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Wednesday, 30 July 2025

मूर्त - अमूर्त

                                मूर्त-अमूर्त 
         न तस्य प्रतिमा अस्ति, यस्य नाम महद्यशः। 
                                       (वाज. यजुर्वेद, ३२/३)
        इस मंत्र के दो अर्थ हैं-
(१) जिसका नाम महद्यश है, उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। यह भाव महद् शब्द में भी है- सबसे महान् का अर्थ ही है, उससे सभी कम हैं, कोई बराबर नहीं है।
(२) महान् व्यक्ति या वस्तु की प्रतिमा होती है।
      जैसा पुरुष सूक्त आदि में है- 
          सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
    इसी अर्थ में अर्जुन ने गीता में कहा है-
  तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।
       (गीता, ११/४६)।
         महान् के यश की प्रतिमा नहीं होती। जैसे व्यक्ति रूप में मेरा रूप रंग, आकार आदि है। पर मेरे यश, विद्या, प्रभाव आदि का रूप या आकार नहीं है। इस अर्थ में लक्ष्मी के भी दो रूप वेद में हैं-जो सम्पत्ति दीखती है, वह लक्ष्मी है, जो नहीं दीखता वह श्री है-
     श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ । (वाज. यजुर्वेद, ३१/२२)
 श्री अर्थात् तेज, महिमा को इसी अर्थ में अलक्ष्मी भी कहा है-
       या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः ।
(चण्डी पाठ, ४/५)
अतः सभी पदार्थों के मूर्त-अमूर्त भेद किये गये हैं। वैशेषिक दर्शन में काल भी एक पदार्थ है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार उसके मूर्त-अमूर्त रूप हैं। अपनी श्वास क्रिया का अनुभव होता है। उसका ४ सेकण्ड का चक्र असु है। उससे छोटे कालमान अमूर्त है, बड़े कालमान मूर्त हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार वस्तुओं का कई कारणों से अनुभव नहीं होता-बहुत बड़ा या बहुत सूक्ष्म, (भागवत पुराण, ३/११/१-४ भी), अपने परिवेश से भिन्न नहीं हो। अनुभव से परे को असत् कहते हैं, उसकी सत्ता है, पर पता नहीं चलता। यदि असत् की सत्ता नहीं है तो उससे सत् या दृश्य जगत् का निर्माण नहीं हो सकता। असतो सदजायत (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१)। गीता में भी कहा है कि यदि असत् का अस्तित्व नहीं होता, उससे कुछ उत्पन्न नहीं होता -
नासतो विद्यते भावो, नाभावो विद्यते सतः 
(गीता, २/१६)।
किसकी प्रतिमा है-
ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः, 
सर्वा गतिः याजुषी हैव शश्वत्।
सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्,
सर्वं हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/३)
ऋग्वेद स्पष्टतः मूर्ति रूप है।
यजुर्वेद गति रूप है, जब चक्रीय गति से उपयोगी उत्पादन हो (गीता, ३/१०, १६)। अतः यज्ञ की प्रक्रिया यजुर्वेद में है। इसमें प्रायः मूर्ति होती है, वस्तु की गति देख सकते है। यज्ञ की हवि (निर्माण के लिए प्रयुक्त सामग्री), निर्मित पदार्थ, यज्ञ वेदी तथा उपकरण आदि दृश्य हैं। उनकी मूर्ति है, कई प्रकार की वेदी निर्माण के आकार वैदिक साहित्य में वर्णित हैं। किन्तु कुछ गति नहीं दीखती है, जैसे शरीर के भीतर श्वास या रक्त सञ्चार, पाचन क्रिया। इनको भी उपकरणों से देखा जा सकता है। मानसिक विचार अमूर्त हैं, पर विचारों का क्रम लिखा जा सकता है। ऋग्वेद के अस्य वामीय सूक्त के अनुसार वाक् के तीन पद गुहा में अदृश्य हैं, बाहरी व्यक्त वाक् वैखरी का अनुभव दूसरे को भी होता है। उसे मूर्त अक्षरों में लिखा भी जाता है।
सामवेद महिमा है। उसकी मूर्ति नहीं होती। किन्तु उसकी माप के लिए चित्र बना कर गणना होती है, जैसे गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत् चुम्बकीय क्षेत्र आदि। महिमा या साम को प्रायः ३ भाग में देखते है, विष्णु सहस्रनाम में एक नाम है-त्रिसामा। सूर्य के प्रभाव क्षेत्र या साम को भी तीन क्षेत्रों में बांटा है-
अग्नि वायु रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातन ।
 (मनु स्मृति, १/२३)
पृथ्वी कक्षा तक ताप या अग्नि क्षेत्र, यूरेनस कक्षा तक सौर वायु, सौर मण्डल की सीमा ३० धाम तक प्रकाश क्षेत्र (ऋक्, १०/१८९/३)। इनको विष्णु के तीन पद भी कहा है। यह मूर्त नहीं है, पर इनकी सीमा की माप वेद में है तथा उनके चित्र बन सकते हैं।
गीता के अध्याय १५ में सभी पदार्थों को पुरुष कहा है। क्षर सभी पदार्थ हैं, उनकी मूर्ति है। उसकी क्रिया या परिचय अदृश्य है। क्रिया दीखती है। यह मूर्त-अमूर्त दोनों है।
क्षरः सर्वाणि भूतानि, कूटस्थोऽक्षर उच्यते।
अव्यय पुरुष की मूर्ति नहीं है, उसकी प्रक्रिया समझने के लिए उसे रेखांकित करते है, या वर्णन करते है।
परात्पर पुरुष कल्पना से परे है।

