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Friday, 11 July 2025

बहुला यात्रा - रथ यात्रा की पूर्णता हैं ।

बहुला यात्रा
१. रथ यात्रा-बहुला रथ यात्रा की पूर्णता है। 
रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष में होती है। इसका आरम्भ वस्तुतः प्रतिपदा को ही होता है, जब श्री जगन्नाथ नेत्र खोलते हैं। उसके बाद द्वितीया को अपने निवास श्री-मन्दिर (जगन्नाथ मन्दिर) से गुण्डिचा मन्दिर जाते हैं। अतः इसे गुण्डिचा यात्रा भी कहते हैं। दशमी तिथि को श्री मन्दिर लौट कर आते हैं, उसे बहुला यात्रा कहते हैं। यह १० दिनों का सृष्टि चक्र है जिसकी पूर्णता के बाद एकादशी को जगन्नाथ सो जाते हैं, जिसे हरिशयनी एकादशी कहते हैं। 

२. शब्द भेद-देवनागरी लिपि में एक ही ’ल’ है। विन्ध्य के दक्षिण भाग में ब्राह्मी लिपि परम्परा में २ प्रकार के ल हैं-ल तथा ळ। ळ का उच्चारण ड़ जैसा होता है। ड़ (ळ) तथा ढ़ (ळ्ह) देवनागरी में नहीं हैं, किन्तु इनका हिन्दी के कई शब्दों में प्रयोग है। खिलाड़ी, लड़ाई, लड़ी आदि शब्दों में दोनों ल का एकसाथ प्रयोग है। देवनागरी में यह वर्ण नहीं होने के कारण ल (ळ) का उच्चारण र जैसा भी होता है। पाणिनीय सूत्र (१/३/२)-उपदेशेऽजनुनासिक इत्-की अच् सन्धि सम्बन्धित व्याख्या में कहा गया है कि र और ल में अभेद है। ड और ल में भी अभेद है। रलयोः डलयोः अभेदः। कहां किस ल का प्रयोग होगा इसका स्पष्ट नियम नहीं है। स्वाभाविक उच्चारण के अनुसार ३ प्रकार के नियम हैं-(१) शब्द के आरम्भ में ल, तथा बाद में ळ होगा। (२) आरम्भ में य का ज जैसा उच्चारण, बाद में य उच्चारण (ओड़िया में दो प्रकार के य हैं-ज जैसा ଯ, य जैसा ୟ, इसके अतिरिक्त च-वर्ग में भी ज है), (३) शब्द के आरम्भ में व का ब जैसा उच्चारण, बाद में व। प्राचीन ओड़िया में दोनों प्रकार के व थे। १९८१ में नेटवर्क इलेक्ट्रानिक टाइपराइटर द्वारा आयोजित राजभवन की लिपि सम्मिलनी में दोनों प्रकार के व रखने का प्रस्ताव था। पर आधुनिक विचार वालों ने एक ही रखने पर जोर दिया। बाद में संस्कृत प्रयोग के कारण दोनों जोड़ना पड़ा, किन्तु संस्कृत परम्परा से भिन्न करने के लिए इसका क्रम देवनागरी का उलटा किया। वर्तमान देवनागरी लिपि में ’व’ के भीतर रेखा दे कर उसे ’ब’ बनाते हैं। नयी ओड़िया में ’ब’ के भीतर विन्दु दे कर उसे ’व’ बनाते हैं। अंग्रेजी शासन में बंगला और ओड़िया में व लिखने के लिए ’ओ+व’ लिखना आरम्भ किया, जिसका कोई पारम्परिक शास्त्रीय आधार नहीं है। 
बहुल या बहुला शब्द कें वेद में ल का ही प्रयोग है, किन्तु उच्चारण परम्परा के अनुसार यह बहुळ या बहुळा हो जाता है। यात्रा, या गति एक एक क्षेत्र होने के कारण स्त्रीलिंग है, एक पिण्ड पुल्लिंग होता है (केश पुल्लिंग, चोटी या दाढ़ी स्त्रीलिंग)। अतः इसे बहुळा यात्रा कहते हैं। ळ का ड़ जैसा उच्चारण होने से यह बाहुड़ा हो गया है। हिन्दी में ळ वर्ण में र-ल का अभेद होने से इसका क्रिया रूप बहोर हो गया है, जिसका रामचरितमानस में प्रयोग है। आश्चर्य है कि स्वयं ओड़िया में बहुळा का क्रिया रूप में प्रयोग नहीं है, जहां यह यात्रा होती है।
