व का स्तम्भन हो जाता है।

4. कृष्णपक्ष, चौदस के दिन धतूरा की जड़, त्रिलोह में बंद करके धारण करने से शत्रुजनित पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

5. ग्रहपीड़ा नाशक प्रयोग-ग्रहों की पीड़ा को दूर करने के लिए

शास्त्रोक्त उपाय इस तरह है। यह उपाय मेरे द्वारा अनुभूत भी है। अतः सर्वजन अपनी ग्रहों की दूषित पीड़ा को शान्त करें। इस प्रयोग में आवश्यक मन्त्रादि जप करने का विधान भी है-

प्रयोग-एक मिट्टी की काली हान्डी (हँडिया) में धतूरा अपामार्ग (चिड़चिड़ा) बरगद, पीपल, शमी, लेटिन में शमी तथा आम, गूलर के पत्ते, घी, दूध, चावल चना मूँग, गेहूँ, तिल, शहद व दही भरकर उसे नीचे लिखे मन्त्र से अभिमंत्रित कर शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष की जड़ में गाड़ दें। इससे ग्रहपीड़ा नष्ट हो जाती है। यह प्रयोग दरिद्रतानाशक तथा पापनाशक भी है।

नोट 🚫 यदि इन उपर्युक्त प्रयोगों के साथ इनके शाबर मंत्र से अभिमंत्रित करके प्रयोग किया जाए तो अति शीघ्र ही प्रभाव मिलता हैं।

प्राचीन शाबर पद्धति के शाबर मंत्रों की साधनाओं के लिए टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े
👇
(https://t.me/sabar_mantravali टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े )

चेतावनी- शाबर मंत्रावली का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबधित जानकारी प्रदान करना है शाबर मंत्रावली की पोस्टों को पढ़कर यदि कोई व्यक्ति किसी मंत्र तंत्र यंत्र,टोने-टोटके, गण्डे, तावीज अथवा नक्श आदि का प्रयोग करता है और उससे उसे कोई लाभ नहीं होता या फिर किसी वजह से नुकसान होता है, तो उसकी जिम्मेदारी हमारी या फेसबुक बेबसाइट की कतई नहीं होगी क्योंकि हमारा उद्देश्य केवल विषय से परिचित कराना है।मंत्र तंत्र यंत्र की साधना और किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श लें
श्री नाथजी गुरूजी
की चरण कमल पादुका
को आदेश

Friday, 9 January 2026

अदरक पाग - सर्दियों की पौष्टिक शक्तिवर्धक औषधि ( टॉनिक )

अदरक पाग ...
जी हां 'पाग' ..'पाक' नहीं। हमारे यहां इसे इसी नाम से 
बनाने की विधि --
सामग्री (जितनी मैंने यूज़ की आप अपनी आवश्यकतानुसार घटा -बढ़ा लें इसी अनुपात में)
1.अदरक दो किलो।
2.दूध दो लीटर।(क्योंकि दस लीटर डालकर बनाने के लिए बहुत परिश्रम और लागत दोनों चाहिए। जबकि ये कम दूध में भी स्वादिष्ट और अच्छा बन जाता है)
3.गेहूं का आटा एक किलो।
4.पोस्ता दाना आधा किलो।
5.गुड़ चार किलो।
6.पचास ग्राम पीपर।
7.पचास ग्राम कालीमिर्च ।
8.पचास ग्राम अजवायन।
9.पचास ग्राम दालचीनी।
10.पचास ग्राम गोंद।
11.पचास ग्राम लौंग।
12.पचास ग्राम काला नमक।
13.सूखी मेवे काजू, बादाम, मूंगफली दाना।
14.आधा किलो देसी घी।
कैसे बनाएं --
अदरक छिल कर कद्दूकस करके पीस लें । पीस कर देसी घी में इतना भूनें की पानी सूख जाए।पोस्ता दाना भिगोकर रखें फूल जाने के बाद मिक्सी में पीस लें ।पीसने के बाद घी में पानी सूख जाने तक भूनें।
गेहूं के आटे को घी में लाल- लाल भून लें।सारे मसाले भूनकर मिक्सी में सूखा पीस लें।
दो लीटर दूध का खोआ बना लें।अब गुड़ की एक तार की चाशनी बनाएं और उसमें सबसे पहले अदरक पोस्ता दाना पेस्ट, फिर भुने हुए सारे मसाले का पाउडर और काला नमक डालें।अब इसमें पंजीरी और खोआ डालें खूब अच्छी तरह चलाएं गांठें ना पड़ने पाएं । सबसे आखिर में ड्रायफ्रूट्स डालकर चलाएं फिर उतार लें हल्का ठंडा होने पर हथेली में घी लगाकर लड्डू बांध दें।
अदरक पाग रेडी । 

इसे आप काढ़े के ऑप्शन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। रोज रोज काढ़ा बनाने का झंझट खत्म।
  स्वादिष्ट तो इतना बनता है कि अदरक का स्वाद ना पसंद करने वाला भी चाव से सात आठ लड्डू खा जाए।

#अभिलाषासिंह 
#winter