✍️अरुण कुमार उपाध्याय 

Wednesday, 23 July 2025

पञ्चदशाक्षरी मन्त्र (कादि, हादि एवं सादि विद्या)

पञ्चदशाक्षरी मन्त्र (कादि, हादि एवं सादि विद्या)

√★१. 'कादि विद्या' 'क' से प्रारब्ध ।
√★२. 'हादि विद्या'. 'ह' से प्रारब्ध । 
√★३.'सादि विद्या' 'स' से प्रारब्ध ।

★★★पञ्चदशाक्षरी मन्त्र ★★★

√●(१) ३ ककार, (४) 'शिव वर्ण', 
√●(२) २ हकार, 
√●(३) शेष बीजाक्षर 'शक्तिवर्ण', 
√●(४) ३ ह्रींकार (शिवशक्त्यात्मक ) ॥

√◆३ ककार = शिववर्ण । 
√◆२ हकार = शिववर्ण । 
√◆३ ह्रींकार शिवशक्त्यात्मक। 
√◆शेष वर्ण = शक्तिवर्ण।

♀♀पञ्चदशाक्षरी मन्त्र - क ए ईल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं ,स क ल ह्रीं ।♀♀

★★★श्रीविद्या (त्रिपुरासिद्धान्तप्रतिपाद्य श्रीविद्या) के १२ उपासक हैं। ★★★
 √●१. मनु, 
√●२. चन्द्र, 
√●३. कुबेर, 
√●४. लोपामुद्रा, 
√●५. मन्मथ, 
√●६. अग्नि, 
√●७ सूर्य, 
√●८. इन्द्र, 
√●९. स्कन्द, 
√●१०. शिव, 
√●११. अगस्त्य और 
√●१२. क्रोधभट्टारक दुर्वासा । 

√★इन सभी १२ उपासकों के नाम पर भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय थे और इस प्रकार श्रीविद्या के १२ सम्प्रदाय थे, किन्तु अधिकांश लुप्त हो गये । 

√●अब मुख्यतः दो सम्प्रदाय ही शेष हैं -
 √★१. कामराज सन्तान।
√★२. लोपामुद्रा सन्तान। 

√★लोपामुद्रा सन्तान भी विच्छिन्न है। कामराज सन्तान अविच्छिन्न है। 'कामराजविद्या' ही 'कादिमत' है और लोपामुद्रा विद्या ही 'हादिमत' है। विद्या की ये दो सन्तानें ही आज प्रचलित हैं ।

√★(१) 'वाग्भव कूट' में श्रीकण्ठ (अ) से युक्त क्रोधीश (क), कोणत्रय अर्थात् योनि (त्रिभुज ए), लक्ष्मी (ई), अनुत्तर (अ) के साथ मांस (ल) आते हैं।

√★(२) 'कामराज कूट' में शिव (ह), हंस (स्), ब्रह्मा ( क ), वियत् (ह) एवं शुक्र (ल्) आते हैं। अक्षर (अ) के साथ, शिव (ह) वियत् (ह्) के बिना उपर्युक्त 'कामराज कूट' 'शक्तिकूट' कहा जाता है। प्रत्येक कूट के अन्त में एक-एक हृल्लेखा (ह्रीं ) जोड़ लेना चाहिए। हृल्लेखा के स्वरूप के अन्तर्गत व्योम (ह). अग्नि (र), वामलोचना (ई), बिन्दु (०), अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी ये १२ अङ्ग अन्तर्भूत हैं। बिन्द्वादि ९ के समूह का नाम ही है 'नाद'। इस प्रकार प्रथम में १८ वर्ण, मध्यस्थ में २२ वर्ण एवं अन्तिम में १८ वर्ण - सब मिलाकर ५८ वर्ण होते हैं । 

√●१. मूलाधार से प्रारम्भ करके प्रलयाग्नि के समान भासित 'प्रथम कूट' है, जो कि अनाहत चक्र को स्पर्श करता है । 

√●२. अनाहत चक्र से आगे कोटिसूर्यवत 'द्वितीय कूट' है, जो कि आज्ञाचक्र का स्पर्श करता है ।

√●३. आज्ञा चक्र से आगे ललाट के मध्य भाग में कोटिचन्द्रवत् प्रकाशित 'तृतीय कूट' है।

♂♂
√◆१. जगत् एवं पञ्चदशाक्षरी विद्या में भी कोई भेद नहीं है। दोनों में ऐकात्म्य है-