गयी बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
(रामचरितमानस, बालकाण्ड, १२/७)
अरबी लुटेरों के जासूस अजमेर में रहते थे। वे माल-ए-गनीमत अर्थात् लूट की स्त्रियों तथा सम्पत्ति के वितरण को गरीबों की भलाई या गरीब निवाज कहते थे। गुरु नानक ने भगवान को असल गरीब निवाज कहा। गुरु गोविन्द सिंह को या भगवान् को भी सच्चे बादशाह कहते थे, अर्थात् मुगल बादशाह शासक नहीं लुटेरे हैं। इसी अर्थ में तुलसीदास ने भगवान् राम को गरीब-निवाज (दीनबन्धु) तथा साहिब (असल राजा) कहा है। जो चीज चली गयी, उसे भगवान राम वापस दिलाते हैं। इसी अर्थ में बाहुड़ा यात्रा है, जो जगन्नाथ जी मन्दिर से चले गये थे, वे वापस आ गये। रामचरितमानस, लंका काण्ड में बहोर शब्द के कई प्रयोग कैं, गिरने के बाद पुनः उठना। जैसे हनुमान से युद्ध में मेघनाद गिर गया था, पुनः उठा-उठि बहोरि कीन्हेसि बहु माया, जीति न जाइ प्रभञ्जन जाया॥ (सुन्दर काण्ड,१८/९)
बाहुड़ा का संस्कृत रूप खोजने में कुछ लोग इसे बहुदा या बाहुदा कहते हैं। यह शब्द संस्कृत जैसा लगता है, पर इसका बहुला से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसका अंग्रेजी मूल हो सकता है। अंग्रेजी में बाहुड़ा को Bahuda लिखा जायेगा, क्योंकि उस लिपि में ड या ड़ अक्षर नहीं है। इसे पुनः संस्कृत में बहुदा या बाहुदा पढ़ा जायेगा। 

३. बहुला के अर्थ-बहु का अर्थ अधिक है। बहुल का अर्थ है, पूर्णता या उससे अधिक, अतिरिक्त। बाहुल्य का अर्थ है प्रायः, अधिकांश आदि। बहुला स्त्रीलिङ्ग रूप है।
बहुल-(१) घना-वृक्षाश्च बहुलच्छायान् ददृशुर्गिरिमूर्धनि (महाभारत, ३/१४३/३), (२) चौड़ा, मोटा, (३) प्रायः-अविनय बहुलतया (कादम्बरी, १४३), (४) बहुसंख्यक-तरुण तमाल नीलय बहुलोन्नमदम्बुधरा (मालतीमाधव, ९/१८)। (५) प्रचुरता-नाधार्मिके वसेद् ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम् (मनु स्मृति, ४/६०)।
बहुलम्- (१) प्रायः- बहुलं छन्दसि। (२) आकाश-अनन्त विस्तार अर्थ में, (३) महादेव-मन्थानो बहुलो वायुः सकलः सर्वलोचनः (महाभारत, १३/१७/१२८), (४) अग्नि।
बहुला = गाय -कस्मात् समाने बहुला प्रदाने सद्भिः प्रशस्तं कपिला प्रदानम् (महाभारत, १३/७७/९)। एला, इलायची।
नक्षत्र सम्बन्धित अर्थ-(१) सुदर्शन चक्र- पृथ्वी कक्षा को चान्द्र कक्षा जिन विन्दुओं पर काटती है, उनको राहु केतु कहते हैं। अतः क्रान्ति वृत्त ही आकाशीय राहु का सिर काटने वाला सुदर्शन चक्र है। इसे धारण करने वाला सूर्य विष्णु तथा जगन्नाथ का दृश्य रूप है। विष्णु सुप्त रूप, जगन्नाथ जाग्रत रूप (चण्डी पाठ, अध्याय १)। सूर्य तेज से त्वष्टा ने सुदर्शन चक्र बनाया था-
