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सूर्य मकरस्थ होने जा रहे हैं। और इधर हम नीलाचल में भटक रहे हैं। अनजान अनचीन्हे रास्ते। रॉबर्ट फ्रॉस्ट के शब्दों में कहें तो "आई टुक द वन लेस़ ट्रैवल्ड बाई"। नीलाचल कामरूप शैल माघ में नहाया है। "माघ मघ् दीप्तौ"! माघ अपने सम्पूर्ण ऐश्वर्य में विराजमान है यहां। समझ आता है कि क्यों देवराज इन्द्र स्वयं को 'मघवा' कहे जाना पसन्द करते हैं। "मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड़यौ मुनि धीर री सजनी"
माघ जब आता है, तो कामाख्या का नीलाचल मौन हो जाता है। यह मौन किसी अभाव का नहीं, गर्भस्थ शक्ति के विश्राम का मौन है। जहाँ अन्य तीर्थ उत्सवों से पहचाने जाते हैं, वहाँ कामाख्या की पहचान उसके गुप्त कालों से है—और माघ उन्हीं गुप्त कालों में से एक है।
शाक्त परम्परा में शक्ति का अर्थ सदा उन्मुक्त प्रकट होना नहीं। शक्ति का एक रूप संकोच भी है, निग्रह भी है, अन्तर्मुखता भी है। माघ उसी अन्तर्मुखी शक्ति का महीना है।
माघ आता है तो लगता है जैसे समय स्वयं स्नान करके लौटा हो। आकाश धुला-धुला, पृथ्वी संयमी, और मनुष्य—कुछ भीतर की ओर झुका हुआ। यह महीना न उत्सव की चकाचौंध लाता है, न विरह की चीख—यह मौन का उजास है। माघ भारतीय संस्कृति का वह क्षण है जब जीवन अपने ही प्रश्नों के सामने बैठ जाता है।
ऋतुएँ केवल मौसम नहीं होतीं, वे मनुष्य की भीतरी अवस्थाएँ होती हैं। माघ उसी भीतरी अवस्था का नाम है, जब मनुष्य अपने भीतर की ठंड से परिचित होता है और उसे तप में बदलने का साहस करता है।
भारतीय कालबोध में माघ कोई साधारण महीना नहीं। यह उत्तरायण की देह में स्थित आत्मा है। सूर्य का मकर में प्रवेश केवल खगोल नहीं—यह धर्म का संकेतक है। भीष्म का शरशय्या पर पड़ा रहना और उत्तरायण की प्रतीक्षा करना इसी काल-संस्कार की कथा है।
मकर भारतीय ज्योतिष में धर्म का द्वार माना गया है। उत्तरायण केवल खगोलीय घटना नहीं, वह भीष्म के शरशय्या पर पड़े प्रतीक्षा-काल की स्मृति है—जहाँ मृत्यु भी समय की अनुमति से घटित होती है।
“उत्तरायणं पुण्यं देवयानं प्रचक्षते”
— महाभारत, भीष्मपर्व
यहाँ समय देवपथ बन जाता है। माघ में मनुष्य भी अपने जीवन को देवपथ पर मोड़ने का संकल्प करता है—व्रत, स्नान, मौन और संयम के द्वारा।
भारतीय संस्कृति में समय कभी निरपेक्ष नहीं रहा। यहाँ काल भी नैतिक है, उत्तरदायी है। माघ में समय मनुष्य से पूछता है—"तुम प्रकाश की ओर जा रहे हो या केवल दिन गिन रहे हो"?