'ब्रह्मणि जगतो जगति च विद्याभेदस्तु सम्प्रदायार्थः ॥'
३ ककार एवं ईकार→'बिन्दु' ।

२ हल्लेखाऐं →सर्वसिद्धिप्रद एवं सर्वरोगहर चक्र ।

२ हकार एवं एकार →सर्वरक्षाकर, सर्वार्थसाधक एवं सर्वसौभाग्यदायक चक्र ।

२ सकार→सर्वसंक्षोभण, सर्वाशापरिपूरक ।
लकार→चतुरस्र(त्रैलोक्य मोहन)

√●२. माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु, साधक इन पाँचों में ऐक्य है— इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः चेति । पञ्चानामपि भेदाभावो'।

√●३. 'विद्या' भगवती त्रिपुरसुन्दरी एवं कुल कुण्डलिनी से भी अभिन्न है। 'साक्षाद्विद्यैवैषा न ततो भिन्ना जगन्माता' ।

√●४. क ह ल एवं स = शक्ति हल्लेखा ( ह्रीं ) = शिव एवं शक्ति का सामरस्य ।

√●५. वाग्भव कूट का अर्थ सूक्ष्म बुद्धि की विस्तृत व्याप्ति। कामराज कूट का अर्थ - शौर्य, धन, स्त्री, कीर्ति का आधिक्य ।
 क = ब्रह्मा । 
ए = विष्णु । 
अ = ईश ।

 प्रथम कूट = ऋग्वेदात्मक।
 द्वितीय कूट = यजुर्वेदात्मक ।
तृतीय कूट =सामवेदात्मक ।

ह,स = आनन्द ।
 क = सत्य ।
ह = अनन्त । 
ल = ज्ञान।

'विद्या' तृतीय कूट द्वारा ब्रह्म जीव में तादात्म्य स्थापित करती है ।

 स, क, ल पद = जीव का वाचक है। जामत्, स्वप्न, सुषुप्ति । 

शक्तिवीज ह्रीं = ब्रह्म है । 

तृतीय कूट का स क ल पद = 'यह सब ब्रह्म है ॥' 

ककार, एकार एवं अकार = ब्रह्मा, विष्णु, महेश जो स्रष्टा, पालक एवं संहर्ता है। समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म स क ल है यही तृतीय कूट का अर्थ है। 

√●(क) वाग्भवकूट : क ए ई ल ह्रीं = कादि विद्या ।

 √●(ख) कामकूट :ह स क ह ल ह्रीं = लोपामुद्राविद्या ।

√● (ग) शक्तिकूट: स क ल ह्रीं = सादि विद्या ।

★★★कतिपय विद्या प्रकार : ★★★

√★★१. 'अगस्त्य विद्या' - ह ह स क ह स क ए ल ह्रीं ह स ह स क ह ल ह्रीं ।

√★★२. 'नन्दि विद्या' - ह ह स क ह स क ए ल ह्रीं ह स ह स क ह ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं।

√★★३. 'प्रभाकरी विद्या' - क ए ई ल ह्रीं ह स क ए ल ह्रीं ह स ह स क ह ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं स क ल ह्रीं ।

√★★४. 'मानवी विद्या' - ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं स क ल ह्रीं।

 वही (सर्वातिशायी या सर्वोच्च) महेशी देवी जिसका स्वरूप वितर्कातीत हैं। और जो पश्यन्ती आदि मातृकाओं के रूप में व्यक्त होने के कारण त्रिरूपात्मिका हैं। और जो चक्र के रूप में परिणत हो गई हैं ।

विद्वज्जन महेशी एवं चक्र में भी रञ्चमात्र भेद स्वीकार नहीं करते । स्वयमेव परा इन दोनों (देवता एवं चक्र) का सूक्ष्म रूप है । इन दोनों में स्थूल रूप से भी कोई भेद नहीं है।
Sanjeev Sinha 
श्री ललिता महा त्रिपुर सुंदरी ( फेसबुक ग्रुप )

अध्याय १४ कूर्म पुराण की गुरुगीता।

वेदव्यास उवाच- 
एक वर्षसे यथाविधि गुरुकी सेवा करते हुए उनके #समीप निवास करनेवाले शिष्यको यदि गुरु यथार्थ ज्ञानका उपदेश देना प्रारम्भ नहीं करते हैं तो शिष्यके दुष्कृत उस गुरु में आ जाते हैं।**
और गुरु का पतन आरंभ हो जाता है इसी कारण जिसको यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ और जो मनुष्य जितेन्द्रिय और अनासक्त नहीं उसको शिष्यों का संग्रह नहीं करना चाहिए , धन या प्रतिष्ठा के लोभ से जो अवीतरागी और लोभी, कामिनी के दास,स्त्री लम्पट ,क्रोधी, क्षमाहीन और चित्तविश्रांतहीन नर दीक्षा देते हैं वे भवरोग से मुक्त न होकर उनके शिष्यों के पापों का फल ही भोगते रहते हैं। 
-**
संवत्सरोषिते शिष्ये गुरुर्ज्ञानमनिर्दिशन् ।
 हरते दुष्कृतं तस्य शिष्यस्य वसतो गुरुः ॥
कूर्म पुराण उपरिविभाग 
अध्याय 14कूर्म पुराण की गुरुगीता। 
गुरुके आसन, शय्या तथा यानपर कभी भी नहीं बैठना चाहिये। गुरुके दौड़नेपर उनके पीछे दौड़े और चलनेपर उनके पीछे चलना चाहिये ।। १३ ।।