तस्मात् प्रसादं कुरु मे यद्यनुग्रह भागहम्। अपनेष्यामि ते तेजो यन्त्रे कृत्वा दिवाकर॥२७॥
रूपं तव करिष्यामि लोकानन्दकरं प्रभो। तथेत्युक्तः स रविणा भ्रमौ कृत्वा दिवाकरम्॥२८॥
पृथक् चकार ततेजश्चक्रं विष्णोरकल्पयत्। त्रिशूलं चापि रुद्रस्य वज्रमिन्द्रस्य चाधिकम्॥२९॥ 
(मत्स्य पुराण, ११/२७-२९)
क्रान्ति वृत्त रूप में सुदर्शन चक्र की स्तुति-
भ्राम्यद् भाति यदीय भास्वर-वपु-र्बिभ्रद् भ-चक्र-प्रभां, भिन्दद् भीमतमः सुदर्शनमिति ख्यातं क्षयान्तं क्षितौ।
भक्तानां भवभीति सम्भव-भिदे भूभारभूतच्छिदे। धाम्ने श्यामधराधराधिपतये कस्मैचिदस्मै नमः॥२५॥ 
(सिद्धान्त दर्पण, २/२५)
(२) रास चक्र- विषुव वृत्त को क्रान्ति वृत्त २ विन्दुओं पर काटता है। जिस विन्दु पर सूर्य गति उतरायण में विषुव वृत्त को स्पर्श करती है, उसे कृत्तिका (कैंची) कहते हैं, क्योंकि यहां से दोनों वृत्तों की कैंची जैसी शाखायें निकलती हैं। क्रान्ति आदि की गणना यहां से आरम्भ होती है, क्योंकि यही से गोलीय त्रिभुज आरम्भ होता है। अतः कहा है-कृत्तिकातः गणना। 
मुखं वा एतत् नक्षत्राणा यत् कृत्तिकाः। एतद्वा अग्नेः नक्षत्रं यत् कृत्तिकाः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/२/१) 
कृत्तिका में जन्म होने पर सूर्य महादशा होती है। विषुव वृत्त के उत्तर भाग ने नक्षत्रों को देव नक्षत्र कहते हैं। आंख या दूरदर्शक यन्त्र से वेध के निए नक्षत्र चक्र अश्विनी से आरम्भ होता है, वहीं से राशि चक्र का भी आरम्भ है। जहां वृत्तों की दोनों शाखायें पुनः मिलती हैं (१८० अंश दूर) वह द्वि-शाखा अर्थात् विशाखा नक्षत्र है। 
कृत्तिका प्रथमं। विशाखे उत्तमं। तानि देव नक्षत्राणि। यानि देवनक्षत्राणि तानि दक्षिणेन परियन्ति। अनुराधाः प्रथमम्। अपभरणीरुत्तमम्। तानि यम नक्षत्राणि। यानि यम नक्षत्राणि तानि उत्तरेण (परियन्ति) (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/२/७)
कृत्तिका से विशाखा तथा वापस कृत्तिका तक की गति जैसी गुण्डिचा तथा बहुला यात्रा है। इस चक्र में २ प्रकार के रास चक्र हो रहे हैं-(१) संवत्सर चक्र-कार्त्तिक पूर्णिमा से आगामी कार्त्तिक पूर्णिमा तक, (२) पृथ्वी का घूर्णन अक्ष २६,००० वर्ष में क्रान्ति वृत्त के उत्तर ध्रुव अर्थात् नाक-स्वर्ग की परिक्रमा कर रहा है। इस मार्ग को शिशुमार चक्र कहते हैं (विष्णु पुराण, अध्याय, २/९)। इसका भी आरम्भ विन्दु कृत्तिका कहा गया है।
तन्नोदेवासोअनुजानन्तुकामम् .... दूरमस्मच्छत्रवोयन्तुभीताः।
तदिन्द्राग्नी कृणुतां तद्विशाखे, तन्नो देवा अनुमदन्तु यज्ञम्।
नक्षत्राणां अधिपत्नी विशाखे, श्रेष्ठाविन्द्राग्नी भुवनस्य गोपौ॥११॥
पूर्णा पश्चादुत पूर्णा पुरस्तात्, उन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय।
तस्यां देवा अधिसंवसन्तः, उत्तमे नाक इह मादयन्ताम्॥१२॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१/१) 