हमारे पूर्व-पुरूष पुरखे पराशर कह गये कि "मघायां पूर्णिमायां जातः मासः माघः"! अर्थात् मघा नक्षत्र की पूर्णिमा से युक्त मास। और यह मघा नक्षत्र स्वयं पितृदेवता, वंश-स्मृति, और संस्कार-परम्परा का प्रतीक है। इस प्रकार माघ मास स्मृति और संस्कार का काल बन जाता है। तो इसीलिए तो नहीं महर्षि पराशर ने कहा कि "माघ में मघोन बन जाना मेरे पुत्रों "! मघोन: अर्थात दानशील तेजस्विता! क्षमाशील हृदय। विशाल ह्रदय। मैग्नेनिमस। महामना। महात्मा। यजमान।
माघ-स्नान का दृश्य केवल तीर्थ का नहीं, सभ्यता का दृश्य है। बूढ़े शरीर, काँपते हाथ, और आँखों में विश्वास की गर्मी—यह सब देखकर लगता है कि भारतीय संस्कृति किताबों में नहीं, नदियों में लिखी गई है।
“माघे मासि गङ्गायां स्नानं पापप्रणाशनम्”
यह स्नान शरीर का नहीं, स्मृति का स्नान है। मनुष्य अपने भीतर जमी हुई थकान, अपराध-बोध और अहंकार को ठंडे जल में विसर्जित करता है।
कुंभ और माघ मेला—ये आयोजन नहीं, समूहगत आत्मालोचन हैं। यहाँ कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं—सब शीत में समान रूप से काँपते हैं, और यही समानता भारतीय अध्यात्म की जड़ है।
माघ की खिचड़ी भारतीय लोकबुद्धि का दर्शन है। न उसमें अधिक मसाले, न आडंबर—फिर भी वह सम्पूर्ण है। तिल, गुड़, घी—ये केवल स्वाद नहीं, शिशिर ऋतु की दार्शनिक प्रतिक्रिया हैं।
चरक ने कहा—
“शिशिरेऽग्निर्बलीयान् भवति”
लोक ने इसे पकवान में बदल दिया। यही भारतीय ज्ञान-परम्परा है—शास्त्र का लोक में अवतरण।भारतीय संस्कृति कभी अमूर्त नहीं रही, उसने दर्शन को थाली में परोसा है।
माघ न तो वसंत की तरह चंचल है, न वर्षा की तरह उन्मुक्त। यह साहित्य का संयमी महीना है। संस्कृत काव्य में शिशिर विरह को गाढ़ा करता है, हिन्दी कविता में यह आत्मसंवाद का समय है।
निराला की पंक्तियाँ—
“जमी है धरा हिमकणों में,
भीतर जलता हुआ प्रश्न लिए”
माघ का सौंदर्य इसी प्रश्न में है। यह महीना पूछता है—
क्या तुम्हारे भीतर कुछ जल रहा है, या सब ठंडा हो चुका है? करुण रस कि निष्पत्तियों की तरह माघ भी रोता नहीं, बस चुप हो जाता है।
माघ की भक्ति में शोर नहीं। यह घंटियों का महीना नहीं, श्वासों का महीना है। जप धीमा हो जाता है, शब्द कम और अनुभूति अधिक। शैव परम्परा में माघ-अभिषेक, वैष्णव परम्परा में माघ-सेवा—सबका सार एक है:
ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करो, स्वयं समझो।
यह महीना धर्म का प्रचार नहीं, धर्म की परीक्षा है।
माघ भारतीय सभ्यता का आत्मदर्पण है। अभी किसान आकाश को देखता है। जब उत्सव थमते हैं, तभी मनुष्य स्वयं को सुनता है।
यह महीना सिखाता है कि संस्कृति केवल उत्सवों से नहीं, संयम से बनती है। माघ हमें याद दिलाता है कि प्रकाश पाने के लिए पहले ठंड सहनी पड़ती है।
माघ कोई बीत जाने वाला महीना नहीं। वह हर वर्ष लौटकर हमसे पूछता है—
तुम्हारे भीतर उत्तरायण हुआ या नहीं?