बैल, ऊँट एवं घोड़ेकी सवारी, प्रासाद, प्रस्तर, चटाई, शिलाखण्ड तथा नौकामें गुरुके साथ समान आसनपर बैठा जा सकता है (ऐसी जगहोंपर भी नीचे ही बैठा जाय ऐसा नियम नहीं है)। ब्रह्मचारी सदा जितेन्द्रिय रहे, अपने मनको वशमें रखे, क्रोध न करे, पवित्र रहे, सदा मधुर और हित करनेवाली वाणीका प्रयोग करे ॥ १४-१५ ॥

ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रयत्नपूर्वक सुगन्धित पदार्थों, माला, रस (तीखे रसवाले गुड़ आदि), मद्य, शुक्त* अर्थात् गुड़ आदिके मिश्रणसे बने मादक तीक्ष्ण पदार्थ, प्राणियोंकी हिंसा, तैल आदिका मर्दन, अञ्जन, जूता, छाताका धारण करना, काम, लोभ, भय, निद्रा, गायन, वादन तथा नृत्य, डाँट-फटकार लगाना, निन्दा, स्त्रीदर्शन तथा उसका स्पर्श, दूसरोंको मारना और चुगलखोरी आदिका परित्याग करे ॥ १६-१७॥

जलका घड़ा, पुष्प, गोबर, मिट्टी और कुश इन्हें प्रयोजन भर ही लाना चाहिये । प्रतिदिन भिक्षा माँगनी चाहिये। कृत्रिम लवण और जो भी बासी वस्तु हो, उन सबका त्याग करना चाहिये। (ब्रह्मचारीको) नृत्य नहीं देखना चाहिये और गायन आदिसे नि:स्पृह रहना चाहिये। सूर्यकी ओर (उदय-अस्तके समय तथा अपवित्र दशामें) नहीं देखना।

: इनका (गुरुका) केवल #नाम (सम्मानबोधक उपाधि आदिसे शून्य नाम) परोक्षमें भी नहीं लेना चाहिये।
 इनके चलनेकी क्रिया, बात करनेके ढंग और अन्य क्रियाओंकी नकल उपहासकी दृष्टिसे नहीं करनी चाहिये॥ ५

गुरुका जहाँ परीवाद (विद्यमान दोषका कथन) । हो रहा हो अथवा जहाँ उनकी निन्दा हो रही हो, वहाँ अपने दोनों कानोंको बंद कर ले अथवा वहाँसे अन्यत्र चला जाय। दूर विद्यमान शिष्य (किसी अन्यको गुरुकी पूजाके लिये नियुक्त कर उसके द्वारा) गुरुकी पूजा न करवाये, (यदि स्वयं गुरुके समीप जाकर पूजा करनेमें समर्थ हो । स्वयं गुरुके समीप जानेमें असमर्थ होनेपर तो अन्यके द्वारा भी गुरुकी पूजा करवायी जा सकती है।) क्रोधके आवेशमें रहनेपर शिष्यको स्वयं भी गुरुकी पूजा नहीं करनी चाहिये। यदि गुरु स्त्रीके समीप हों तो उस समय उनकी पूजा नहीं करनी चाहिये। गुरुकी बातका उत्तर नहीं देना चाहिये और गुरुके निकट रहनेपर उनकी आज्ञाके बिना बैठना भी नहीं चाहिये ॥ ६-७॥(शिष्यको चाहिये कि ) गुरुके लिये सर्वदा जलसे पूर्ण घड़ा, कुश, पुष्प तथा समिधा लाये और नित्य उनके अङ्गोंका मार्जन (गुरुको स्नान कराना) तथा (गन्धादिद्वारा) लेपन (शरीरका सुगन्धीकरण) करे। उनके निर्माल्य (गुरुकी सेवामें समर्पित माला आदि), शय्या, खड़ाऊँ, जूता, आसन तथा छाया आदिका कभी भी लंघन नहीं करना चाहिये। गुरुके लिये दन्तकाष्ठ (दाँतोंको स्वच्छ करनेके लिये दतुअन) आदि लाये और (भिक्षादिमें) प्राप्त पदार्थोंको गुरुको निवेदित करे। गुरुसे बिना पूछे कहीं जाये नहीं तथा सदा गुरुके प्रिय तथा हित करनेमें लगा रहे ॥ ८ - १०॥