= देव कामना पूर्ण करते हैं, इन्द्राग्नि (कृत्तिका) से विशाखा (नक्षत्रों की पत्नी) तक बढ़ते हैं। तब वे पूर्ण होते हैं, जो पूर्णमासी है। तब विपरीत गति आरम्भ होती है। यह गति नाक कॆ चारो तरफ है। 
इसे ब्रह्माण्ड पुराण में मन्वन्तर काल कहा है, जो इतिहास का मन्वन्तर है।
स वै स्वायम्भुवः पूर्वम् पुरुषो मनुरुच्यते॥३‌६॥ तस्यैक सप्तति युगं मन्वन्तरमिहोच्यते॥३७॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/९)
त्रीणि वर्ष शतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु। दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः॥१६॥
त्रीणि वर्ष सहस्राणि मानुषाणि प्रमाणतः। त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः॥१७॥
षड्विंशति सहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु। वर्षाणां युगं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः॥१९॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२९)
राधारासे च कार्त्तिक्यां कृष्णप्राणाधिकप्रियाम्। (देवीभागवत पुराण, ९/३८/८५)
कार्त्तिक पूर्णिमा से समुद्री यात्रा आरम्भ होती है, जिसे ओड़िशा में बालि-यात्रा कहते हैं। इसके बाद प्रायः चक्रवात नहीं आते।
कृत्तिका के बाद सूर्य ऊपर उठता है अतः वह रोहिणी (आरोहण, उठना) नक्षत्र है और इसका पति चन्द्र है (वायु पुराण, १/२/८, स्कन्द पुराण, ५/३/१०८, रामायण, ६/१०२/३२ आदि)। इसके विपरीत विशाखा से पूर्व स्वाती नक्षत्र में सूर्य नीचे या दक्षिण सीमा पर पहुंचता है। यह क्रान्ति के दृश्य या देव भाग की सीमा है अतः स्वाती को सूर्य पत्नी कहा गया है।
सा तत ऊर्ध्व आरोहत्। सारोहिण्यभवत्। तद् रोहिण्यै रोहिणित्वम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/१०/६)
संज्ञा तु यम कालिदी रेवन्तमनुदस्रसूः। त्रसरेणु महावीर्या स्वातिः सूर्या सुवर्च्चला।
सरेणुर्द्युमयी त्वाष्ट्री प्रिये चैते विवस्वतः (त्रिकाण्डशेषः)
क्रान्ति वृत्त के देवभाग का अन्त स्वाती नक्षत्र के साथ होता है, अतः स्वाती को क्रान्तिवृत्त भी कहा गया है। इसके ४ खण्डों का स्वस्तिक रूप में चित्र बनता है जिसके ४ कोनों पर इन्द्र, पूषा, बृहस्पति तथा तार्क्ष्य के नक्षत्र हैं (२ अयन आरम्भ विन्दु, विषुव रेखा पर उत्तर तथा दक्षिण गति के स्थान)। 
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। 
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ 
(ऋक्, १/८९/६, वाज. यजु, २५/१९)
भविष्यति हि मे पन्थाः स्वातेः पन्था इवाम्बरे । (रामायण, ४/६७/२०) = मेरा मार्ग आकाश के स्वाति मार्ग (क्रान्ति वृत्त) जैसा हो।
नल द्वारा निर्मित सेतु भी आकाश के स्वाती पथ जैसा दीख रहा था-
स नलेन कृतः सेतुः सागरे मकरालये ।
शुशुभे सुभगः श्रीमान् स्वातीपथ इवाम्बरे॥ (रामायण, ६/२२/७४)
आषाढ़ शुक्ल दशमी को जब बाहुड़ा यात्रा होती है तो चन्द्र प्रायः स्वाती नक्षत्र में रहता है। उसके ५ दिन बाद आषाढ़ पूर्णिमा को चन्द्र पूर्व या उत्तर आषाढ़ में रहेगा, जिससे इस मास का नाम आषाढ़ हुआ है। 
