ओ३म् यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु।
शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥ ( यजुर्वेद ३६/२२)
"हे परमेश्वर, आप जिस-जिस देश से जगत् के रचन और पालन के लिए प्रयास करते हैं, उस-उस देश से हमको भय से रहित करिए".
समस्त उपस्थित आर्य विद्वान सज्जनों एवं विदुषी मातृशक्तियों को नमन् वंदन अभिनन्दन 🙏🌷
आज आर्य संन्यासी स्वामी नित्यानंद जी का असामयिक निधन हुआ।
आप वक्ता डॉ व्यास नंदन शास्त्री जी के सहपाठी रहे हैं। ईश्वर दिवंगत आत्मा को सदगति प्रदान करें ।
मनुष्य प्रतिदिन अपने आसपास लोगों को काल के वशीभूत मृत्यु होते देखते हैं निकटस्थ लोगों के श्मशान में अंतिम संस्कार भी करते हैं यद्यपि अभिनिवेश नामक क्लेश से मनुष्य मृत्यु भय से चिंतित रहते हैं फिर भी जीवित मनुष्य अपने आप को अमर समझ बैठे होते हैं। यही संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य महाभारत में बताया हैं।
यह प्राण - अपान का खेल है । इसी खेल में हमें जीवन जीना है, संसार का व्यवहार भी निभाना हैं और अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्म को जानने का महान लक्ष्य भी ध्यान में रखना हैं।
हम संसार में देखा करते किसी भी यज्ञ अनुष्ठान सामाजिक उत्सव या पारिवारिक संस्कार समारोह में भोग भंडारे में विभिन्न पकवान बनने लगे हैं और इन पकवानों व्यंजनों पेय पदार्थों की इतनी वेरायटी होती है कि किस खाद्य के साथ क्या खाना हैं और क्या त्यागना हैं यह भूल कर सबको चखने खाने और पीने लग जाते हैं। और कोई न खाएं तो कोई मित्र रिश्तेदार या परिजन मनुहार करते हुए खिला पिला देते हैं।
आज लोग थोड़ा मान, थोड़ा बड़ा पद, थोड़ा धन या थोड़ा सा सौन्दर्य, थोड़ा ज्ञान आदि पा कर अभिमान के मद से चूर होकर अपनी इस ईश्वर कृपा से प्राप्त थोड़ी सी शक्ति या पावर को बढ़ा-चढ़ाकर अपनी शान ऐश्वर्य का दिखावा तो करते ही हैं पर बहुत से लोग मौका मिलते ही अपने से कमजोर को नीचा दिखाने में भी बिल्कुल संकोच नहीं करते ।
पर वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें प्राप्त यह सब धन पद मान प्रतिष्ठा अस्थाई हैं। यह आज यदि उनके पास है तो कल उस कमजोर के पास भी जा सकता हैं जिसे वे आज नीचा दिखा रहे हें। इसलिए हमें इस अस्थाई धन पद प्रतिष्ठा की तुलना में स्थाई रहने वाली ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए वेद उपनिषद शास्त्रों का स्वाध्याय, संध्या हवन जप ध्यान और संतों की संगत करते रहना चाहिए।
जब कोई आपसे शत्रुवत व्यवहार करें तो अपने महान पूर्वज ऋषियों के चरित्र और आचरण का स्मरण करना चाहिए। वे करुणा के सागर थे अपने शत्रुओं का भी कल्याण चाहते थे और उन्हें क्षमा कर धर्म का पालन करने का उपदेश देते हुए आत्म कल्याण की ओर प्रेरित करते थे।
पर यदि धर्म का उपदेश करने पर भी कोई अन्यायी अत्याचारी दुष्ट आत्मा न माने तो संसार और धर्म की रक्षार्थ उसे अत्याचारी श्राप⁰ देकर दण्ड देने में एकपल का विलंब भी नहीं करते थे।
टिप्पणी⁰ - सावधान ! हमें अपने तप बल का भलीभांति आंकलन करते हुए क्रोधित होकर श्राप देने के बारे में हजार बार सोच लेना चाहिए।
हमारा इस मंच से सत्य सनातन वैदिक धर्म के विदुषीयों-विद्वानों-कवियों और लेखकों से आव्हान हैं कि आपको घरों में बैठने के लिए सनातन परिवार में यह मनुष्य जीवन नहीं मिला हैं, आप अपनी प्रतिभा का मनुष्य समाज में सत्य सनातन धर्म के जागरण के लिए आगे आए और अपनी क्षमता से काम करें।
