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Sunday, 22 December 2024

योग दर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (७)

                                ॥ॐ॥
                             योग दर्शन
  योग दर्शन पर सप्तम एवं इस सत्र के अंतिम दिन का
                        व्याख्यान/ प्रवचन 
       ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
         बुधवार मार्गशीर्ष कृ १२ विक्रम संवत २०८१ 
                       27 नवंबर 2024 ईस्वी  
         (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा ) 

आज हम सब सप्तम और इस सत्र के अंतिम दिन योग दर्शन पर चर्चा करें । इससे पूर्व आचार्य आवृत्ति जी का भजन सुनेंगे। 

पाप करने से जो डर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी।
काम नेकी का जो कर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी॥ 

मोह संसार का छोड़ कर ईश भक्ति में लाई लगन ।
शोक सागर से जो तर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी ॥
काम नेकी का ... पाप करने से जो ..॥ 

यूं तुम मरते हैं लाखों यहां कायरों की तरह आदमी ।
देश-जाति पर जो मर गए उनकी रोशनी कहानी रहेगी ॥
काम नेकी का ... पाप करने से जो ..॥ 

जिंदगी के सुलभ पाथ में भी कुछ तो कांटे हैं बोकर गये ।
झोली फूलों से जो भर गए उनकी रोशन कहानी रहेगी ॥
काम नेकी का ... पाप करने से जो ..॥ 

अपने सुख-दुख में बेमोल तू खूब हंसता है रोता भी तू।
कष्ट औरों के जो हर गए उनकी रोशन कहानी रहेगी ॥ 

पाप करने से जो डर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी।
काम नेकी का जो कर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी॥ 

                      धन्यवाद ! नमस्ते
                --- --- --- ००००० --- --- --- 

आइये आरंभ करते हैं।  मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे - 

ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
         तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
               ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


आज योग दर्शन की अंतिम कक्षा है और विगत 6 दिनों से हम योग दर्शन पर चर्चा सुन रहे हैं और आज हम प्रयास करेंगे योग दर्शन के कुछ मुख्य बातों की चर्चा करते हुए आज विषय को विराम करेंगे ।
तो योग दर्शन के दो पाद के कुछ प्रमुख सूत्रों की चर्चा संक्षेप से करते हुए आपके बीच में रखा और अब दो पाद आज कुछ समय के लिए हम सुनेंगे और ये दो पाद को संक्षिप्त से संक्षेप में सुन पाएंगे तो पहले है विभूति पाद और फिर है कैवल्य पाद। तो विभूति पाद में जो बातें आई है वह अंतरंग की बात आई हैं - धारणा ध्यान और समाधि ।
बहिरंग की चर्चा दूसरे पाद में हो गई और कुछ भूमिका के रूप में प्रथम पाद में समाधि पाद में और अब अंतरंग की चर्चा महर्षि पतंजलि यहां कर रहे हैं धारणा ध्यान समाधि जो अंतरंग है जो मन का विषय है तो 
             " देशबन्धश्चित्तस्य धारणा । " 
                    (विभूति पाद /१)
"धारणा" क्या है ?  इसको समझना चाहिए की धारणा देशबंध किसी देश में अपने चित्त से चित्त को बांधना चित्त को रोक देना अब देश कोई स्थान भी हो सकता है और कोई शरीर के अंग विशेष भी हो सकता है देश स्थान शरीर के अंग नाभि हृदय नासिकाग्र भृकुटी जिसको आज्ञा चक्र बोलते हैं ब्रह्मरंद्र सहस्रार चक्र तो इन स्थानों  पर या कहीं पर शरीर के किसी देश विशेष में या फिर कोई स्थान कोई बिंदु लगा ले या ओम कहीं लिखकर दीवाल पर टांग दे या कोई स्टैचू कोई बना लेते हैं अपने आइडियल पर्सन के गुरु का या किसी का उस पर जो साकारवादी लोग हैं ईश्वर को साकार मानते हैं -गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।  मानते हैं इसमें यह नहीं कह सकते कि वे इसको धरणा का विषय नहीं बना सकते हैं,  बना सकते हैं । लेकिन अंततोगत्वा आपको अपने शरीर में ही आना पड़ेगा क्योंकि हमारी आत्मा शरीर से बाहर नहीं है प्रेक्टिस करने के लिए अभ्यास के लिए आप बहरी कोई स्थान विशेष ओ३म् लिख दें और वहां पर आप अपने मन को टिका दें एक दीपक जला दें वहां पर मन को टिका दें तो वह करना हो तो कर सकते हैं प्रेक्टिस करने के लिए, लेकिन अपने शरीर में आना पड़ेगा और शरीर में भी एक स्थान महत्वपूर्ण है धरणा के लिए जैसा कि महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने कहा हृदय प्रतिष्ठं जज्ञिरे यद् जीवं प्रतिष्ठम् अर्थात वेद के आधार पर की ह्रदय प्रदेश,  हृदय प्रदेश कोई लोग हृदय  ब्रह्मरंध्र को भी मानते हैं सह्रसार चक्र को भी हृदय मानते हैं कई लोगों से मैंने चर्चा की यह भी हृदय हैं ? लेकिन वह हृदय नहीं हो सकता हृदय के बारे में महर्षि देव दयानंद जी ने वह चौहद्दी बता दी दोनों स्तनों के मध्य अंगुष्ठ मात्र जो गड्ढा है उसी का नाम हृदय है और उस हृदय देश में आत्मा रहती है आत्मा का स्थान हृदय देश है।
तो हृदय में आत्मा का निवास स्थान है और जहां पर मैं हूं वहीं पर ब्रह्म की खोज करेंगे तो ब्रह्म का साक्षात्कार होगा अपना स्वरूप का भी दर्शन होगा तो धरणा यदि अनुभवी तपस्वियों के कथन अनुसार यदि विचार करें तो हृदय में ही लगाना चाहिए और महर्षि पतंजलि ने खुली छूट दे दिया है किसी देश विशेष में स्थान विशेष में चित्त को रोकना धरणा हैं। अब कहा उसी जगह पर ध्यान करना है अब ध्यान करना है -  ध्यान क्या है ? ध्यान के बारे में सूत्र ऋषि ने बनाया 
             " तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।" 
                   ( विभूति पाद /२ ) 
तत्र प्रत्यय एक तांता ध्यानम् तत्र तो कहां पर ? आप कह रहे हैं तो कहां  ? जहां धारणा किया है चित्त का । अब समझिए आप हम गलती क्या करते मैं भी गलती करता हूं प्राय: कभी-कभी मन भागता रहता है इधर उधर विचारों में विषयों में तो मन रोकेंगे धारणा करेंगे मन को यहां हृदय में या आज्ञा चक्र में मन को यहां रोकेंगे।
अब मन को हमने फिक्स किया जहां अब वहीं पर विचार करेंगे, अब मन को कहीं हम डोर से बांधेगें नहीं, स्थान से बांधेंगे नहीं मन तो भागता ही रहेगा उसमें कुछ विचार लायेगें और उनको भगाते रहेंगे ..
तो धरणा पहले आवश्यक है। मन को एक जगह पर रोकना बांधना अति आवश्यक है फिर वही तत्र वही उसी जगह पर चित्त में अब आपको एक तांता बनाना है तथा तत्र प्रत्यय एक तांता ..प्रत्येय का मतलब क्या हो गया ? प्रत्यय का अर्थ यहां पर जान लेना है अब किसी भी थॉट्स/ विचार/ ज्ञान के बारे में सोचना है वह अग्नि हो सकती है पृथ्वी हो सकती है जल हो सकता है आप जिसको साक्षात्कार करना चाहते हैं जिसके बारे में जानना चाहते हैं उस ज्ञान को वहां पर उत्पन्न (क्रिएट) करें अब वहां पर ब्रह्म भी हो सकता आत्मा भी हो सकता है क्योंकि समाधि तो अनेकों विषय में लगाएंगे आप । तो हम बेहतर समझते हैं कि हमारा विषय (सब्जेक्ट) ब्रह्म बने । तो ब्रह्म का ज्ञान, ईश्वर का ज्ञान के बारे में वहीं पर जहां पर चित्त को रोका है उसी जगह पर इस चित्त के द्वारा इस जगह पर आप प्रत्यय ध्यान ईश्वर का, ज्ञान ईश्वर का एकतांता लगातार उसी के बारे में सोचेंगे कि वह सर्वव्यापक है सर्वव्यापक कैसे हैं ? कण-कण में है सब को जानता है। आनंदकंद है हमको आनंद मिल रहा है वह सर्वरक्षक है मुझे रक्षा (प्रोटेक्शन) मुझे मिल रहा है। इस प्रकार से आप एक अनुभव (फीलिंग) करेंगे उसी के ज्ञान की अनुभूति एकतांता लगातार भले ही शब्द बदलेगा अब यहां हमने कहा कि सर्वव्यापक तो परमात्मा सर्वव्यापक भी है हमने कहा सर्वज्ञ हैं परमात्मा सर्वज्ञ भी हैं तो परमात्मा से संबंधित (रिलेटेड) ज्ञान ही चलें भले ही आप शब्द परिवर्तन (चेंज) कर रहे हैं उनके विषय में जितनी जानकारी है उसमें आपका विचार परिचिंतन परमात्मा से ही संबंधित ज्ञान हो और एक-तांता ( लगातार ) हो ईश्वर परमात्मा का ही ज्ञान हो अन्य विषय का ज्ञान नहीं आना चाहिए तो उसको हम ध्यान कहेंगे ।
फिर कहा उसी ध्यान के करते-करते समाधि अवस्था प्राप्त होगी। अब समाधि के बारे में सुन ले
    " तदेवार्थमात्रनिर्भासे स्वरूपशून्यमिव समाधिः। " 
                            ( वि०पा०/ ३)
यह सूत्र आ गया तद एव उस प्रत्यय के ज्ञान के आधार पर ही अर्थ मात्रम् निर्वासम् ..  अर्थ की केवल प्रतीति हो और प्रतिभाषित हो स्वरूप को शून्य अपना स्वरूप भौतिक स्थिति इसको भुला देना इसको विस्मित कर देना सुन्न/शून्य सा हो जाना मैं स्त्री हूं पुरुष हूं मैं घर में बैठा हूं आपके जो भी अपने जीवन से संबंधित स्वरूप से संबंधित समझ है उसको शून्य कर देना अर्थ की केवल प्रतीति हो यह समाधि है । समाधि के बारे में थोड़ी और दो-तीन बात कर दूं एक होता है ध्याता, एक होता है ध्यान, एक होता है ध्येय । इसको समझ लीजिए तो संभवतः क्लियर हो सकता है । ध्याता, ध्यान, ध्येय और‌ कर्ता, क्रिया कर्म तो अब कर्ता ध्याता आत्मा मैं हूं । क्या कर रहा हूं ? क्रिया ध्यान कर रहा हूं, अभी प्रवचन सुन रहे हैं । क्या कर रहे हैं -  क्रिया प्रवचन हो रही है प्रवचन रूपी क्रिया को आप सुन रहे हैं अब प्रवचन का विषय क्या है  ? मैं ध्यान कर रहा हूं मैं कर्ता ध्याता क्या कर रहा हूं ध्यान क्रिया और यह किसका कर रहा किस विषय में कर रहा हूं वह विषय ध्येय बन गया । यह तीनों की प्रतीति है तो धरणा की स्थिति है उसमें से एक क्रिया हट जाए केवल कर्ता और कर्म बच जाए ध्यता और ध्यान बच जाए, ध्याता और ध्येय बच जाए तो ध्यान बन गया और केवल ध्येय बच जाए ध्याता भी कर्ता भी हट जाए तो समाधि बन जाती है । ध्यान में दो विषय रहेगा मैं क्या कर रहा हूं इसका बोध नहीं रहेगा यदि यह बोध रह है कि मैं ध्यान कर रहा हूं मैं बैठा हूं अपने घर में अपना भी बोध है, ध्यान करने की क्रिया का भी बोध है किस विषय का ध्यान करना है? ईश्वर का ।  ईश्वर का भी समझ थोड़ा बन पा रहे हैं तो धारणा में  है। और अभ्यास करते-करते करते-करते आप देखेंगे कि मैं क्या कर रहा हूं सुध-बुध खो गया, यह पता नहीं चलता है केवल मैं का बोध है और ध्येय विषय का बोध है तो ध्यान लग गया । और अपना भी बोध फीलिंग हट जाए केवल ध्येय बच जाएगा, अर्थ बच गया तो आप समझिए समाधि लग गई । चलिए आप विचार करेंगे मेरे जो समझ था वह आपके बीच में रखने का प्रयास कर रहा हूं । आज जो विषय हैं यह विभूति पाद इन्हीं तीनों पर टिका हुआ है - धारणा ध्यान समाधि । इन तीनों को इन तीनों को एक साथ कर दें - 
                     " त्रयमेकत्र संयमः। " 
                         (वि०पा०/ ४)
त्रयम एकत्र संयम - संयम क्या हैं ? कहते संयम करना संयम शब्द शास्त्रीय है -  धारणा ध्यान समाधि एकत्व हो जाए, अलग-अलग ना रहे - तो संयम होता है । और उस संयम से सिद्धि होती है । यदि धारणा ध्यान और समाधि
अलग-अलग है तो सिद्धि नहीं आएगी ।
अब वह समाधि अंतिम में जो समाधि है लास्ट धरणा पहले सेकंड नंबर ध्यान अंतिम समाधि तो धारणा गायब हो गई ध्यान हट गया केवल समाधि बची और उस समाधि में धारणा भी है ध्यान भी है और समाधि तो है ही तो उस अवस्था में संयम कहलाता है और संयम का प्रयोग जिस विषय में करेंगे तो उस विषय की सिद्धि हो जाएगी उस विषय को हम जान लेंगे । अब संयम का प्रयोग करेंगे तो अब संयम का प्रयोग करते हुए -
" एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्था- परिणामा
       व्याख्याताः ।" 
                 ( योगदर्शन ३/१३ )
और इसमें आया है परिणाम -
" परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् । " 
( यो०द०३/१६ )
एक उदाहरण दे रहा हूं मैं सारे सूत्रों की व्याख्या नहीं करूंगा क्योंकि इतने सारे विभूतियां हैं उपलब्धियां हैं तो उसको कैसे गिनाऊंगा इतने कम समय में लेकिन कुछ मुख्य जो मेरे हृदय को छूता है कुछ सिद्धियां जो हमें समझ में आता है वह मैं बता रहा हूं -
""परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ।"" विभूति पाद का १६वां सूत्र है परिणाम त्रय संयमात् अतीत अनागत ज्ञानम् अब योगी भविष्य को भी जानता है भूत को भी जानता है अब आपके मन में यह प्रश्न आ रहा होगा कि कौन सी ऐसी विद्या है जो मैं भी अपने भविष्य को जान लूं  हर व्यक्ति अपने भविष्य को जानना चाहता है मेरी मृत्यु कैसे होगी कल क्या घटना घटने वाली है यह पता चल जाए बहुत अच्छा आवृत्ति जी भी इस बात में बड़ी रुचि लेती है तो यह हमसे कभी कोई पूछते रहती है रहती है कि हमें पता चल जाये कि कल क्या होगा तो बहुत खुशी मिलेगी.. हर व्यक्ति के अंदर चाहे वह साधना करते हो या ना करते हो भविष्य को जानने की जिज्ञासा रहती है और इसी कारण से समाज में एक पाखंड चल पड़ा है तो फलित ज्योतिष और लोग फलित ज्योतिष के नाम पर इमोशनल ब्लैकमेलिंग करते हैं और  इमोशनल ब्लैकमेलिंग हम लोग होते हैं । वह होता कुछ नहीं फलित मिथ्या है वह एक अवधारणा है उसमें कुछ सच्चाई नहीं है, ऋषि दयानंद ने इसका खंडन किया है।  हां गणित ज्योतिष सार्थक है। 
ज्योतिष एक आर्ष विषय का ग्रंथ हैं। तो अब भविष्य को जानने के लिए अतीत अनागत ज्ञानम् यदि अपना जानना चाहते हैं अपने परिजनों का जानना चाहते हैं भविष्य का ज्ञान भूत का ज्ञान वर्तमान को तो सबको पता होता है कि वर्तमान में हम कहां है क्या कर रहे हैं हमारी क्या पोजीशन है यह तो हमें पता होता है तो देखिए विचार करते हैं इस पर कैसे जानेंगे योगी लोग कैसे जानता है तो आया है १३ वें सूत्र में धर्म लक्षण अवस्था परिमाण व्याख्याता पीछे आया था धर्म परिणाम अवस्था परिणाम लक्षण परिणाम । तो अब परिणाम को समझते हैं तीन प्रकार के परिणाम होते हैं, आप ध्यान से सुनेंगे तो थोड़ी कुछ बात समझ में आएगी बहुत गहरा विषय है क्योंकि योगदर्शन है और बड़ा सूक्ष्म विषय है यहां पर परिणाम तीन होते धर्म परिणाम लक्षण परिणाम अवस्था परिणाम तो आप किसी भी विषय में आप उसके अतीत को जान सकते हैं कि यह किसी वस्तु जैसे पत्थर कितना पुराना है कितने दिन तक यह चलेगा इसके जो तत्ववेत्ता होते हैं गवेशक होते हैं पुराने से पुराने वस्तु का आकलन करते हैं, इसकी आयु कितनी पुरानी हो सकती है एक अनुमान से वह करते हैं उस पर कुछ अपनी उनकी पढ़ाई होती है । योग में क्या होता है इसको हम योगी की दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं तो तीन परिणाम को हम समझ लेते हैं । तीन परिणाम क्या है ?
धर्म लक्षण अवस्था । तीनों एक है लेकिन उसको अंतर करके समझेंगे -
धर्म परिणाम - स्वरूप में परिवर्तन होना यह धर्म परिणाम हैं ।और लक्षण परिणाम - स्वरूप जिस स्वरूप में है वह लक्षण परिणाम है । 
अवस्था परिणाम - धर्म और लक्षण के रूप में आने में जो बीच में समय लगता है उसको अवस्था या अवस्था परिणाम कहते हैं । अब इसको मैं स्पष्ट (क्लियर) करके समझाता हूं उदाहरण से समझ आए शायद आपको जैसे मिट्टी ले लीजिए मिट्टी का पिंड लीजिए लूथरा लीजिए मिट्टी का पिंड कुंभकार घड़ा बनाने वाला एक मिट्टी का पिंड लिया तो अब उसे मिट्टी का पिंड का धर्म क्या है धर्म परिणाम है तो धर्म अभी मिट्टी रूप ह वह और अब उसे धर्म को उसे मिट्टी रूपी धर्म को एक आकार (शेप ) दे दिया गया, माना अब वह घड़ा बन गया तो अब क्या हो गया प्रकट हो गया तो अब कौन सा लक्षण वाला हो गया घट धर्म घट लक्षण वाला हो गया उसको मिट्टी नहीं कहेंगे, अब क्या कहेंगे ? अब घड़ा कहेंगे  - क्यों कि मिट्टी में हम जल नहीं रख सकते घड़े में पानी रख सकते हैं। तो एक धर्म मिट्टी धर्म था अब घट धर्म में बदल गया जो बदल करके दूसरा रूप आया है तो वह लक्षण घड़ा घट लक्षण वाला हो गया तो घट धर्म से लक्षण परिणाम हो गया घट लक्षण वाला अब समझेंगे मिट्टी से घड़ा बनने में जो समय (टाइम) लगा जो प्रक्रियाएं लगी अवस्थाओं में परिवर्तन (चेंज) किया गया वह अवस्था परिणाम है ।  जैसे घड़ा बना 10 साल के बाद, उसमें जो टाइम लगा 10 साल बाद उसमें जो परिवर्तन आया (चैंनजेज आया) वह पुराना हो गया तो अब वह टूटने कि स्थिति में हैं ।