गुरुके समीप कभी भी पैर फैलाकर बैठना नहीं चाहिये और उनके समीप जँभाई, हँसी, कण्ठाच्छादन (सुन्दर माला, हार आदि गलेमें पहनना) तथा ताली इत्यादिकी ध्वनि (ताल ठोंकना आदि निरर्थक) न करें।

 गुरुके आसन, शय्या तथा यानपर कभी भी नहीं बैठना चाहिये। गुरुके दौड़नेपर उनके पीछे दौड़े और चलनेपर उनके पीछे चलना चाहिये ।। १३ ।।

बैल, ऊँट एवं घोड़ेकी सवारी, प्रासाद, प्रस्तर, चटाई, शिलाखण्ड तथा नौकामें गुरुके साथ समान आसनपर बैठा जा सकता है (ऐसी जगहोंपर भी नीचे ही बैठा जाय ऐसा नियम नहीं है)। ब्रह्मचारी सदा जितेन्द्रिय रहे, अपने मनको वशमें रखे, क्रोध न करे, पवित्र रहे, सदा मधुर और हित करनेवाली वाणीका प्रयोग करे ॥ १४-१५ ॥

ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रयत्नपूर्वक सुगन्धित पदार्थों, माला, रस (तीखे रसवाले गुड़ आदि), मद्य, शुक्त* अर्थात् गुड़ आदिके मिश्रणसे बने मादक तीक्ष्ण पदार्थ, प्राणियोंकी हिंसा, तैल आदिका मर्दन, अञ्जन, जूता, छाताका धारण करना, काम, लोभ, भय, निद्रा, गायन, वादन तथा नृत्य, डाँट-फटकार लगाना, निन्दा, स्त्रीदर्शन तथा उसका स्पर्श, दूसरोंको मारना और चुगलखोरी आदिका परित्याग करे ॥ १६-१७॥

जलका घड़ा, पुष्प, गोबर, मिट्टी और कुश इन्हें प्रयोजन भर ही लाना चाहिये । प्रतिदिन भिक्षा माँगनी चाहिये। कृत्रिम लवण और जो भी बासी वस्तु हो, उन सबका त्याग करना चाहिये। (ब्रह्मचारीको) नृत्य नहीं देखना चाहिये और गायन आदिसे नि:स्पृह रहना चाहिये। सूर्यकी ओर (उदय-अस्तके समय तथा अपवित्र दशामें) नहीं देखना चाहिए।
साभार - ✍️शंकराचार्योंश ब्रह्मानंद अक्षयरुद्र जी

Saturday, 19 July 2025

घाघ और भड्डरी की ज्योतिष संबंधी प्रसिद्ध कहावतें

"घाघ और भड्डरी की ज्योतिष संबंधी प्रसिद्ध कहावतों पर शोधात्मक व्याख्या: एक शोध प्रबंध विश्लेषण।"

प्रस्तावना: भारतीय लोक साहित्य और संस्कृति में घाघ और भड्डरी दो ऐसे नाम हैं, जिनकी कहावतें आज भी ग्रामीण समाज में जीवित हैं। ये कहावतें भारतीय कृषि, ज्योतिष, मौसम विज्ञान, और सामाजिक मान्यताओं का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करती हैं। घाघ और भड्डरी की रचनाएँ अनुभवजनित ज्ञान का खजाना हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से प्रसारित होती रही हैं। इन कहावतों का महत्व केवल साहित्यिक या ऐतिहासिक नहीं है, बल्कि ये व्यावहारिक जीवन में भी उपयोगी हैं, विशेष रूप से कृषि कार्यों और मौसम की भविष्यवाणी के संदर्भ में। इस शोध प्रबंध में हम घाघ और भड्डरी की ज्योतिष संबंधी प्रसिद्ध कहावतों का विश्लेषण करेंगे, उनके वैज्ञानिक आधार को समझेंगे, और उनके सांस्कृतिक महत्व का मूल्यांकन करेंगे। 

घाघ और भड्डरी का परिचय: घाघ और भड्डरी भारतीय लोक कविता के दो प्रमुख स्तंभ हैं, जिनका जीवन और कार्यकाल इतिहास में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है। फिर भी, उनकी कहावतों की लोकप्रियता और प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। घाघ को मुख्य रूप से खेती, नीति, और स्वास्थ्य से संबंधित कहावतों के लिए जाना जाता है, जबकि भड्डरी की रचनाएँ ज्योतिष, मौसम, और आचार-विचार पर केंद्रित हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि ये दोनों एक ही व्यक्ति हो सकते हैं, लेकिन अधिकांश शोधकर्ता इन्हें अलग-अलग व्यक्तित्व मानते हैं।

इन दोनों कवियों की कहावतें सरल, सहज और लयबद्ध हैं, जो ग्रामीण जनमानस में आसानी से रच-बस गई हैं। इनकी रचनाओं में ज्योतिषीय संकेतों, नक्षत्रों की स्थिति, और मौसम के पैटर्न का गहरा ज्ञान झलकता है। ये कहावतें न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं में मार्गदर्शन भी प्रदान करती हैं।

