जो कहते हैं कि स्वतन्त्रता का बीज दयानन्द ने बोया था, वे दयानन्द का लिखा हुआ एक भी ऐसा लेख नहीं दिखा सकते जो अंग्रेज़ सरकार के विरोध में लिखा गया हो, एक भाषण नहीं बता सकते जो अंग्रेज़ सरकार के विरोध में दिया गया हो। ले-देकर कुछ पंक्तियाँ दिखाते हैं, जो बाद में इनके द्वारा ही प्रक्षिप्त की गई होती हैं। किन्तु हमारे पास सैकड़ों ऐसे प्रमाण हैं - दयानन्द के लिखे हुए, उनकी जीवनियों में लिखे हुए तथा उनके चेलों द्वारा लिखे हुए - जो सिद्ध करते हैं कि दयानन्द अंग्रेज़ सरकार के बड़े प्रशंसक और भक्त थे। सदैव अपने उपदेशों में अंग्रेज़ सरकार की प्रशंसा किया करते थे तथा भारत में उनके बने रहने की कामना किया करते थे। सत्यार्थ प्रकाश में यह जो दयानन्द ने लिखा है, उनके मरने के बाद प्रकाशित सत्यार्थ प्रकाश के संस्करणों में से आर्यसमाजियों ने इस अंश को नहीं छापा है। हाँ प्रक्षेप अनेक कर दिये हैं।
इस बात का एक प्रमाण यह भी है कि स्वामी दयानन्द का कोई पक्का चेला भी कभी अंग्रेज़ सरकार का विरोधी नहीं रहा, बल्कि भक्त ही रहा है- दयानन्द के कारण । उदाहरणस्वरूप - दयानन्द के पक्के चेले पंडित लेखराम अपनी पुस्तक में ब्रिटिश शासन की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं - "इंग्लैंड की रानी और भारत की साम्राज्ञी ने भारत के शासन की बागडोर सँभालने के बाद विद्या और शिक्षा का प्रसार करने का प्रयास किया है। उनकी कृपा और कीर्ति से सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य है। चोर-डाकुओं का दमन कर दिया गया है। देश बदमाशों के आतंक से मुक्त हो चुका है और सब दशाओं को सुधारने के प्रयत्न किए जा रहे हैं।" (तहज़ीब-ए-बरहिनी)
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