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Wednesday, 30 July 2025

मूर्त - अमूर्त

                                मूर्त-अमूर्त 
         न तस्य प्रतिमा अस्ति, यस्य नाम महद्यशः। 
                                       (वाज. यजुर्वेद, ३२/३)
        इस मंत्र के दो अर्थ हैं-
(१) जिसका नाम महद्यश है, उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। यह भाव महद् शब्द में भी है- सबसे महान् का अर्थ ही है, उससे सभी कम हैं, कोई बराबर नहीं है।
(२) महान् व्यक्ति या वस्तु की प्रतिमा होती है।
      जैसा पुरुष सूक्त आदि में है- 
          सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
    इसी अर्थ में अर्जुन ने गीता में कहा है-
  तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।
       (गीता, ११/४६)।
         महान् के यश की प्रतिमा नहीं होती। जैसे व्यक्ति रूप में मेरा रूप रंग, आकार आदि है। पर मेरे यश, विद्या, प्रभाव आदि का रूप या आकार नहीं है। इस अर्थ में लक्ष्मी के भी दो रूप वेद में हैं-जो सम्पत्ति दीखती है, वह लक्ष्मी है, जो नहीं दीखता वह श्री है-
     श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ । (वाज. यजुर्वेद, ३१/२२)
 श्री अर्थात् तेज, महिमा को इसी अर्थ में अलक्ष्मी भी कहा है-
       या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः ।
(चण्डी पाठ, ४/५)
अतः सभी पदार्थों के मूर्त-अमूर्त भेद किये गये हैं। वैशेषिक दर्शन में काल भी एक पदार्थ है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार उसके मूर्त-अमूर्त रूप हैं। अपनी श्वास क्रिया का अनुभव होता है। उसका ४ सेकण्ड का चक्र असु है। उससे छोटे कालमान अमूर्त है, बड़े कालमान मूर्त हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार वस्तुओं का कई कारणों से अनुभव नहीं होता-बहुत बड़ा या बहुत सूक्ष्म, (भागवत पुराण, ३/११/१-४ भी), अपने परिवेश से भिन्न नहीं हो। अनुभव से परे को असत् कहते हैं, उसकी सत्ता है, पर पता नहीं चलता। यदि असत् की सत्ता नहीं है तो उससे सत् या दृश्य जगत् का निर्माण नहीं हो सकता। असतो सदजायत (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१)। गीता में भी कहा है कि यदि असत् का अस्तित्व नहीं होता, उससे कुछ उत्पन्न नहीं होता -
नासतो विद्यते भावो, नाभावो विद्यते सतः 
(गीता, २/१६)।
किसकी प्रतिमा है-
ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः, 
सर्वा गतिः याजुषी हैव शश्वत्।
सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्,
सर्वं हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/३)
ऋग्वेद स्पष्टतः मूर्ति रूप है।
यजुर्वेद गति रूप है, जब चक्रीय गति से उपयोगी उत्पादन हो (गीता, ३/१०, १६)। अतः यज्ञ की प्रक्रिया यजुर्वेद में है। इसमें प्रायः मूर्ति होती है, वस्तु की गति देख सकते है। यज्ञ की हवि (निर्माण के लिए प्रयुक्त सामग्री), निर्मित पदार्थ, यज्ञ वेदी तथा उपकरण आदि दृश्य हैं। उनकी मूर्ति है, कई प्रकार की वेदी निर्माण के आकार वैदिक साहित्य में वर्णित हैं। किन्तु कुछ गति नहीं दीखती है, जैसे शरीर के भीतर श्वास या रक्त सञ्चार, पाचन क्रिया। इनको भी उपकरणों से देखा जा सकता है। मानसिक विचार अमूर्त हैं, पर विचारों का क्रम लिखा जा सकता है। ऋग्वेद के अस्य वामीय सूक्त के अनुसार वाक् के तीन पद गुहा में अदृश्य हैं, बाहरी व्यक्त वाक् वैखरी का अनुभव दूसरे को भी होता है। उसे मूर्त अक्षरों में लिखा भी जाता है।
सामवेद महिमा है। उसकी मूर्ति नहीं होती। किन्तु उसकी माप के लिए चित्र बना कर गणना होती है, जैसे गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत् चुम्बकीय क्षेत्र आदि। महिमा या साम को प्रायः ३ भाग में देखते है, विष्णु सहस्रनाम में एक नाम है-त्रिसामा। सूर्य के प्रभाव क्षेत्र या साम को भी तीन क्षेत्रों में बांटा है-
अग्नि वायु रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातन ।
 (मनु स्मृति, १/२३)
पृथ्वी कक्षा तक ताप या अग्नि क्षेत्र, यूरेनस कक्षा तक सौर वायु, सौर मण्डल की सीमा ३० धाम तक प्रकाश क्षेत्र (ऋक्, १०/१८९/३)। इनको विष्णु के तीन पद भी कहा है। यह मूर्त नहीं है, पर इनकी सीमा की माप वेद में है तथा उनके चित्र बन सकते हैं।
गीता के अध्याय १५ में सभी पदार्थों को पुरुष कहा है। क्षर सभी पदार्थ हैं, उनकी मूर्ति है। उसकी क्रिया या परिचय अदृश्य है। क्रिया दीखती है। यह मूर्त-अमूर्त दोनों है।
क्षरः सर्वाणि भूतानि, कूटस्थोऽक्षर उच्यते।
अव्यय पुरुष की मूर्ति नहीं है, उसकी प्रक्रिया समझने के लिए उसे रेखांकित करते है, या वर्णन करते है।
परात्पर पुरुष कल्पना से परे है।

✍️अरुण कुमार उपाध्याय 

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