•ज्योतिष और भारतीय कृषि का संबंध: भारतीय संस्कृति में ज्योतिष का कृषि से गहरा संबंध रहा है। प्राचीन काल से ही किसान फसलों की बुवाई, सिंचाई, और कटाई के लिए शुभ मुहूर्त और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति पर निर्भर रहे हैं। ज्योतिष में नक्षत्रों, तिथियों, और ग्रहों की चाल का विश्लेषण करके मौसम की भविष्यवाणी की जाती थी, जो कृषि कार्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। घाघ और भड्डरी की कहावतें इसी परंपरा का लोकप्रिय और सरल रूप हैं।

•ये कहावतें ग्रामीण किसानों के लिए एक प्राकृतिक कैलेंडर की तरह कार्य करती हैं। उदाहरण के लिए, नक्षत्रों के आधार पर बुवाई का समय तय करना या बादलों की स्थिति से वर्षा का अनुमान लगाना इन कहावतों के मुख्य उद्देश्य हैं। यह अनुभवजनित ज्ञान पीढ़ियों के अवलोकन और प्रयोग का परिणाम है, जो आधुनिक मौसम विज्ञान के अभाव में भी किसानों के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ।

घाघ और भड्डरी की ज्योतिष संबंधी प्रसिद्ध कहावतों का विश्लेषण:
घाघ और भड्डरी की कहावतों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: वर्षा संबंधी कहावतें, कृषि कार्यों से संबंधित कहावतें, और स्वास्थ्य एवं जीवनशैली संबंधी कहावतें। नीचे इन श्रेणियों के अंतर्गत कुछ प्रसिद्ध कहावतों का विश्लेषण प्रस्तुत है।

••1. वर्षा संबंधी कहावतें: वर्षा भारतीय कृषि का आधार है, और घाघ-भड्डरी की कहावतें मौसम के संकेतों को समझने में किसानों की सहायता करती हैं। इन कहावतों में बादलों की स्थिति, हवा की दिशा, और ग्रह-नक्षत्रों की चाल का उल्लेख होता है।

कहावत 1: 

"शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय। 
तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।"

- अर्थ: यदि शुक्रवार को बादल छाए रहें और शनिवार को भी यही स्थिति बनी रहे, तो वर्षा अवश्य होगी।

- विश्लेषण: यह कहावत मौसम के पैटर्न पर आधारित है। लगातार दो दिनों तक बादलों का बना रहना नमी के संचय का संकेत देता है, जो वर्षा की संभावना को बढ़ाता है। आधुनिक मौसम विज्ञान में भी बादलों की घनत्व और हवा की नमी (humidity) को वर्षा का प्रमुख कारक माना जाता है। यह कहावत किसानों को खेती के कार्यों, जैसे बुवाई या सिंचाई, की योजना बनाने में सहायता करती है।

- ज्योतिषीय संदर्भ: सप्ताह के दिनों का उल्लेख ज्योतिषीय प्रभाव को दर्शाता है, क्योंकि प्रत्येक दिन किसी न किसी ग्रह से संबंधित माना जाता है। शुक्रवार (शुक्र) और शनिवार (शनि) का संयोजन संभवतः जल तत्व से जुड़ा हुआ है।

•कहावत 2:
"आषाढ़ी पूनौ दिना गाज बीज बसंत, 
ऐसा बोले भड्डरी, आनंद मानो संत।"

- अर्थ: यदि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को बादल गरजें और बिजली चमके, तो चौमासे में अच्छी वर्षा होगी।

- विश्लेषण: आषाढ़ मास (जून-जुलाई) भारत में मानसून का प्रारंभिक समय होता है। पूर्णिमा के दिन गरज और बिजली का होना मानसून की सक्रियता का संकेत है। यह कहावत किसानों को वर्षा की तैयारी के लिए सचेत करती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, बिजली और गरज वायुमंडलीय अस्थिरता (atmospheric instability) का परिणाम होते हैं, जो वर्षा की संभावना को बढ़ाते हैं।

- ज्योतिषीय संदर्भ: पूर्णिमा चंद्रमा की पूर्ण शक्ति का प्रतीक है, जिसे ज्योतिष में जल तत्व से जोड़ा जाता है। यह मौसम और ज्योतिष के बीच संबंध को रेखांकित करता है।

•• 2. कृषि कार्यों से संबंधित कहावतें: कृषि कार्यों के लिए समय का चयन भारतीय किसानों के लिए महत्वपूर्ण रहा है। घाघ और भड्डरी की कहावतें नक्षत्रों और मौसम के आधार पर यह मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

••कहावत 1:
"आर्द्रा धान पुनर्वसु पइया, 
गै किसान जब लाग चिरैया।"

- अर्थ: आर्द्रा नक्षत्र में धान की वृद्धि होती है और पुनर्वसु नक्षत्र में पइया (खरपतवार) बढ़ता है।

