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Monday, 17 August 2026

सत्यार्थ प्रकाश की संस्करणों में अशुद्धियों का लगातार शुद्धिकरण

पूर्व के एक लेख में मैंने, सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानन्द के दो झूठ दिखाये। जिसमें पहला झूठ था - स्वामी दयानन्द ने राजा भोज के संजीवनी नामक ग्रंथ का झूठा वर्णन किया, ऐसा कोई ग्रंथ था ही नहीं, न अब है। स्वामी जी ने दूसरा झूठ भोज प्रबंध ग्रंथ का श्लोक लिखकर बोला था, जब कि भोजप्रबंध में ऐसा कोई श्लोक था ही नहीं । आर्यसमाजियों ने इस प्रत्यक्ष दिख रहे स्वामी जी के झूठ को भी झूठ स्वीकार नहीं किया, और न ही इस पर कोई टिप्पणी की, न ही इसका खंडन किया।अब इतने स्पष्ट असत्य की रक्षा बेचार कैसे कर पाये ? किन्तु मेरे नाम से लिखी गयी एक एक पोस्ट पर एक आर्यसमाजी ने कमेन्ट किया कि - "सत्यार्थ प्रकाश में कुछ भी गलत नहीं है, इस पर हठी और दुराग्रही ही आक्षेप करते है"। 

यह केवल इस एक आर्यसमाजी की मान्यता नहीं है, यह सत्य है कि प्रत्येक आर्यसमाजी यही मानता है कि - स्वामी दयानन्द ऋषि थे, महर्षि थे, आप्तपुरुष थे, व्याकरण के सूर्य थे , इसलिए उनकी बनाई सत्यार्थ प्रकाश में सब कुछ सत्य है, यह स्वतः प्रमाण है, इसमें जो भी लिखा है वह अंतिम सत्य है "। 

जब कि वास्तविकता यह है कि - इन नए नए पैदा हुये आर्यसमाजियों को आर्यसमाज और सत्यार्थ प्रकाश का सही इतिहास ही नहीं पता है। ये मूर्ख कहते है कि - "सत्यार्थ प्रकाश में कोई दोष नहीं है , और में घोषणा करता हूँ , कि विश्व की एकमात्र ऐसी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश ही है, जिसमें सर्वाधिक अशुद्धिया है, गलतिया है। और ये अशुद्धिया इस हद तक है कि पिछले सवा सौ वर्ष से इस पुस्तक को अनेकों आर्यसमाजी शुद्ध करने का प्रयास करते आ रहे है, किन्तु यह शुद्ध ही नहीं हो पा रही है।

मेरी तो यहाँ तक इच्छा है कि, गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड वालो से सम्पर्क करके "सर्वाधिक अशुद्धियों वाली और सवा सौ वर्ष से लगातार किए जा रहे शुद्धिकरण के अथक प्रयासो के बाद भी शुद्ध नही हो पा रही " पुस्तक के तौर इसका नाम वर्ल्ड रेकॉर्ड वाली सूची में दर्ज कराया जाये। 

अब में सत्यार्थ प्रकाश की इन हजारो गलतियो में से केवल उन उन गलतियो और परवर्तन को दिखाता हूँ, जो कि केवल आर्यसमाजियों द्वारा स्वीकार की गयी है --- 

 सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण की भूमिका में स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "इस ग्रंथ को भाषा व्याकरणानुसार शुद्ध करके दूसरी बार छपवाया है_ _ _ जो प्रथम छपने में कही कही भूल रही थी, वह निकालकर शोधकर ठीक ठीक कर दी गयी है। "

यानि पहले स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश अपने लिपिकरो से लिखवाई । उसके बाद स्वामी दयानन्द ने उसे जांचा और ठीक किया । फिर उसके बाद उस लिखे हुये को मुद्रित किया गया और फिर मुद्रण प्रतियो के अंश पुनः स्वामी दयानन्द के पास आए , उन्हौने पुनः इसे जाँचकर शुद्ध किया। यानि स्वामी दयानन्द ने अपनी लिखवाई गयी सत्यार्थ प्रकाश को , स्वयं दो बार पढ़कर शुद्ध किया"। 