मैत्रायणी संहिता (१/३/९) में सूर्य पथ को उरु-क्रम कहा गया है। क्षितिज को २ विन्दुओं पर यह चक्र काटता है, वह उरु-क्षिति है।
वि चक्रमे पृथिवीमेष एतां क्षेत्राय विष्णुर्मनुषे दशस्यन्। 
ध्रुवासो अस्य कीरयो जनास उरुक्षितिं सुजनिमा चकार॥ (ऋक्, ७/१००/४)
स्व॒स्ति॒मत् उ॒रु॒क्षि॒तौ (ऋक्, ९/८४/१) = उरुक्षिति का द्विवचन प्रयोग।
पूर्व दिशा का विन्दु लग्न है, पश्चिम क्षितिज का विन्दु सप्तम भाव है।
लोक भाषा में पूर्व क्षितिज को उदयाचल या उदयगिरि कहते हैं (भारत के पूर्व तट के स्थान)। पश्चिमी क्षितिज या भारत के पश्चिम तट के स्थान अस्ताचल, रत्नगिरि (महाराष्ट्र) या सूर्यास्त (सूरत) है। दोनों के बीच नीला आकाश नीलाचल या जगन्नाथ का क्षेत्र है।
(३) बहुल तिथि और पक्ष-गणित के अनुसार मास का आरम्भ अमावास्या से होता है, जब सूर्य तथा चन्द्र एक दिशा में रहते हैं। अमा = एक साथ, वास्या = निवास। उस समय चन्द्र का पूर्ण अन्धकार भाग दिखायी देता है। रात्रि में बिना चन्द्र-या सूर्य प्रकाश आकाश में ताराओं का नित्य या अमृत प्रकाश है, वही दीखता है, अतः इसे अमृत कला भी कहते हैं। चन्द्र अधिक कोणीय गति के कारण सूर्य से आगे निकलता है और प्रायः १५ दिन बाद वह १८० अंश दूर सूर्य के विपरीत दिशा में आता है तब पूर्ण प्रकाशित भाग दिखायी देता है। यह पूर्णिमा तिथि हुयी।१८० अंश अन्तर पर १५ तिथि हुई या १२ अंश अन्तर पर १ तिथि, अतः तिथि गणना के लिए (चन्द्र- सूर्य) अन्तर अंश को १२ से भाग देते हैं। चन्द्र का प्रकाशित भाग बढ़ने का समय शुक्ल पक्ष है। उसके बाद चन्द्र सूर्य के निकट आने लगता है, तथा प्रकाशित भाग कम होता है, जिसे कृष्ण पक्ष कहते हैं। उसमें १५ तिथि के बाद अधिक (बहुल) तिथि ही लिखते हैं, १६ के बदले पुनः १ से तिथि गणना आरम्भ करते हैं। अतः शुक्ल पक्ष की तिथि को शुद्ध-दिवस या सुदी तथा कृष्ण पक्ष की तिथि को बहुल-दिवस या बदी कहते हैं। १५ से अधिक तिथियों की गणना होने से यह बहुल या कृष्ण पक्ष कहते हैं।
प्रादुरास बहुल क्षपा छवि (रघुवंश, ११/१५)
करेण भानोर्बहुलावसाने संधुक्ष्यमाणेव सशाङ्करेखा (कुमार सम्भव, ७/८, ४/१३)
शुक्ल पक्ष में चन्द्र दीखना आरम्भ होता है, अतः इसे दर्श कहते हैं। पूर्णिमा को पूरी तरह दीखता है, जिसे पूर्णमास कहते हैं। दर्श से पूर्णमास तथा वापस दर्श तक चान्द्रमास का चक्र है। सभी यज्ञ दिन, मास या वर्ष के चक्र में होते हैं, अतः दर्श-पूर्णमास सभी यज्ञों का प्रतीक है। सृष्टि के सभी १० चक्रों के प्रतिरूप में दशमी को रथ यात्रा की समाप्ति होती है। सूर्य की तरफ चन्द्र का निकट जाना बहुला गति है, अतः जगन्नाथ का भी अपने मन्दिर में लौटना बहुला यात्रा है।

४. गुण्डिचा या मौसीमा-यह रहस्यमय है और केवल अनुमान किया जा सकता है। चैतन्य गौड़ीय मठ के अनुसार गुण्डिचा राजा इन्द्रद्युम्न की पत्नी थी। पर इसका कहीं उल्लेख नहीं है, तथा अन्य सभी वर्णनों के विपरीत है। 