- विश्लेषण: आर्द्रा और पुनर्वसु नक्षत्र मानसून के समय (जून-जुलाई) में आते हैं। आर्द्रा नक्षत्र में नमी की अधिकता धान की बुवाई के लिए उपयुक्त होती है, जबकि पुनर्वसु में खरपतवार की समस्या बढ़ती है। यह कहावत किसानों को बुवाई का सही समय चुनने और खरपतवार नियंत्रण की योजना बनाने में मदद करती है।

- ज्योतिषीय संदर्भ: नक्षत्रों का उल्लेख ज्योतिषीय गणना को दर्शाता है। आर्द्रा का संबंध राहु और पुनर्वसु का बृहस्पति से है, जो प्रकृति के चक्रों से जुड़े हैं।

••कहावत 2:
"मघा भूमि अघा मघा न बरसे भरे।
 न खेत मातु न परसे भरे न पेट।"

- अर्थ: मघा नक्षत्र में वर्षा होने से भूमि संतृप्त होती है, जिससे फसल अच्छी होती है। यदि वर्षा न हो, तो न खेत भरता है, न पेट।

- विश्लेषण: मघा नक्षत्र (जुलाई-अगस्त) मानसून के मध्य का समय है। इस समय वर्षा फसलों के लिए जीवनदायिनी होती है। यह कहावत जल संरक्षण और फसल उत्पादन के बीच संबंध को रेखांकित करती है। वैज्ञानिक रूप से, मिट्टी में नमी का स्तर फसलों की वृद्धि के लिए आवश्यक है।

- ज्योतिषीय संदर्भ: मघा नक्षत्र का संबंध केतु से है, जो परिवर्तन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

•••3. स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी कहावतें:            हालांकि यह शोध मुख्य रूप से ज्योतिष पर केंद्रित है, घाघ और भड्डरी की कुछ कहावतें स्वास्थ्य और जीवनशैली से भी संबंधित हैं, जो ज्योतिषीय समय के आधार पर हैं।

••• कहावत 1:
"चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ में पंथ आषाढ़ में बेल।"

- अर्थ: चैत में गुड़, वैशाख में तेल, जेठ में यात्रा, और आषाढ़ में बेल खाना हानिकारक है।

- विश्लेषण: यह कहावत मौसम और स्वास्थ्य के बीच संबंध को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, गर्मी के महीने जेठ में यात्रा से बचना तापमान और थकान से संबंधित हो सकता है। आषाढ़ में बेल का सेवन पाचन संबंधी समस्याओं से जोड़ा जा सकता है, क्योंकि मानसून में नमी बढ़ने से पाचन कमजोर होता है।

- ज्योतिषीय संदर्भ: महीनों का उल्लेख ज्योतिषीय पंचांग पर आधारित है, जो स्वास्थ्य और ग्रहों की स्थिति को जोड़ता है।

•••कहावत 2:
"प्रातःकाल खटिया से उठि के पिये तुरन्ते पानी।
 वाके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के जानी।"

- अर्थ: सुबह उठते ही पानी पीने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और वैद्य की आवश्यकता नहीं पड़ती।

- विश्लेषण: यह कहावत स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को दर्शाती है। सुबह पानी पीना आधुनिक चिकित्सा में भी मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने और शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए उपयोगी माना जाता है।

- ज्योतिषीय संदर्भ: प्रातःकाल का समय सूर्योदय से जुड़ा है, जिसे ज्योतिष में स्वास्थ्य और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

कहावतों का वैज्ञानिक आधार: घाघ और भड्डरी की कहावतें अनुभवजनित ज्ञान पर आधारित हैं, जो प्रकृति के अवलोकन से उत्पन्न हुआ है। इन कहावतों में मौसम के संकेतों, जैसे बादलों की स्थिति, हवा की दिशा, और पशु-पक्षियों की चेष्टाओं का उपयोग किया गया है। आधुनिक मौसम विज्ञान भी इन संकेतों को मान्यता देता है। उदाहरण के लिए:

- बादलों का संचय: लगातार बादल छाए रहना वर्षा का संकेत है, जो वायुमंडल में नमी के स्तर को दर्शाता है।

- नक्षत्र और मौसम: नक्षत्रों की स्थिति वर्ष के मौसम चक्र से मेल खाती है। आर्द्रा और मघा जैसे नक्षत्र मानसून के समय आते हैं, जो फसलों के लिए उपयुक्त हैं।

- स्वास्थ्य संबंधी सलाह: मौसम के अनुसार आहार और जीवनशैली में बदलाव आधुनिक आयुर्वेद और विज्ञान में भी स्वीकार्य हैं।

-हालांकि ये कहावतें वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में सिद्ध नहीं हुईं, फिर भी इनका आधार प्रकृति का दीर्घकालिक अवलोकन है, जो आज भी प्रासंगिक है।

सांस्कृतिक महत्व: घाघ और भड्डरी की कहावतें भारतीय ग्रामीण संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। ये कहावतें न केवल कृषि और ज्योतिष से संबंधित हैं, बल्कि सामाजिक मान्यताओं, नैतिकता, और जीवन दर्शन को भी प्रतिबिंबित करती हैं। इनकी मौखिक परंपरा ने इन्हें पीढ़ियों तक जीवित रखा है। ये कहावतें ग्रामीण समाज में एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सम्मानित हैं और आज भी किसानों के बीच प्रचलित हैं।

