- पति-पत्नी के वैदिक स्वरूप -
भारत में पति तथा पत्नी दोनों का अर्थ स्वामी है, केवल पुल्लिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग का अन्तर है।
चण्डी पाठ में पत्नी के विषय में देव-असुर धारणा का अन्तर कहा गया है। असुरों में स्त्री भी अन्य रत्नों की तरह सम्पत्ति थी। भारत में पति-पत्नी बराबर के थे।
(शुम्भ सन्देश)
रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥१११॥
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्।
सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्॥११२॥
(दुर्गा) यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥१२०॥
(चण्डी पाठ, अध्याय ५)
पत्नी अर्थात् स्वामिनी के विपरीत असुर भाषा के शब्द हैं-
Wife -तवाफ (अरबी) = परिक्रमा करना।
तवाफ = निकट रह कर सेवा करना। तवाफ का बहुवचन तवायफ। त लुप्त होने से वाइफ़।
Mistress (Mrs.) = रखैल। (आजकल एक सम्मानित शब्द बना है-Live-in relation । )
औरत (अरबी) = गुप्ताङ्ग, लज्जाजनक।
(सभी के सन्दर्भ-उर्दू हिन्दी शब्दकोष-मुस्तफा खान मद्दाह, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, तृतीय संस्करण, १९७७)
वेद में पत्नी के ४ रूप कहे गये हैं। (उक्त विवेचना में) इनमें कुछ शब्द केवल प्राचीन अरबी में थे।
पतञ्जलि महाभाष्य के अनुसार वेद में सभी द्वीपों के शब्द हैं। अरब में इसकी नकल हुई कि एक पुरुष ४ स्त्री रख सकता है (उसे पत्नी कहना उचित नहीं है)।
(१) महिषी = महान् अर्थ में, जैसे महिला। प्रायः रानी के लिए महिषी या पट्ट-महिषी का प्रयोग। अभी डाइटिंग फैशन में महिषी (भैंस) कहने पर विवाद होगा। माता तथा पत्नी रूप।
(२) वावाता = स्वामिनी। प्राचीन अरबी में यह शब्द था। अभी यह केन्या में प्रचलित है।
(३) पालागली या तोता-२ पाला (पक्ष) के बीच गली। पिता तथा पति के परिवार के बीच सम्पर्क, दूती। इसके लिए अधिक बोलना पड़ता है। अतः बोलने वाले पक्षी को तोता कहते हैं।
(४) परिवृक्ता-सायण ने इसका अर्थ परित्यक्ता किया है। पर उस अर्थ में वह पत्नी नहीं रहेगी। अन्य ३ रूपों के अतिरिक्त स्वतन्त्र व्यक्तित्व, शिक्षा या व्यवसाय।
चतस्रो जाया उपक्लृप्ता भवन्ति । महिषी वावाता परिवृक्ता पालागली । सर्वा निष्किण्योऽलङ्कृताः । मिथुनस्यैव सर्वत्वाय । (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/१/८)
सायण भाष्य-चतस्रो भार्याः उप समीपे क्लृप्ताः स्थिताः भवन्ति । पालागली दूतदुहिता ।
टिप्पणी-पत्न्यश्चायंत्यलङ्कृताः निष्किण्यो महिषी वावाता परिवृक्ता पालागलीति । (कात्यायन श्रौत सूत्र, २०/१२)- प्रथम परिणीता पत्नी, वावाता वक्लमा, परिवृक्ता अवक्लमा,पालागली दूत पुत्री ।
चतस्रश्च जायाः कुमारी पञ्चमी…..(शतपथ ब्राह्मण, १३/५/२/१-८)
परिवृक्ता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः ।
अनाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥१०॥
वावाता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः ।
श्वाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥११॥
(अथर्व, २०/१२८)
प्रास्मै गायत्रमर्चत वावातुर्यः पुरन्दरः ।
याभिः काण्वस्योप बर्हिरासदं यासद् वज्री भिनत् पुरः ॥ (ऋक्, ८/१/८)
आ त्वाद्यः सधस्तुतिं वावातुः सख्युरा गहि । उपस्तुतिर्मघोनांप्रत्वावत्वधातेवश्मिसुष्टुतिम् ॥