तो वह अब टूटने की स्थिति में है, टूट गया तो आप यह कह सकते हैं कि अब वह घड़ा नहीं रहा वह मिट्टी धर्म वाला होगा मिट्टी लक्षण वाला हो गया अब मैं इसको आपको समझाने का प्रयास कर रहा हूं कि शायद बात समझ में आ जाए खुल जाए बात है यह तीन परिणाम है धर्म परिणाम लक्षण परिणाम अवस्था परिणाम इन तीनों में एक-एक करके योगी संयम करता है अतीत अनागत और वर्तमान अब मिट्टी धर्म वर्तमान में था घड़ा भविष्य में आएगा तो आप भविष्य में जो घड़ा रूप बनेगा वह धर्म बनेगा तो घट जब बन गया भविष्य में मिट्टी से तो वह घट लक्षण वाला परिणाम हो गया और घड़ा से मिट्टी या मिट्टी से घड़ा बनने में जो टाइम पीरियड लगा उसमें जो चेंजेज हैं वह अवस्था परिणाम है ।
अवस्था में संयम करेगा धारणा ध्यान समाधि लगाएगा या फिर घट या मिट्टी स्वरूप में उसको संयम करेगा धारणा ध्यान समाधि लगाएगा यह घट में धारणा ध्यान समाधि लगाएगा तो उसमे अलग-अलग करके लक्षण में धर्म में और अवस्था में संयम करने से उस वस्तु का कि कितना पुराना है कितने दिन तक चलेगा योगी को ज्ञान हो जाता है । अपने शरीर के बारे में भी अपने चित्त के बारे में भी योगी को बोध हो जाता है हमारा शरीर कब तक चलेगा और हम आगे हमारे कितनी आयु और बीत गई कितनी आयु हमारी शेष है अपने जीवन में जान जाएंगे दूसरे जीवन में कोई वस्तु के बारे में भी जान सकते हैं इस प्रकार से भूत भविष्य का ज्ञान योगी करते हैं । फिर यहां पर एक आता हैं सूत्र - 

" शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्सङ्कर-
       स्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् । "
(योग दर्शन ३/१७) 

अब यहां पर एक बात और मैं समझाना चाहता हूं की योगी अपने मृत्यु के बारे में जान सकता है कि मेरी मृत्यु कब होगी और मृत्यु कब होगी इसके लिए कुछ चिन्ह भी प्रकाशित होता है 22वां सूत्र है - 
"सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म 
       तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ।" 
(योग दर्शन ३/२२) 
अभी जो भूत भविष्य का ज्ञान योगी को होता है धर्म परिणाम लक्षण परिणाम अवस्था परिणाम में संयम करने से तो आप इस आधार पर योगी अपने जीवन के कर्मों को ध्यान में जाकर समाधि में जाकर देखा है अब यह सूत्र आया पहले को सूत्र आगे में बोला था उसकी व्याख्या करने से पहले मेरे मन में आए किसकी व्याख्या करें जो उसकी संगति उसके साथ है की सोप क्रमम् निरुप क्रमम् च संयमात् इसको समझते हैं सोप क्रमम् कर्म योगी अपने कर्म जो कर्म व्यवस्थित है उसको सोप क्रमम् कहते हैं जो कर्म अनावशिष्ठित अव्यवस्थित है उसको निरुप क्रमम् कहते है ।जैसे अपने कपड़ा धोया कपड़े को धो करके अपने फैला करके धूप में डाल दिया प्रतिदिन हम नहाते हैं कपड़े धोते तो सोप क्रमम् कपड़े को हमने कैसे किया फैला करके धूप में टांग दिया और वह कपड़ा जल्दी सूख जाएगा सोप क्रमम् हो गया क्योंकि कपड़े के धागे और उसकी जो व्यवस्था है वह सोप क्रमम् में व्यवस्थित है उसमें धूप ठीक से लगेगा और वह सूख जाएगा गिला से सूखा हो जाएगा आपने कपड़े धोए और ऐसे लुंज-पुंज पिंड बनाकर के कपड़े का गोला बनाकर के रख दिया तो 2 दिन में भी कपड़ा नहीं सुखेगा वह हो गया निरुप क्रमम् । समझिएगा बात को तो अब जल्दी फल किसका मिला जो सोप क्रमम् में और निरुप क्रमम् जो देर से फल मिलेगा कपड़ा अव्यवस्थित है, जैसे जंगल में एक क्रम से तिनका सूखा हुआ घास एक दूसरे से टच किया हुआ लगा हुआ है एक चिनगारी एक माचिस की तिल्ली आपने कोई लिया और ऐसे जला करके उस पर रख दिया अब सोप क्रमम् है तो वह घास में तिनके में आग लग जाएगी और विकराल रूप धारण कर लेगा सब मिनटों में जल जाएगा लेकिन इस घास के गट्ठर को आप निरुप क्रमम् करके टाइट करके बिल्कुल गोला बना दीजिए गेंद बना दीजिए और फिर उसमें आग लगाया जाए , ये महर्षि वेदव्यास जी का भाष्य में उदाहरण आया है जो मैं बात बोल रहा हूँ, उस गोले में आग तो लगेगी पर जलानें में टाईम लगेगा, क्योंकि निरुप क्रमम् हैं। 
अब ठीक उसी प्रकार से आप व्यवस्था करें कि अपनी मृत्यु के बारे में अपरांत ज्ञान अर्थात मृत्यु का ज्ञान हमें कैसे होगा ? तो योगी अपने कृत कर्मों में संयम करता है वर्तमान जीवन के कर्मों में बाल्यावस्था से लेकर अभी तक हमने जो कर्म किया है उसमें से कितने कर्म सोप क्रमम् है और कितने कर्म निरुफ क्रमम् है उन कर्मों में सोप क्रमम् की संख्या कितनी है उसमें समाधि लगाएगा संयम करेगा धारणा ध्यान समाधि और निरूप क्रमम् जो कभी-कभी हुआ है व्यवस्थित नहीं हुआ है तो उसमें भी संयम करेगा उसके आधार पर, अपने कर्माशय के आधार पर योगी अपनी अपरांत मृत्यु के बारे में जान लेता है कि मैं इतने दिन के बाद और इतने समय में चला जाऊंगा शरीर मेरा छूट जाएगा अब आप कहेंगे इसमें कैसे घटाया जाता आप शरीर में अपने ऊहा से कुछ आपकी बात आपके बीच बात रख रहा हूं हमारे जीवन में एक व्यवस्थित क्रम होता है कोई व्यक्ति लगातार स्मोकिंग करता है सिगरेट पीता है चैन-स्मोकर है,  कोई व्यक्ति लगातार शराब पीता है आदत हो गई वह उसको तो वो शराब पीनालगातार बिना शराब रह नहीं सकता वो, बिना सिगरेट के रह नहीं सकता बिना व्यविचार किए हुए रह नहीं सकता, रूप रस गंध स्पर्श शब्द काम क्रोध लोभ मोह कोई डेली क्रोध करता है कोई डेली काम में लिप्त होता है तो अब जिस व्यक्ति कर्म कंटीन्यूअस है लगातार है बुरे कर्म जो हमारे शरीर को हानि पहुंचते है वह कर्म बहुत शीघ्र फल देगा क्योंकि मृत्यु जल्दी संनिकट आएगा यह सोप क्रमम् है ।
अब कोई व्यक्ति सिगरेट तो पीता है कभी पी लेता है ऐसे कभी नहीं पीना चाहिए शराब पी लेता है कभी पी लेता है डेली नहीं पीता । तो जो डेली पीता है उसका रिजल्ट जल्दी आयेगा और जो डेली नहीं पीता कभी कभी पीता है उसका रिजल्ट देर से आयेगा।  जो नहीं पीता उसका और देर से आयेगा। तो काम क्रोध लोभ मोह आदि जो हमारे जीवन में सोप क्रमम् का रूप ले लिया कंटीन्यूअस ले लिया है यदि उन कर्मों को हम संयम करके ध्यान जाकर के देखे तो अपनी मृत्यु का ज्ञान हो जाएगा कब मेरी मृत्यु इतने दिन के बाद होगी पक्का है  ये तो मैं बुरे कर्म का उदाहरण दे रहा हूं। अब योगी में तो बुरा कर्म होते नहीं कुछ अच्छे कर्म है सोप क्रमम् है जो भी वह कंटिन्यू होता है उसके आधार पर भी शरीर का सेल्स कितना डेट हुआ कितना हमारा बच्चा हुआ है कितना हमारे शरीर के आयु एक्सपायरी डेट कब होगा यह सब कर्म अच्छे कर्म में भी सोप क्रमम् निरुप क्रमम् होता है । मैं तो बुरे कर्म का उदाहरण इसलिए दे रहा हूं की बातें समझ में आ जाए आसानी से, बाकी योगी के जीवन में बुरे कर्म नहीं होते । तो  बुरे कर्म या अच्छे कर्म कुछ ऐसे हमारे शरीर से रिलेटेड होते हैं कर्माशय में जो सोप क्रमम् लगातार होता है, कोई कभी-कभी होता है अब योगी की बात करते हैं हम मनुष्य साधारण मनुष्य अपने काम क्रोध लोभ मोह पर नियंत्रण नहीं कर पाते कितने बार इस शरीर को हम टॉर्चर करते हैं अग्नि के जैसे बिजली का शॉर्ट सर्किट लगते हैं इसको इसके सेल्स हमारा डेड होता है अपनी आयु कम हो रही है मृत्यु ओर जा रहे हैं । योगी काम उसके जीवन में समाप्त हो गया क्षीण कर दिया लोभ है नहीं क्रोध है नहीं वह ध्यान में बैठा प्राण वायु को रोककर संयम करके 1 मिनट में 2 मिनट में एक से दो बार प्राण लेता है वह भी नहीं लेता लंबे समय तक प्राणायाम कर रखा है।
हम लोग काम क्रोध में प्रतिदिन किया जाता है लिप्त है खान पान बिगड़ रहा हैं, भाग रहे हैं  तो हमारी आयु कम होगी और योगी की आयु लंबी होगी ।
तो फिर भी योगी अपने मृत्यु के बारे में जान लेता है। 

मैंने थोड़ा विस्तार से बताने का प्रयास किया है । यहां पर एक शब्द आया है वो है "अरिष्टभ्य वा "अरिष्ट क्या है? 
ये तो योगी अपनी मुत्यु के बारे में जानेगा जो साधक हैं, धारणा ध्यान समाधि लगाया है । लेकिन साधारण मनुष्य को भी मृत्यु का ज्ञान हो जाता है महर्षि पतंजलि को नमन करिए कि उन्होंने कुछ अच्छी बातें हमारे लिए लिख दिए की साधारण मनुष्य को अपने मृत्यु का ध्यान कैसे होगा अरिष्टभ्योवा = अरिष्ट का चिन्ह । महर्षि दयानंद जी का एक पुस्तक है योगी का आत्म चरित्र अज्ञात जीवनी पहले बोल करके छपी थी एक पुस्तक अभी योगी के आत्म चरित्र नाम से छपा है अंग्रेजी में अब ट्रांसलेट हो गया है योगी माइंड करके तो इस प्रकार से कई नाम से वह पुस्तक छपते रहे और कई लोगों ने उसको विवादित पुस्तक भी कहा ।
उसमे मैंने पढ़ा लगभग 100 प्रकार के अरिष्ट का वर्णन महर्षि दयानंद जी ने किया है की मृत्यु का चिन्ह,  की मृत्यु का समझ इससे बन सकता है जिसमें कुछ का उन्होंने ऋषि ने दिया तो उसमें से दो-चार मुझे याद भी है और यहां व्यास जी भी लिख रहे हैं की व्यास जी इस सूत्र का भाष्य करते हुए कहा कि अरिष्ट का पहचान अर्थात अरिष्ट के द्वारा अपरांत मृत्यु का बोध हम कर सकते कान में उंगली डाल लेते और कान में उंगली डालने के बाद यदि सनसनाहट की आवाज आना बंद हो जाए तो समझिए मृत्यु बड़ी सन्निकट है और महर्षि वेदव्यास जी ने भी इसमें लिखा है इसी सूत्र पर की आंख को दबाने से जो 2 - 4 चंद्रमाएं बन जाते हैं रोशनी डिवाइड हो करके दिखती है वह ना दिखाना तो मृत्यु सन्ननिकट है और इससे और भी संबंधित है कि जैसे  जाग्रत अवस्था में अपने पितरों को देखना जब बूढ़े अवस्था में जब हम चले जाते कोई रोग ऐसा आ जाता है तो कहते अपने पितरों आदि को देखने की देखो हमारे दादा परदादा यह आ रहे हैं और वह हमें बुला रहे हैं तो लोग पूछते हैं कहां है अपने पितरों को देखना और वह मुझे बुला रहे हैं अरिष्ट का चिन्ह है और स्नान करके सीने का पानी शीघ्र सुख जाए तो वह अरिष्ट का चिन्ह है शीघ्र मृत्यु का चिन्ह है ।
इस प्रकार से कुछ अरिष्टों का जो पहचान है उसे साधक लोगों ने किया है और उसकी चर्चित चर्चा योगी के आत्मचरित्र पुस्तक में भी आया है । यहां व्यास जी ने भी दो तीन बातों की आधिभौतिक आधिदैविक और आध्यात्मिक अरिष्टों के नाम से किया है जिसको हम जान सकते हैं तो इस सूत्र पर चर्चा करते हुए की योगी अपने अपरांत मृत्यु के बारे में जान लेता है सोप क्रमम् और निरुप क्रमम् कर्मों में संयम करने से ।
अब यहां पर एक और सिद्धियों की बात आती है -
"शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्सङ्कर-
       स्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ।"  
( योगदर्शन ३/१७ ) 