अब देखिये कैसी हास्यास्पद मूर्खताओ का क्रम चलता है - 

स्वामी दयानन्द ने दो बार सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करके , वैदिक यंत्रालय के प्रबंधकर्ता मुंशी समर्थदान को भेज दिया। स्वाभाविक है मुंशी जी ने भी इसे पढ़ा होगा। फिर इस सत्यार्थ प्रकाश को छाप दिया गया। 

किन्तु इसके बाद इस संस्कारण में 147 अशुद्धिया पाई गई और इसका शुद्धिपत्र जारी कर दिया गया। पुस्तक को शुद्ध करके छापा गया। 

उस समय तक सत्यार्थ प्रकाश को छापने का अधिकार (कॉपीराइट) आर्यसमाज की परोपकारिणी सभा के ही पास था। स्वामी दयानन्द ने इस सभा को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया था। 

तब परोपकारिणी सभा के लोगो ने पुनः पाया कि स्वामी दयानन्द के द्वारा दो बार शुद्ध की गयी, फिर उसके बाद हमारे भी द्वारा 147 अशुद्धियों को शुद्ध करने के बाद भी , सत्यार्थ प्रकाश में अनेक अशुद्धिया रह गयी है। तब सभा ने पाँचवी आवृत्ति छपवाते समय पंडित लेखराम से सत्यार्थ प्रकाश को संशोधित करवाया। इस तरह पाँचवी आवृति 'महाशुद्ध' करवाके परोपकारिणी सभा ने छपवा दी। 

किन्तु हाय रे दुर्भाग्य , पाँचवी आवृत्ति जिसे कि महान पंडित लेखराम द्वारा पूर्ण शुद्ध कर दिया था, इसके बाद भी देखा गया कि सत्यार्थ प्रकाश में तो अभी भी अनेक अशुद्धिया है , संशोधन की आवश्यकता है। 

तब फिर परोपकारिणी सभा ने पाँचवी आवृत्ति से लेकर 39 वी आवृत्ति तक समय समय पर 5 से 6 समितिया आर्यसमाज के विद्वानो की बनाई , जिनका कार्य सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करना था। इन समितियों में स्वामी श्रद्धानंद , भवानीलाल भारतीय सहित अनेकों आर्यसमाज के उस उस समय के विद्वान शामिल किए गए। इस तरह वर्ष दर वर्ष समितिया बना बनाकर सत्यार्थ प्रकाश की अशुद्धियों को दूर करने के लिए महा-महा-शुद्धि अभियान चलाया गया। किन्तु यह पुस्तक शुद्ध न हो सकी, फिर भी अनेक दोष बने रहे।

इसके बाद सत्यार्थ प्रकाश को छापने का परोपकारिणी सभा का कॉपीराइट समाप्त हो गया, तब आर्यसमाज की अन्य सभाओ ने भी सत्यार्थ प्रकाश को अपनी अपनी हैसियत के अनुसार शुद्ध करके छापा, किसने कितनी अशुद्धिया/गलतिया पायी और संशोधन किए है , वह बताते है ------ 

1 - परोपकारिणी सभा ने 35 के लगभग संस्करण निकालकर लगभग 3000 अशुद्धियों को शुद्ध व परिवर्तन किया। 

2- आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट ने भी लगभग 3000 परिवर्तन किए। 

3 - युधिष्ठिर मीमांसक तथा स्वामी विद्यानंद सरस्वती के अलग अलग संस्करणों में लगभग 4500 संशोधन-परिवर्तन किए गए। 

4- स्वामी जगदीशवरानंद सरस्वती के संस्करण में इतने संशोधन किए कि आर्यसमाजी भी गिन नहीं पाये। 

5 - सत्यार्थ प्रकाश न्यास , उदयपुर के संस्करण में 3000 के लगभग परिवर्तन किए गए। 

इस प्रकार आर्यसमाज की भिन्न भिन्न सभाओ ने सत्यार्थ प्रकाश छापी , सभी ने औसतन 3500 अशुद्धियों को ठीक किया, पाठ परिवर्तन किए , जोड़ा घटाया। 

