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Monday, 24 August 2026

सत्ता जब सेवा से कट जाती है, तो पहले वह अहंकार बनती है; अहंकार जब आलोचना से कट जाता है, तो उन्माद बनता है; और उन्माद जब मर्यादा से कट जाता है, तो पतन बन जाता है।

मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ
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भारतीय पुराणों ने मनुष्य को सत्ता के बारे में बहुत पहले ही सावधान कर दिया था। इतना पहले कि तब न चुनाव होते थे, न प्रेस-कॉन्फ्रेंस, न सर्वेक्षण एजेंसियाँ, न सोशल मीडिया की ट्रोल-सेना। फिर भी सत्ता के चरित्र को लेकर मनुष्य की बीमारी वही थी—सिंहासन मिलते ही आदमी अपने कद को भूल जाता है और सिंहासन की ऊँचाई को अपना कद समझने लगता है।

महाराज नहुष इसका प्राचीनतम और शायद सबसे सुंदर उदाहरण हैं।
इंद्र के लुप्त हो जाने पर देवताओं ने नहुष को इंद्रपद दिया। नहुष में तेज था, तप था, पुण्य था, योग्यता थी। किंतु सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अयोग्य को योग्य नहीं बनाती—वह कई बार योग्य को भी अपने भ्रम में अयोग्य बना देती है।

नहुष को इंद्रासन मिला तो भीतर का मनुष्य धीरे-धीरे बाहर के पद में घुलने लगा। जो कभी विनम्र था, वह ऐश्वर्य का अभ्यासी हुआ। फिर अधिकार का अभ्यासी। फिर अधिकार के प्रदर्शन का। और अंततः उसे लगा कि देवताओं के ऊपर बैठने वाला व्यक्ति देवताओं से ऊपर हो गया है।
यहीं से पतन शुरू हुआ।

कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य तब आता है जब नहुष ने सप्तर्षियों को अपनी पालकी उठाने के लिए लगा दिया। ऋषि पालकी ढो रहे थे और इंद्रासन पर बैठा हुआ नहुष अपने को विश्व का स्वामी समझ रहा था। अगस्त्य मुनि की चाल स्वाभाविक रूप से धीमी थी। नहुष अधीर हुआ।

“सर्प! सर्प!”—कहा जाता है कि उसने शीघ्र चलने के लिए प्रेरित किया।
और फिर सत्ता का व्याकरण बदल गया।
उसने अगस्त्य को पैर से स्पर्श किया। ऋषि का शाप मिला—“सर्प योनि में जाओ।”
नहुष गिरा।
जिस ऊँचाई पर वह पहुँचा था, उससे कहीं अधिक ऊँचाई से।

यह केवल एक राजा के सर्प बनने की कथा नहीं है। यह भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक अद्भुत रूपक है।

सत्ता जब सेवा से कट जाती है, तो पहले वह अहंकार बनती है; अहंकार जब आलोचना से कट जाता है, तो उन्माद बनता है; और उन्माद जब मर्यादा से कट जाता है, तो पतन बन जाता है।

आज नहुष हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन नहुषत्व बिल्कुल जीवित है।

आज सप्तर्षियों को पालकी उठाने के लिए बुलाने की आवश्यकता नहीं। सत्ता ने तकनीक विकसित कर ली है। अब पालकी दिखाई नहीं देती; कुर्सी दिखाई देती है। ऋषि दिखाई नहीं देते; अधिकारी, कर्मचारी, समर्थक, पत्रकार, विशेषज्ञ, पार्टी कार्यकर्ता और नागरिक दिखाई देते हैं। और सबसे सुविधाजनक बात यह है कि पालकी भी अब अदृश्य है।

सत्ता में बैठे व्यक्ति को अब यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि “मुझे उठाओ।”
व्यवस्था स्वयं उठाती है।

दरवाज़े स्वयं खुलते हैं। रास्ते स्वयं साफ होते हैं। स्वागत स्वयं होता है। कैमरे स्वयं घूमते हैं। जयकारे स्वयं उत्पन्न होते हैं। समर्थक स्वयं प्रमाणपत्र देते हैं कि जो हो रहा है, वह ऐतिहासिक है।

इतिहास भी बेचारा कई बार सोचता होगा—“मुझे कब बुलाया गया?”