अब इसको समझते हैं इस सूत्र में ऋषि ने क्या कहा कहते हैं कि शब्द अर्थ और प्रत्यय इन तीनों में इतरेतरअध्यासा  यह तीनों एक सा संकरस्य मिला हुआ रहता है मिश्रित रहता है एक दूसरे से जुड़ा हुआ रहता है। शब्द अर्थ और ज्ञान ।
अब उदाहरण समझिए - गौ शब्द हमने कहा, "गौ" शब्द है और गौ शब्द का अर्थ गौशाला में बंधे हुए गोकुमल युक्त  तो जो गाय हैं, चार पैर वाली गौशाला में बंधी हुई है, वह अर्थ हैं ।
गौ शब्द है और  जो पिंड गौशाला में बंधी हुई गाय है वो अर्थ है,  और गौ शब्द हमारे बुद्धि में जो समझ बना हुआ है उसी को वह कहा जाता है वह प्रत्यय है वह ज्ञान है,  तो महर्षि पतंजलि कहना चाहते हैं कि शब्द गौ शब्द और गौ शब्द का अर्थ गाय और उसका ज्ञान या समझ यह तीनों संकरस्य मिश्रित इतरेतरअध्यासा एक दूसरे से मिक्स भाव में रहता है इस कारण से हम किसी भी शब्दों के अर्थ को नहीं जान पाते अलग-अलग नहीं कर पाते अलग-अलग बोध नहीं होता है । जैसे  तोता ने बोला कौवे ने बोला और किसी पक्षी पशु ने गाय ने कुछ आवाज लगाई वह भी एक शब्द है उस शब्द का भी एक अर्थ होता है उसका एक समझ ज्ञान भी होता है तो योगी शब्द सुना उसे शब्द को अलग किया उस शब्द के अर्थ को अलग करके संयम किया उसके ज्ञान में अलग-अलग ज्ञान में अलग संयम अर्थ में अलग संयम और शब्दों में अलग संयम धारणा ध्यान समाधि लगाएंगे तो उन शब्दों का अर्थ सर्वभूतरुतज्ञानम् की गौ ( गाय ) क्या कह रही है यह पक्षी क्या कह रहा है यह अननोन कोई भी पशु-पक्षी प्राणी किसी भी भाषा में बोले उसका वह ज्ञान कर सकता है उसको वह समझ सकता है समाधि में जाकर के योगी किसी भी शब्दों का अर्थ पशु पक्षियानम सर्वभूतरुतज्ञानम् सभी भूत प्राणियों के शब्द जो बोले गए उसके अर्थ शब्द प्रत्यय में संयम करने से उसका ज्ञान योगी को हो जाता है । यह बात यहां पर ऋषि कह रहे हैं यह बहुत बड़ी बात है। साधारण लोग हम लोग अनुमान लगा सकते कि कौवा क्या बोल रहा है यह तोता क्या बोल रहा है गाय  क्या बोल रही है तो पशु पक्षियों की आवाज को भी योगी जान लेता है उसके अर्थों को समझ लेता है इस प्रकार से बहुत प्रकार के सिद्धियां यहां पर दी गई है तो समय अभाव है आदरणीय डॉक्टर व्यास नंदन शास्त्री जी भी हमारे बीच दिख रहे आपका अभिनंदन है सादर नमस्ते तो हम इनका भी विचार सुनेंगे आदरणीय शास्त्री जी का।
तो यहां पर है सूत्र है 
"प्रातिभाद् वा सर्वम् । " (३/३३)
और 
"मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्। " (३/३२)
मूर्धा ज्योति दर्शन करने से सिद्ध पुरुषों का दर्शन होता है और कहते हैं सूर्य में संयम करने से भुवनों का ज्ञान होता है भुवन ज्ञानम सूर्य में संयम करने से संसार का ज्ञान कर लेगा अब है प्रातिभाद् वा सर्वम् ।  अर्थात प्रतिभा जब उत्पन्न होती है अपनी प्रतिभा रूपी सामर्थ्य को योगी उत्पन्न करता है सब कुछ जान लेता है तो इसमें कोई शक नहीं है तो सिद्धियों की बात करें तो बहुत विस्मयता होती है आश्चर्य होता है कि क्या हैं यह सब ?   जल पर पानी पर पैदल योगी चल सकता है कांटों पर पैदल चल सकता है कांटे नहीं चुभेंगे जल में स्पर्श नहीं करेगा किचड़ स्पर्श नहीं होगा और यह सारी बातें या सिद्धियां आई है लेकिन हम कुछ लोग ऐसा इन सिद्धियों के विषय को सुनना नहीं पसंद करते कि यह चमत्कार है जी यह चमत्कार तो अपने वैदिक परंपरा में नहीं है लेकिन सिद्धियां हैं और इन सिद्धियों की चर्चा ऋषियों ने की है और यह सिद्धियां साधारण रूप में समान रूप में एक सिद्धि है लेकिन साधना मार्ग में एक बाधक भी है, उपसर्ग है। इसलिए ऋषि ने कहा इसको समझ करके प्रयोग करें।
तो कैवल्य पाद में पहला सूत्र आया कैवल्य पाद को लेकर मैं समापन की ओर चल रहा हूं - 
"जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः।"  (४/१)
पांच प्रकार की बातें यहां पर है - जन्म औषधि मंत्र तप और समाधि से जो उत्पन्न होती है सिद्धियां , सिद्धियां बहुवचन की सिद्धियां जो होती है सफलताएं सिद्धियां जो होती है जीवन में जन्म से भी होती है कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं पिछले के जीवनके पुण्य तपस्या साधना से उनको जन्म से ही सिद्धि  होती है । और औषधि से भी सिद्धि होती हैं औषधि खाकर अपनी वाणी को अमोघ कर लेते हैं हमारे आदरणीय आचार्य सनत कुमार जी कहते हैं औषधीयों पर काम कर रहे की 300 वर्ष तक हम जी सकते हैं औषधीयों का सेवन करके उस पर काम भी कर रहे हैं की औषधियां से भी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती है वाणी को अमोघ बनाया जा सकता आयु को लंबी किया जा सकता है बहुत प्रकार की चीजों को प्राप्त कर सकते हैं मंत्र जप गायत्री मंत्र या ओम् प्रणव जप से भी सिद्धियों को प्राप्त किया जा सकता है । और तप,  तप है द्वंद सहकर के कठोर तपस्या करके आप सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं, सिद्ध पुरुष बन सकते हैं और अंत में है समाधि समाधि जो अष्टांग योग है यम नियम आदि का पालन करते हुए समाधि को प्राप्त करते हैं तो उससे भी सिद्धियां त्रयं एकम् संयमात् तो संयम करने से धारणा ध्यान समाधि लगाने से सिद्धियां आती है तो महर्षि पतंजलि ने इस कैवल्य पाद के प्रथम सूत्र में यह पांच प्रकार से सिद्धियां होती हैं जिस बात की चर्चा कर दी है अब उसमें हमें कौन सा अनुकूल है जन्म से तो हमें है नहीं सिद्धि वह औषधि के बारे में हमें उतना समझ है नहीं फिर मंत्र पाठ यदि विधिवत करें तो उससे , कुछ तपस्या से लाभ मिल जाए तपस्या से मंत्र से समाधि से तीन ऑप्शन हमारे पास है जो -  राज राम ..
वर्तमान जीवन में अपना करके हम सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं तो अंतिम सूत्र है -
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं
       स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति । (४/३४)

योग दर्शन का अंतिम सूत्र अब सिद्धियां मोक्ष प्राप्ति करायेगी क्या ?  नहीं कराएगी । सामान्य दशा में सिद्धि कहलाती है लेकिन योग मार्ग पर समाधि दशा में जाते समय यह उपसर्ग है बाधक है कि यह हमें बाधा उत्पन्न करती हैं ।लोकैषणा वित्तैषणा पुत्रैषणा में ला करके पटक देता है यह सिद्धियां ।
इसलिए महर्षि दयानंद को हम ऐसा समझते हैं कि सैकड़ो प्रकार की सिद्धियां उनको थी अनेक प्रकार की ऐसा हम कह सकते हैं लेकिन वह दिखाते नहीं थे किसी को कहते नहीं थे आवश्यकता पड़ने पर किसी के परोपकारार्थ उसका प्रयोग योगी करते हैं ऋषि दयानंद जी ने भी किया हैं ।
तो सिद्धियां यह बाधक है तो अब सिद्धियों को हम अपने सेवा के लिए अपने आवश्यकता के लिए दूसरी परोपकार के लिए प्रयोग कर सकते हैं ।  बिना सिद्धियों के भी हम मुक्ति में जा सकते हैं सिद्धि प्राप्त करना कोई जरूरी नहीं है सिद्धियों के लिए अलग से पुरुषार्थ करना पड़ता हैं पर योगी के पास ये अपने आप आ जाती है प्रतिभा से ।
तो अब कहते हैं यहां पर पुरुषार्थ क्या है ?
महर्षि कपिल ने भी कहा कि
अथ त्रिवृति दुखम अत्यंत अनुवर्ती अत्यंत पुरुषार्थ:
तीन प्रकार के दुखों से छूटना अत्यंत पुरुषार्थ है पुरुषार्थ शून्यानाम हम पुरुषार्थ करते हैं बहुत तरह के पुरुषार्थ करते हैं लेकिन हमारा पुरुषार्थ शून्य नहीं होता है एक के बाद एक कोई न कोई समस्या बनी रहती है। तीनों प्रकार के दुखों से छूट जाना पुरुषार्थ की शून्यता आ जाएगी पुरुषार्थ शून्यानाम गुणानाम प्रतिप्रसव: अब हमारा कोई पुरुषार्थ नहीं बचा तीनों दुखों से हट गए अब यह गुण जो है सतोगुण रजोगुण तमोगुण यह प्रतिप्रसव अपने कारण में चला गया हमारे लिए नष्ट हो गया नष्टम प्रति अनष्टम हमारे योगी के लिए जो योगी पुरुषार्थ शून्य हो गया तीन प्रकार के दुखों से छुटकारा पा लिया अब कोई पुरुषार्थ उसके जीवन में नहीं रहा उनके लिए प्रकृति अपने कारण में चली गई प्रसव हो गई लेकिन अन्य आत्मा केलिए जो अभी मुक्ति प्राप्त नहीं किया उनके लिए उपादेय है उनके लिए तो कारण है उनके लिए तो साधन है तो कहा " कैवल्य स्वरूप प्रतिष्ठा " अब स्वरूप में प्रतिष्ठित होना चित्ति शक्ति या चेतन स्वरूप में जाना यह कैवल्य है अपने स्वरूप में जाना या परमात्मा के स्वरूप में अवस्थित होना दोनों बातें सन्निहित है योग दर्शन के तीसरें सूत्र पर जाइए
तदा दष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् । (१/३).

तो तीसरा सूत्र कहा के अपने स्वरूप प्रतिष्ठा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना कि मैं आत्मा हूं और अपने स्वरूप में चले गए तो परमात्मा का दर्शन हो जाएगा परमात्मा भी अपना स्वरूप दिखा देता है जो मैं यह हूं तुम अपना स्वरूप में आ जाओ मैं अपना स्वरूप तुम्हें दिखा दूंगा तो अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना हमारा कर्तव्य है हमारा पुरुषार्थ है हम परमात्मा के स्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं हो सकते परमात्मा अपनी कृपा से अपने स्वरूप को दिखाता है अपने स्वरूप को प्रदान करता हैं आनंद को देता है ।
तो ...
      स्वरूप प्रतिष्ठा ही कैवल्य है अपने स्वरूप में चले जाए यह डेडलाइन है यह होमवर्क हमने पूरा कर लिया हम मुक्ति को प्राप्त कर लेंगे परमात्मा हमें उस नोबेल प्राइज जो परम आनंद है मुक्ति अपना स्वरूप प्रदान कर देता है । यही चित्ति शक्ति है।
     यह योग दर्शन आज हमने गत सात दिनों तक आपके बीच में संक्षेप से कुछ चर्चाएं की कुछ मुख्य मुख्य बातों को कहने का प्रयास किया ।  धन्यवाद  ।
                          ( समापन )
योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।









योगदर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (६)


                           ॥ॐ॥
                          योग दर्शन
   योग दर्शन पर पष्ठम् दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
     ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
      मंगलवार मार्गशीर्ष कृ ११विक्रम संवत २०८१ 
                26 नवंबर 2024 ईस्वी
        (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )

आज हम सब षष्ठम दिन के योग दर्शन पर चर्चा करें 
इससे पूर्व आचार्य आवृत्ति जी का भजन 

ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए॥ 

संसार में ही दिन रात आसक्त रहकर, दिन रात अपनी ही मतलब की कहकर ।
सुख के लिए लाख दुःखों को सहकर, ये दिन अब तक यूं ही बिताये ।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए।
ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं‌ ॥
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 
ऐसा जगा दो फिर सो न जाऊं अपने को निष्काम प्रेमी बनाऊं।
ऐसा जगा दो फिर सो ना जाऊं अपने को निष्काम प्रेमी बनाऊं ।
तुम को ही चाहूं तुम को ही पाऊं, संसार का भय कुछ रह न जाये ।
तुम को ही चाहूं तुम को ही पाऊं, संसार का भय कुछ रह न जाये ।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं‌ ॥
हे नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 

वो योग्यता दो सद्कर्म कर लूं अपने हृदय में सद्भाव भर लूं
वो योग्यता दो सद्कर्म कर लूं अपने हृदय में सद्भाव भर लूं ।
नर तन हैं साधन भव सिंधु तर लूं ऐसा समय फिर आये न आये।
नर तन हैं साधन भव सिंधु तर लूं ऐसा समय फिर आये न आये।
हे नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। यह मन न जाने क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं।
है यह नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 

                     नमस्ते धन्यवाद।
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आइए आरंभ करते हैं।  मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे - 
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
        तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
              ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


सभी श्रेष्ठ मनीषी महान पुरुषों महानुभावों को नमन ।
योग दर्शन की चर्चा में हम यहां तक आए थे की हेय दुख
हेय का मतलब दुख और दुख का कारण और दूसरा था सुख और सुख का उपाय यहां जो हान शब्द आया हैं -
 योग दर्शन में हेय, हेयहेतु हान हानोपाय 
हान हानोपाय हेय हेतु  । तो यह जो हान है जिसको सुख कहा गया हैं यह परमात्मा का सुख है हान आनंद ।
सांसारिक सुख को योग दर्शनकार ने दुख की कोटी में रखा है । संसार में सुख नहीं है, वैसे सांसारिक दृष्टि से विचार करेंगे तो संसार में सुख है, क्योंकि प्रकृति के तीन अवस्थाएं हैं तीन गुण हैं सतोगुण रजोगुण तमोगुण। इन तीन गुणों के आधार पर हम विचार करेंगे तो सुख की प्रतिती होगी और इन तीन गुणों के बारे में महर्षि पतंजलि में यहां पर कहा हैं -
प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम्।  ( योग दर्शन २/१८)
तो इस दृश्य इस जगत को इस संसार को इस रूप में ऋषि कहते हैं कि प्रकाश, प्रकाश का मतलब है ज्ञान प्रकाश का मतलब रोशनी आप भी सब जानते हैं । तो वह सतोगुण जो होते हैं वह प्रकाशशील है । स्वभाव सत्व का कैसा है प्रकाश।  तो जब हमारे चित्त में सतोगुण प्रधान होता है तो हम सत्य सत्यता यथार्थ को जानते हैं । प्रकाशित होता है सब बातें सही कौन है ? गलत कौन है ? यह हमें प्रतीत होने लगता है ।और फिर कहा क्रिया, रजोगुण का क्रिया है, की राजोगुण यदि बढ़ा हुआ है चित्त में जीवन में तो व्यक्ति बड़े चंचल होते हैं क्रियाशील होते हैं बहुत एक्टिव होते हैं । और रजोगुण दुःख भी प्रदान करता है । और सतोगुण सुख देता हैं । दुख देता है रजोगुण चंचलता को लाता है क्रियाशीलता को लाता है खूब व्यक्ति भागता है दो चार दस प्रकार के बिजनेस भी करेंगे कि भागेंगे भी राजनीति में भी जाएंगे 
वहां जाएंगे बहुत .. तो कहते कि इसमें रजोगुण उभरा हुआ है । और सतोगुण वाले व्यक्ति होते हैं वह शांत चित्त होकर के एकांत में रहना पसंद करते हैं विवेक भाव से किसी कार्य को करते हैं इस कार्य को करने में क्या लाभ है क्या हानि हैं ?और हमें क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ? इन सारी बातों का प्रकाश उसके मन में रहता है । 
लेकिन तमोगुण वाले व्यक्ति - तो तमोगुण का जो फल है वह स्थिति वाला है मूढ़ अवस्था । "प्रकाश क्रिया स्थिति"  स्थिति का मतलब यहां पर पड़े रहना । तो तमोगुण यदि बढ़ा हुआ है व्यक्ति के अंदर तो किंकर्तव्यविमूढ़म् वह क्या करें ? क्या ना करें ? उसको वह समझ नहीं रहता उसके पास मूढ़ अवस्था में मूर्छित अवस्था जैसा बना रहता है तो ना कुछ करने की इच्छा है ना कुछ करेगा । तो इस प्रकार से यह तमोगुण की बात यहां पर आई है । फिर कहा यह जो तीनों गुण मिलकर के "भूत इंद्रियात्मक" भूत क्या है ? इन तीनों गुणों से ही यह सृष्टि की रचना हुई तो यह जो पंचमहाभूत है तो यह भी त्रिगुणात्मक है और जो इंद्रियां है, इंद्रियां हमारी यह भी त्रिगुणात्मक हैं। लेकिन विचार करके देखेंगे तो यह संसार जो है तमोगुण प्रधान है भूत । अब हम थोड़ा सा सांख्य दर्शन में ले चलेंगे आपको तो सांख्य दर्शनकार ने यहां पर क्या कहा की
  सत् रज तम साम साम्यवस्था प्रकृति:
प्रकृतय महान महत्व अहंकारों अहंकारत पंचतत्व मात्राणि उभय इंद्रियं स्थूलभूतानि पुरुषेरिति पंच - त्रिगुणां ..  सूत्र के आधार पर अब सत् रज तम साम यहां पर आप देखेंगे तो क्योंकि प्रकृति की चर्चा आई तो सत्व रज तम तीनों की जो साम्यावस्था होती है इसको हम प्रकृति कहते हैं, प्रकृति में समता होती हैं । मूल कारण में जो आंख का विषय नहीं बनेगा और जब वह प्रकृति निर्माण कार्य के रूप में आगे बढ़ती है परमात्मा की शक्ति से परमात्मा उसको जब आगे बढ़ता डेवलपमेंट करता है तो वहां पर वै-साम्यावस्था आती है साम्यावस्था नहीं रहती है । इसको समझिए की प्रकृति के निर्माण में जब प्रकृति सम भाव में रहेगा अपने-अपने स्वरूप में सतोगुण तमोगुण रहेगा तो वह प्रलय की स्थिति होगी मूल कारण होगा और सृष्टि निर्माण जब आरंभ होता है तो परमात्मा की शक्ति उसमें काम करती है और वह वैसमव्य  अवस्था में आ जाता है वैसमव्य का मतलब विक्षोभ ।
जैसे नदी में एक पत्थर फेंके तो देखिये पानी में लहरें उठती है विक्षोभ होता है उथल-पुथल होता है । तो सत्व रज तम  में जब उथल-पुथल होता है परमात्मा जब उसको मिक्स करता है कम ज्यादा करके निर्माण करता है तो फिर सृष्टि बनना आरंभ हो जाता है । तो पहला स्टेप जब बनता है पहले कार्य जो है वह सांख्य दर्शन के आधार पर क्योंकि यहां पर भूत और इंद्रिय शब्द आया है उसकी व्याख्या करने के लिए मैं वहां पर सांख्य दर्शन में गया उसको समझते हुए आज को हम समझेंगे तो पहले कार्य जो बनता है उसकी मह तत्व कहते हैं । क्या कहते हैं ? महतत्व और महतत्व पहला सृष्टि का कार्य है उसको बुद्धि तत्व भी कहते हैं।
बुद्धि इसी महतत्व के द्वारा हम आत्मा सत्या-सत्य का निर्णय कर पाते हैं । तो सत्या-सत्य निर्णय करने का जो इंस्ट्रूमेंट है साधन है उसे महतत्व कहते है वह बुद्धि तत्व है और बुद्धि से महतत्व से सृष्टि जब और आगे बढ़ी अहंकार बन गया। अहंकार.. फिर इसको अहंकार को दो प्रकार से देखेंगे फिर यह चर्चा जब विषय बढ़ जाएगा,क्योंकि विषय को हम यहां योग दर्शन पर केंद्रित करना चाहते हैं ।
अहंकार एक पदार्थ है अहंकार एक सृष्टि का कार्य है अहंकार से व्यक्ति जो अपना सत्ता का बोध कराता है अपने आत्मा का बोध करता है अपने कर्तव्य का बोध करता है ।
अहंकारत पंचतत्व मात्राणि ..तो अहंकार से दो विभाग बन गये इसको समझिए ..
अहंकार से दो विभाग बना अहंकार में सत्व गुण की प्रधानता से इंद्रियों का निर्माण हुआ और इंद्रियां कितने हैं? तो इंद्रियां 10 इंद्रियां और एक मन इंद्रियों है और ये 11 हैं ।
इंद्रियों का निर्माण सत्व अहंकार से हुआ और सत्व अहंकार से परमात्मा ने इंद्रियों को बनाया है तो विचार करके देखिए यह जो इंद्रियां हमारी है सात्विक है मन सात्विक हैं, मन का जो स्वरूप है सतोगुण प्रधान है । इंद्रियों का जो सामर्थ्य है वह सत्व प्रधान है । लेकिन आपके मन में प्रश्न आ गया होगा की मन चंचल होता है मन को रोके भी नहीं रुकता ।
तो मन सतोगुण कैसे माना जाए तो आप सोचेंगे कि मन को चंचल करने के लिए जो रजोगुण उसमें उभरा है उसका कारण हमारा आहार है, हमारा व्यवहार है, हमारी आदतें हैं, बहुत सारे ऐसी आदतें ऐसा आहार ऐसा व्यवहार जो मन को जीवन को रजोगुण - तमोगुण से भर देता है । तो अब मन में रजोगुण प्रधान हो गया या तमोगुण प्रधान हो गया उसका कारण हम मनुष्य हम आत्मा हैं कि हमारा खान-पान कैसा है व्यवहार कैसा है । यदि आप मन को अपने स्वरूप में रहने देना चाहते हैं की मन को जैसा परमात्मा ने डिजाइन किया है इंद्रियों को जैसा डिजाइन किया है निर्माण किया है उसको हम छेड़छाड़ ना करें तो आपको उसके अनुरुप सतोगुण के अनुसार यदि आहार आदि व्यवहार करते हैं तो मन इंद्रियों अपने स्वरूप में रहती है नहीं तो अपने स्वरूप को छोड़ देती है । तो यहां पर इंद्रियां शब्द पढ़ा हुआ है योग दर्शन में तो इंद्रियां सातोगुण है और उसमें मन भी एक इंद्रिय है वह आंतरिक इंद्रिय उभय इंद्रिय है । मन को क्या कहा "उभय इंद्रिय" क्यों कहा ? आप सायंकाल और प्रातःकाल जो हवन करते हैं दैनिक उसके अलग-अलग मंत्र हैं लेकिन आठ मंत्र उभय कालीन मंत्र उसको आप सब जानते हैं कि वह प्रातः कालीन वाले मंत्र के साथ भी जुड़ते है और सांयकालीन मंत्रों के साथ भी वही मंत्र जुड़ते है इसलिए वह उभय-कालीन हैं , वह अलग नहीं है, सेम है । तो मन जो है वह उभय इंद्रिय इसलिए मन को कहा जाता है की मन जो है ज्ञान-इंद्रियों के साथ भी जुड़ता है और कर्म-इंद्रियों के साथ भी मन जुड़ जाता है इसलिए मन का नाम उभय इंद्रिय है और जिस जिस इंद्रिय के साथ मन जुड़ेगा वही इंद्रिय काम करेगी ।
मन का स्वभाव है मन का धर्म है कि एक बार में एक ही काम मन करता है दो काम नहीं करेगा । तो मन जिस इंद्रिय के साथ जुड़ता है वह इंद्रिय एक्टिव होती है वह विषय को ग्रहण कर पाती है और जिसके साथ मन नहीं जुड़ेगा वह इंद्रिय ग्रहण नहीं करेगी विषय को । तो अब इस पर प्रश्नआएगा की मन तो एक बार में कितने काम हम कर लेते हैं कितने इंद्रियों से काम कर लेते हैं तो यह विषय आप सब जानते हैं कि मन इतना सूक्ष्म है इतना गतिमान है इतना पावरफुल है कि उसके अंदर इतना सामर्थ्य है कि वह बहुत कम समय में अपने कई इंद्रियों को प्रयोग कर सकता हैं।
और हमें लगता है कि एक साथ वह कई पर कार्य कर रहा है, लेकिन उसमें क्रमभेद हैं । उसमें क्रम भेद हैं जैसे हाथ में आप पांच बॉल उछालें अभ्यास हो तो पांचों बॉल्स को आप गिरने नहीं देंगे इतनी तेज गति से आपका अभ्यास है कि आप क्रम से एक के बाद एक पांचों गैंदो को क्रम से पकड़ कर उछाल देते हैं और गिरने नहीं देते हैं तो मन का इतना सामर्थ्य है कि वह क्रम से होने दें रहा है लेकिन हमें लगता है एक साथ हो रहा हैं । पंखा जब घर में चलाते हैं तो पंखुड़ियां तीन या चार होती है लेकिन जब वह घूमते हुए गति पकड़ लेती है तो लगता है एक ही हैं, वो तीन या चार नहीं दिखाई देती तो मन जब स्पीड में काम करता है तो हम साधारण मनुष्यों को ऐसा प्रतीत होता है कि मन एक साथ कई कामों को कर रहा है, लेकिन वो क्रम से हो रहा है वो क्रम इतना फास्ट है कि लगता है मन सबके साथ जुड़ रहा है।
तो इंद्रियां मन यह सात्विक है परमात्मा ने सात्विक बनाया है, इसको सात्विक ही रहने देना चाहिए और वह यदि हम व्यवहार आहार सात्विक करेंगे तो मन सात्विक रहेगा ।
फिर कहा "भूत और इंद्रियां"  तो भूत क्या है ?  भूत का निर्माण जो पंच महाभूत हैं अग्नि वायु जल आकाश पृथ्वी की यह पांचो महाभूत तमस अहंकार से बनाएं । क्योंकि पहले सूक्ष्म भूत है रुप रस गंध स्पर्श शब्द, इससे फिर पंचमहाभूत बना है अग्नि वायु जल आकाश पृथ्वी ।
तो यह तमस अहंकार से इसकी उत्पत्ति हुई तो यह संसार तमोगुण प्रधान और इंद्रियां सत्गुण प्रधान है ।
अब कहेंगे तो रजोगुण प्रधान क्या है ? तो रजोगुण जिसके साथ जुड़ जाए । तमोगुण में रजोगुण चला जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । सतोगुण में रजोगुण चला जाए तो प्रभावित कर देता है अर्थात चंचल कर देता है ।
तो इस प्रकार से सृष्टि के बारे में थोड़ा सा हमने चर्चा आपके बीच में थोड़ी रखी। 