और यदि उत्तर मौन में “हाँ” है,
तो समझिए—माघ सफल हुआ।
अस्तु, कामरूप पर उत्तरायण का सूर्य तमस् से तेजस् की ओर संक्रमण का काल है। स्थूल शीत के भीतर सूक्ष्म अग्नि के प्राकट्य का सुअवसर। शिव-शिवानुभव की तैयारी का समय। शाक्त परम्परा में माघ बीज-काल है।
शक्ति का गुप्त संचय, वसन्त-प्रसव से पूर्व गर्भकाल। इसलिए कामाख्या में माघ गुह्य साधना और मौन-तप का समय माना जाता है।
तन्त्र कहते हैं-
“इच्छा शक्तिर्जगत्कारणम्”
इच्छा जब बाहर जाती है, तो सृष्टि बनती है;
और जब भीतर लौटती है, तो साधना बनती है।
माघ वही क्षण है जब कामाख्या की शक्ति बाहर कम, भीतर अधिक प्रवाहित होती है। नीलाचल पर यह समय उत्सव-विराम का है। यहाँ शक्ति नाचती नहीं, संकलित होती है। यह वह महीना है जब शक्ति अपने ही गर्भ में उतरती है।
ऋतु भी देवी है।
शाक्त परम्परा में काल स्वयं देवी का रूप है—कालिका।
माघ उस कालिका का स्थिर नेत्र है—न उग्र, न करुण, केवल साक्षी। तन्त्रालोक में कहा गया—
“कालेनैव जगत्सर्वं दृश्यते लीयते पुनः”
माघ में सृष्टि जैसे ठहर जाती है। कामाख्या में यह ठहराव अत्यन्त सघन है—न अधिक तीर्थयात्री, न उन्मत्त साधना। यह बीज-काल है। और देखें कि शाक्त मिथक में रक्तबीज केवल असुर नहीं, अनियंत्रित प्रवाह का प्रतीक है—जो बहता ही जाता है। दुर्गा उसे तब जीतती हैं जब वे उसकी धारा को रोकती हैं। माघ उसी रोक का महीना है। यहाँ न उग्र चण्डी का आवाहन है, न कामाख्या का रजस्वला उत्सव (अम्बुबाची)।
यह संयम की दुर्गा का समय है। वास्तव में तो भारतीय संस्कृति में शक्ति को जीतना नहीं, सहेजना आता है। अभी कामरूप की साधना सार्वजनिक नहीं, गुप्त है।
और माघ गुप्तता का ऋतु-संस्कार है।
तन्त्र में कहा गया—
“गुप्तं यत्र साधनं तत्र सिद्धिः शीघ्रं भवति”
माघ की ठंड साधक को एकान्त देती है—देह को स्थिर, श्वास को सूक्ष्म और मन को संकुचित। यह वही अवस्था है जहाँ कुण्डलिनी बिना उछाले उठती है।
यह महीना मन्त्र-जप का नहीं, मन्त्र-स्मरण का है।
कामाख्या की योनि-शिला सदा उर्वरता का प्रतीक मानी जाती है, पर शाक्त परम्परा जानती है—उर्वरता भी विश्राम माँगती है। माघ सृष्टि का विराम-क्षण है।
जैसे भूमि को भी कुछ समय बिना बीज के रहना होता है।
“यत्र शक्तिः विश्रामं प्राप्नोति, तत्रैव महाशक्तिः प्रकटते”
— तान्त्रिक भावसूत्र
यह माघ महीना स्त्री-तत्त्व के स्वाधीन मौन का महीना है।
इसीलिए माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई। क्यों? क्योंकि पृथ्वी की महायोनि है प्रयाग। कुम्भ पर पीछे लिखे एक लेख में इस पर विस्तृत चर्चा हुई थी।
उपनिषदों में उत्तरायण देवयान है। देवायन है। शाक्त परम्परा में यही ऊर्ध्वशक्ति है—जो मूलाधार से सहस्रार की ओर जाती है।
माघ में यह यात्रा सहज होती है, क्योंकि प्रकृति स्वयं ऊर्ध्वमुखी हो जाती है—सूर्य, प्राण और संकल्प—तीनों ऊपर की ओर। तो, कामाख्या में माघ का अर्थ है शक्ति का आकाश की ओर देखना।
शाक्त परम्परा स्त्री को केवल जननी नहीं, द्रष्टा मानती है।
माघ इसी द्रष्टा-स्त्री का महीना है—जो बोलती नहीं, देखती है। यह महीना बताता है कि शक्ति का सबसे बड़ा रूप उन्माद नहीं, संयत साक्षित्व है। माघ में कामाख्या उत्सव नहीं करती, वह स्वयं को याद करती है। और जो साधक इस स्मृति में सहभागी हो जाता है,
वह जान लेता है कि शक्ति सदा प्रकट नहीं होती, कभी-कभी वह केवल होती है। और वही उसका परम रूप है।
'माघ' भारतीय सभ्यता का स्नानागार है जहां हम अपने मन की बात नहीं करते हैं। ईश्वर के मन की बात सुनने का जतन करते हैं।
✍️ मधुसूदन पाराशर
कामरूप माघ कृष्ण ९ वि.सं. २०८२
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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