ग्रामीण वैद्यों का ब्रह्मास्त्र होती थी भैषजमणिमाला
का योग
#मृतसंजीवनी_सुरा(अर्क)
जो कई बार इंजेक्शन से भी जल्दी असर दिखाती थी ओर कोई खास दुष्प्रभाव भी नहीं था।दुर्भाग्य से उल्लूपैथी ओर आबकारी विभाग के षडयंत्र का शिकार हो गई, असुरो के षडयंत्र के कारण बाजार से आउट हो गई जादुई संजीवनी ।
ठन्ड यानी जाड़ा और बरसात के दिनों में होने वाली सभी तरह की बीमारियों में इसका उपयोग करना मरीज की जान बचाने के लिये तो रामबाण था ही मलेरिया में भी बढ़िया काम करती है ।
मृतसन्जीवनी सुरा(अर्क) को एक या दो उपयुक्त आसव या अरिष्ट बराबर- बराबर + बराबर जल के साथ मिलाकर खाने के बाद दोपहर और रात को दिया जाता था/है । कानूनी रूप से अवैध है मगर फिर भी कुछ वैद्य अब भी चोरी छिपे बना कर प्रयोग करते होंगे । आसपास कहीं किसी के पास उपलब्ध हो तो अवश्य प्रयोग करें।
इस ओषधी के उपयोग से वात प्रकूपित दर्दों में बहुत आराम मिलता है । जिन्हे किसी भी तरह का दर्द हो या कमजोरी हो वे इसका उपयोग उपयुक्त आसव या अरिष्ट के साथ मिलाकर करें ।
जिन्हे सर्दी , जुखाम, खांसी, श्वास की तकलीफें हों, वे इसका उपयोग निसंकोच कर सकते है ।
प्रसव के बाद महिलाओं को इस ओषधी का सेवन अवश्य करना चाहिये, यह महिलाओं के जननागों पर बहुत सटीक असर करती है और बहुत प्रभावशाली भी है । इस ओषधी की गठिया,संधिवात आदि तकलीफों में मालिश करने से लाभ होता है ।
अनिद्रा ( जिन्हे नीन्द न आती हो) जिन्हे मानसिक रोग हो, जिन्हे दिमागी काम बहुत अधिक करना रहता हो, वे लोग इसका सेवन अश्वगन्धारिष्ट, सारस्वतारिष्ट, द्राक्षारिष्ट आदि के साथ भोजनोपरान्त करें तो बहुत लाभ होता है।
शास्त्र में इस ओषधी के बहुत से प्रयोग बतलाए गए हैं यह मादक और गर्म स्वभाव की है अतः इसका अधिक उपयोग हानिकारक भी हो सकता है।
इसकी मात्रा 5 मिलीलीटर से 10 मिलीळीटर तक ही है, इससे अधिक इसे कभी भी नहीं लेना चाहिये ।
यह जादुई ओषधी निमोनिया हैजा - सन्निपात बुखार के ठंडे पड़ते शरीर में फिर से गर्मी उत्तपन कर देती है ।
श्वास - दमा,खांसी में तो तुरंत असर करती है/ थी, वात कफ के रोग स्वत: ही गो कुराना गो कुराना करते करते भागने लगेंगे ।
यह कैंसर जैसे भयानक दर्द में भी राहत देती थी/है ।
मानव शरीर 2 द्रव्यों को बहुत शीघ्रता से हजम करता है और हजम किये गये पदार्थ को सीधे सीधे खून में मिला देता है , ये दो द्रव्य हैं अल्कोहल और ग्लूकोज । स्पष्ट बात है कि जब आसव अरिष्ट सुरा जैसी वस्तु के साथ मिलाकर प्रयोग किए जाएंगे तो शरीर में प्रभाव भी शीघ्रता से करेंगे।
मृत सन्जीवनी सुरा आयुर्वेद की एक ऐसी औषधि है जो वाकई में किसी भी बीमारी के कारण मरने वालों के लिये “सन्जीवनी” जैसा काम करती है ।
इस औषधि का योग भैषजमणिमाला में इस प्रकार से दिया गया है ।
नया गुड़ 6 सेर, बबूल(कीकर) की छाल, बेर की छाल, सुपारी प्रत्येक 1 सेर, लोध 20 तोला, अदरख 20 तोला, कूट पीस कर तथा गुड़ को 8 गुना सादे पानी में घोलकर किसी बडे बरतन में डाल दें और इस बरतन का मुख बन्द करके 20 से 25 दिन तक सन्धान के लिये एकान्त में रख दें ।
सन्धान के समय बीतने के बाद इस सारे द्रव्य में सुपारी, एल्वालुक, देवदारू,लौन्ग, पद्माख, खस, सफ़ेद चन्दन, सोया, अजवायन, काली मिर्च, सफ़ेद जीरा, स्याह जीरा, कचूर, जटामासी, दालचीनी, इलायची, जायफल, नागरमोथा, गठिवन, सोन्ठ, मेथी, मेढासिन्गी, चन्दन , ये सब प्रत्येक द्रव्य ढाई ढाई तोला लेकर मिला लें और इसमें 5 सेर पानी और मिलाकर सारी ऊपर की बतायी दवायें घोल दें ।
अब इस सभी द्रव्य को अर्क निकालने वाले “भभका” यन्त्र में डाल कर इसका सुरा रूपी अर्क निकाल लें ।
वास्तव में यह एक प्रकार की ओषधीय सुरा होती है जो उपचार के लिये काम आती है । इस ओषधी का उपयोग पुराने समय के वैद्य उपर बतायी गयी बीमारियों में सफलता पूर्वक किया करते थे, कुछ गिने चुने वैद्य आज भी करते हैं ।
साभार ✍️ग्राम भिष्ज सुरेन्द्र सिंह सुंदर
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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