तो ऋषि कहते हैं महर्षि पतंजलि कि - भोग अपवर्ग दृश्य..
  आप के मन में प्रश्न आ रहा होगा कि परमात्मा में संसार बनाया इंद्रियां बनाई और यह सब कुछ दिया । पिंड और ब्रह्मांड । यह क्यों बनाया ? कई लोगों के मन में ऐसा प्रश्न आता है कि परमात्मा ने संसार बना करके हमको दुख में डाल दिया संसार नहीं बनता तो हम बढ़िया से पड़े रहते आत्मा अपना मुर्छित अवस्था में रहे, सोए हुए रहे, जैसे रहे इतना घर बनाओ, धन कमाओ, भोजन पकाओ, रोज भोजन करो यह फिर बुढ़ापा रोग इतना दुख है तो यह क्यों परमात्मा ने आत्मा को झंझट में डाल दिया ? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि यदि एक व्यक्ति मुर्छित अवस्था में एक आत्मा पड़ी हो तो वह कोई मुर्छित अवस्था में पड़ा रहना नहीं चाहता है । सभी अपने आप को जानना चाहते हैं, संसार को देखना चाहते है या अपने स्वरूप को जानना चाहते है प्रकाश में रहना चाहते हैं अंधकार में पड़ना नहीं चाहते है रात्रि कोई पसंद नहीं करता है रात्रि कितना ही सुखद क्यों ना हो किसी को अच्छा क्यों नहीं लगता हो लेकिन रात्रि जो है वह सुख कारक नहीं होता दिन शुभ कारक होता जहां प्रकाश और जहां अंधकार है वह तो दुख कारक होता है । तो आत्मा यदि मूर्छित अवस्था में पड़ी रहती तो ना तो आत्मा का प्रयोजन सिद्ध होता कुछ जान पाती और परमात्मा का ज्ञान परमात्मा का सामर्थ्य उसका भी कोई प्रयोजन नहीं रहता क्योंकि परमात्मा का जो सामर्थ्य है शक्ति है परमात्मा का जो ज्ञान है परमात्मा का क्रिया-बल है यह सब परोपकार के लिए है, दूसरे के हित के लिए है।  तो परमात्मा ने कल्याण की भावना से आत्मा के कल्याण हो जाए तो सृष्टि निर्माण कर दिया की आत्मा मुर्छित हैं, सोयी हुई है, समर्थ तो है लेकिन वह चल नहीं सकती है, देख नहीं सकती है, तो चलो हम इसके लिए कुछ हेल्प करते हैं सहायता करते हैं - तो परमात्मा ने सृष्टि बना करके आत्मा को दे दिया अब आत्मा के पास जैसे सृष्टि को जोड़ा अब आत्मा चलने लगी दौड़ने लगी बोलने लगी कि देखने लगी और वेद आदि पढ़ करके अपने को समझने लग गई कि मैं कौन हूं परमात्मा कौन है यदि मूर्छित अवस्था में आत्मा रहती है सृष्टि निर्माण नहीं होता इंद्रियां हमें प्राप्त नहीं होती, संसार नहीं होता तो अपने को तो नहीं जानते परमात्मा को भी नहीं जानते। परमात्मा का कितना बड़ा आनंद है " मोक्ष " उसको भी नहीं जान पाते।
परमात्मा करुणानिधान है तो उन्होंने यह इंद्रियां दी यह शरीर और संसार बना कर दिया कि तुम मुर्छित मत रहो मेरे आनंद को भोगों । स्वछंद होकर निश्चिंत हो कर जहां जाना है घूमों 
३१ नील ४० खरब १० अरब वर्ष तक ये परमात्मा की कितनी बड़ी कृपा है उपकार है आत्माओं पर मोक्ष प्राप्ति के लिए। तो संसार क्यों बनाया परमात्मा ने ? भोग अपवर्ग दृश्यम् .. अब यह मैं नहीं कह रहा हूं यह महर्षि पतंजलि कह रहे हैं कि भोग और अपवर्ग के लिए परमात्मा ने इस दृश्य को इस संसार को बनाया। भोग क्या हैं? सुख और दुःख।
संसार के विषय जो है भोग है रुप रंग गंध स्पर्श शब्द इसमें हम कोई सुखी होते हैं तो कोई दुःखी होते हैं। 

भोग या फल को भोगने के लिए संसार का होना जरूरी है, शरीर का होना जरूरी है, नहीं तो कर्म फल नहीं मिलेगा भोग नहीं मिलेगा अब अच्छा भी होगा, बुरा भी हो सकता है।
और अपवर्ग मोक्ष भी हमें नहीं मिलता यदि यह संसार ना होता यदि हमारे पास शरीर ना होता क्योंकि शरीर है तभी हम मोक्ष के लिए तैयारी करते हैं तो शरीर हमारा साधन है मोक्ष के लिए और कर्म फल को सुख और दुख को भोगने का एक साधन है यह शरीर यह दोनों प्रकार की फलों को चाहे मोक्ष प्राप्त करना चाहे चाहे संसार के सुख और दुख को भोगना हो तो शरीर का होना अनिवार्य है, इसलिए परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की । 
फिर कहते हैं कि इस संसार की रचना करके परमात्मा ने हम आत्माओं का कल्याण किया अब हम इस संसार के भोग से हम बचना चाहते हैं सुख-दुख से बचना चाहते हैं, जो बुद्धिमान होगा जो बुद्धिमान व्यक्ति है संसार में वह स्थाई सुख चाहता है और जो अज्ञानी है कम बुद्धि वाले हैं वह तात्कालिक सुख चाहता है विचार करके देखिए की दो प्रकार के लोग हैं संसार में - कल किसने देखा है ? आज खूब खाओ छककर के खाओ चाट-पकोड़े जो भी मिला खूब बढ़िया भोजन खाओ । 

तो अभी एक इंटरव्यू में देख रहा था वह सिद्धू जी जो है अपनी पत्नी के कैंसर को जैसे उनकी पत्नी हरा दिया,  फोर्थ स्टेज का कैंसर और वह क्लीयर हो गया, समाप्त हो गया तो लोगों ने पूछा मीडिया वालों ने की कैसे हुआ,क्या खाया  आपने तो उन्होंने कहा कि कैंसर का दो रीजन है एक तो गेहूं का जो प्रयोग करते हैं की उसमे कैंसर होने की खतरा अधिक रहती है तो गेहूं की रोटी अधिक नहीं खाए गेहूं तो सदा के लिए छोड़ दे तो अच्छा है और मोदी जी को धन्यवाद करिए क्योंकि श्री अन्न का उन्होंने प्रोत्साहन किया है श्री अन्न जो मोटे अनाज है जौ बाजरा कोदो समा चावल और फिर मक्का यह जो मोटे अनाज है उसका प्रयोग हमें करना चाहिए । खाली गेहूं ( केवल गेहूं) नहीं खाना चाहिए । गेहूं तो ना खाए तो अच्छा है । और फिर उन्होंने कहा कि रिसर्च में यह भी आया है कि जो चीनी है शुगर तो शुगर हमारे बॉडी में कैंसर का सेल्स डेवलप करता है तो शुगर को भी न ले और जो फिर मिल्क प्रोडक्ट और मिल्क वह भी दूध यदि शुद्ध मिलता है अपने घर का और वह भी गाय का हैं और देशी गाय का दूध तो अमृत है। वह हमारे बॉडी के लिए लाभदायक है, परंतु मार्केट में जो दूध आ रहा है प्रायः हानिकारक हैं  ..।