पुराणों में इसके लिए २ शब्द हैं- (१) ब्रह्म पुराण अध्याय (१/६३) में गुण्डिका यात्रा का माहात्म्य, (२) नारद पुराण (२/६१/४२) में गुण्डिचा मण्डप के लिए प्रस्थित कृष्ण, बलराम सुभद्रा के दर्शन से वैकुण्ठ प्राप्ति। स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड में उत्कल खण्ड (३३/११३, ४६/३९)।
शब्द कल्पद्रुम, खण्ड २ में इसकी २ व्युत्पत्ति दी है-(१) गुण्डक = धूलि से निर्मित (ओड़िया में घुण्ड) मण्डप। मूल धातु- गुडि (गुण्ड्र) वेष्टने, रक्षणे च (धातुपाठ, १०/५१) = घेरना, पीसना, चूर्ण करना। स्नेहपात्र (मेदिनी कोष) (२) गुठि (गुण्ठ) वेष्टने, रक्षणे च (१०/५२) या गुडि (१०/५१)-जो घेर कर रक्षा करे। गुण्ठ भूमि की माप है (क्षेत्र को घेरना), सर्वे केन्द्र गुण्टूर (गुण्टर चेन)।
अतः गुण्डिचा के ये अर्थ हुए-(१) रथ यात्रा की सीमा। (२) जगन्नाथ मूर्ति या तेज को अपने भीतर रखती है, जैसे श्री मन्दिर में। गर्भ में रखने वाली माता है, ७ दिन के लिए अपने गर्भ में रखने वाली गुण्डिचा भी माता जैसी या मौसी है। ओडिया में मौसीमा।
मौसीमा यात्रा के समय ओड़िशा तट पर वर्षा का आरम्भ विक्रमादित्य काल में होता था-आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्ट सानुं (मेघदूत, २)। वर्षा वायु का मौसमी वायु नाम मौसीमा का अपभ्रंश लगता है।
जगन्नाथ मनुष्य नहीं हैं, जिनकी माता या मौसी होंगी। विशेषकर इन्द्रद्युम्न से बहुत पूर्व से जगन्नाथ पूजा होती थी, उनकी पत्नी जगन्नाथ की मौसी नहीं हो सकती। यम काल में जल प्रलय होने से जगन्नाथ मूर्ति डूब गयी थी जिसका इन्द्रद्युम्न तथा विद्यापति शबर ने उद्धार किया था।
आद्यामूर्तिर्भगवतो नारसिंहाकृतिर्नृप। नारायणेन प्रथिता मदनुग्रहतस्त्वयि॥३८॥ 
(स्कन्द पुराण-वैष्णव उत्कल खण्ड, अध्याय २८)
इन्द्रनीलमयी श्रेष्ठा प्रतिमा सार्वकामिकी॥७१॥
यम तां गोपयिष्यामि सिकताभिः समन्ततः॥७४॥ 
लुप्तायां प्रतिमायां तु इन्द्रनीलस्य भो द्विजाः॥७७॥ (ब्रह्म पुराण, अध्याय ४३) 

५. यज्ञ चक्र- यज्ञ इष्ट वस्तु का चक्रीय क्रम में उत्पादन है।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविध्यष्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ (गीता ३/१०)
एवं प्रवर्तितं चक्रं ... (गीता ३/१६)
अतः ३ प्रकार के इष्टि यज्ञ हैं। सभी यज्ञ प्राकृतिक काल चक्रों में हैं-दैनिक (अग्निहोत्र, ५ महायज्ञ), मासिक (दर्शपूर्णमास), वार्षिक (चातुर्मास्य, पशु बन्ध आदि)
(१) सृष्टि यज्ञ-सृष्टि मे १ अव्यक्त से ९ व्यक्त सर्ग होते हैं-
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वे प्रभवन्त्यहरागमे (गीता, ८/१८)