(ऋक्, ८/१/१६)
या वा अपुत्रा पत्नी सा परिवृत्ती (परिवृक्ती)-
(शतपथ ब्राह्मण, ५/३/१/१३)
सुवरीति परिवृक्ती । (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/४/५)
प्रहेयो वै पालागलो (दूतः) व्वानं वै प्रहित एति ।
(शतपथ ब्राह्मण, ५/३/१/१)
यैव प्रथमा वित्ता (भार्य्या) सा महिषी ।
(शतपथ ब्राह्मण, ६/५/३/१)
महिषी धाय्या । (कौषीतकि ब्राह्मण, १५/४)
भुव इति वावाता (पत्नी) ।
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/४/५)
तष्टासि तृष्टिका विषा विषातक्यसि ।
परिवृक्ता यथा सस्यृषभस्य वशेव ॥ (अथर्व, ७/११३/२)
परिवृक्ते पति विद्यमानट् (ऋक्, १०/१०२/११)
सं ते वावाता जरतामियं गीः (ऋक्, ४/४/८)
पति के भी ४ रूप कहे गये हैं-
सोमस्य जाया प्रथमं गन्धर्वस्तेऽपरः पतिः।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः॥
(अथर्व, १४/२/३)
(१) सोम = सौम्य, मित्र जैसा। राजा या विष्णु की तरह उदार।
सोमो वैष्णवो राजेत्याह तस्याप्सरसो विशः ।
(शतपथ ब्राह्मण, १३/४/३/८)
यो वै विष्णुः सोमः सः (शतपथ ब्राह्मण, ३/३/४/२१, ३/६/३/१९)
तत् यत् एव इदं क्रीतो विशति इव तदु हास्य (सोमस्य) वैष्णवं रूपम् (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/२)
(२) गन्धर्व = इनका सम्बन्ध अप्सरा से है। प्रेम सम्बन्ध।
वरुण आदित्यो राजेत्याह तस्य गन्धर्वा विशस्त इम आसत इति। युवानः शोभना उपसमेता भवन्ति (शांखायन श्रौत सूत्र, १६/२/८, आश्वलायन श्रौत सूत्र, १०/७/३, शतपथ ब्राह्मण, १३/४/३/७)
गन्धेन च वै रूपेण च गन्धर्वाप्सरसः चरन्ति (शतपथ ब्राह्मण, ९/४/१/४)
स्त्रीकामा वै गन्धर्वाः (ऐतरेय ब्राह्मण, १/२७)
गन्धर्वाः सप्तविंशतिः (वाज. यजु, ९/७, शतपथ ब्राह्मण, ५/१/४/८)-यहां सायण, महीधर के अनुसार गन्धर्व का अर्थ नक्षत्र है। २७ को अरबी में उलटा लिखने पर ७२ हूर हैं।
(३) अग्नि = अग्रि या अग्रणी। नेता। परिवार चलाने वाला।
स यत् अस्य सर्वस्य अग्रं असृज्यत तस्मात् अग्रिः, अग्रिः ह वै तं अग्निः इति आचक्षते परोऽक्षम् (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/११, प्रायः यही २/२/४/२ में)
इसी अर्थ में कहा है कि अग्नि! हमें अच्छे मार्ग पर ले चलो-
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
(ईशावास्य उपनिषद्, १६, ऋक्, १/१८९/१, वाज. यजु, ५/३६, ७/४३, ४०/१६, तैत्तिरीय सं, १/१/१४/३, ४/४३/१ आदि)
(४) मनुष्य = परिवृक्ता की तरह स्वतन्त्र मनुष्य।
पुरुषो (= मनुष्यः) वै प्रजापतेः नेदिष्टम् (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/१) = प्रायः प्रजापति जैसा, पालक।
मनसि एव भवति। न एनं मनुः (मनन शक्तिः इति -सायण) जहाति (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/८/३) = मनन शक्ति वाला।
इस अर्थ में मन्तु, मन्तुमस्, मन्यु भी कहा गया है।
युवोः अच्छिद्रा मन्तवो ह सर्गाः
(ऋक्, १/१५२/१, मैत्रायणी सं, ४/१४/१० आदि)
आ दत्ते दस्र मन्तुमः, पूषन्नवो वृणीमहे, येन पितृनचोदयः (ऋक्, १/४२/५)
अग्निः इव मन्यो त्विषितः सहस्व
(ऋक्, १०/८४/२, अथर्व, ४/३१/२)
साभार - ✍️ अरुण कुमार उपाध्याय
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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