सत्ता का नैतिक पतन किसी एक बड़े अपराध से नहीं होता। वह छोटी-छोटी सुविधाओं से शुरू होता है।
पहले नेता को सुरक्षा घेरे की आदत होती है।
फिर प्रशंसा की।
फिर विरोध से असुविधा होने लगती है।
फिर प्रश्न पूछने वाला शत्रु दिखाई देता है।
फिर आलोचक राष्ट्र-विरोधी, व्यवस्था-विरोधी, विकास-विरोधी या किसी अन्य सुविधाजनक श्रेणी में रख दिया जाता है।

और अंत में राजा को राजा नहीं, अवतार समझने वाले लोग चारों ओर खड़े हो जाते हैं।
यही नहुष का संकट था।

और यही किसी भी लोकतंत्र का संकट है।
लोकतंत्र में सिंहासन नहीं होना चाहिए—लेकिन कुर्सियाँ कभी-कभी सिंहासन से भी अधिक खतरनाक हो जाती हैं। क्योंकि सिंहासन पर बैठने वाला राजा जानता था कि उसके ऊपर देवता हैं, ऋषि हैं, धर्म है, लोकमत है और अंततः मृत्यु है।

आधुनिक सत्ता में समस्या यह है कि आदमी के पास पाँच साल का कार्यकाल होता है और उसके चारों ओर पाँच हजार लोग होते हैं जो उसे बताते रहते हैं कि वह अमर है।
यहाँ नहुष फिर मुस्कुराते हैं।

उन्हें याद आता है कि उन्होंने भी कभी सोचा था कि इंद्रासन स्थायी है।

सत्ता का सबसे बड़ा छल यही है कि वह अपने धारक को अस्थायित्व भूलने देती है।
कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की स्मृति बहुत जल्दी स्थायी हो जाती है।
उसे लगता है—यह सब मेरे कारण है।
वह भूल जाता है कि लोकतंत्र में जनता ने उसे नियुक्त नहीं, उधार दिया है।
जनादेश स्वामित्व-पत्र नहीं होता।
वह एक अस्थायी विश्वास है।

लेकिन जब विश्वास को अधिकार समझ लिया जाता है, तब नैतिकता धीरे-धीरे सरकारी फाइल की तरह नीचे दब जाती है।
और सत्ता पक्ष का नैतिक पतन यहीं से आरंभ होता है।

विरोधी दलों की गलतियाँ गिनाने में सत्ता जितनी दक्ष होती है, अपनी गलतियों को देखने में उतनी ही अंधी।

यह भी नहुष की ही परंपरा है।
क्योंकि अहंकार का सबसे मनोरंजक गुण यह है कि उसे आईना पसंद नहीं आता।
उसे चित्र पसंद आता है।
आईना बताता है—चेहरे पर दाग है।
चित्र बताता है—चेहरा शानदार है।
इसलिए सत्ता को आईने से अधिक चित्रकार चाहिए।

आज के चित्रकार आधुनिक हैं। वे शब्दों से चित्र बनाते हैं। आँकड़ों से बनाते हैं। प्रचार से बनाते हैं। उपलब्धियों की ऐसी माला बनाते हैं जिसमें कभी-कभी फूल कम और प्लास्टिक अधिक होता है।
पर जनता की आँखें अंततः चित्र से नहीं, जीवन से निर्णय करती हैं।
रसोई में महँगाई का दर्शन अलग होता है।
बेरोजगार युवक के कमरे में विकास की परिभाषा अलग होती है।
किसान के खेत में अर्थव्यवस्था का रंग अलग होता है।
और अस्पताल की कतार में नागरिकता का अनुभव किसी भाषण से बिल्कुल अलग।

