आर्यसमाजी कृतेश पटेल लिखते हैं -- "जब मराठा हिन्दवी स्वराज्य के लिए लड़ रहे थे, तब अद्वैती क्या कर रहे थे?
शृंगेरी मठ से 'शृंगेरी धर्म स्थान के दस्तावेज' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है। ए. के. शास्त्री द्वारा लिखित इस पुस्तक में टीपू सुल्तान द्वारा 7 अक्तूबर 1791 को लिखा हुआ पत्र भी है, जिसमें टीपू सुल्तान ने अपने शत्रु को हराने के लिए शृंगेरी मठ में सहस्रचंडी जाप करने के लिए धन्यवाद ज्ञापन किया था। इसके अलावा हिजरी 1226 का एक पत्र है, जिसमें टीपू के शत्रु के नाश के लिए तत्कालीन शंकराचार्य सच्चिदानन्द भारती द्वारा सहस्रचंडी होम करने का वर्णन है। जिस शिवाजी के स्वराज्य का नाम लेकर शचीन्द्र शर्मा जी ज्ञान दे रहे हैं, अद्वैतियों के परमगुरु उसी स्वराज्य को नष्ट करने के लिए यज्ञ कर रहे थे। आखिर ऐसा क्यों?"
शचीन्द्र -- दयानन्दी पूछ रहा है कि - 'जब मराठा हिन्दवी स्वराज्य के लिए लड़ रहे थे, तब शंकराचार्य के अनुयायी क्या कर रहे थे?' इस प्रश्न से पता चलता है कि इस दयानन्दी ने इतिहास नहीं पढ़ा है, बस अपनी पुस्तकों में शांकर परंपरा पर लगाए गए आक्षेपों को पढ़कर ही कॉपी-पेस्ट कर दिया है।
दयानन्दी को पता नहीं है कि शिवाजी महाराज के आदर्श समर्थ गुरु रामदास स्वामी शांकर परंपरा के भक्त ही थे तथा उनका मार्गदर्शन लिया करते थे। रामदास जी की शिक्षाओं को पढ़ें, उनमें शांकर परंपरा के ज्ञान, वैराग्य, अद्वैत-वेदान्तीय शब्दावली मिलती है। दासबोध में अद्वैत, ब्रह्म, माया, आत्मज्ञान, द्वैत-निरसन आदि पर व्यापक चर्चा है।
जैसे कि - "अद्वैत म्हणिजे काये । अदृश्य म्हणिजे काये । अच्युत म्हणिजे काये । मज निरोपावें ॥"
आगे रामदास स्वामी कहते हैं -"सत्य ब्रह्माचा संकल्प । मिथ्या मायेचा विकल्प ।"
तो स्वामी रामदास अद्वैती थे या त्रैतवादी? और इन्होंने क्या-क्या किया है, वह पता ही होगा।
उस काल के पेशवा माधवराव बल्लाल ने तो सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य जी को अग्रपूजा हेतु चुना था तथा शंकराचार्य जी को पुणे बुलाया था। ये सभी मराठा शासक शंकराचार्य जी का संरक्षण, धार्मिक वैधता तथा आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया करते थे। इसके सैकड़ो ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। ये शंकराचार्य जी के भक्त कहाएँगे या दयानन्दी विचारधारा के?
दयानन्दी विचारधारा का तो उस काल में कोई था ही नहीं। बल्कि दयानन्द से पहले के पूरे इतिहास में दयानन्दी विचारधारा का कोई मनुष्य नहीं मिलता है।
पेशवा बाजीराव द्वितीय ने भी सार्वजनिक घोषणा की थी कि सभी धार्मिक स्थलों में शृंगेरी शारदा पीठ को प्रथम पूजा का सम्मान दिया जाए। इन्होंने भी स्वयं को शंकराचार्य जी का शिष्य घोषित किया था।
और ये पेशवा प्रसिद्ध भी थे शंकराचार्य के शिष्य के तौर पर। 1805 के ईस्ट इंडिया कंपनी के पत्र में शृंगेरी शंकराचार्य जी के लिए लिखा गया - 'पंडित प्रधान पेशवा बहादुर का गुरु।'
तो ये सब शंकराचार्य जी को सर्वोच्च मानने वाले, उनका आशीर्वाद, मार्गदर्शन की कामना रखने वाले - यह सब त्रैतवादी हुए? दयानंदी बताए कि - अगर अद्वैत परंपरा कुछ नहीं कर रही थी तो ये यह सब पक्ष विपक्ष के शासक सब क्यो शंकराचार्य जी के समर्थन, आशीर्वाद और मार्गदर्शन के लिए लालायित होते थे, घोषणाएँ कर करके स्वयं को उनका शिष्य, भक्त आदि क्यो कहा करते थे?
