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Wednesday, 23 July 2025

अध्याय १४ कूर्म पुराण की गुरुगीता।

वेदव्यास उवाच- 
एक वर्षसे यथाविधि गुरुकी सेवा करते हुए उनके #समीप निवास करनेवाले शिष्यको यदि गुरु यथार्थ ज्ञानका उपदेश देना प्रारम्भ नहीं करते हैं तो शिष्यके दुष्कृत उस गुरु में आ जाते हैं।**
और गुरु का पतन आरंभ हो जाता है इसी कारण जिसको यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ और जो मनुष्य जितेन्द्रिय और अनासक्त नहीं उसको शिष्यों का संग्रह नहीं करना चाहिए , धन या प्रतिष्ठा के लोभ से जो अवीतरागी और लोभी, कामिनी के दास,स्त्री लम्पट ,क्रोधी, क्षमाहीन और चित्तविश्रांतहीन नर दीक्षा देते हैं वे भवरोग से मुक्त न होकर उनके शिष्यों के पापों का फल ही भोगते रहते हैं। 
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संवत्सरोषिते शिष्ये गुरुर्ज्ञानमनिर्दिशन् ।
 हरते दुष्कृतं तस्य शिष्यस्य वसतो गुरुः ॥
कूर्म पुराण उपरिविभाग 
अध्याय 14कूर्म पुराण की गुरुगीता। 
गुरुके आसन, शय्या तथा यानपर कभी भी नहीं बैठना चाहिये। गुरुके दौड़नेपर उनके पीछे दौड़े और चलनेपर उनके पीछे चलना चाहिये ।। १३ ।।

बैल, ऊँट एवं घोड़ेकी सवारी, प्रासाद, प्रस्तर, चटाई, शिलाखण्ड तथा नौकामें गुरुके साथ समान आसनपर बैठा जा सकता है (ऐसी जगहोंपर भी नीचे ही बैठा जाय ऐसा नियम नहीं है)। ब्रह्मचारी सदा जितेन्द्रिय रहे, अपने मनको वशमें रखे, क्रोध न करे, पवित्र रहे, सदा मधुर और हित करनेवाली वाणीका प्रयोग करे ॥ १४-१५ ॥

ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रयत्नपूर्वक सुगन्धित पदार्थों, माला, रस (तीखे रसवाले गुड़ आदि), मद्य, शुक्त* अर्थात् गुड़ आदिके मिश्रणसे बने मादक तीक्ष्ण पदार्थ, प्राणियोंकी हिंसा, तैल आदिका मर्दन, अञ्जन, जूता, छाताका धारण करना, काम, लोभ, भय, निद्रा, गायन, वादन तथा नृत्य, डाँट-फटकार लगाना, निन्दा, स्त्रीदर्शन तथा उसका स्पर्श, दूसरोंको मारना और चुगलखोरी आदिका परित्याग करे ॥ १६-१७॥

जलका घड़ा, पुष्प, गोबर, मिट्टी और कुश इन्हें प्रयोजन भर ही लाना चाहिये । प्रतिदिन भिक्षा माँगनी चाहिये। कृत्रिम लवण और जो भी बासी वस्तु हो, उन सबका त्याग करना चाहिये। (ब्रह्मचारीको) नृत्य नहीं देखना चाहिये और गायन आदिसे नि:स्पृह रहना चाहिये। सूर्यकी ओर (उदय-अस्तके समय तथा अपवित्र दशामें) नहीं देखना।

: इनका (गुरुका) केवल #नाम (सम्मानबोधक उपाधि आदिसे शून्य नाम) परोक्षमें भी नहीं लेना चाहिये।
 इनके चलनेकी क्रिया, बात करनेके ढंग और अन्य क्रियाओंकी नकल उपहासकी दृष्टिसे नहीं करनी चाहिये॥ ५

