पञ्चदशाक्षरी मन्त्र (कादि, हादि एवं सादि विद्या)
√★२. 'हादि विद्या'. 'ह' से प्रारब्ध ।
√★३.'सादि विद्या' 'स' से प्रारब्ध ।
★★★पञ्चदशाक्षरी मन्त्र ★★★
√●(१) ३ ककार, (४) 'शिव वर्ण',
√●(२) २ हकार,
√●(३) शेष बीजाक्षर 'शक्तिवर्ण',
√●(४) ३ ह्रींकार (शिवशक्त्यात्मक ) ॥
√◆३ ककार = शिववर्ण ।
√◆२ हकार = शिववर्ण ।
√◆३ ह्रींकार शिवशक्त्यात्मक।
√◆शेष वर्ण = शक्तिवर्ण।
♀♀पञ्चदशाक्षरी मन्त्र - क ए ईल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं ,स क ल ह्रीं ।♀♀
★★★श्रीविद्या (त्रिपुरासिद्धान्तप्रतिपाद्य श्रीविद्या) के १२ उपासक हैं। ★★★
√●१. मनु,
√●२. चन्द्र,
√●३. कुबेर,
√●४. लोपामुद्रा,
√●५. मन्मथ,
√●६. अग्नि,
√●७ सूर्य,
√●८. इन्द्र,
√●९. स्कन्द,
√●१०. शिव,
√●११. अगस्त्य और
√●१२. क्रोधभट्टारक दुर्वासा ।
√★इन सभी १२ उपासकों के नाम पर भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय थे और इस प्रकार श्रीविद्या के १२ सम्प्रदाय थे, किन्तु अधिकांश लुप्त हो गये ।
√●अब मुख्यतः दो सम्प्रदाय ही शेष हैं -
√★१. कामराज सन्तान।
√★२. लोपामुद्रा सन्तान।
√★लोपामुद्रा सन्तान भी विच्छिन्न है। कामराज सन्तान अविच्छिन्न है। 'कामराजविद्या' ही 'कादिमत' है और लोपामुद्रा विद्या ही 'हादिमत' है। विद्या की ये दो सन्तानें ही आज प्रचलित हैं ।
√★(१) 'वाग्भव कूट' में श्रीकण्ठ (अ) से युक्त क्रोधीश (क), कोणत्रय अर्थात् योनि (त्रिभुज ए), लक्ष्मी (ई), अनुत्तर (अ) के साथ मांस (ल) आते हैं।
√★(२) 'कामराज कूट' में शिव (ह), हंस (स्), ब्रह्मा ( क ), वियत् (ह) एवं शुक्र (ल्) आते हैं। अक्षर (अ) के साथ, शिव (ह) वियत् (ह्) के बिना उपर्युक्त 'कामराज कूट' 'शक्तिकूट' कहा जाता है। प्रत्येक कूट के अन्त में एक-एक हृल्लेखा (ह्रीं ) जोड़ लेना चाहिए। हृल्लेखा के स्वरूप के अन्तर्गत व्योम (ह). अग्नि (र), वामलोचना (ई), बिन्दु (०), अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी ये १२ अङ्ग अन्तर्भूत हैं। बिन्द्वादि ९ के समूह का नाम ही है 'नाद'। इस प्रकार प्रथम में १८ वर्ण, मध्यस्थ में २२ वर्ण एवं अन्तिम में १८ वर्ण - सब मिलाकर ५८ वर्ण होते हैं ।
√●१. मूलाधार से प्रारम्भ करके प्रलयाग्नि के समान भासित 'प्रथम कूट' है, जो कि अनाहत चक्र को स्पर्श करता है ।
√●२. अनाहत चक्र से आगे कोटिसूर्यवत 'द्वितीय कूट' है, जो कि आज्ञाचक्र का स्पर्श करता है ।
√●३. आज्ञा चक्र से आगे ललाट के मध्य भाग में कोटिचन्द्रवत् प्रकाशित 'तृतीय कूट' है।
♂♂
√◆१. जगत् एवं पञ्चदशाक्षरी विद्या में भी कोई भेद नहीं है। दोनों में ऐकात्म्य है-
'ब्रह्मणि जगतो जगति च विद्याभेदस्तु सम्प्रदायार्थः ॥'
३ ककार एवं ईकार→'बिन्दु' ।