यानि स्वामी दयानन्द जिस शुद्ध सत्यार्थ प्रकाश को देकर गए थे, उसे मूल रूप में "शर्म के मारे" आर्यसमाज की कोई सभा आज के समय में प्रकाशित नहीं कर रही है। सब ने अपनी अपनी "औकात" के अनुसार सत्यार्थ प्रकाश का शुद्धिकरण कर डाला है, अर्थात जोड़ना घटाना कर दिया है, अर्थात सत्यार्थ प्रकाश की इज्जत लूट ली है। .... और हमें ये आर्यसमाज के नए रंगरूट बताते है कि - 'सत्यार्थ प्रकाश में कुछ गलत नहीं है'। और कैसे और कितना गलत होगा मियां ? 

लेकिन बात इतने पर ही न रुकी ..... 140 वर्षो तक आर्यसमाज के बड़े बड़े विद्वानो द्वारा समितिया बना बना कर , और स्वतंत्र रूप से भी लगातार सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करने के प्रयासो के बावजूद सत्यार्थ प्रकाश शुद्ध न हो सकी । :) 

फिर आर्यसमाज के एक विद्वान डॉक्टर सुरेन्द्र कुमार ने इसे "फाइनली महा महा महा शुद्ध करने का बीड़ा उठाया । यहाँ ये भी बताना आवश्यक है कि आर्यसमाजियों में आपस में सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करने को लेकर, जोड़ने घटाने को लेकर , पाठ बदलने को लेकर आपस में मुर्गा-लड़ाई होती रही है। आर्यसमाज का एक पक्ष कहता है कि - जो दो चार हजार परिवर्तन करके स्वामी जी की इज्जत पर रफू कर दिया है इतना ही रहने दो , और आर्यसमाज का दूसरा पक्ष कहता है कि - इतनी शुद्धिया करके भी अशुद्ध रह गयी तो क्या लाभ , इसलिए और ज़ोर लगाकर इसे पूरा शुद्ध करते है, ताकि आगे चलकर दुनिया से कह सके कि - देखो स्वामी दयानन्द इतने बड़े विद्वान थे कि उनकी पुस्तक में एक भी गलती नहीं है । 

खैर आर्यसमाज के डॉक्टर सुरेन्द्र कुमार ने काफी समय श्रम किया , और अंततः सत्यार्थ प्रकाश का अब तक का सबसे शुद्ध संस्करण प्रकाशित करने का दावा किया। इन्हौने भी तीन चार हजार गलतिया सत्यार्थ प्रकाश में निकाल दी, अर्थात इतने परिवर्तन किए। 

लेकिन क्या अब भी सत्यार्थ प्रकाश शुद्ध एवं दोष रहित है ? इसका उत्तर है नहीं । :) सवा सौ से अधिक वर्ष तक , सौ से अधिक संस्करण प्रकाशित करने के बाद , 40 के लगभग आर्यसमाज के संपादकों द्वारा संशोधित संस्करण प्रकाशित करने के बाद भी सत्यार्थ प्रकाश अशुद्ध ही रह गया। अरे जब खुद स्वामी दयानन्द जैसे महान ऋषि ही दो बार शुद्ध करने के बाद खुद ही इसे शुद्ध न कर पाये,तो ये 40 क्या 400 भी लग जाये तो क्या कर पाएंगे ? :) अब बताइये पूरे विश्व में किसी भी पुस्तक को लेकर ऐसा कोई उदाहरण है क्या ? 