 तो मैंने यहां पर भोग की बात आई थी कि व्यक्ति अपने खान-पान के कारण अपने जीवन को दुख में डाल देता है ।जो मन में आने सो खाओ चाहे मिठाई खा लो चाहे पूरी खा लो खूब तेल वाली सब्जी का खा लो खूब खाइये तो आपको दुख मिलेगा रोग होगा इससे बच नहीं सकते तो रोगों से बचने के लिए यह तो रोग का कारण बताया कैंसर अधिक सेल्स डेवलप होते बॉडी में लेकिन इसका फिर बचाव क्या है नीम का पत्ता कच्ची हल्दी आंवला और फिर एक आता है वह नींबू का पानी का नींबू का पानी भी पीना चाहिए सुबह-सुबह खाली पेट जितना उपवास करेंगे उतना कैंसर का सेल्स मर जाता है तो यह कितनी बड़ी बात है कि हम खाये चले जाते हैं खाते जाते खाते जाते हैं और यह हमारी बीमारी है कि भूखा रहना नहीं चाहते खूब भूख लग रही है ना उपवास करिए व्रत करिए पानी पर रहिए पेट साफ रखिए तो वह अपने आप हमारा बॉडी रिकवर करता है तो इस प्रकार से भोग जो है यदि सुखी होना चाहते हैं तो अच्छा भोग हमें मिले सुख मिले और स्वस्थ रहें तो खान-पान पर अपने को ध्यान रखना होगा यदि खान पान का बिगाड़कर लिया आदत हमने बिगाड़ ली - भूख नहीं है लेकिन फिर भी खा रहे हैं ... जीव्हा पर नियंत्रण नहीं है हमने बचपन में , आज मैंने गलती कर दी मैं बचपन में मक्की की रोटी और दूध और उसके साथ गुड़ खा लेता था आज जबकि मैंने पेट सफाई की आज क्लोलिंग भी किया और जीव्हा पर, मन पर नियंत्रण नहीं किया आया अभी जस्ट आपके से जुड़ने से पहले मक्के की रोटी दिख गई और दूध गाय का और फिर वह गुड़ डाल करके मैं खा
लिया और खाने के बाद तत्काल मुझे लगा कि मैंने बड़ी गलती की आज तो मुझे  खाना नहीं था फल फ्रूट पर रहना चाहिए था तो अब यह क्यों ऐसा हुआ क्योंकि आदत बचपन में खाया था मां हमको खूब खिलाती थी संस्कार था और वह दिख गया और अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाया और जब खाया तब पश्चाताप हुआ तो व्यक्ति की आदतें कुछ ऐसी बन जाती है कि हम अपने गलती को समझ नहीं पाते हैं अपने इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं उसका परिणाम फिर हमें दूरगामी भोगना पड़ता है । महानुभावों मैं इस बात को इसलिए बता रहा हूं कि हमारे जीवन में दुख आता क्यों है ? यह सुख आएगा कैसे ? यह आएगा अपने जीवन में सुख वाणी इंद्रियां और मन आदि के नियंत्रण करने से ।
आपको वही चीज लेना है विचार करके "बिना विचारे जो करें सो पाछे पछताय.. " कहावत हैं आपको किसी भी काम को करने से पहले हजार बार सोचना पड़ेगा और चाहिए कि हम इस कार्य को करने जा रहे हैं इसका दूरगामी परिणाम कितना होगा  ? और महर्षि पतंजलि इसी बात को आगे कहेंगे -
 " वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् । " ( सा० पा० ३३)
वितर्क बाधने प्रतिपक्ष भावनम् तो वितर्क क्या है ?
अगला सूत्र है साधन पाद का-  
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ।
( सा०पा०३४ )
तो यहां पर महर्षि पतंजलि कहते हैं वितर्क हैं  कि व्यक्ति अपने जीवन में जो लोभ हैं क्रोध है यह बुराई है कमजोरी है यह वितर्क है । तो वितर्क को रोकने के लिए क्या करना चाहिए ? तो ऋषि कहते हैं प्रतिपक्ष भावनम् . तो प्रतिपक्ष भावनम् का क्या अभिप्राय है ? कैसे समझेंगे उसको?? समझते हैं एक उदाहरण से समझेंगे जैसे मन में यदि किसी विषय को भोगने की इच्छा हो जाए और वह संस्कार है हमने उसको भोग रखा है, खा रखा है, चख रखा है,  देख रखा है वह संस्कार है । तो उसके पीछे और क्या परिणाम हो सकता है मुझे रामायण कुछ बात की स्मृति आ रही है मैं उसको कहना चाहता हूं एक बार ऐसा एक कहानी बनाई गई की माता सीता को हनुमान जी और जामवंत जी, अंगद आदि वानर सैना बनाई और को खोजने के लिए निकले और सुग्रीव ने उनको आदेश दिया था कि माता सीता को यदि ढूंढ करके नहीं लाये एक महीने के अंदर तो तुम्हें मृत्यु दंड दिया जाएगा । ऐसे यह बात रामायण में नहीं है यह लोगों ने बनाया है लेकिन प्रतिपक्ष भावनाम् पर घटना है मुझे बड़ा अच्छा लगा,  इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि कोई भी कहानी जो होती है वह किसी अच्छी बात को किसी अच्छे मैसेज को देने के लिए की शिक्षा मिल जाए कहीं सुनी जाती हैं।
तो एक महीने का डेडलाइन दिया गया तो अब एक महीना गुजर गया माता सीता नहीं मिली समुद्र किनारे जाकर के सभी ने आमरण अनशन कर दिया कि अब लौट करके खाली हाथ नहीं जाना यहीं पर प्राण त्याग देंगे अन्न जल छोड़कर के । क्योंकि वहां जाएंगे तो सुग्रीव राजा है हमें उसका काम किया नहीं माता सीता को खोज नहीं पाया तो मृत्यु दंड देंगे तो वहां भी मरना है यहां भी मरना है और वहां मारेंगे तो और हानि होगी । क्या क्या हानि होगी वहां करने से वहां जाने से रिपोर्ट मिलेगा भगवान राम को कि सीता जी मिली  नहीं, भगवान राम सीता से बहुत स्नेह करते हैं तो वह भी प्राण त्याग देंगे अपनी पत्नी के वियोग में और भगवान राम प्राण त्याग देंगे तो फिर लक्ष्मण भी प्राण त्याग देंगे तो दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न भी प्राण त्याग देंगे।  अच्छा भाई नहीं रहेंगे तो तीनों माताएं जब महाराज दशरथ भी नहीं अब संसार में है तो तीनों माताएं प्राण त्याग देंगे और यह तीनों माताएं सारे भाई प्राण त्याग देंगे तो अयोध्या के नर नारी प्राण त्याग देंगे अयोध्या के नर नारी प्राण त्याग देंगे तो पशु पक्षी भी उतनी भगवान राम से प्यार करते हैं पशु पक्षी भी प्राण त्याग देंगे पेड़ पौधे वनस्पतियां यह सूख जाएंगे तो बहुत नहीं प्रेम करते कितनी बड़ी आग लग जाएगी और हमें तो मरना ही है असफल होने पर राजा छोड़ेंगे नहीं, यदि हम यहां पर प्राण त्यागते हैं समुद्र किनारे भूखे प्यासे रह करके तो यह सूचना है वहां तक नहीं जाएगी माता-सीता नहीं मिली तो पता मिलने की आस में तो कम से कम भगवान राम तो बैठे रहेंगे मरेंगे नहीं और  इतनी बड़ी आग तो नहीं लगेगी हानी तो नहीं होगी हम मरेंगे तो हम लोग ही केवल मरेंगे तो यह अच्छा है कि यहीं पर हमें इसको आग को बुझा देनी चाहिए आगे बढ़ने नहीं देना चाहिए ।
तो इससे हमें क्या शिक्षा मिलती है -
हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो हमारी आदतें हैं बुरी आदतें अपने इंद्रियों पर हम नियंत्रण नहीं कर पाते फिसल जाते तो उससे होने वाली हानि का विचार व्यक्ति को बार-बार करें हानि पर हानि हानि पर हानि उसके बाद इसके बाद यह हानि उसके बाद यह हानि उ इस प्रकार से यदि हानि होने का उससे होने वाले विनाश का यदि अधिक दिग्दर्शन मन में किया जाए तो संभव है कि हम उस कमजोरी से बच सकते हैं, और विचार करेंगे मुझे कोई भी काम करने से पहले हजार बार सोचना चाहिए कि मैं यह करूं या ना करूं यह करूं या ना करु  चाहे वह भोजन हो, व्यवहार हो, कोई विषय हो, उसका लाभ और हानि पर विचार बार-बार करना चाहिए यह प्रतिपक्ष भाव है । तो यदि वितर्क हिंसा आदि काम क्रोध लोभ मोह आदि जो हमारी कमजोरी है क्या यह हमें बाधित करता है हमें मजबूर करता है आदत के कारण संस्कार के कारण तो प्रतिपक्ष भावनम् यदि हम उठाते हैं तो उसका लाभ हमें यह मिलेगा कि हम उस बुराई से उस कमजोरी से अपने को बचा सकते हैं । और यदि प्रतिपक्ष विचार नहीं करते उससे होने वाले साइड इफेक्ट हानि पर विचार नहीं करते तो हम फिसल जाएंगे और पतंगे की तरह जो आग पर जल करके मरता है इस तरह से हम भी जल करके मर जाएंगे तो विचार करना चाहिए मनुष्य को जो हमारी कमजोरी है उसे मैं कैसे बचे और उसका कमजोर पक्ष को ढूंढते रहो हानि पक्ष को मन में लाते रहे जिससे हम बच सके । तो यहां पर भोग की बात चल रही थी यह ।
अब अपवर्ग क्या है ? अपवर्ग "मोक्ष" हैं।
संसार में यह केवल कहानी नहीं है यह केवल किस्सा नहीं है कि किसी ने कहा होगा पता नहीं होता है कि नहीं ? पर यह रियलिटी है, वास्तविकता है कि मोक्ष होता है ।
और मोक्ष क्यों होता है ?  हम ऐसा क्यों कहते हैं, मोक्ष को हमने देखा नहीं परमात्मा को हमने देखा नहीं लेकिन हम यह कह रहे हैं तो आपको शब्द प्रमाण से ऋषि के भजन गा रहे थे आदरणीय प्रेम जी की " ऋषियों की बात मान लो कि हम अपने जीवन को सुंदर बनाना चाहते हैं ... ।" तो ऋषि कभी असत्य भाषण नहीं करते योग दर्शन को लिखने वाले महर्षि पतंजलि वह असत्य भाषण कैसे करेंगे ? क्योंकि वह समाधि में थे आत्म दृष्टा थे और आत्म दृष्टा होने से वह जो कुछ भी लिखा है वह शब्द प्रमाण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हमें कि हमारा "मोक्ष" होता है, और यह यथार्थ है, ईश्वर है । तो अब आज कल के आधुनिक जो बच्चे हैं वह बच्चे कहते हैं कि जी मैं नहीं मानता इस बात को वेद में लिखा हुआ है दर्शन में लिखा हुआ है मैं नहीं मानता वहां तो ऐसे ही लिख दिया होगा क्या इसका प्रमाण है कि इसका यह मोक्ष होता होगा ?  परमात्मा है  ? 
यह जो बातें लिखी है वह सही है तो उनको समझाइए कि देखो शब्द प्रमाण को आप भी मानते हो ।
हम जितने लोग हैं बिना शब्द प्रमाण के अपने जीवन का व्यवहार नहीं कर सकते, तो फिर कहेंगे शब्द प्रमाण के बिना जीवन व्यवहार नहीं चलेगा । अब हम जन्म लिए उदाहरण समझिए हमने जन्म लिया और बाल्यावस्था में अबोध अवस्था हमारी कौन माता है ? कौन पिता है ? कौन दादा है ? कौन दादी है ? माता-पिता यह कहते हैं कि देखो बड़ा हो गया तो मैंने तुम्हें जन्म दिया है मैं तुमहारा पिता हूं मां कहती है मैं तेरी मां हूं अच्छा अरे तुम्हें जन्म दिया है अब यह उस बालक को शब्द के आधार पर जन्म देते समय तो बोलना नहीं क्योंकि अबोध था तो अब बड़ा हुआ तो मां कहती है कि मैं तुम्हारी मां हूं यह तुम्हारे वह दादा है और परदादा, दादा के दादा परदादा और उसके भी पीछे दादा का वह फोटो लगे हैं वह दादा है तो अब इस पर हम विश्वास करते हैं। यह सही बात है तो आप विचार करिए दादा परदादा को हमने नहीं देखा अब मां बाप तो चलो प्रत्यक्ष है वह कह रहे हैं तो मान लेते हैं, आपने मुझे जन्म दिया है इसलिए माता-पिता हो आपके शब्दों पर विश्वास करते हैं आप प्रत्यक्ष भी हो। अब जो नहीं है उस पर विचार करें तो वही दादा है परदादा है कैसे माने ? हमारे साथ माता-पिता ने कहा तो झूठ नहीं बोलेंगे वहां उनके शब्द पर आप विश्वास कर रहे हैं, तो क्या ऋषि जो बात कह गये, जो पिता के समान हमारे ऋषि थे जिन्होंने आप्त-भाव से, कल्याण की भावना से ग्रंथ लिखा वेद का आधार पर प्रमाण देते हुए तो वह कभी झूठ बोल सकते है?  वह समाधि में जाकर के उन्होंने प्रत्यक्ष किया और मैं इस बात को यहां पर सिद्धि के प्रकरण में इस बात को स्पष्ट करूंगा कल थोड़ी सिद्धि की बातें आएगी कि जैसे इन इंद्रियों से आंख आदि इंद्रियों से हम सांसारिक वस्तुओं को प्रत्यक्ष करते हैं तो ठीक उसी प्रकार से ऋषि लोग समाधिस्थ आप्तजन अपने ज्ञान चक्षु से अदृश्य सत्ता का प्रत्यक्ष करता है उसके लिए असंभव नहीं हैं। वह प्रत्यक्ष अनुभव करता है तो आत्मा का प्रत्यक्ष, परमात्मा का प्रत्यक्ष  "प्रत्यक्ष = प्रति अक्षर प्रत्यक्ष: ।" जो कहते हैं कि अक्षय इति आंख, तो इस प्रकार से प्रत्यक्ष जैसे साधारण मनुष्य अपने इंद्रियों से करता है इस तरह से ऋषि लोग अपने आत्मज्ञान से प्रत्यक्ष करता है और उस प्रत्यक्ष को जान करके वह जो बातें लिखता है उसे शब्द प्रमाण कहते है और शब्द प्रमाण हम जैसे लोक व्यवहार में हम प्रयोग का आधार पर मानते हैं और उसको अनुभव करते हैं इस तरह से ऋषि की बातों का अनुभव करना चाहिए ।
अब आगे थोड़े से बढ़ेंगे कि अब जो आठ शब्दों में योग दर्शन की बातें आई थी यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि योग की चर्चा हो और अष्टांग आठ अंगों की चर्चा ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी क्योंकि अब इतने कम समय में पूरे योगदर्शन के सारे सूत्र पर हम चर्चा नहीं कर पाएंगे क्योंकि 195 सूत्र हैं। इन 195 सूत्र पांच-सात दिन में नहीं कर सकते 
( क्योंकि यहां पर एक दिन में लगभग एक घंटे ही व्याख्यान हो रहा है ) तो मुख्य या मूल मूल सूत्र हम ले रहे हैं तो इस दूसरे पद में (साधन पाद में) अष्टांग योग में जो आया है जो आठ अंग वाले अष्टांग योग। 
तो आठ अंग वाले जो आठ हैं उसमें से आरंभ के पांच अंग बहिरंग है और अंत के तीन अंग अंतरंग हैं।
बहिरंग जो पांच है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार यह बहिरंग इसलिए है कि यह शरीर से संबंध रखते है स्थूल शरीर से स्थूल इंद्रियों से यहां इनका व्यवहार संबंध होता हैं ।और धारणा, ध्यान, समाधि यह मन का विषय है, आंतरिक भाग से सूक्ष्म शरीर से इसका संबंध हैं इसलिए इसको अंतरंग कहा जाता है ।
अब मैं सीधे वहां ले चलता हूं समय हो गया हैं कुछ मिनट और है तो मैं इस आठ अंगों की व्याख्या नहीं करूंगा आप सबको पता है क्योंकि इतना तो हम आर्यों को पता ही होता नाम भी याद है और यम पांच है नियम पांच है नाम भी याद है उनका व्याख्या भी परिभाषा भी हमें पता है भले व्यवहार में कितना लेते हैं वह अपना व्यक्तिगत विषय होगा लेकिन शाब्दिक रूप से तो अवश्य सबको पता हैं। तो उसके रिजल्ट (परिणाम) की थोड़ी-थोड़ी चर्चा करके मैं आज समापन करता हूं। 
परिणाम (रिजल्ट) क्या है तो पहले यम है और नियम है तो यम नियम की थोड़ी महत्वता बता दे -  दो शब्दों में कहते हैं कि जो व्यक्ति केवल यम का सेवन करता है और नियम का सेवन नहीं करता है उसके भी हाथ कुछ नहीं लगता जो कोई नियम का सेवन करता है यम का पालन नहीं करता उसको भी कोई हाथ नहीं लगता, कुछ भी हाथ में लगता है क्योंकि दोनों आपस में जुड़ा हुआ है ।
नियम व व्यक्तिक है व्यष्टि है और यम सामाजिक हैं समष्टि है।
इसको समझिए - यह जो मनुष्य समाज है मनुष्य समाज की भित्तियां / दीवार/ वॉल वह क्या है ? तो यम और नियम है । इसी पर मनुष्य समाज टिका हुआ है । 
तो यम और नियम यह हमारे समाज की दीवार है, आधार है। यदि भित्ति को तोड़ दिया जाए तो घर गिर जाएगा तो उसी तरह से समाज यदि ध्वस्त होता है यम नियम का पालन न होने से सत्य आदि आचरण न करने से व्यक्ति का जीवन दोषपूर्ण हो जाता है और उस समाज की स्थिति चरमरा जाती है ।
तो यम-नियम बड़ा ही महत्वपूर्ण हैं, जोगियो ( योगीयो ) के लिए तो और भी महत्वपूर्ण है । महर्षि दयानंद का जीवन यम-नियम से ओतप्रोत था उनको यम-नियम का पालन करने की इस पर फोकस करने की आवश्यकता ही नहीं थी उनको तो जीवन ही  यम-नियम था ।
अब यम-नियम के बाद है - "आसन" आसन तो आप सब जानते हैं आसन बहुत प्रकार के होते 350, 500 प्रकार के 600 प्रकार के आसन..
लेकिन एक आसन जो महर्षि पतंजलि ने बताया -
              " स्थिरसुखमासनम् । " ( सा०पा० ४६ )
इस तरह सुखपूर्वक यदि एक आसन में बैठा जाए और एक अभ्यास कर लिया जाए उसी से सिद्धि मिलेगी समाधि मिलेगी अन्यथा नहीं मिल सकती ।
तो यम के बारे में आया है अहिंसा - अहिंसा में यदि प्रतिष्ठित हो जाए तो क्या मिलेगा तो महर्षि कहते हैं 
    " अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः । " 
        ( योगदर्शन २/३५)
अहिंसा में प्रतिष्ठित होने से आस-पड़ोस के लोगों का प्राणियों का वैर त्याग हो जाता है । तो प्रश्न तो बहुत आएगें पर समय नहीं हैं जो मैं यहां बोलूं .. 
अहिंसा क्या है ?अहिंसा..
तो देखिए 81प्रकार की हिंसा , 81 टाइप्स हिंसा का योगदर्शन में वर्णन किया गया है, और उसका विश्लेषण करेंगे तो आपको अलग से फिर थोड़ा समय निकालना होगा एक - एक घंटा उस पर चर्चा चलेगी 81 टाइप्स हिंसा क्या है उसके ऑपोजिट अहिंसा है तो अहिंसा का पालन करने से अहिंसा क्या है ? अब मैं इसमें इस बात को जोड़ दूंगा कि यम का जो पहला पाठ अहिंसा है वह अहिंसा को ही पुष्ट करता है अहिंसा को ही पूर्ण करता है सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यह जो अगले चार चरण है वह अहिंसा को पक्का करता है अहिंसा के लिए ही है यदि आप अहिंसा को अलग मानेंगे सत्य को अलग मानेंगे तो नहीं बात बनेगी , सत्य जो अहिंसा को पूर्ण करता है जैसे पांच क्लेश में अविद्या मूल है और अविद्या का ही विस्तार राग द्वेष आदी है तो उसी तरह से अहिंसा मूल है अहिंसा का ही विस्तार है सत्य , अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ।आगे आया है - 
     " सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । " 
        ( योगदर्शन २/३६)
अब आज का प्रसंग समापन कर रहा हूं " सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । " महर्षि  पतंजलि का सूत्र हैं - सत्य में व्यक्ति प्रतिष्ठित हो जाए तो सब क्रियाओं की सिद्धि होती हैं।
आप व्यवहार भानु में पढ़िए -  बजाज और एक झूठे ग्राहक कैसे कपड़े खरीदने गए और कैसे लड़ाई झगड़ा हुआ। व्यवहार भानु में बड़े सुंदर ढंग से ऋषिवर ने लिखा है अब कहानी कहानी कहां हैं दृष्टांत ही दृष्टांत हैं व्यवहार भानु में । तो लोग कहते हैं कि बिजनेस करने वाले को झूठ बोलना पड़ता है तो ऋषि दयानंद ने सब बातों को खोल कर रख दी कि झूठ पर तो कुछ भी बात टिकती नहीं है जो सत्यनिष्ठ होगा उसी का बिजनेस चलता है और सत्य व्यवहार करने वाला व्यक्ति वह सब क्रियाओं की सिद्धि कर लेता है जो चाहता है जिस कार्य में हाथ डालेगा उसको सफलता मिलेगी सत्य पर जो व्यक्ति चलेगा "सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । "  कि सत्य में प्रतिष्ठित होने वाला व्यक्ति जो भी काम करेगा उसका फल प्राप्त होगा वह निष्फल नहीं हो सकता वह कभी व्यर्थ नहीं जाएगा,वह फल मिलेगा उसको असफल नहीं होगा । फिर कहते हैं - 
        "अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।" 
                     (योगदर्शन २/३७)
अस्तेय में प्रतिष्ठित हो गए तो सारे रत्न अर्थात सब प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति व्यक्ति को होता हैं ।
अस्तेय मतलब चोरी त्याग यदि चोरी का त्याग कर दिया चोरी नहीं करते हम तो आपको किसी चीज की कमी नहीं रहेगी अभाव नहीं रहेगा यह मैं नहीं कह रहा हूं  यह महर्षि पतंजलि का सूत्र हैं। अब आगे देखें ब्रह्मचर्य पालन से लाभ 
         " ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । " 
                  ( योगदर्शन २/३८)
ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित होते हैं तो शक्तिशाली होंगे बलशाली होंगे । अब अंतिम बात  -
        " अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ।" 
                ( योगदर्शन २/३९)
अब इसको विचार कर लीजिए - मैं कौन हूं? और मेरे पिछले मां-बाप कौन थे ?  यह जानना चाहते हैं आगे मैं मरकर के फिर शरीर में किस कुल में जाऊंगा ? इस विषय को समझना चाहते हैं , आपके मन में यह प्रश्न यदि आ रहा है तो इसका समाधान ऋषि ने कर दिया‌ - "अपरिग्रहस्थैर्ये जन्म कथा संबोध: ।" अपरिग्रह में स्थित हो जाए । अपरिग्रह का मतलब होता है कि जितनी आवश्यकता है उतने ही विचार व्यवहार साधन उसको आप लाए । अब इतने सारे कपड़े इतने बड़े-बड़े घर इतनी सारी व्यवस्थाएं इतने सारे विचार इतने प्रकार के भोजन व्यंजन तो यह अपरिग्रह नहीं है, परिग्रह हैं और परिग्रह करने वाले व्यक्ति को समय कहां है इस संसाधनों में उलझा हुआ है उनके विचारों में उलझा हुआ है उनके पास समय कहां है कि मैं विचार करूं कि मेरे पिछले के मां-बाप कौन थे ? मेरा स्वरूप क्या है ? मैं आगे जब शरीर छूटेगा मेरी आत्मा किस कुल में जाएगी किस शरीर में जाएगी ? इसको काम कब करेगा वर्कआउट कब करेगा समाधि कब लगाएगा ध्यान कब करेगा इतने सारे काम उलझा रखा है विचार व्यवहार साधन यह सारे राजनीति यह पार्टियों वह पार्टियां यह वह, अब कैसे बैठेंगे 2 घंटा 3 घंटा ध्यान लगाने पर कम से कम एक घंटा सुबह एक घंटा शाम पर समय ही नहीं हमारे पास ध्यान करने का .. तो ऋषि कहते हैं आप अपरिग्रह में स्थित हो जाइए आपको सारा परिचय मिल जाएगा पिछले 100 जीवन पीछे मेरे बाबा कौन थे किस-किस योनि में मैं गया आगे मैं किस-किस योनि में जाऊंगा इसका परिचय आपको दिग्दर्शन होगा समाधि प्राप्त होगी इसी जीवन में यदि सूत्रों पर विश्वास पूर्वक आचरण करें तो ।
 इसलिए आर्य महानुभावों आप सबसे मेरा एक निवेदन है प्रार्थना है कि आप संसार की समस्याओं को सुलझाने में महारत हासिल कर लिए अपने जीवन में पारिवारिक सामाजिक समस्याओं को सुलझाते रहते हैं लेकिन अपनी समस्या को सुलझा लो कि मैं कौन हूं ?  कहां से आया हूं ?  आगे कहां जाऊंगा ? इस प्रश्न पर काम किया जाए थोड़ा सा भी समय लगाया जाए तो जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है और यह मानव जीवन सफल होगा आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद कल कुछ सिद्धियों की बात करूंगा विभूतियां और केवल्य दो पाद विभूति पाद और कैवल्य पाद उस पर कुछ दो-चार सूत्र आपके बीच में प्रमुखता से रख करके अपनी बात रखेंगे और समापन इस विषय का करेंगे ।
           आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद ।
क्रमशः        

योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।

योग दर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (५)

                             ॥ॐ॥
                           योग दर्शन
   योग दर्शन पर पंचम दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
     ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
      सोमवार मार्गशीर्ष कृ १०विक्रम संवत २०८१ 
                  25 नवंबर 2024 ईस्वी
       (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )
आज हम सब पंचम दिन में योग दर्शन पर चर्चा करें 
        इससे पूर्व बहन आचार्य आवृत्ति जी द्वारा 
                   नश्वर शरीर पर भजन 

जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।

रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां । गम के सांचे में ढ़लना पड़ेगा 
रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां गम के सांचे में ढ़लना पड़ेगा
वक्त ऐसा भी आएगा माना  वक्त ऐसा भी आएगा माना तुझको कांटों पर चलना पड़ेगा वक्त ऐसा भी आएगा माना तुझको कांटों पर चलना पड़ेगा ।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा मौत
जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा । 

बाप बेटे यह भाई भतीजे , बाप बेटे यह भाई भतीजे 
तेरे साथी है जीते जी के 
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
बाप बेटे यह भाई भतीजे, बाप बेटे यह भाई भतीजे तेरे साथी है जीते जी के अपने आंगन से उठाना पड़ेगा अपने आंगन से उठाना पड़ेगा अपनी चौखट से चलना पड़ेगा अपनेआंगन से उठाना पड़ेगा अपनी चौखट से चलना पड़ेगा 
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा 
मौत जब तुझको आवाज देगी मौत जब तुझको आवाज देगी  घर से बाहर निकलना पड़ेगा 

ऐसी हो जाएगी तेरी हालत ऐसी हो जाएगी तेरी हालत काम आएगी दौलत ना ताकत ऐसी हो जाएगी तेरी हालत काम आएगी दौलत ना ताकत 
छोड़कर अपनी ऊंची हवेली छोड़कर अपनी ऊंची हवेली तुझको बाहर निकलना पड़ेगा छोड़कर अपनी ऊंची हवेली तुझको बाहर निकलना पड़ेगा 
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा 
मौत जब तुझको आवाज देगी मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा घर से बाहर निकलना पड़ेगा ॥ 
          इसी कटुसत्य के साथ धन्यवाद।
             --- ---- --- ००००० --- --- ----

                      आचार्य प्रभामित्र जी
आइये आरंभ करते हैं।  मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे - 
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
          तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
                 ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

सभी को सादर नमस्ते ।
आइये हम सब मिलकर योग दर्शन के ऊपर अपनी बात को सुने कि महर्षि पतंजलि ने हमारे लिए क्या-क्या कहा ? कल के चर्चा में हमने आपके बीच में बातें रखी थी योग दर्शन को एक शब्दों में समझना हो तो "ईश्वर प्राणिधान " शब्द से समझ सकते हैं। तीन शब्दों में यदि योग दर्शन को समझने का प्रयास किया जाए - तो "तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान क्रियायोग:" तो तीन शब्दों के द्वारा हम योगदर्शन को समझ सकते हैं। आत्मसात कर सकते हैं योग को, और सामान्य लोगों के लिए आठ शब्दों में यम,नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि  ये आठ शब्दों में हम योग दर्शन को समझ सकते हैं । तो द्वितीय पाद जो साधना पाद है किन-किन साधनों का उपाय करने से हमें मुक्ति मिलेगी मोक्ष का द्वारा खुलेगा तो आज साधना पाद का प्रथम सूत्र आया है -
        तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥
क्रिया योग के अनुष्ठान से हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं । जीवन के दुखों से छूट सकते हैं, जन्म मरण के चक्र से हम छूट सकते हैं।
तप क्या है ? इस बात को आप सब भलीभांति जानते हैं। महर्षि दयानंद के शब्दों में मैं कहना चाहूंगा की श्रेष्ठ कार्यों को करते हुए जो विघ्न बाधा उपस्थित हो उसे सह लेना यह तप कहलाता हैं ।
श्रेष्ठ कार्य क्या हैं ? तो श्रेष्ठ कार्य यज्ञ है, श्रेष्ठ कार्य साधना है, श्रेष्ठ कार्य वेद-विद्या का अध्ययन है, तो इन कार्यों को करते हुए जो कुछ कष्ट आता है उसको सहन करना यह तप है । तो तप शरीर का, वाणी का और मन का-यह तीन प्रकार के तप है, इसका अनुष्ठान करना चाहिए । मौन रहते हैं-वाणी का तप है, मन पर नियंत्रण करते हैं-यह मन का तप है,  शरीर में जो भोजन आदि से अपने शरीर को साधते हैं-यह शारीरिक तप है।
तो हम सभी प्रकार के तपस्याओं को करते हुए अपने इस साधन रूपी शरीर मन आदि को अनुकूल बनाएं । और स्वाध्याय ..
स्वाध्याय जैसा कि आप सब जानते हैं की अपना अध्ययन करना, अपने जीवन को पढ़ना, यह स्वाध्याय है।  स्व्श्च अध्ययनम् स्वाध्याय।
प्रतिदिन अपने कमियों को ढूंढना और उन कमियों को बार-बार अपने विवेक से समझकर के उसे निकालने का प्रयास करना महर्षि दयानंद जी का प्रिय मंत्र -
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । 
यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥

इस मंत्र को जब हम समझते हैं तो ऋषि को यह मंत्र प्रिय क्यों था ? तो जब तक हमारे अंदर कमियां रहेगी तब तक हम इस संसार में दुःख भोगते रहेंगे या सांसारिक सुख को हम भोगते रहेंगे दुख मिलता रहेगा क्षणिक सुख मिलता रहेगा, इससे यदि परे होना चाहते हैं तो एक भी बुराई हमारे अंदर ना हो । दुरितानि परासुव विश्वानी दुरितानी
जो भी जितने भी दुरित है दुर्गुण हैं वो सब हमसे दूर हो जाए। अब यहां पर यदि व्याकरण की दृष्टि से देखा जाए तो सर्वानी दुरितानी परासुव  ऐसा भी मंत्र में आ सकता था, सर्वानी शब्द नहीं विश्वानी शब्द हैं यहां पर विश्वानी शब्द विश्ववरी व्याप्तो शब्द से बना इसका प्रयोग करेंगे तो विश्वानी शब्द बनेगा जो व्याप्त है तो विश्वानी दुरितानी का मतलब हमें यह समझना चाहिए कि वह दुरित चाहे आत्मिक दोष हो या मानसिक दोष हो या शारीरिक वाचिक दोष हो उन सभी दोषों में विश्वानी जो व्याप्त दोष है जिसको हम स्थूल रुप से नहीं समझ सकते हमें पता भी नहीं चलता कि हमारे अंदर क्या डिमेरिट (दुर्गुण) दोष हैं । तो विश्वानी का मतलब जो व्याप्त है मन में आत्मा में शरीर में वाणी में सूक्ष्म रुप से हैं उन सारे जो दुरित दुर्गुण हैं वो दूर हो जाए।
और यद् भद्रं जो भद्र हैं, अच्छाई है कल्याणकारी है जो भी है यद् भद्रं .. तन्न आ सुव अर्थात् हममें आ जाये। तो अब हम यह समझ सकते हैं कि मनुष्य जब तक पूर्ण रुप से पवित्र न हो जाए मनसा वाचा कर्मणा आत्मा से पवित्र हो जाए तभी वे मोक्ष के अधिकारी होते हैं। तो स्वाध्याय का पहला मतलब मैं आपको समझा रहा हूं - कि यह अपना अध्ययन करना कि मुझ में कौनसी कमियां हैं खाने पीने के दोष है, बोलने का दोष है सोचने का दोष है या व्यवहार दोष है - बहुत सारे दोष हैं । इन दोषों को बारीकी से निकलना।और स्वाध्याय मोक्ष शास्त्रों को पढ़ना । मोक्ष शास्त्र - महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं कि -
जपो प्रणवों वा मोक्ष शास्त्र अध्ययनं वा । अर्थात् प्रणव का जप करना भी स्वाध्याय है और मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन करना भी स्वाध्याय है। तो मोक्ष शास्त्र जो वेद है, योगदर्शन है, उपनिषद हैं, सत्यार्थ प्रकाश जो ऋषि कृत ग्रंथ हैं आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिए। और स्वाध्याय एक तो यह विचार करके देखें कि अपने से पढ़ना यह स्वाध्याय है। और गुरुमुख से भी पढ़ना यह भी एक प्रकार का विद्या प्राप्ति का एक मार्ग है ।
महाभाष्यकार ने कहा- "चतुर्भी प्रकारेण विद्या उपयोगिता भवति" चार प्रकार से विद्या आती है- और वह पहले आगम कालेन, स्वाध्याय कालेन, प्रवचन कालेन, व्यवहार कालेन इति। महाभाष्य की उक्ति हैं यह । कि महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि और महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन की रचना की महर्षि पतंजलि ने ही  महाभाष्य की रचना की और महर्षि पतंजलि ने आयुर्वेद शास्त्र की भी रचना की । अब कहते हैं ऐसे ऋषि को नमन हैं जिन्होंने योगदर्शन की रचना करके चित् के मन के मलो को धो दिया। आयुर्वेद शास्त्र की रचना करके शरीर के मलों को धो दिया और व्याकरण शास्त्र महाभाष्य की रचना करके वाणी के मलों को धो दिया ऐसे ऋषि को नमन हैं। तो महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य में क्या कहा " विद्या चतुर्भी प्रकारेण उपयुक्ता भवति "
विद्या चार प्रकार से आती हैं (आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहार कालेन); पहले आगम काल 
(१) आगम काल का अभिप्राय है की गुरु मुख से पढ़ना "आगम इति वेद:" अगम-निगम तो वेद को आप गुरु मुख से पढ़ रहे हैं और यह आगम काल है और फिर है
(२) स्वाध्याय काल - स्वाध्याय काल में विद्या कैसे आती है कि आपने एक शब्द भी सुना होगा "श्रवण मनन निदिध्यासन और साक्षात्कार" यह  इसमें घट जाएगा । श्रवण होता है गुरु मुख से सुनना यह हो गया आगम काल और मनन हो गया स्वाध्याय काल कि आप केवल गुरु मुख से विद्या को आपने सुना श्रवण किया और उसको स्वाध्याय नहीं किया मनन नहीं किया तो लाभ नहीं होता । इसलिए एकांत में बैठकर के पढ़े हुए सुने हुए विषयों पर मनन करना चिंतन करना यह स्वाध्याय काल है। अलग हटकर के पढ़ना, अपने आप पढ़ना यह स्वाध्याय है। ध्यान रहे गुरु मुख से पढ़ना स्वाध्याय काल नहीं वह आगम काल हैं, वह श्रवण में आयेगा। और फिर कहा गया प्रवचन काल।
(३) प्रवचन काल -  प्रवचन काल क्या है ? महर्षि दयानंद जी ने व्यवहार भानु पुस्तक में इस बात को स्पष्ट से लिखा है इसको पढ़ा जाए ऋषिवर ने कहा कि प्रवचन कालेन - प्रवचन भी करना चाहिए, आप हम सब एक उपदेशक हैं प्रवचन का मतलब यह पढ़ाना जो कुछ अपने गुरुमुख से आगम काल में पढा है एकांत में बैठकर कर आपने चिंतन किया है मनन किया है विचार किया है और उसको आप प्रवचन कर दीजिए, दूसरे को पढ़ा दीजिए । तो पढ़ाना चाहिए आप जो कुछ भी पढ़ते हैं वह दूसरे को पढ़ाइए दूसरे को बताइए प्रवचन करिए तो प्रवचन करने से भी विद्या आती है । इसलिए लिखा ऋषि दयानंद जी ने लिखा प्रवचन करने से पढ़ने से जितनी अधिक विद्या आती है उतनी पढ़ने से नहीं.. पढ़ने से कम विद्या आती, पढ़ाने से विद्या अधिक आती है यह महाभाष्यकार ने कहा और ऋषि दयानंद जी ने इसकी व्याख्या की । तो हमें प्रवचन भी करना चाहिए पढ़ाना भी चाहिए पकड़-पकड़ के पढ़ाइए और यह तो अच्छा अवसर हैं आर्यों का महाकुंभ है यह वर्षों से चल रहा है इसमें सबको अवसर मिलता है क्योंकि यह लंबे काल से चल रहा है हमारे आदरणीय भ्राता आर्य लखन जी ने यह हम सबको बहुत ही सुअवसर प्रदान किया है प्रवचन करने का ... तो हम सबको भी प्रवचन करते रहना चाहिए जो कुछ आप पढ़ते हैं दूसरे को पढ़ाइए उससे विद्या पक्की हो जाएगी तो यह हैं प्रवचन कालेन । फिर है व्यवहार कालेन 
(४) व्यवहार कालेन - "व्यवहार कालेन विद्या उपयुक्ता भवति" व्यवहार काल में आप उस विद्या को कितना जीवन में उतारते हैं ।
इस पर हमें ध्यान रखना चाहिए, उस पर हम कितना आचरण या अमल में लाते हैं, व्यवहार में लाते हैं । यह साक्षात्कार होगा । 
श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार इस प्रकार से भी कह सकते हैं या आगम काल, स्वाध्याय काल प्रवचन काल और व्यवहार काल  महाभाष्यकार के शब्दों में। 
तो व्यवहार में जब आप उस विद्या को लाने लग जाते हैं, उससे भी विद्या आती हैं और वो पक्की होती है, जीवन में उसका लाभ फल हमें मिलने लगता हैं। तो  स्वाध्याय के बारे में आपने सुना - मोक्ष शास्त्रों को पढ़ना, ओम् का जप करना, अपना आत्मनिरीक्षण करना ये सारी व्यवस्थाएं हैं जो स्वाध्याय काल में आ जाती हैं।
             तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि  
ईश्वर प्राणिधान - ईश्वर प्राणिधान का अभिप्राय आप सब समझ रहे होंगे कि समर्पण कर देना सरेंडर बोल देना समर्पित कर दिजिए ।
" तुभ्यं वस्तु -तुभ्यं समर्पयामि " मेरा कुछ भी नहीं । अभी भजन आवृत्ति जी बड़ा सुंदर गा रही थी कि "एक दिन निकालना पड़ेगा मौत जब तुमको आवाज देगी .." तो मैं और मेरापन इसको छोड़ दीजिए, समर्पण कर दिजिए कि हे प्रभु! ये शरीर भी मेरा नहीं हैं।और जो कुछ भी साधन आपने दिया है ईश्वर के द्वारा हमें मिला है - धन परिवार व्यवस्थाएं ये सब ईश्वर का हैं ईश्वर अर्पण अपने आप को कुछ भी न समझना शून्य समझना और अपने कर्तव्य में कि हे प्रभु हम आपके आनंद को पाना चाहते हैं , आपके आनंद के लिए ही मेरा जीवन है । और मुझे धन नहीं चाहिए पद नहीं चाहिए आयु नहीं चाहिए संसार का सुख नहीं चाहिए कुछ नहीं चाहिए बस एक ही इच्छा मन में हो कि प्रभु अपनी गोद में ले लो अपने आनंद रुपी अमृत का पान करा दो । ये भाव मन में ला करके सरेंडर बोल दीजिए सम्पूर्ण समर्पण कर दीजिए और ईश्वर के आदेश अनुसार व्यवहार करें वेद के अनुसार आप चले और अपने हर एक पल को जीये तो उसकी आज्ञा में अपने को चलाते हुए यही ईश्वर प्राणिधान हैं । और ईश्वर प्राणिधान जिन्होंने कर दिया अपने प्रकृति लय योगी कहते हैं न कि अपने चित्त को लय कर देता है उसके मन में काम क्रोध लोभ संसारिक कोई चाहना है ही नहीं । ईश्वर प्राणिधान इस प्रकार से हमें जीने का प्रयास करना चाहिए - तप करें स्वाध्याय करें ईश्वर प्राणिधान। अब कहते हैं कि ये जो आप तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान करते हैं इसका फल क्या मिलेगा? तो समाधि की भावना बनेगी । वैसे अभी तक यहां पर सच्चे हृदय से अपने आप को पूछिए कि कितने व्यक्ति हैं यहां मैं अपने आप को भी जोड़ता हूं कि समाधि की भावना से जीते हैं? कि मुझे जीवन में समाधि प्राप्त करना हैं ।
तो यह भावनाएं नहीं बनती है। वैसे साधना के समय तो मेरी भावना बन जाती है मैं बनाता हूं मुझे समाधि प्राप्त करनी है मोक्ष में जाना है फिर भूल जाते हैं दिनभर फिर सांसारिक कार्य में ये वो.. याद नहीं रहता कि समाधि में जाना है।
(टिप्पणी -" तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग" का फल क्या हैं ?  - "तप स्वाध्याय" से समाधि लगने का भाव और मार्ग सुगमता पूर्वक प्रशस्त होगा ..और "ईश्वर प्राणिधान" से तात्पर्य है स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर देना .. तेरा तुझको को अर्पण भाव से रहना। 
तो प्रश्न यह हैं कि यहां मुझ सहित कितने श्रोता /पाठक हैं जो समाधि भाव में रहने का सुख निरंतर लेना चाहते हैं ?  सत्य यह हैं कि चाहते हम सब हैं परंतु महत्वपूर्ण यह हैं कि इस ओर जाने का प्रयास हम कितना करते हैं .. मैं स्वयं का अनुभव कहूं तो साधना के समय समाधि में जाने का भाव मेरा बनता हैं पर सामान्य जीवन में लौटने पर यह समाधि भाव क्षीण हो जाता हैं अर्थात लगभग नहीं रहता और मै संसार के व्यवहार में संलग्न हो जाता हूँ ।. ..) 
तो तप करेंगे स्वाध्याय करेंगे ईश्वर प्राणिधान करेंगे तो समाधि की भावना बनेगी ।
" समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च "  कल आचार्य आनंद पुरुषार्थी जी बड़ी अच्छी बात कह रहे थे कि क्लेश जो है उदार विच्छिन्न तनु और प्रक्षिप्त यह चार बातें आई थी यहां पर तनु आया है "अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् "- यदि आप तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान का अनुष्ठान करते हैं यह लाभ होगा एक तो समाधि की भावना बन जाएगी कि मुझे समाधि प्राप्त करना है दूसरा लाभ होगा कि क्लेश जो है यह तनु हो जाएगा छोटा हो जाएगा  तनु का मतलब होता है छोटा होना, क्षीण हो जाना, दुर्बल हो जाना, तो क्लेश "अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः"  अविद्या राग द्वेष अभिनिवेश यदि यह क्षीण हो जाता है । यह उदार नहीं है उभरा हुआ नहीं है वरन् दबा हुआ है कमजोर पड़ा हुआ है जैसे जब घोड़ा बेलगाम हो जाता है उसको दो-चार दिन भोजन देना बंद कर दे अर्थात् घोड़े को पालन करने वाला या जो घुड़सवारी करता है वह सज्जन वह जब घोड़े को भोजन उसको देना बंद कर दे तो वह बेलगाम घोड़ा कमजोर हो जाता हैं अब उसे आराम से पकड़ सकते हैं तो उसी प्रकार से यह मन जब भी बेलगाम होता है अविद्या जब उठी हुई थी तो यह मन अपने आप में तांडव नृत्य करता है तो तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान करने से मन एकदम दुर्बल हो जाता है क्षीण हो जाता है यह अविद्या अस्मिता राग द्वेष आदि क्षीण हो जाते है, सब कमजोर हो जाता है और चाह के भी आप विषय सुखों को लेना चाहेंगे इच्छा नहीं होगी क्यों क्योंकि तप कर रहे हैं स्वाध्याय कर रहे हैं ईश्वर प्राणिधान कर रहे हैं तो यह मन जो कभी उभरा हुआ होता था अब यह क्षीण पड़ गया दुर्बल हो गया । तो यह ऋषि की दी एक बहुत अच्छी (टेक्निक) तरकीब एक विज्ञान यहां पर प्रदान कर रहे हैं बता रहे हैं । अब वह क्लेश क्या है मैं इसकी चर्चा नहीं करूंगा क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) आप सब जानते हैं।
यहां अविद्या की थोड़ी चर्चा करेंगे फिर आगे बढ़ेंगे .. तो अविद्या क्या हैं? ऋषि के शब्दों में "अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या। "
अनित्य , अशुचि , दुःख , अनात्मसु , नित्य , शुचि , सुख , आत्म-ख्याति: , अविद्या इसमें यह बात समझनी हैं कि अनित्य को नित्य समझना, अशुचि को शुचि समझना,  दुःख को सुख समझना और अनात्मा को आत्मा समझना यह अविद्या हैं। ये चार विभाग वाले अविद्या हैं, अविद्या को चार भागों में बांट कर ऋषि ने बता दिया -
अनित्य को नित्य समझना इसका उदाहरण लें लिजिए एक भजन है कि - " जब तुमको मृत्यु आवाज देगी.. " अर्थात् यह शरीर मरण-धर्मा है और इस संसार का नाम मृत्युलोक हैं तो मृत्युलोक में हम सब आये है एक दिन मरने के लिए, सदा के लिए जीवित रहने के लिए नहीं आये.. परंतु सामान्य लोगों से आप मृत्यु की बात बोलिए.. कहेंगे कि क्या अशुभ बोल रहे हैं ? यह मृत्यु न बोलिए यह मृत्यु अशुभ है.. तो वह सुनना नहीं चाहते .. हैं मृत्युलोक में शरीर मिला है मरने के लिए.. लेकिन मृत्यु को सुनना पसंद नहीं करते क्यों ?
किसी कवि ने बड़ी अच्छी बात कही है - 
" दो बातो को भूल मत जो चाहे कल्याण ।
नारायण एक मौत को दूजे श्री भगवान॥ " 
ये दो बातों को लोग भूले हुए रहते हैं- एक तो ईश्वर को भूले हुए रहते हैं और दूसरी मृत्यु को भूले हुए रहते हैं। तो अपना कल्याण कैसे होगा? तो कवि ने बड़ी अच्छी बातें कही हैं की यह मृत्युलोक हैं इसमें हम मरने के लिए आये है और प्रतिदिन हम थोड़ा थोड़ा मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं.. एक ही दिन में श्मशान भूमि नहीं पहुंच जाते .. एक कदम हमारा प्रतिदिन बढ़ रहा है आज का दिन आपका निकल गया रात्रि हो गई तो एक दिन आप मृत्यु की ओर बढ़ गये, आपके जीवन से एक दिन कम हो गया और मृत्यु की ओर एक पग बढ गया .. आप - हम इस बात को नहीं समझते ? आज हम मर गये ( आयु का एक दिन बीत गया ) अर्थात् आज का दिन हमारे लिए मर ( बीत ) गया । हमारे शरीर के सेल समाप्त हो रहें हैं .. उदाहरण के लिए एक मिट्टी का घड़ा ले लिजिए .. माना आप आज कुंभकार से एक नया घट जल भरने के लिए खरीद कर लाते है, एक वर्ष, दो वर्ष तीन.. चार पांच वर्ष.. ऐसे कुछ वर्ष बीतने पर जब एक दिन घड़े को भर कर ऊपर से किनारा पकड़ कर उठाते समय ऊपर का भाग आपके हाथ में रह जाता है और नीचे का भाग टूट कर नीचे रह जाता हैं..  ध्यान दें जब घट नया खरीद कर लाये थे तो यह मजबूत था और ऐसे उठाने पर नहीं टूटा .. और जब तक नहीं टूटा जब-तक इसमें पर्याप्त मजबूती बनी रही .. पर एक दिन यह टूट गया इससे समझना चाहिए कि प्रतिदिन उस घट में क्षय हो रहा था, परिवर्तन हो रहा था उसमें विघटन हो रहा था कमजोर पड़ रहा था और एक दिन ऐसा आया कि उसको छूते ही अलग अलग हो गया।
ऐसे वस्त्र, पुस्तक के कागज भी लंबे समयांतराल के बाद क्षीण हो कर कट फट जाते है।
ये सब पदार्थ एक दिन में कमजोर नहीं हुए प्रतिदिन कमजोर होते होते क्षय होते होते एक दिन ऐसी स्थिति इस अवस्था में आये हैं ठीक उसी प्रकार से हमारा यह शरीर है, हम एक दिन में बूढ़े नहीं हो रहे है धीरे-धीरे मन शरीर में इंद्रियों में क्षीणता आ रही हैं यह कमजोर हो रहा है और अंत में एक दिन हमें यह मृत्यु की स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है, तो हम प्रतिदिन मृत्यु को प्राप्त कर रहे हैं । लेकिन मृत्यु को सुनना नहीं चाहते, अनित्य पदार्थों को नित्य मान करके जीना यह महा मूर्खता है अब मैं कठोर शब्दों का प्रयोग कभी-कभी करता हूं क्योंकि ऋषि दयानंद का प्रभाव कुछ ज्यादा ही मेरे ऊपर आ जाता है आज मैं व्यवहार भानु पढ़ा रहा था कि किन्हीं सज्जन को तो पढ़ते-पढ़ते वहां पर कई एक बार "महामूर्ख" का शब्द आया तो ऋषि दयानंद जैसे कड़वा सत्य बोलते थे । तो हम लोग को महामूर्ख हैं ।
क्यों है ? क्योंकि इस सत्य को स्वीकार नहीं करते की अनित्य साधनों को हम नित्य मानकर के जी रहे हैं कि मैं कभी मरुंगा ही नहीं यह मेरा घर "यह हवेली.." भजन में आया था, यह हमारे पास हमेशा रहेगा ऐसा मान करके ऐसी भावना से शब्दो में भले कह देते जी यह तो धर्मशाला है हमें तो भगवान का दिया हुआ है, लेकिन अंतरात्मा मन से अपना मानता हैं । सब तेरा है मैं रहूंगा ऐसी तैयारी करते तो अनित्य साधनों से नित्य साधनों की उपलब्धि करना ही बुद्धिमानी हैं ।हम सबको बड़ा चिंतित होना चाहिए बहुत बेचैन होना चाहिए कि मैं आज मेरा दिन चला गया एक दिन मैं मृत्यु की तरफ बढ़ गया आज मैंने क्या किया कितने घंटे साधना की कितने घंटे स्वाध्याय किया या हमने आज कौन से पुण्य इकट्ठा किया 50-50 का बैलेंस बनाना पड़ेगा हमारे एक मित्र हैं आदरणीय वशिष्ट जी वह पढ़ते रहते हैं और वह कहते है आचार्य जी इस पर चर्चा होनी चाहिए कि महर्षि दयानंद जी ने यह कहा सत्यार्थ प्रकाश में 50% शुभ कर्म और 50% अशुभ कर्म और दोनों बराबर होगा तो फिर से मनुष्य जीवन मिलेगा । शुभ कर्म अधिक होगा तो बहुत अच्छी बात है देवता के जीवन मिलेंगे और शुभ कर्म कम हो गया तो पशु-पक्षी के जीवन में जाना पड़ेगा । तो पुण्य कर्म कैसे अधिक से कमाये इस पर विचार किया जाए पुण्य कर्माशय कैसे बनाया जाए, और पुण्य कर्म से वह क्या होगा आज हमने कौन-कौन से पुण्य कर्म किए तो व्यवहार-भानु में महर्षि दयानंद जी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में लिखा आज ही प्रसंग में आया था कि जो मनुष्य दूसरे के दुख को अपना दुख समझ करके उसके दुख को दूर करने का प्रयास करता है, और अपना तन मन धन विद्या की वृद्धि में अपने संतानों को और दूसरे मनुष्यों को वेद विद्या की प्राप्ति में लगता है वह मनुष्य बड़े भाग्यशाली है वह अपने पुण्यात्मा है वह अपने पुण्य को बढ़ा रहा हैं ।अब विचार करके देखे ऋषि ने एक मोती की तरह अपने पुस्तकों में चाहे छोटी पुस्तक हो या बड़ी पुस्तक हो शब्दों को पिरो दिया कि पुण्य हमें कितना अधिक से अधिक इकट्ठा करना चाहिए, क्योंकि पुण्य यदि हम इकट्ठा नहीं करते, माना साधन नहीं कर पा रहे हैं चलिए कोई बात नहीं । यह सुक्ष्म विषय है । तो पुण्य तो इकट्ठा करिए ना क्योंकि पुण्य इकट्ठा नहीं होगा तो मनुष्य जीवन छिनते ही आपको दोबारा फिर मनुष्य जीवन नहीं मिलेगा पशु पक्षी की योनि में जाना पड़ेगा । अब आप पूछेंगे इस बात को मैं क्यों कहता हूं क्योंकि बड़े दार्शनिक विद्वानों से भी आप सुनेंगे हमारे गुरुजी हैं आदरणीय मुनि सत्यजीत जी वह भी कहा करते हैं इस बात को की एक बार मनुष्य जीवन यदि हमें प्राप्त हो गया तो करोड़ों की संख्या में लाखों करोड़ों की संख्या में पुण्य कर्मों का समूह घाटे में (माईनस में) चला गया क्योंकि परमात्मा ने फ्री में/ मुफ्त में मनुष्य जीवन नहीं दिया है, मनुष्य जीवन पाने के लिए हमारा पुण्य कर्म व्यय हुआ है, पुण्य कर्म था और वह पुण्य कर्म फल जाति आयु भोग के रूप में आ गया ... बोले यहां योग दर्शन में लिखा हुआ है जाति आयु भोग में, जो हमारा कर्माशय में था वह पुण्य कर्म वो विपाक रूप में आ गया जाति आयु भोग में ।
तो जाति आयु भोग प्राप्त हुआ तो अब वह पुण्य कर्म‌ कर्माशय में बैलेंस था वह समाप्त हो गया क्योंकि फल मिल गया, मुझे मनुष्य जीवन ( जाति ) मिल गया, आयु मिल गई भोग सामग्री मिल गई अब वह तो माईनस में / घाटे में चला गया पहले तो बैलेंस में था बैंक बैलेंस था और मनुष्य जीवन में आकर के हम ना साधना की, ना निष्काम कर्म किया, ना पुण्य प्राप्ति के लिए सकाम-कर्म किया । हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहे, धन को बैंक-बैलेंस में, बैंक में पड़े रहने दिया उससे बड़े-बड़े यज्ञ नहीं किये, विद्या - वेदविद्या के वृद्धि में दान नहीं किया, वेद का प्रचार नहीं किया, गरीबों की सेवा नहीं की, असहाय  निर्धन लोगों की रक्षा नहीं की, अपने परिजनों की हित सहायता नहीं की तो फिर हम जैसे महामूर्ख महाअज्ञानी कौन होगा ?  क्योंकि उसे यह समझेंगे निष्काम कर्म करके साधना भी नहीं की तो मनुष्य जीवन तो मिलना मुश्किल है - इसलिए हमें मोक्ष में नहीं जाने की इच्छा है नहीं जाने की भावना बनती है उतना समझ नहीं है तो पुण्य कर्म का तो समझ है। हमें अपने जीवन में पुण्य कर्म को बढ़ाकर के अपने जीवन को फिर से सुरक्षित कर ले आप रिजर्व कर ले कि हमें नेक्स्ट जीवन अगला जीवन फिर से मनुष्य का ही मिलेगा क्योंकि हमने बैलेंस को बनाया है । और एक दिन में हजारों पाप कर्म हो गए आप विचार करके देखिए ना आज आप अपने हमने यज्ञ नहीं किया यज्ञ किया भी तो शुद्ध घी सामग्री का प्रयोग नहीं किया पाप हो गया, पुण्य की जगह हमसे पाप हो गया और संध्या नहीं की पाप हो गया अपने समय का प्रयोग उसे नहीं किया पाप हो गया अपनी ड्यूटी नहीं की पाप हो गया कितना पाप हुआ दिन भर में हजारों पाप हम कर जाते हैं हमें पता भी नहीं चलता है और पुण्य तो बहुत प्रयास पूर्वक थोड़ा सा कर पाते हैं, वह भी नहीं करते तो इस प्रकार से हमें विचार करना चाहिए।
तो मैं चर्चा कर रहा था कि हम सब विवेकी बने अनित्य साधनों से नित्य  ।। ऋषि दयानंद का वाक्य है अनित्य साधनों से नित्य सत्ता की उपलब्धि करें और नित्य है आत्म स्वरूप, नित्य है परमात्मा का स्वरूप उसको उपलब्ध करना उसको जानना या आप पुण्य कर्म को बढ़ाएं जिससे अगला जीवन मनुष्य का सुरक्षित हो जाए । क्योंकि यह सब कुछ अनित्य है हमारे पास नहीं रहेगी यह व्यवस्थाएं । फिर कहा अनित्य साधनों के बाद अनित्य असुचि - असुचि क्या है ? असुचि हैं कि यह शरीर अपवित्र है । 
      "शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः।"