ब्रिटिश अधिकारी और इतिहासकार जे. बी. सीली ने उल्लेख किया है कि - 18वीं सदी में, एक मजबूत हिंदू शक्ति और शृंगेरी जैसे आध्यात्मिक केंद्र के बीच संबंध हिंदुओं के लिए गौरव और एकता का स्रोत था।
कर्नाटक के अभिलेखागार में प्राचीन पांडुलिपियाँ हैं, उनमें विस्तार से मराठाओं और शांकर पीठ के संबंध, सम्मान आदि का वर्णन है। मूर्ख दयानन्दी जाकर पढ़ ले। उसे इनके संबंध पता चल जाएंगे।
अब शंकराचार्य जी का जो कार्य था - आध्यात्मिक संरक्षण देना, राजनीतिक मार्गदर्शन देना - वह दिया ही करते थे। इसके सैकड़ों ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं, अनेक इतिहासकारों के। वह स्वयं भाला पकड़कर लड़ने तो जाते नहीं। युद्ध तो सैनिक ही लड़ा करते हैं।
हम पूछें कि - जब कारगिल का युद्ध हुआ था तो परोपकारिणी सभा के सदस्य कौन से दयानंदी भवन में सर्प और बकरा लिए बैठे थे ? तो ऐसे प्रश्न का कोई तुक हैं?
फिर आगे दयानन्दी - शांकर पीठ में किए गए - 'सहस्रचंडी' जाप व होम के पत्रों को प्रस्तुत करते हुए पूछ रहा है कि - "जिस शिवाजी के स्वराज्य का नाम लेकर शचीन्द्र शर्मा जी ज्ञान दे रहे हैं, अद्वैतियों के परमगुरु उसी स्वराज्य को नष्ट करने के लिए यज्ञ कर रहे थे।"
यहाँ भी हम कहेंगे कि इसने इस इतिहास को भी नहीं पढ़ा है। बस केवल यह पत्र पढ़कर निष्कर्ष निकाल लिया है। इतिहास पढ़ना या सत्य जानना इनका उद्देश्य नहीं होता है कभी। इनका उद्देश्य होता है - बस बीच में से कहीं से भी कुछ निकालो और आक्षेप करो। इस पूरे प्रकरण को समझिए।
1791 में मराठा सेना 'हिन्दू सेना' नहीं रही थी तथा वह 'हिन्दवी स्वराज्य' के आदर्शों से दूर हो चुकी थी। तब वे मुख्यतः 'मराठा स्वराज्य', यानी अपने राज्य के विस्तार, राजनीतिक प्रभुत्व और आर्थिक लाभ के लिए लड़ रहे थे।
यह सम्मिलित सेना थी, जिसमें मराठा, सिख, मुसलमान और यूरोपीय सैनिक भी शामिल थे। इस सेना में पिंडारी दल भी थे, जिनमें अधिकांश मुसलमान हुआ करते थे। अंग्रेज़, स्कॉटिश, फ्रांसीसी, आयरिश, इतालवी, जर्मन और डच आदि सैनिक अधिकारी थे। तब यह युद्ध धर्मयुद्ध नहीं था, राज्य के लिए युद्ध हो रहे थे।
शृंगेरी मठ की महिमा ये थी कि हिन्दू शासक और मुस्लिम शासक दोनों ही मठ से मैत्रीपूर्ण संबंध चाहते थे। किन्तु स्वाभाविक है कि मठ के संन्यासियों का हृदय मराठाओं की ही तरफ था, और वे उनका निरंतर यथोचित मार्गदर्शन भी किया करते थे।
किन्तु 1791 में एक बड़ा अपराध हुआ। मराठा सेना की एक टुकड़ी ने, जिसका कि पिंडारी दल होने का दावा किया जाता है, शृंगेरी मठ पर आक्रमण कर दिया। यह घृणित हमला मराठा सरदार रघुनाथराव की सेना से जुड़े एक दल ने किया था।
इस दल ने मठ से हाथी, घोड़े, नकदी तथा सब मूल्यवान वस्तुएँ लूटीं, यहाँ तक कि शंकराचार्य जी का दंड और कमंडल भी लूटकर ले गए।
वे इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने मठ में रखी माँ शारदा की प्रतिमा खंडित की तथा कई ब्राह्मणों और संन्यासियों की हत्या की। तथा मठ में जो महिलाएँ थीं, उनके साथ अत्याचार किया।
इन रघुनाथराव के पुत्र त्रिंबकराव का एक पत्र मिलता है, जो उसने अपने चाचा को लिखा था। उसमें वह लिखता है - "सेना के तुंगा नदी पार करने से पहले ही लामान और पिंडारी शिमोग्गा पहुँच गए थे। वे गए और शृंगेरी में स्वामी जी के मठ को लूट लिया। स्वामी का दंड (लाठी) और कमंडलु (पात्र) भी ले लिया गया। कुछ भी नहीं बचा। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया। कई महिलाओं ने आत्महत्या कर ली। स्वामी जी की मूर्ति, लिंग आदि लूट लिए गए।"
तब दयानन्दी बताए कि यह यज्ञ इस अधार्मिक कार्य के विरोध में किया गया था या स्वराज्य को नष्ट करने के लिए किया गया था?