२ हल्लेखाऐं →सर्वसिद्धिप्रद एवं सर्वरोगहर चक्र ।
२ हकार एवं एकार →सर्वरक्षाकर, सर्वार्थसाधक एवं सर्वसौभाग्यदायक चक्र ।
२ सकार→सर्वसंक्षोभण, सर्वाशापरिपूरक ।
लकार→चतुरस्र(त्रैलोक्य मोहन)
√●२. माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु, साधक इन पाँचों में ऐक्य है— इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः चेति । पञ्चानामपि भेदाभावो'।
√●३. 'विद्या' भगवती त्रिपुरसुन्दरी एवं कुल कुण्डलिनी से भी अभिन्न है। 'साक्षाद्विद्यैवैषा न ततो भिन्ना जगन्माता' ।
√●४. क ह ल एवं स = शक्ति हल्लेखा ( ह्रीं ) = शिव एवं शक्ति का सामरस्य ।
√●५. वाग्भव कूट का अर्थ सूक्ष्म बुद्धि की विस्तृत व्याप्ति। कामराज कूट का अर्थ - शौर्य, धन, स्त्री, कीर्ति का आधिक्य ।
क = ब्रह्मा ।
ए = विष्णु ।
अ = ईश ।
प्रथम कूट = ऋग्वेदात्मक।
द्वितीय कूट = यजुर्वेदात्मक ।
तृतीय कूट =सामवेदात्मक ।
ह,स = आनन्द ।
क = सत्य ।
ह = अनन्त ।
ल = ज्ञान।
'विद्या' तृतीय कूट द्वारा ब्रह्म जीव में तादात्म्य स्थापित करती है ।
स, क, ल पद = जीव का वाचक है। जामत्, स्वप्न, सुषुप्ति ।
शक्तिवीज ह्रीं = ब्रह्म है ।
तृतीय कूट का स क ल पद = 'यह सब ब्रह्म है ॥'
ककार, एकार एवं अकार = ब्रह्मा, विष्णु, महेश जो स्रष्टा, पालक एवं संहर्ता है। समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म स क ल है यही तृतीय कूट का अर्थ है।
√●(क) वाग्भवकूट : क ए ई ल ह्रीं = कादि विद्या ।
√●(ख) कामकूट :ह स क ह ल ह्रीं = लोपामुद्राविद्या ।
√● (ग) शक्तिकूट: स क ल ह्रीं = सादि विद्या ।
★★★कतिपय विद्या प्रकार : ★★★
√★★१. 'अगस्त्य विद्या' - ह ह स क ह स क ए ल ह्रीं ह स ह स क ह ल ह्रीं ।
√★★२. 'नन्दि विद्या' - ह ह स क ह स क ए ल ह्रीं ह स ह स क ह ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं।
√★★३. 'प्रभाकरी विद्या' - क ए ई ल ह्रीं ह स क ए ल ह्रीं ह स ह स क ह ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं स क ल ह्रीं ।
√★★४. 'मानवी विद्या' - ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं स क ल ह्रीं।
वही (सर्वातिशायी या सर्वोच्च) महेशी देवी जिसका स्वरूप वितर्कातीत हैं। और जो पश्यन्ती आदि मातृकाओं के रूप में व्यक्त होने के कारण त्रिरूपात्मिका हैं। और जो चक्र के रूप में परिणत हो गई हैं ।
विद्वज्जन महेशी एवं चक्र में भी रञ्चमात्र भेद स्वीकार नहीं करते । स्वयमेव परा इन दोनों (देवता एवं चक्र) का सूक्ष्म रूप है । इन दोनों में स्थूल रूप से भी कोई भेद नहीं है।
Sanjeev Sinha
श्री ललिता महा त्रिपुर सुंदरी ( फेसबुक ग्रुप )
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