आर्यसमाज के रामनाथ वेदालंकार, दयानंद संदेश में लिखते है कि - "हे देव दयानंद, तुम यदि देख पाते कि तुम्हारे सत्यार्थ प्रकाश की कैसी मिट्टी पलीत हो रही है तो तुम रो पड़ते __ _ _ _ तुमने कभी स्वप्न में नहीं सोचा होगा कि तुम्हारे किए कराये हुये सही संशोधन, प्रतिलिपिकर्ता की मिलावट कहकर ठुकरा दिये जाएँगे और तुम्हारी प्रथम पाण्डुलिपि की रफ तथा गलत इबारत को भी रत्न मानकर सँजोया जाएगा "। 

निष्कर्ष यह निकलता है कि, सत्यार्थ प्रकाश में एक दो सौ पाँच सौ नहीं बल्कि हजारो गलतिया थी, छोटी से लेकर बड़ी गलतिया। आर्यसमाजियों ने इन्हे ठीक करने का खूब प्रयास किया , लेकिन गलतिया ही ऐसी ऐसी विचित्र और इतनी थी , कि हर बार कम करे, अगली बार फिर दिख जाती । रक्तबीज की तरह .... । गलतिया ठीक करने के साथ साथ आर्यसमाजियों ने, सत्यार्थ प्रकाश से अनेक चीजों को हटाया भी, कुछ अपनी ओर से जोड़ा भी । मतलब स्वामी जी के अमर ग्रंथ का हाल इन दुष्टो ने उस मजबूर वैश्या जैसा कर दिया, जिससे आकर कोई भी बलात्कार कर जाये । कभी अकेले किया, कभी समितिया बनाकर सामूहिक बलात्कार किया। 

इसका एक कारण तो यह जान पड़ता है कि, आर्यसमाजी नहीं चाहते थे जिन स्वामी दयानन्द की हद से ज्यादा झूठी प्रसंशा वे कर रहे है, सत्यार्थ प्रकाश को पढ़कर लोग सत्य जानेंगे , दूसरा कारण संशोधन का ये रहा कि कई चीजे स्वामी दयानन्द की इन्हे अटपटी लग रही थी। जिसे इन्हौने हटा दिया। तीसरा कारण था कि कुछ अपना भी जोड़ना था । अब इन्हौने क्या क्या परिवर्तन किए और क्या क्या गलतिया थी , इसे संक्षेप में देखिये - 

1 - बीस से अधिक वेदमंत्रो को ही स्वामी दयानन्द ने गलत लिख रखा था । जैसे कि - "सत्यमेव जयति नानृतम्" (पृष्ठ संख्या 4) । "एकं सद् विप्रा बहु वदन्ति (पृष्ठ संख्या 7 ) मूल प्रति । ऐसे ऐसे प्रसिद्ध मंत्र भी स्वामी दयानन्द ने गलत लिखे थे। इन गलतियो को बाद में आर्यसमाजियों ने ठीक किया। 

2 - अनेक संस्कृत वाक्य अशुद्ध लिखे थे - जैसे कि - "गण्यन्ते ये ते गुणा " (गुण्यंते )" (पृष्ठ संख्या 34) ऐसी अनेकों गलतिया स्वामी जी ने की थी, जो आर्यसमाजियों ने सुधारी। 

3 - स्वामी दयानन्द ने गणित की भी अनेक हास्यास्पद गलतिया कर रखी थी जैसे कि - "पृष्ठ संख्या 67 , पर लिखा था कि - छत्तीस और आठ मिलके बयालीस होते है :) , बाद में आर्यसमाजियों ने बयालीस की जगह चौबालीस लिखा। 

"बारह बारह वर्ष मिल के छत्तीश और आठ मिला के बयालीश (समुल्लास 3, मूलस॰ पृष्ठ 47 , द्वितीय स॰ 32 )

ये था स्वामी दयानन्द का अद्भुद गणित का ज्ञान , बारह और बारह को जोड़कर छत्तीश बना दिये :) 

इस प्रकार की अनेक हास्यास्पद साधारण गुना भाग की भी गलतिया स्वामी दयानन्द ने की थी। ऐसी कई गणनात्मक गलतियो को आर्यसमाजी ठीक करते रहे। 

 4 - शब्दो में हजारो गलतिया थी, जो ठीक की गई। 

5 - इसके अलावा कई जगह पाठ परिवर्तन किया, जैसे कि चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानन्द पहले से ही गर्भवती स्त्री से भी नियोग करा रहे थे, इसे संशोधित किया गया। 