व्यक्त के ९ सर्ग या क्रमों के नाम कई पुराणों में हैं, जैसे विष्णु पुराण, अध्याय (१/५)। तैत्तिरीय उपनिषद् (२/१) के अनुसार क्रम है-आत्मा, आकाश, वायु, अग्नि, अप्, पृथिवी, ओषधि, अन्न, पुरुष। ९ सर्गों के निर्माण चक्र के अनुसार ९ प्रकार के कालमान हैं (सूर्य सिद्धान्त, १४/१)
रथ यात्रा में अव्यक्त रूप आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को है, जब जगन्नाथ की आंख खूलती है। उसके बाद द्वितीया को मूल नक्षत्र में रथ यात्रा आरम्भ होती है-यह सृष्टि की इच्छा या ईक्षा है। ब्रह्माण्ड का केन्द्र भी मूल नक्षत्र है। ७ दिन गुण्डिचा मन्दिर में रहते हैं-५ महाभूत, ओषधि, अन्न। नवम दिन वापस आते हैं-पुरुष। 
निर्माण शान्त स्थिति में होता है, जिसे रात्रि कहा गया है। सृष्टि के १० सर्ग को १० रात्रि कहा गया है।
अथ यद्दशमं अहः उपयन्ति। संवत्सरमेव देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण, १२/१/३/२०)
श्रीः वै दशमं अहः। (ऐतरेय ब्राह्मण, ५/२२)-प्रतीक रूप में दशम दिन श्री मन्दिर में।
प्रतिष्ठा दशमं अहः (कौषीतकि ब्राह्मण, २७/२, २९/५)
अथ यत् दश रात्रं उपयन्ति। विश्वान् एव देवान् देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण, १२/१/३/१७)
विराड् वा एषा समृद्धा यद् दश अहानि (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ४/८/६)
सृष्टि की प्रतिमा रूप मनुष्य का गर्भ में जन्म १० चन्द्र परिक्रमा (२७३ दिन) में होता है। प्रेत शरीर चान्द्र मण्डल का है, उसका निर्माण पृथ्वी के १० अक्ष भ्रमण या दिन में होता है। 

६. श्री मन्दिर-(१) पत्नी रूप-लक्ष्मी रूप में जगन्नाथ की २ पत्नी हैं-दृश्य सम्पत्ति लक्ष्मी है (लक्ष दर्शनाङ्कनयोः-धातुपाठ, १०/५)। अदृश्य सम्पत्ति श्री है। यह दीखती नहीं है, अतः इसे अलक्ष्मी भी कहा गया है-
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः (चण्डी पाठ, ४/५)-सुकृति के घर में अधिक लक्ष्मी नहीं होती, या जो शान्ति, विद्या आदि लक्ष्मी है, वह दीखती नहीं है। अन्य अर्थ है कि जब तक लक्ष्मी छिपी रहती है, उसे सुकृति मानते हैं।
श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ (उत्तर नारायण सूक्त, वाज, यजु, ३१/२२)।
इनको लोकभाषा में विमला और महालक्ष्मी कहते हैं, जिनके मन्दिर मुख्य मन्दिर के पीछे हैं।
(२) तेज रूप-तेज रूप में साम के प्रायः ३ भेद किये जाते हैं। विष्णु सहस्रनाम में एक नाम है-त्रिसामा। सूर्य के ३ सामों को विष्णु का ३ पद कहा गया है-ताप क्षेत्र पृथ्वी तक, वायु क्षेत्र यूरेनस कक्षा तक, तेज क्षेत्र सौर मण्डल की सीमा तक।
इसके प्रतिरूप जगन्नाथ विग्रह के ३ साम हैं-श्री मन्दिर, श्रीचन्दन (चन्दन = आवरण, छदि संवरणे-धातु पाठ, १०/४६) या चन्दनपुर, हरिचन्दन (एकाम्र या कल्पवृक्ष का पर्यायवाची) भुवनेश्वर का लिङ्गराज क्षेत्र।
ऋक्-सामे वा इन्द्रस्य हरी (ऐतरेय ब्राह्मण, २/२४, तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/३/९)
ऋक्-सामे वै हरी (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/६)
