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Wednesday, 19 August 2026

क्या सचमुच स्वामी दयानंद जी गुरुद्रोही हैं ? यदि नहीं तो कृपया आर्य समाजी विद्वान इस पोस्ट पर कमेंट प्रमाणिक संदर्भ सहित करें ।

संसार में गुरुद्रोही तो अनेक हुए होंगे, किंतु इस मामले में भी दयानंद सरस्वती जैसा कोई न हुआ होगा। गुरुद्रोहियों का इतिहास लिखा जाए, तो उसके शिरोमणि दयानंद ही होंगे।

स्वामी जी थोड़े से संतुष्ट नहीं हुआ करते थे। नियोग कराना चाहते थे, तो दो-चार पर न रुके, ग्यारह तक बात पहुँचाई। गुरु बनाने पर आए, तो ऐसे आए कि गुरुओं की झड़ी लगा दी, किंतु सगे किसी के न हुए।

सर्वप्रथम दयानंद ने शृंगेरी मठ के स्वामी पूर्णानंद सरस्वती जी से संन्यास लिया था। दयानंद सरस्वती को यह नाम भी शांकर परंपरा के संन्यासी ने ही दिया था। फिर इनसे गुरुद्रोह किया, किंतु 'सरस्वती' उपाधि को जीवन भर लगाए रखा।

उसके बाद योगानंद जी से योग की शिक्षा प्राप्त की, छिनूर में कृष्णशास्त्री जी से व्याकरण पढ़ा - ये भी शांकर परंपरा से ही थे। इनसे भी गुरुद्रोह किया। फिर दुग्धेश्वर मंदिर में शिवानंद गिरि जी तथा ज्वालानंद पुरी जी को गुरु बनाया... फिर इनसे भी गुरुद्रोह कर दिया। फिर कुछ वर्ष गायब रहे। वह इतिहास मिलता नहीं है। दयानन्द जी की प्रवृत्ति को देखकर हमें विश्वास हैं कि  दो-चार गुरु उतने समय में भी बनाकर छोड़ दिए होंगे।

फिर घूम-फिरकर विरजानंद जी के पास आए और इनको गुरु बनाया। किंतु इनसे भी सब सीख-सिखाकर कुछ वर्षों तक तो गुरु की आज्ञा का पालन किया, फिर इनसे भी द्रोह कर दिया।

अनेक आर्यसमाजी इस भ्रम में, इस झूठ में जीते हैं कि दयानंद ने जो अंट-शंट बक दिया है, जो अवैदिक सिद्धांतों का उपदेश कर गए हैं, उसकी शिक्षा विरजानंद जी ने दी थी,  किंतु वास्तविकता में ऐसा नहीं है। अनेक स्पष्ट, अकाट्य प्रमाण हैं इस बात के कि विरजानंद जी शिव जी तथा दुर्गा माँ के परम भक्त थे, वे केवल भागवत पुराण तथा वैष्णवों का विरोध करते थे।

इनसे पढ़ने के बाद तो दयानंद कथावाचक बन गए थे। जैसा कि उनकी जीवनी में ही लिखा है - 

"परंतु क्वार के महीने से गीता की कथा आरंभ की। रात के समय दो घंटे यह कथा किया करते थे और देवी भागवत (पुराण) से भी अच्छे-अच्छे उपदेश सुनाया करते थे। यह कथा दीपावली के पश्चात् एक मास तक होती रही।"(दयानंद जीवन चरित, पृष्ठ संख्या 49)

स्वामी जी के पास एक गीता और विष्णुसहस्रनाम की पुस्तक थी, जो उन्होंने मंदिर लक्ष्मीनारायण के पुजारी को दे दी। (पृष्ठ संख्या 48)

किंतु विरजानंद से किए गए गुरुद्रोह का दयानंद को क्षोभ अवश्य था, शर्म भी आती थी।  यही कारण था कि वे पुनः उनको मुँह दिखाने कभी न गए। और विरजानंद जी के किसी भी शिष्य से कभी शास्त्रार्थ नहीं किया।

विरजानंद जी के एक शिष्य ने तो दयानंद को पत्र भी लिखा था - जो कि आर्यसमाज के साहित्य में ही है - जिसमें वे कहते हैं:-

"गुरु जी तो ये सब न सिखाते थे, तुमने कहाँ से सीखा? गुरु जी तो दुर्गासप्तशती का पाठ भी किया करते थे, प्रतिदिन गंगा स्नान को जाते थे। हम तुम्हारे पास शास्त्रार्थ को आते हैं और तुम निकल जाते हो।"

इस पत्र का उत्तर दयानंद ने नहीं दिया था।

दयानंद जीवन चरित, पृष्ठ संख्या 240 पर इसकी पुष्टि भी हो जाती है - 

"मथुरा में सबसे बड़ा विचार उनको (दयानंद को) यह रहा कि स्वामी विरजानंद के विद्यार्थी मुझे सहपाठी समझकर इस विचार से न आ जावें कि मैं उनके कारण मूर्तिखंडन न करूँगा।" (पृष्ठ 240)

तथा दयानंद जीवन चरित, पृष्ठ संख्या 64 पर लिखा है - 

"पंडित ब्रह्मशंकर ने स्वयं देवेंद्रबाबू से कहा कि विरजानंद दुर्गापाठ किया करते थे। एक बार दयानंद ने उसका प्रतिवाद किया, तो विरजानंद दंड लेकर उन्हें मारने दौड़े।"

ऐसे अन्य अनेक प्रमाण हैं, जो सिद्ध करते हैं कि विरजानंद का द्वेष केवल वैष्णव मत से था, किंतु मूर्तिपूजा, अवतारवाद, तीर्थ आदि सब सनातनी सिद्धांतों में उनकी श्रद्धा थी। इसीलिए इनसे पढ़ने के बाद कई वर्षों तक दयानंद ने मूर्तिपूजन भी किया, पुराणों की कथाएँ भी कहीं, शैव मत का प्रचार भी किया। इसकी पुष्टि भी दयानंद जीवन चरित से हो जाती है - 

"दयानंद ने सुंदरलाल को शिवलिंग की पूजा और दुर्गाष्टक का पाठ करने का उपदेश दिया था।" (दयानंद जीवन चरित, पृष्ठ संख्या 71)

अतः क्या ऐसा कहना अनुचित होगा कि दयानंद जैसा गुरुद्रोही भी मिलना मुश्किल है? जो किसी गुरु के कहे में न चला। सबसे जो सीखा, सीखा और अंत में अपने अंग्रेज मित्रों की बात मानी या उनसे प्रभावित हो गए। अपना हर सिद्धांत अपने सब गुरुओं के विरुद्ध तथा वेद आदि शास्त्रों के विरुद्ध ही बनाए। कभी किसी समय कुछ कहा, कभी किसी समय कुछ। अपने जीवनकाल में कभी किसी एक सिद्धान्त पर स्थिर नहीं रहे। 

ऐसे भ्रांत व्यक्ति को ऋषि-महर्षि कहना तो पाप है ही, किंतु ऐसे व्यक्ति की बातों का विश्वास तो धर्म के किसी भी विषय पर नहीं करना चाहिए।
✍️ शचीन्द्र शर्मा 
कमेंट से 

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