भारत की पवित्र भूमि इतनी महत्वपूर्ण हैं कि स्वर्ग में बैठे देवताओं की भी इच्छा होती हैं वे भारत की भूमि पर मनुष्य जन्म लेकर जीवन जीने सौभाग्य पा कर अपनी आध्यात्मिक उन्नति करते हुए ईश्वर भक्ति और दीर्घकालीन मोक्ष सुख के पात्र बने।
हमारे शास्त्र यह घोषणा करते है हम सब ईश्वर की संतान हैं और इस संसार में हमें एक-दूसरे के हितों के साथ पर्यावरण संरक्षण पशु-पक्षी आदि जीवों के संतुलन का ध्यान रख कर जीवन में सांसारिक व्यवहार निभाते हुए आत्मकल्याण करते हुए ब्रह्म को जानने की ओर बढ़ना हैं।
इसके लिए हमें उलूक श्वान भेड़िया चिड़े गरुड़ और गिद्ध वृत्ति से बचना होगा अर्थात् षड्-रिपुदमन करना होगा । अथर्ववेद में मंत्र आया है -
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम् ।
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र ॥ (अथर्ववेद ८/४/२२ )
उलूकयातुं = उल्लू के चाल को
शुशुलूकयातुं = भेडिये की चाल को
श्वयातुमुत = कुत्ते की चाल को (उत = और )
कोकयातुम् = चिडे की चाल को
सुपर्णयातुम् = गरुड़ की चाल को (उत = और )
गृध्रयातुं = गिद्ध की चाल को
जहि = नाश कर, त्याग दे ।
हे इन्द्र = ऐश्वर्याभिलाषी आत्मन्।
रक्ष : = राक्षस को
दृषदा + इव + प्र + मृण = मानो पत्थर से, पत्थर-समान कठोर साधन से मसल दें।
व्याख्या –
योगिजन कामक्रोधादि विकारों को पशु-पक्षियों से उपमा देते हैं, उनका यह व्यवहार इस मंत्र के आधार पर है ।
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उलूक = उल्लू अन्धकार से प्रसन्न होता है । अन्धकार और मोह एक वस्तु है । मूढ़जन मोह के कारण अज्ञानान्धकार में निमग्न रहना पसंद करते हैं । उलूकयातु का सीधा-सादा अर्थ हुआ मोह । मोह सब पापों का मूल है । वात्स्यायन ऋषि ने लिखा है – मोह: पापीयान् = मोह सबसे बुरा है, राग-द्वेषादि इसी से उत्पन्न होते हैं |
शुशुलूक – भेड़िया - मोह से राग-द्वेष उत्पन्न होता है । भेड़िया क्रूर होता है, बहुत द्वेषी होता है।| शुशुलूकयातुम् का भाव हुआ द्वेष की भावना । द्वेषी मनुष्य में क्रोध की मात्रा बहुत होती है ।
श्वान = कुत्ता - कुत्ते से स्वजातिद्रोह तथा चाटुकारिता बहुत अधिक मात्रा में होती है । स्वजाति-द्रोह द्वेष का ही एक रूप है और मत्सर=जलन के कारण होता है । दूसरे की उन्नति न सह सकना मत्सर है । चाटुकारिता लोभ के कारण होती है । लोभ राग के कारण हुआ करता है ।
श्वयातु का अभिप्राय हुआ – मत्सरयुक्त लोभवृत्ति । लोभवृत्ति की जब पूर्ति नहीं होती, तो मत्सर और क्रोध उत्पन्न होते हैं ।
कोक=चिड़ा - चिड़ा बहुत कामातुर होता है, कोक का अर्थ हंस भी होता है। हंस भी बहुत कामी प्रसिद्ध है। कोकयातु का तात्पर्य हुआ कामवासना।
सुपर्ण = सुन्दर परों वाला गरुड़ - गरुड़ पक्षी को अपने सौन्दर्य का बहुत अभिमान होता है । सुपर्णयातु का भाव हुआ – अहंकार-वृत्ति-मन ।
गृध्र =गिद्ध,गिद्ध बहुत लालची होता है,गृध्रयातुम् का भाव हुआ लोभवृत्ति ।
वेद ने इन सबका एक नाम रक्ष:=राक्षस रखा है, अर्थात् मोह, क्रोध, मत्सर, काम, मद और लोभ राक्षस हैं । राक्षस या रक्षस् शब्द का अर्थ है – जिससे अपनी रक्षा की जाए, अपने-आपको बचाया जाए । मोह आदि आत्मा के शत्रु हैं । इनको मार देना चाहिए । जिसे आध्यात्मिक या लौकिक किसी भी प्रकार के ऐश्वर्य की कामना हो, वह इन राक्षसों को मसल दे । मोह आदि में से एक-एक ही बहुत प्रबल एवं प्रचण्ड होता है । यदि किसी मनुष्य पर ये छहों एक साथ आक्रमण कर दें, तो उसकी क्या अवस्था होगी ? अतः मनुष्य को सदा सावधान एवं जागरूक रहना चाहिए और इन षट् विकरो से सावधान होकर बचना है । (+)