6- अब देखिये सत्यार्थ प्रकाश से क्या क्या हटाया गया - समुल्लास दस में मूलप्रति पृष्ठ 365 में लिखा है कि - "(माँस को , चाहे कुत्ते आदि मांसाहारियो को खिला देवे, चाहे कोई मांसाहारी खावे तो भी संसार की हानि नहीं होती ) 

इसके आगे स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "जो ग्राम में कुक्कुट सूअर तथा मांसाहारी सब पशु-पक्षी जो पेट से चलते है, अशुद्धहारी है , मत्स्यादि है, वे सब अभक्ष्य (न खाने योग्य) है, और इनसे भिन्न शुद्धाहारी जांगल सब भक्ष्य है, किन्तु यह बात राजवर्गी मनुष्यो के लिए है । 

यहाँ स्वामी दयानन्द माँस किस किस का खाना चाहिए, यह बता रहे थे। आर्यसमाजियों ने इसे सत्यार्थ प्रकाश से हटा दिया। 

फिर आगे स्वामी दयानन्द "ग्राम के कुक्कुट आदि अभक्ष्य और वनस्थ भक्ष्य है, इसमें क्या युक्ति है " इस प्रश्न के उत्तर में लिखते है कि - " ग्राम के कुक्कुट आदि अशुद्धाहारी , अभक्ष्य और जंगलवासी शुद्धाहारी भक्ष्य है। किन्तु उस मनुष्य का स्वभाव मांसाहारी होकर हिंसक हो सकता है " ( समुल्लास दस , मुद्रणप्रति पृष्ठ 183) 

अब स्वामी दयानन्द मांसभक्षण को पुनः ठीक मानने लगे थे इसका प्रमाण यह है कि , जब शोध करके स्वामी दयानन्द ने ये सत्यार्थ प्रकाश के पृष्ठ , वैदिक यंत्रालय को भेजे थे तब वैदिक यंत्रालय के प्रमुख मुंशी समर्थदास भड़क उठे थे और उन्हौने स्वामी दयानन्द को उलाहना देते हुये पत्र लिखा कि - ""थोड़े थोड़े काल में विचार का बदलना हानिकारक होता है"। आप कभी मांसभक्षण का विरोध करने लगते है, कभी समर्थन करने लगते है। हर कुछ समय में सिद्धान्त बदल लेते है। (यह पत्र आर्यसमाज से प्रकाशित दयानन्द पत्रावली में है , जाकर देख सकते है, और स्वामी दयानन्द का मांसभक्षण का समर्थन करने वाला पत्र इनके द्वारा फाड़ दिया गया था, इसका वर्णन भी दयानन्द पत्रावली में है ) 

 और भी देखिये , मुद्रणप्रति पृष्ठ संख्या 183, समुल्लास दस में स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "तंडुलादि, गोधूम, फल -मूल, कन्द , दूध , घी मिष्ठादि का सेवन और पूर्वोक्त वनस्थ पशुओ के माँस का सेवन राजपुरुष करे"। 

यह भी आर्यसमाजियों ने सत्यार्थ प्रकाश से हटा दिया। ऐसे अनेक तथ्य जिनको लेकर स्वामी दयानन्द ने अपना मत बदल लिया था, किन्तु आर्यसमाजियों को यह ठीक न लगा, उन्हौने सोचा इससे तो बड़ी अप्रतिष्ठा होगी, इसलिए ये सत्यार्थ प्रकाश से हटा दिये गए। यही कारण है कि स्वामी दयानन्द की पुस्तकों में वर्णव्यवस्था, मांसभक्षण, यज्ञोपवीत, मुक्ति आदि अनेक सिद्धांतो पर विरोधी विचार मिलते है। यह सब इसी जोड़ने घटाने का परिणाम है। 

(7) - स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "उत्तम वर्णो के हाथ का खाना और चांडालादि नीच भंगी चमार आदि का न खाना । (समुल्लास 10, मुद्रणप्रति , पृष्ठ संख्या 183। स्वामी दयानन्द के इस जातिवादी घृणा दर्शाने वाले वाक्य को भी हटा दिया गया। 

स्वामी दयानन्द लिखते है - "अयोध्या नगरी वस्ती, कुत्ते, गधे, भंगी, चमार, जाजरू सहित तीन बार स्वर्ग में गयी (समुल्लास 11, मुद्रणप्रति पृष्ठ संख्या 224 ) 