गुरुका जहाँ परीवाद (विद्यमान दोषका कथन) । हो रहा हो अथवा जहाँ उनकी निन्दा हो रही हो, वहाँ अपने दोनों कानोंको बंद कर ले अथवा वहाँसे अन्यत्र चला जाय। दूर विद्यमान शिष्य (किसी अन्यको गुरुकी पूजाके लिये नियुक्त कर उसके द्वारा) गुरुकी पूजा न करवाये, (यदि स्वयं गुरुके समीप जाकर पूजा करनेमें समर्थ हो । स्वयं गुरुके समीप जानेमें असमर्थ होनेपर तो अन्यके द्वारा भी गुरुकी पूजा करवायी जा सकती है।) क्रोधके आवेशमें रहनेपर शिष्यको स्वयं भी गुरुकी पूजा नहीं करनी चाहिये। यदि गुरु स्त्रीके समीप हों तो उस समय उनकी पूजा नहीं करनी चाहिये। गुरुकी बातका उत्तर नहीं देना चाहिये और गुरुके निकट रहनेपर उनकी आज्ञाके बिना बैठना भी नहीं चाहिये ॥ ६-७॥(शिष्यको चाहिये कि ) गुरुके लिये सर्वदा जलसे पूर्ण घड़ा, कुश, पुष्प तथा समिधा लाये और नित्य उनके अङ्गोंका मार्जन (गुरुको स्नान कराना) तथा (गन्धादिद्वारा) लेपन (शरीरका सुगन्धीकरण) करे। उनके निर्माल्य (गुरुकी सेवामें समर्पित माला आदि), शय्या, खड़ाऊँ, जूता, आसन तथा छाया आदिका कभी भी लंघन नहीं करना चाहिये। गुरुके लिये दन्तकाष्ठ (दाँतोंको स्वच्छ करनेके लिये दतुअन) आदि लाये और (भिक्षादिमें) प्राप्त पदार्थोंको गुरुको निवेदित करे। गुरुसे बिना पूछे कहीं जाये नहीं तथा सदा गुरुके प्रिय तथा हित करनेमें लगा रहे ॥ ८ - १०॥

गुरुके समीप कभी भी पैर फैलाकर बैठना नहीं चाहिये और उनके समीप जँभाई, हँसी, कण्ठाच्छादन (सुन्दर माला, हार आदि गलेमें पहनना) तथा ताली इत्यादिकी ध्वनि (ताल ठोंकना आदि निरर्थक) न करें।

 गुरुके आसन, शय्या तथा यानपर कभी भी नहीं बैठना चाहिये। गुरुके दौड़नेपर उनके पीछे दौड़े और चलनेपर उनके पीछे चलना चाहिये ।। १३ ।।

बैल, ऊँट एवं घोड़ेकी सवारी, प्रासाद, प्रस्तर, चटाई, शिलाखण्ड तथा नौकामें गुरुके साथ समान आसनपर बैठा जा सकता है (ऐसी जगहोंपर भी नीचे ही बैठा जाय ऐसा नियम नहीं है)। ब्रह्मचारी सदा जितेन्द्रिय रहे, अपने मनको वशमें रखे, क्रोध न करे, पवित्र रहे, सदा मधुर और हित करनेवाली वाणीका प्रयोग करे ॥ १४-१५ ॥

ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रयत्नपूर्वक सुगन्धित पदार्थों, माला, रस (तीखे रसवाले गुड़ आदि), मद्य, शुक्त* अर्थात् गुड़ आदिके मिश्रणसे बने मादक तीक्ष्ण पदार्थ, प्राणियोंकी हिंसा, तैल आदिका मर्दन, अञ्जन, जूता, छाताका धारण करना, काम, लोभ, भय, निद्रा, गायन, वादन तथा नृत्य, डाँट-फटकार लगाना, निन्दा, स्त्रीदर्शन तथा उसका स्पर्श, दूसरोंको मारना और चुगलखोरी आदिका परित्याग करे ॥ १६-१७॥

जलका घड़ा, पुष्प, गोबर, मिट्टी और कुश इन्हें प्रयोजन भर ही लाना चाहिये । प्रतिदिन भिक्षा माँगनी चाहिये। कृत्रिम लवण और जो भी बासी वस्तु हो, उन सबका त्याग करना चाहिये। (ब्रह्मचारीको) नृत्य नहीं देखना चाहिये और गायन आदिसे नि:स्पृह रहना चाहिये। सूर्यकी ओर (उदय-अस्तके समय तथा अपवित्र दशामें) नहीं देखना चाहिए।
साभार - ✍️शंकराचार्योंश ब्रह्मानंद अक्षयरुद्र जी

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