सूर्य विष्णु का एक दृश्य रूप है, उसका पिण्ड या मूर्ति ऋक् है, उससे निकली ऊर्जा इन्द्र है, जिसका प्रसार क्षेत्र साम है। उसकी माप इन्द्र का वज्र है-
धामच्छद् अग्निः इन्द्रो ब्रह्मा (वाज. यजु, १८/७६, शतपथ ब्राह्मण, १०/१/३/८)
(३) आध्यात्मिक-मनुष्य की श्री उसके मस्तिष्क में रहती है, अतः उसे शिर (सिर) कहते हैं।
यच्छ्रियं समुदौहं तस्मात् शिरः, तस्मिन् एतस्मिन् प्राणा अध्रयन्त तस्मात् एव एतत् शिरः (शतपथ ब्राह्मण, ६१/१/१४)
मन से ही मन्दिर हुआ है-
अवधेश के बालक चारि सदा, तुलसी मन-मन्दिर में बिहरें (कवितावली, ३)
शरीर विश्व का प्रतिरूप है। जो देव आकाश में हैं, उनके ध्यान के लिए मूर्ति बनाते हैं। वही अदृश्य रूप में शरीर के भीतर हैं। अतः हर पूजा में अङ्ग न्यास करते हैं।
शरीर को रथ कहा गया है। इस रथ में जो सूक्ष्म (वामन) आत्मा को देखता है, उसे मोक्ष मिलता है।
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या (अथर्व, १०/२/३१)
अष्टाचक्रं वर्तते एक नेमि (अथर्व,११/४/२२)
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/१८)
गतिशील पुर को रथ कहा है-
आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि, मनः प्रग्रहमेव च॥३॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥४॥
(कठोपनिषद्, १/३/३-४)
= शरीर रथ है, इसका रथी या स्वामी आत्मा है। बुद्धि सारथी या चालक है, जो मन रूपी प्रग्रह (पगहा, रस्सी) से इन्द्रिय रूपी अश्वों को नियन्त्रित कर रहा है। इन्द्रिय तथा मन द्वारा आत्मा इसका उपभोग कर रहा है।
हंसः शुचिषद् वसुरन्तरिक्षसद्, होता वेदिषद् अतिथिर्दुरोणसत्।
नृषद् वरसदृतसद् व्योमसदब्जा, गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥२॥ 
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥।३॥
(कठोपनिषद्, २/२/२-३)
(श्लोक २-महानारायण उपनिषद्, ८/६, १२/३, नृसिंह पूर्वतापिनी उप. ३/६, ऋक्, ४/४०/५ में भी है) 
= परम सत्य (ऋतं बृहत्) है कि परम व्योम में (शुचि-सद्) वह ब्रह्म हंस है, अन्तरिक्ष में वसु है। यज्ञ वेदी में वह होता है, घर में अतिथि है, हर नर में है (नृषद्, वैश्वानर रूप), उच्च जीवों में भी है (वर-सद्), ऋत् या (ऋत्-सत् में है, शून्य में है (इन्द्र रूप में व्योम-सत्, नेन्द्रात् ऋते पवते धाम किं च न-ऋक्, १/६९/६), अप् से सृष्ट विश्व में है (अब्ज), किरण या पृथ्वी (गो) में है (गोजा), पर्वत में है (अद्रिजा, पार्वती)।  
जो प्राण को उठाता है (उदान वायु) तथा अपान से नीचे ठेलता वह्, वह शरीर के मध्य (हृदय) में वामन है, जिसकी उपासना सभी देव करते हैं।
इसे गीता में प्राणायाम यज्ञ कहा है-
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणाः॥ (गीता, ४/२९)
✍️ अरुण कुमार उपाध्याय 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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