इन पंक्तियो में स्वामी दयानन्द ने भंगी, चमार आदि शब्दो का प्रयोग घृणा के साथ किया था, इसलिए आर्यसमाजियों ने इन वाक्यो को भी हटा दिया।

इसके अतिरिक्त भी शूद्रो के लिए ऐसे वाक्य स्वामी दयानन्द ने कहे थे, वे सब हटाये गए। 

8 - अनेक गलतिया ऐसी भी थी कि -स्वामी जी लिखते है - "इसलिए जो कुछ भी वेदादि शास्त्रो में व्यवस्था व इतिहास लिखे है, उसी का मान्य करना भद्र पुरुषो का काम है । (मूलप्रति पृष्ठ संख्या 304) । यहाँ स्वामी दयानन्द वेदो में इतिहास स्वीकार कर रहे थे, इसे हटा दिया गया। 

कुल मिलाकर अधिक क्या कहे , सत्य तथ्य यह है कि - ऐसी हजारो गलतिया स्वामी दयानन्द की लिखी इस सत्यार्थ प्रकाश में खुद आर्यसमाजियों द्वारा ही मानी और परिवर्तित की गयी है , जिससे यह हमारा कथन सिद्ध होता है कि सत्यार्थ प्रकाश विश्व के इतिहास की सर्वाधिक अशुद्धियों से भरी पुस्तक है। 

अब आर्यसमाजियों के सामने दो विकल्प है - पहला - हजारो गलतियो अशुद्धियों वाली पुस्तक को लिखने वाला व्यक्ति ऋषि महर्षि या आप्तपुरुष नहीं हो सकता, इसे स्वीकार करे और इस झूठ को गाना बंद करे । दूसरा - इसे सच माने कि यह द्वितीय संस्करण स्वामी दयानन्द ने लिखा ही नहीं है। स्वामी दयानन्द ने केवल सत्यार्थ प्रकाश का प्रथम संस्करण ही लिखा था। द्वितीय संस्करण आर्यसमाजियों ने उनके मरने के बाद , खुद से बनाकर छापा इसलिए इसमें हजारो की संख्या में गलतिया है। अब जिनमें थोड़ी बुद्धि शेष है वे आर्यसमाजी इन दोनों में से किसी एक विकल्प को चुन ले।

किन्तु कम से कम इतना बड़ा झूठ बोलकर हिन्दुओ को न बहकाइए कि - स्वामी दयानन्द जैसा विद्वान अन्य कोई न रहा है और उनकी लिखी सत्यार्थ प्रकाश मे कोई गलतिया नहीं है। एवं ये हजारो गलतिया केवल वह है जो कि आर्यसमाजी विद्वानों द्वारा ही स्वीकार की गयी है। इसके अतिरिक्त भी अनेकों बड़ी बड़ी गलतिया झूठ इस पुस्तक में लिखे गए है। कुछ ऐसे झूठो को पूर्व के लेखो में दिखाया जा चुका है, आगे भी दिखाया जाएगा। ॥जय श्री राम॥
साभार - शचींद्र शर्मा 
लिंक - https://www.facebook.com/share/p/17qxmHYToT/
शचीन्द्र शर्मा जी

 कमेंट १ चन्र्दभान सिंह कानावत मेवाड़ 
सुना है कि वर्तमान आर्य समाजियों ने पुरानी सत्यार्थ प्रकाश दयानंद की पुस्तक ही बदल दी हैं। 😁

शचींद्र जी का रिप्लाई 
चन्द्रभान सिंह कानावत मेवाड़ हां यह सत्य है। सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में स्वामी दयानंद ने बांझ गायों की बलि देने को भी उचित ठहराया है। और भी अनेक ऐसी बाते है। दयानंद की मृत्यु के बाद आर्यसमाजियों ने उसे गायब करके यह सत्यार्थ प्रकाश चलाई, इससे संबंधित यह छोटा सा लेख है । https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=122170072202210006&id=61556300201732&mibextid=Nif5oz
 

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