इस घटना की चारों ओर निंदा हुई थी। टीपू सुल्तान ने शृंगेरी के शंकराचार्य जी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उसने इस घटना पर गहरा दुःख और क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा था - "शृंगेरी मठ में घटित घटना का समाचार प्राप्त हुआ। मठ और श्री शारदाम्बा की मूर्ति के साथ जो अनर्थ हुआ, उससे हमें अत्यन्त दुःख हुआ है। जो लोग ऐसे पवित्र स्थान के विरुद्ध पाप करते हैं, उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ेगा। श्री शारदाम्बा की मूर्ति की पुनःप्रतिष्ठा तथा मठ की व्यवस्था को पूर्ववत् करने के लिए आवश्यक सहायता सरकार की ओर से प्रदान की जाएगी। आप श्री देवी की आराधना करें और शत्रुओं के विनाश तथा समृद्धि और कल्याण के लिए तप, जप एवं अनुष्ठान सम्पन्न करें।"
इसके पश्चात टीपू सुल्तान ने मठ की सहायता की तथा इसकी सुरक्षा हेतु सैनिक भेजे।
तब शंकराचार्य जी को क्या करना चाहिए था? उनके संन्यासियों की हत्या करने वालों, उनके आश्रम में महिलाओं पर अत्याचार करने वालों, उनको लूटने वालों को समर्थन देना चाहिए था और इस घटना पर दुःख व्यक्त करने वाले टीपू को श्राप देना चाहिए था?
कोई मुसलमान सत्यार्थ प्रकाश हाथ में भी पकड़ ले तो इनका वक्षस्थल फूल जाता है। किसी मुसलमान ने दयानन्द की प्रशंसा में दो शब्द कह दिए हों तो रोमांचित हो जाते हैं - आहा, देखो हमारे प्यारे करामाती ऋषि की महिमा! लेकिन एक मुस्लिम शासक शंकराचार्य को जगद्गुरु कह रहा है, बार-बार पत्र लिखकर उनसे आशीर्वाद माँग रहा है, शंकराचार्य के कारण यज्ञ पर उसका विश्वास है कि इनके यज्ञ से राज्य के शत्रु नष्ट हो जाएँगे, राज्य में समृद्धि होगी... और यज्ञ के उपरांत वह पत्र लिखकर यज्ञ का प्रभाव भी स्वीकार कर रहा है कि शंकराचार्य जी के यज्ञ के कारण राज्य में वर्षा हुई है और समृद्धि हुई है। इसमें इनको शंकराचार्य जी की महिमा दिखाई नहीं देती।
अतः स्पष्ट है कि यह होम मराठा साम्राज्य का अंत करने या किसी हिंदुत्व की सेना के अंत के लिए नहीं किया गया था, बल्कि इस आक्रमण के प्रतिउत्तर में ऐसे अधर्मियों के विनाश तथा राज्य में समृद्धि, कल्याण और शांति भी इसका उद्देश्य था।
अब इसे समझें कि मान लीजिए टीपू सुल्तान पराजित हो जाता, तब क्या होता? क्या हिन्दू शासन स्थापित हो रहा था?