राजनीति की विडंबना यह है कि सत्ता अक्सर राष्ट्र को नक्शे पर देखती है और जनता उसे रसोई, खेत, नौकरी, सड़क, विद्यालय और अस्पताल में देखती है।
यहीं नैतिकता और प्रचार के बीच दूरी पैदा होती है।
नहुष की कथा हमें यह नहीं बताती कि सत्ता बुरी है।
वह बताती है कि सत्ता के सामने मनुष्य की परीक्षा शुरू होती है।
योग्यता ने नहुष को ऊपर पहुँचाया था।
लेकिन चरित्र उसे वहाँ टिकाकर नहीं रख सका।
यही किसी भी सत्ता पक्ष के लिए सबसे बड़ा पाठ होना चाहिए।

किसी सरकार की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि उसने कितनी सड़कें बनाईं, कितने भवन बनाए, कितनी योजनाएँ घोषित कीं या कितने चुनाव जीते।
उसकी वास्तविक सफलता इस बात में है कि सत्ता मिलने के बाद उसके भीतर विनम्रता कितनी बची।
क्या वह अपने आलोचक को सुन सकती है?
क्या वह अपनी भूल स्वीकार सकती है?
क्या वह अपने समर्थक को भी गलत कह सकती है?
क्या वह कानून को अपने विरोधी और अपने समर्थक के लिए समान रख सकती है?
क्या वह यह स्मरण रख सकती है कि जनता प्रजा नहीं है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या वह अगस्त्य को पैर लग जाने पर शाप से पहले क्षमा माँग सकती है?

नहुष की कथा का आधुनिक संस्करण शायद यही होगा।
एक दिन सत्ता की पालकी रुकती है।
नीचे खड़े लोग थक चुके होते हैं।
ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति चिल्लाता है—“जल्दी चलो!”
कोई धीरे से कहता है—
“महाराज, हम थक गए हैं।”
सत्ता कहती है—
“तुम्हें समझ नहीं कि मैं कौन हूँ?”
और इतिहास बहुत धीरे से उत्तर देता है—
“हमें अच्छी तरह मालूम है। इसी लिए तो पालकी नीचे रख दी है।”
इतिहास का हास्य बड़ा निर्मम होता है।
वह किसी को तत्काल दंड नहीं देता।
वह पहले उसे ऊँचा उठाता है।
फिर उसकी स्मृति में उसका अहंकार सुरक्षित रखता है।
फिर समय बीतने देता है।
और जब लोग उस व्यक्ति का नाम लेते हैं, तो उसके महलों, भाषणों और विजय से अधिक उसकी भूल याद आती है।
नहुष इसलिए अमर नहीं हुए कि वे इंद्र बने थे।
वे इसलिए अमर हुए कि इंद्र बनकर भी मनुष्य रहना भूल गए थे।

आज के सत्ता पक्ष के लिए इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा कि लोकतंत्र ने राजाओं को समाप्त कर दिया, लेकिन राजसी मानसिकता को नहीं।

राजा चला गया।
राजत्व बचा रहा।
सिंहासन चला गया।
सिंहासन-बोध बचा रहा।
और पालकी उठाने वाले सप्तर्षि अब भी कहीं न कहीं मौजूद हैं।
बस फर्क इतना है कि आज उनके हाथ में संविधान है।

और यदि कभी कोई नहुष फिर यह समझ बैठे कि संविधान उसके नीचे है, तो उसे नहुष की कथा एक बार फिर पढ़ लेनी चाहिए।
क्योंकि भारतीय परंपरा का सबसे गहरा राजनीतिक संदेश शायद यही है—
सत्ता सिर पर रखी जाने वाली वस्तु नहीं है; वह सिर झुकाने की परीक्षा है।

जो सिर झुका सकता है, वही लंबे समय तक ऊँचा रह सकता है।
और जो अपने लिए सप्तर्षियों को पालकी ढोने पर मजबूर करता है, उसके लिए इतिहास के पास एक ही पुराना शब्द है— नहुष।
मधुसूदन