‘प्राक्तो अपाक्तो अधरादुदक्तोऽभि जहि रक्षस: पर्वतेन’ (अथर्व.८/४/१९)
अर्थात् आगे से, पीछे से, नीचे से, ऊपर से, सब ओर से राक्षसों को वज्र से मार दे, अर्थात् दुष्टवृत्तियों का सर्वथा सफाया कर दे ।
पुस्तक साभार :- स्वाध्याय – संदोह स्वामी वेदानन्द जी तीर्थ
(+) यद्यपि यह विकार लगें रहेंगे पर इस सब के बीच रह कर परिवार का दायित्व उठा कर ज्ञान और ईश्वर की भक्ति की ओर बढ़ना हैं मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने के लिए क्यों सुर दुर्लभ मनुष्य शरीर बड़े पुण्य से प्राप्त होता है ।
"कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
गोजिद्भूयासमश्वजिद्धनंजयो हिरण्यजित्॥" ( अथर्ववेद ७/५०/८)
मंत्र के अनुसार मनुष्य को "कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः"
अर्थात् मेरे दाहिने हाथ में कर्म (पुरुषार्थ, कर्तव्य या प्रयास) है। और बाएं हाथ में जय (विजय या सफलता) स्थित है। इस भाव से जीवन में कर्म करना चाहिए।
कर्म करने के लिए मनुष्य को अपने शरीर को पूरी तरह स्वस्थ और रोग रहित रखने का सदा ध्यान रखना चाहिए क्योंकि पहला सुख निरोगी काया शास्त्रों में एकमत से लिखा और बताया गया हैं।
स्वस्थ और निरोगी शरीर ही योग और भोग का साधन है ।
रोगी और अस्वस्थ मनुष्य न तो भोग का सुख ले सकता हैं और न ही योग का आनंद।
इसलिए प्रथम उन्नति शारीरिक उन्नति मानी जाती हैं । हित भुक मित भुक ऋत भुक का पालन करते हुए संयमित जीवन जीना है ।
'हित भुक्, मित भुक् और ऋत् भुक्'
हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा दिया गया स्वस्थ जीवन और खान-पान का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सूत्र है।
तीनों शब्दों का अर्थ
हित भुक्—इसका अर्थ है ऐसा भोजन करना जो शरीर के लिए हितकारी यानी फायदेमंद और पौष्टिक हो।
मित भुक्—इसका अर्थ है जितनी भूख हो, पेट उससे कम यानी हल्का खाना। पूरा गला या पेट ठूंसकर नहीं खाना चाहिए।
ऋत् भुक्—इसका अर्थ है प्राकृतिक रूप से ऋतु (मौसम) के अनुसार जो फल, सब्जियां या अनाज पैदा होते हैं, उनका सेवन करना।
ब्रह्मचर्य का पालन कर योग करते हुए देव तुल्य बनना हैं। हंसते हंसते द्वंद्वों को सहना है जैसे हमारे देश और धर्म की आन के लिए स्वतंत्रता सैनानीयो ने अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया।
हम भी धर्म पालन करते हुए जीवन जीने का संकल्प करें।
आज के दिनांक इतिहास में वीर बलिदानी राजगुरु और शोर्यमयी वीरांगना बीना दास की जयंती हैं इन पुण्यात्माओं को शत् शत् नमन वंदन अभिनंदन ।
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आज के दिनांक 24 अगस्त 1960 को स्वतंत्रता सेनानी श्रद्धानंद जी के सुपुत्र इंद्र वाचस्पति जी की पुण्यतिथि भी हैं इनके और इनके भाई के अपने पिता की पैतृक संपत्ति के महान त्याग से भारत को " गुरुकुल कांगड़ी " जैसा तीर्थ प्राप्त हुआ।
अंत में पुनः आज देवेंद्र भाईसाहब के परिचित दिवंगत पुण्यातमा और व्यसनंदन जी के सहपाठी संन्यासी दिवंगत स्वामी नित्यानंद जी दोनों की सदगति की ईश्वर से प्रार्थना सादर श्रद्धांजलि 🍂
ओम् शांति! शांति !! शांति !!!
🙏
॥ ओम् तत् सद् ॥
साभार - डॉ व्यासनंदन शास्त्री जी द्वारा उद्बोधन के अंश
✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा ( २४ अगस्त २०२६ )
*_वयं राष्ट्रे जागृयाम_*
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