नहीं। दरअसल मराठा सेना, निजाम की सेना और ब्रिटिश - ये तीन पक्ष संयुक्त होकर टीपू सुल्तान के विरुद्ध उस समय युद्ध लड़ रहे थे। तो राज्य को आपस में बाँटा जाता, न कि भगवा लहराया जाता। उस समय की राजनीति अत्यंत जटिल थी। बिना समझे मूर्ख यह अनुमान करते हैं कि एक तरफ हिन्दू योद्धा थे, दूसरी तरफ मुसलमान थे। ऐसा नहीं था।
और यही हुआ था। तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद टीपू की हुई पराजय के बाद श्रीरंगपट्टणम् की संधि के अनुसार, टीपू को अपना आधा राज्य इनको देना पड़ा था, जिसे इन्होंने तीन हिस्सों में बाँट लिया था। ब्रिटिश इंडिया कंपनी को मालाबार तट, बारामहल आदि महत्वपूर्ण क्षेत्र मिले, उत्तर-पश्चिम के कुछ क्षेत्र पेशवाओं को मिले तथा हैदराबाद के निजाम को कृष्णा और पेन्नार नदियों के बीच के कई क्षेत्र तथा दुर्ग दिए गए।
तो यह आपस में बाँटकर हिन्दूराष्ट्र स्थापित हो रहा था? उस समय की राजनीतिक स्थिति अत्यंत जटिल थी। हम अधिक नहीं लिख रहे हैं, अन्यथा बहुत बड़े भ्रमों के महल भरभराकर गिर पड़ेंगे। बुद्धिमान इतने में ही समझ लेंगे।
आर्यसमाजी कहते हैं कि हमने ही इस धर्म को बचाया है, हमने ही बलिदान दिए हैं - तब हमने प्रतिउत्तर में लेख लिखा था कि शिवाजी महाराज आदि सहित जिन्होंने भी युद्ध लड़े, बलिदान दिए, सब हिन्दू ही थे, मूर्तिपूजक ही थे, आर्यसमाजी विचारधारा का तो कोई था ही नहीं। तब दयानन्दी ने विचार किया, बात तो सत्य है, अतः 'अद्वैती' शब्द ले आया। किन्तु इससे वह बात तो ऐसी की ऐसी ही रहेगी। ये सब अद्वैती न भी हों, किन्तु पौराणिक और मूर्तिपूजक तो रहेंगे ही या नहीं? न ही इससे यह सत्य बदलेगा कि दयानन्द के जन्म से पहले आर्यसमाजी विचारधारा का कोई योद्धा नहीं हुआ है इस धरती पर । इस पंथ का इतिहास तो दयानन्द से ही शुरू होता है।
यह बिल्कुल ऐसे है जैसे हम भी आर्यसमाज को सभाओं में बाँटकर प्रश्न करें। जैसे कि - "जब स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, तब परोपकारिणी सभा कहाँ थी? परोपकारिणी सभा का एक भी सदस्य क्रांतिकारी क्यों न हुआ? बल्कि परोपकारिणी सभा तो खुलकर अंग्रेज़ों का समर्थन करती थी तथा घोषणाएँ किया करती थी कि कोई भी स्वतंत्रता संघर्ष से संबन्धित गतिविधियों में भाग न ले, भाषण न दे, चर्चा ही न करे।
जैसा कि बताया था - इसी परोपकारिणी सभा ने 1891 में नियम बनाया, उसमें कहा गया कि: "आर्यसमाज के किसी भी प्रचारक के लिए यह उचित नहीं है कि वह (अपने भाषण में) किसी राजनैतिक विषय की चर्चा करे या उस पर भाषण दे, या किसी ऐसी संस्था से सम्बन्ध रखे या उसकी बैठकों में सम्मिलित हो, जिसके द्वारा राजनैतिक आन्दोलन किया जाता हो।"
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Comment's
बहुत ही उत्कृष्ट लेख शर्मा जी। श्रृंगेरी शंकराचार्य द्वारा टीपू सुल्तान के लिए किए गए यज्ञ का आक्षेप बहुत लोग करते हैं, यहां तक कि कुछ संघी व भाजपाई के it सेल वाले भी। परंतु एक मराठा टुकड़ी द्वारा श्रृंगेरी मठ पर किए गए वीभत्स आक्रमण का तो अधिकांश जनों को पता ही नहीं। इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार शर्मा जी।🙏🙂 Vipraj Mishra
मराठा कोई बहुत बड़े सनातन धर्म संरक्षक नहीं थे। अपने राज्य विस्तार,धन लिप्सा,प्रभुत्व के लिए युद्ध लड़ते थे। हिन्दू राज्यों,राजाओं से चौथ के लिए युद्ध लड़ते थे। - सागर नैन
कुछ राजनीति में आए क्रांतिकारियों को आर्य समाज के पर्दे के पीछे की कहानी का पता नहीं था क्योंकि उनका जुनून देश के प्रति था । Satyavart Sharma