-इन कहावतों का साहित्यिक मूल्य भी कम नहीं है। इनकी लयबद्धता और सरल भाषा इन्हें याद रखने और प्रसारित करने में सहायक रही है। यह लोक साहित्य की शक्ति को दर्शाता है, जो औपचारिक शिक्षा के अभाव में भी ज्ञान का संचार करता है।

आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता: आधुनिक युग में मौसम विज्ञान और कृषि तकनीक ने बहुत प्रगति की है, फिर भी घाघ और भड्डरी की कहावतें अपनी उपयोगिता बनाए हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ तकनीकी संसाधनों की पहुँच सीमित है, ये कहावतें किसानों के लिए एक विश्वसनीय मार्गदर्शक हैं। साथ ही, इन कहावतों का अध्ययन आधुनिक विज्ञान के साथ तालमेल बैठाकर कृषि में सुधार के लिए उपयोगी हो सकता है। उदाहरण के लिए, नक्षत्रों और मौसम के पैटर्न का विश्लेषण करके सटीक बुवाई कैलेंडर तैयार किया जा सकता है।

निष्कर्ष: घाघ और भड्डरी की ज्योतिष संबंधी कहावतें भारतीय लोक ज्ञान का एक अनमोल हिस्सा हैं। ये कहावतें कृषि, मौसम, और जीवनशैली के क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान करती हैं और अनुभवजनित ज्ञान का प्रतीक हैं। इनका वैज्ञानिक आधार प्रकृति के अवलोकन में निहित है, जो आधुनिक विज्ञान से भी मेल खाता है। सांस्कृतिक रूप से, ये कहावतें ग्रामीण भारत की पहचान हैं और पीढ़ियों तक जीवित रहने वाली परंपरा का उदाहरण हैं।

-इन कहावतों का अध्ययन और विश्लेषण न केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी उपयोगी है। आधुनिक तकनीक के साथ इनका समन्वय करके कृषि और मौसम विज्ञान में नई संभावनाएँ तलाशी जा सकती हैं। इस प्रकार, घाघ और भड्डरी की कहावतें अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु हैं, जो हमें प्रकृति और संस्कृति के सामंजस्य का पाठ पढ़ाती हैं।
                  साभार ✍️#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

पुरुषों के पौरुष-बल का राज : प्रतिदिन खाएं ये 4 बीज!

पुरुषों के पौरुष-बल का राज : प्रतिदिन खाएं ये 4 बीज! 

आज की तेज भागदौड़ भरी जिंदगी में हर पुरुष चाहता है कि वह शारीरिक रूप से ताकतवर, मानसिक रूप से संतुलित और हर तरह से फिट बना रहे। मगर तनाव, खराब खानपान और लाइफस्टाइल के कारण मर्दाना ताकत (Testosterone Level), स्टैमिना और एनर्जी धीरे-धीरे कम होती जाती है।
     ऐसे में कुछ बीजों का सेवन लाभदायक हो सकता हैं। 

1. कद्दू के बीज (Pumpkin Seeds): 

कद्दू के बीज ज़िंक का बेहतरीन स्रोत हैं, जो टेस्टोस्टेरोन हार्मोन को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा ये बीज प्रॉस्टेट स्वास्थ्य में सुधार लाते हैं और शरीर को आवश्यक एंटीऑक्सीडेंट भी प्रदान करते हैं। विशेषज्ञ इन्हें "पुरुषों का सुपरफूड" मानते हैं। 

2. अलसी के बीज (Flax Seeds): 

अलसी के बीज ओमेगा-3 फैटी एसिड और लिगनन से भरपूर होते हैं। ये न केवल हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं, बल्कि पुरुषों में हार्मोन संतुलन और यौन क्षमता में भी सुधार करते हैं। पिसी हुई अलसी को सुबह पानी या दही के साथ लिया जा सकता है। 

3. चिया बीज (Chia Seeds): 

चिया बीज उच्च प्रोटीन और फाइबर युक्त होते हैं, जो मांसपेशियों के विकास और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। ये बीज लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखने में सहायक हैं, जिससे दिनभर थकान महसूस नहीं होती। रातभर पानी में भिगोकर सुबह सेवन करना सबसे अच्छा तरीका है। 

4. तिल के बीज (Sesame Seeds): 

आयुर्वेद में तिल को बलवर्धक और कामोत्तेजक माना गया है। यह बीज कैल्शियम, मैग्नीशियम और आयरन जैसे खनिजों से भरपूर होता है, जो हड्डियों और संपूर्ण शरीर की ताकत बढ़ाने में सहायक हैं। सर्दियों में तिल से बने लड्डू या चटनी पुरुषों के लिए खासतौर पर फायदेमंद माने जाते हैं।
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