शौैचात संसर्ग प्रेरक संसर्गा.. आगे आएगा साधना पाद के अंत में आएगा सूत्र ४०। 
शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः का क्या अर्थ होता है ? इसका क्या अर्थ होता है कि योगी जन साधक अपने शरीर का शोधन करता है और जब शरीर का शोधन करता है तो अपने शरीर से घृणा हो जाती है । अभी मैं अपने एक माह से लगभग संजीवनी क्रिया जिसको एनीमा कहते हैं अंग्रेजी में वो लेता हूं और अन्न लगभग प्रायः नहीं ले रहे हैं फल फ्रूट या कुछ स्प्राउट्स आदि साग ले लेते हैं सब्जी लेते हैं । एनिमा लेते ही इतना मल निकलता था मुझे लगता था की मलका कारखाना है। वाह प्रभु यह कहां मल मूत्र बैठा रखा है ? तो आप विचार करें कि यह मल मूत्र का पिंड इतना गंद है इस शरीर में इतनी बदबू आती है मुख से आ रही है नाक से अपान वायु से पेट साफ नहीं है इतनी गंदगीयां भरी पड़ी हैं ।अब हम सब इस शरीर को देवालय,  शिवालय पता नहीं क्या-क्या मान करके बैठे हैं यह शुद्ध है वाह वाह कितना अच्छा है मधुबन है मधु टपक रहा है यह सब मानना तो यह एक प्रकार से मोक्ष मार्ग में अविद्या है ।
जब योगी को साधक को अपने शरीर से घृणा हो जाती हैं, से प्रभु इतनी गंद हैं हमारा शरीर गंद का घर है दूसरे शरीर से स्पर्श कैसे करु ? असंसर्ग वैराग्य होता है अपने शरीर से वैराग्य होता है घृणा हो जाती हैं। आशुचि और इसको शुचि मानकर के और मैं तो कह रहा हूं कि यह दुनिया में धोखा का कोई प्रकाष्ठा नहीं हद कर दी लोगों ने  आप जितने भी ब्यूटी पार्लर यह सब लोगों को धोखा देना यह शरीर उसकी सजा करके परफ्यूम लगाकर के इतना अच्छा पैकिंग करके परफ्यूम लगाकर सेंट लगा घूम रहे हैं  क्या मायाजाल  है लोगों को फंसा रहें है लोग फंस रहे हैं। और अपने शरीर को सजा कर प्रेस करके चश्मा लगा कर के सेंट परफ्यूम लगा कर घूम रहे हैं ..भाई यह गंदगी है लोगों को धोखा दे रहे हो उसको ऐसे .. क्या करें जी ?
तो यही तो है कि गलत चीजों को, अपने कमजोरी को छुपा रहे हैं, सच्चाई को जब आप उसको देखेंगे इसके अंदर जाकर के तो पता चलेगा की सच्चाई कुछ और है इसको चमक धमक करके रंग रोगन करके इसको दुनिया को दिखाया कुछ और जा रहा है । 
वाह .. संसार की क्या माया है, क्या धोखा है इस संसार में तो यह धोखे में जो पडझ रहे हैं हम सब सच्चाई को जाने स्वीकार करें यह शरीर अशुचि है और इसको हम शुचि पवित्र मान करके जी रहे हैं, तो यह है अविद्या दूसरा रूप अनित्य शुचि दुःख - दुःख को सुख मानकर जी रहे हैं, अब मैं लोगों से यह कहता हूं तो कई लोग यह कहते हैं कि संसार में सुख भी है मैं कहता हूं दयानंद जी ने भी तो लिखा है थोड़ा सा सुख है - अच्छा सतोगुण हो जाता है तो थोड़ा सुख है, सांसारिक चर्चा में ऋषिवर ने लिखा है मैं मानता हूं लेकिन विवेकी की दृष्टि से तत्व ज्ञान की दृष्टि से यदि चर्चा सुन रहे हैं, योग दर्शन पढ़ रहे हैं तो यहां पर अभी आया है 15 वां सूत्र है - "परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः"
सब कुछ दुख ही है विवेक की दृष्टि में, तत्वज्ञान की दृष्टि से यह संसार दुःख ही है । "ही" शब्द लगा हुआ हैं और "ही" जहां लग जाए निश्चयात्मक हो जाता है, फिक्स हो जाता है, उसमें कोई अपवाद नहीं रहता । तो यह संसार दुःख है, और इसको सुख समझ कर के जीना यह कितनी बड़ी अज्ञानता है हम जीव्हा का स्वाद, नासिक का सुख या स्पर्श सुख यह सब सुख हमारा माना हुआ है सुख की अनुभूति सुखाभाष है, सुख नहीं है ।  यह मृगतृष्णा है, संसार दुःख और इसको सुख मान करके जी रहे हैं । तो यह अविद्या का तीसरा रूप हैं । और अविद्या की बात करें, अंतिम बात तो कहा अनात्म सु आत्म सु आत्म ख्याति .. अनात्मा को आत्मा मान कर जी रहे हैं।
अब वह क्या है ? उदाहरण से समझते हैं - मन जड़ हैं, बुद्धि जड़ है लेकिन इसको चेतन मान रहे हैं । कोई कहे मैं तो नहीं मानता मैं तो आर्यसमाजी हूं मैं तो दर्शन पढ़ा हूं .. मैं तो मन को जड़ ही मानता हूं। अच्छा जी तो आपको कहा जाये कि मन जड़ हैं, तो आप ध्यान करिए मन को एक घंटा समाधि लगा लीजिए  आत्म भाव में रोक दीजिए । मन को एक विषय में रोक दीजिए। तो कहते है मन नहीं रुकता जी तो मन जड़ कहां हैं? ये तो चेतन हो गया न । मन को आप नहीं रोक पा रहे हैं तो वह चेतन हो गया न इसका मतलब वह अपने आप भाग रहा है ।
मन जड़ होता .. गाड़ी को अपने ब्रेक लगा दी माना आप कार चला रहे हैं और ब्रेक लगा दिया तो क्या गाड़ी आगे चली जाएगी, बंद कर दिया है स्टार्ट नहीं है तो क्या गाड़ी चलेगी..
आप कहेंगे की गाड़ी को कार को इतनी ऊंचाई पर ले गए कि अब वह ढ़लान पर है गाड़ी बंद भी है ब्रेक भी लगा दी फिर भी फिसलता जा रहा है आगे जो जड़ है। तो अभ्यास हो गया मन को भगाने का प्रेक्टिस हो गया ऑलरेडी मन जड़ है तो मन जड़ है उसको चेतन मान करके की मन पर नियंत्रण नहीं कर पाता हूं जी ।
तन्न्मे मन शिव संकल्प अस्तु  .. भूत भविष्य में जाने वाला मन  शिव संकल्प वाला हो जाए प्रार्थना कर रहे हैं परमात्मा से वेद में 
तो अब यह मन जड़ है इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं, बुद्धि  जड़ हैं इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं शरीर जड़ है इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं अनात्म ..
और एक उदाहरण दे दूं - एक सेठ जी थे तो सेठ जी की फैक्ट्री में आग लग गई। तो उनको सूचना मिली कि फैक्ट्री में आग लग गई
और वो छाती पीट पीट कर रोने लगे मर गया मर गया मर गया 
बगल में कुछ लोग थे बोले  सेठ जी तो जिंदा है कहते हैं मर गया ?
तो बोले भाई मेरी फैक्ट्री जल गई मैं जल गया.. फैक्ट्री में आत्मभाव..इतना अटैचमेंट ।
अभी अभी अपने 50 लाख का कार शो रूम से लिया है और थोड़ा सा तो कुछ लग स्क्रेच जाए तो लगता हैं हृदय पर तलवार चल गया हो,  बाप रे बाप अरे वह कितना नाश हो गया हो तो आत्म भाव जड़ वस्तु में आत्मभाव आ गया अनात्मा में आत्म भाव आ जाता हैं , खरोंच लगी कार पर स्क्रेच आया कार पर और आत्मा में पीड़ा और सीने में दर्द शुरू हो गया परेशान हो रहे हैं हम आत्मभाव ..
अनात्मा में आत्मा बुद्धि करना जड़ में चेतन भाव ले आना यह अविद्या का चौथा रुप हैं।अटेचमेंट .. एक दिन तो निकलना पड़ेगा घर छोड़ कर इसलिए घर को जो जड़ है,  जड़ समझा जाए .. नष्ट हो गया हो गया करोड़ों रुपए गये तो गये ये सब जड़ हैं नाशवान है ऐसे नहीं तो वेसे नाश होता..तो इस भाव से हमें रहना चाहिए।
तो समय  भी आगे बढ़ रहा है और अविद्या के स्वरूप की चर्चा मैंने आपके बीच में थोड़ी विस्तार से रखने का प्रयास किया ।
तो दुख संसार है और इसको सुख ना समझा जाए तो अभी तो चार प्रकार के हम लोगों ने समझा लेकिन क्लेश की दृष्टि से राग द्वेष अस्मिता अभिनिवेश यह सब आप जानते हैं ।
अभिनिवेश का मतलब है मृत्यु का भय ।  तो यह सब जो दुख है अविद्या है क्लेश है । यह संसार ही दुःख सागर है तो अंतिम बात मैं यह आपसे निवेदन करके आज के सत्संग को आज की कक्षा को अब विराम करेंगे । तो यहां पर है चार बातें मैं आपको बोलता हूं -
चार पैर वाले योग दर्शन है चार पंखों वाले चार विभाग वाले एक है
हेय, दूसरा हैं भेय, तीसरा है हान और चौथा है हानोपाय ।
इसलिए रोग, रोग का कारण और उसका उपचार और उसकी औषधि तो अब यहां योगदर्शन में देखिए कि पहले दुख है । हेय का मतलब होता है छोड़ने योग्य । हेय क्या है ? किसको छोड़ जाए ? दुःख को छोड़ा जाये । दुःख हेय हैं उस  दुख का कारण क्या है ? पहला है दुःख, हेय का मतलब दुख जिसको हमे छोड़ना है ।
तो दुख होगा हेय त्याज्य । कारण क्या हैं जिसको हम छोड़ना चाहते हैं ? अब हैं हान = सुख । उस  सुख का उपाय क्या है ? सुख का कारण क्या है ?ये चार चीजो को व्यक्ति यदि को समझ लिया तो योगदर्शन की यथार्थता को समझ लिया। इसमें चार सूत्र आये इसी द्वितीय पाद में साधना पाद में - 
पहला हैं - " हेयं दुखं अनागतम् "और बड़े मजे की बात है क्योंकि दर्शन जो है यह फिलासफी अंग्रेजी में रहते हैं इसमें दार्शनिक बात  लिखा हुआ है एक दुःख जो अभी हमको मिल गया उसको ऋषि ने दुःख नहीं माना .. कि अनागतम्  - आने वाले को दुःख मानते
अब कहेंगे आने वाले क्या ? अब ज्वर हमें हो गया, कोई कष्ट रोग आ गया तो वह तो भोग ही लिया आपने दुःख तो आ ही गया और भोग लिया आपने । दुःख वो जो अभी आने वाला अभी भी बस एक मिनट के बाद थोड़ी देर के बाद वह दुख जो आएगा फ्यूचर में उसको वह दुख है तो कहते हैं हेयं दुखं अनागतम् कौन से दुख को हेय किया जाएगा , छोड़ा जाएगा तो कहा है जो आने वाला है जो दुख भोग लिया है उसको तो भोग करके ही छूटेगा जो जाति आयु भोग प्राप्त हो गया है तो वह तो मिल गया आपको आप चाहकर भी नहीं भाग सकते आप जो भोग फल कर्मफल कर्म  विपाकि जाति के रूप में आयु के रूप में भोग के रूप में मिल गया मनुष्य जीवन के रुप में कैसे भाग जाएंगे आप ? मनुष्य जीवन कैसे छोड़कर भाग जाएंगे मां-बाप को कैसे बदल लेंगे ? अपने जो बुद्धि शरीर व्यवस्था भोग है कर्माशय हैं कैसे बदल लेंगे? इसको तो भोगना ही पड़ेगा ।
योगी भी यदि असंप्रज्ञात समाधि में चला जाए वेदेही भी बन जाए तो भी इसको इग्नोर नहीं कर सकता है इसको छोड़ नहीं सकता इस शरीर को त्याग नहीं कर सकता उसको भोगना पड़ेगा शरीर के रहने तक रहना पड़ता हैं , प्रतीक्षा ( वेट ) करना पड़ता है ।
तो जो दुख हमें मिल गया/ आ गया है उसके लिए तो कुछ चिंता ही नहीं करें क्योंकि आ गया तो भोग लो । 
अब जो भोग के रूप में अभी आया नहीं है अभी कर्माशय में है बीज रुप में हैं वह फल रुप में ना आए उसके तैयारी अनागतम् तो पीछे जो हमारी प्रिवियस लाइफ में जो पहले का हमारा जीवन हुआ उसमें कितना अपराध हुआ पाप इस जीवन में पीछे हमने कितना पाप किया तो उसको बिना भोगे मैं फिर बोल रहा हूं, अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश को समाप्त कर दिया जाये तो उसको नष्ट किया जा सकता है ।

फिर कहते हैं परमात्मा अन्यायकारी हो जायेगा। प्रश्न उठना चाहिए।

हेयं दुखंअनागतं जो दुख आने वाला है जो कर्म से बीज रूप में है उसको बिना भोगे उससे छुटकारा पाया जा सकता है वह योग मार्ग पर चलकर के अविद्या को नाश करके व्यक्ति को उससे छुटकारा मिल जाएगा। परमात्मा न्यायकारी ही रहेगा क्यों रहेगा या आप लोग प्रश्न करेंगे तो इसका उत्तर में समाधान देंगे । 
तो दुःख समझ में आया। अब दुःख के बाद आता है हेय हेतु 
दुख का कारण, उसका हेतु क्या है ? तो कहां दृष्टि दृश्यो संयोगो हेय हेतु  अब इसको समझिए एक तो कहा दुःख है।और एक आने वाले दुःख को दुःख कहा और उसका कारण क्या है ? 
दृष्टिर दृश्यो संयोग:
आत्मा और दृष्टिर कहते हैं आत्मा को अदृश्य कहते हैं प्रकृति को आत्मा और प्रकृति का संयोग, आत्मा और चित्त का संयोग आत्मा और शरीर का संयोग - संयोग होगा हेय हेतु ।
हेय माने दुःख हेतु माने कारण ऋषि ने कह दिया कि दुख का कारण है जन्म । प्रकृति के साथ संयोग । आत्मा का दृश्य के साथ जगत के साथ प्रकृति के साथ संयोग होना दुख का कारण है ।
अब इस बात को समझिए दुख क्या है तो दुख कह दिया जो आने वाला है वह दुख है ।  जो आ गया उसको भोग लिया इसलिए दुःख नहीं माना जाता । और दुख का कारण प्राकृतिक के साथ आत्मा का संयोग । 
अब हान क्या है ? तो कहते हैं हान - आइये अब अगला सूत्र है 25 नंबर 
"तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्। "
तो किसका अभाव दृष्टिर दृश्य के संयोग का अभाव ।
आत्मा दृष्टिर,  दृश्य माने जगत संसार । आत्मा और जगत के संयोग का अभाव मतलब संयोग हट जाना ये हान है ।
तद् दृशे कैवल्यम् ये कैवल्य रुप है ।
तद् दृशे कैवल्यम् इस जगत में केवल्य क्या है ? 
इस संसार में सुख क्या है ? तो कहा कि हान है ।
हान को सुख कहा , आत्मा और प्रकृति का संयोग का अभाव हो जाए इसका  और फिर कहा अंतिम इसका यह जो सुख है संयोग का अभाव हो जाए आत्मा और प्रकृति अलग-अलग हो जाए तो सुख मिलने लग जाएगा। तो कहेंगे इसमें कौनसा सुख है ये कैसा सुख है ?
आपके पेट मे मल भरा पड़ा है, उदाहरण दे देता हूं और ...? दबाव लगा हैं चार घंटे से आप बस में बैठे हुए थे और बस कहीं रुकी नहीं और टायलेट भी नहीं.. तो जैसे ही बस रुकी या आपको टायलेट की व्यवस्था मिली अब वहां आपने टायलेट में मल को विसर्जित किया मूत्र त्याग किया आपको उस समय कैसा अनुभव हुआ? 
मल या मूत्र को बहुत देर से रोके हुए थे ऐसी विकट परिस्थितियों में फंस गए थे और जैसे ही व्यवस्था मिली आप गये टायलेट लेट्रिंग गये.. आ हा हा बहुत सुख मिला त्याग दिया अलग हो गए तो सुख मिला । तो आत्मा और शरीर के संयोग का जो वियोग होता है एक विशेष सुख मिलता हैं वो विशेष सुख वहीं सुख है इत्याग अलग हो जाना विमुंजति तो उसका अब इसका अलंग होने का , आत्मा और संसार का अलग होना सुख हैं । अलग होने का हेतु क्या हैं? उपाय क्या हैं? अलग कैसे होंगे तो ऋषि ने कह दिया-
 "विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः"
तो ऋषि ने अंतिम बात यह कह दी कि विवेकख्याति मतलब यथार्थ ज्ञान यथार्थ बोध अविप्लव 
एक होता हैं विप्लव और विप्लव का मतलब होता है उथल-पुथल कि विप्लव हो गया जी, जल विप्लव हो गया अच्छा, जल प्रलय हो गया। विप्लव का मतलब उथल-पुथल होना और अविप्लव का मतलब उथल-पुथल न होना । विवेकख्याति (कंटीन्यू) लगातार बने रहना तो हम कभी-कभी मूढ़ अवस्था में चलें जाते हैं, विछिन्न अवस्था में चलें जाते हैं कभी उदार अवस्था में आ जाते हैं कभी तनु अवस्था में आ जाते हैं क्लेश कभी हम विवेकी बन जाते हैं कभी अविवेकी बन जाते हैं कभी किंकर्तव्यविमूढ़ बन जाते हैं। क्या करें क्या न करें? तो विवेकख्याति में बाधा (डिस्टरबेंस) न आना । विवेकख्याति विवेक अवस्था में लागातार बने रहना अविप्लव रहना हमेशा विवेक की स्थिति में बने रहना हान जो मोक्ष है जो सुख है उसका उपाय हैं कि विवेक को न डिगने देना, हमेशा विवेक की स्थिति में बने रहना चाहे लाख परिस्थिति आ जाये अपने को न खोना विवेक को बनाएं रखना वह अभ्यास से होता है - ऋतंभरा प्रज्ञा वो स्थिति बनती है। तो सुख का हान का उपाय है विवेकख्याति कि विवेक का लगातार बने रहना और हान है आत्मा और प्रकृति का अलग हो जाना ही ये सुख है हान है कैवल्य हैं मोक्ष हैं परमधाम हैं परम आनंद है। 

                          बहुत बहुत धन्यवाद । 
                              ओम् शम् 🙏

योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।