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Monday, 16 February 2026

दाढ़ी का वैशिष्ट्यावाद

दाढ़ी की ख़ासियत यह है कि उसे उगाने या बढ़ाने मे कोई हाथ पाँव नहीं हिलाने पड़ते। वो खतपतवार की तरह अपने आप उगती है। इसलिये दाढ़ी बढ़ाना जैसे वाक्य तकनीकी रूप से सही नही है। पर कुछ लोग इसे लगातार हटाते रहते है तो कुछ और कुछ काम ना होने पर इससे ही उलझे रहते है। दाढ़ी बढ़ाने वालो की ज़िंदगी मे ऐसे साढ़े तीन हज़ार घंटे और जुड़ते है जो उन्होंने दाढ़ी ना बना कर बचाये होते हैं। ऐसे लोग उसे कुछ दूसरे फ़ालतू कामों में ज़ाया करते है जबकि ऐसा करने वाले रिकार्ड बना जाते है ।उन्नीस सौ सत्ताईस मे नार्वे के एक साढ़े चार फुट के सज्जन की दाढ़ी जब नापी गई तो वो पाँच मीटर की निकली। दाढ़ी इकलौता मामला है जिसमें महिलायें पुरूषों को मात नहीं दे सकी है अब तक। जहाँ तक रिकार्ड की बात है तो महिलाओ की सबसे लंबी दाढ़ी केवल तीस सेन्टीमीटर की थी।

दाढ़ी को मर्दानगी से कब जोड़ दिया गया यह तो पता नहीं ,पर चूँकि आमतौर पर मर्दों के चेहरे पर ही ऊगती रही है। शायद इसलिये हुआ होगा ऐसा ,मर्दानगी जुड़ी सत्ता से ,और शायद इसलिये यूरोप मे एक वक्त ऐसा आया जब वहाँ की रानियों ने नक़ली दाढ़ियाँ लगाई और इस तरह अपनी मर्दानगी ज़ाहिर की। हमने खुद अपनी एक रानी को मर्दानी कहा। हालाँकि वे दाढ़ी नहीं लगाती थी।पर वो खूब लड़ी और अपना नाम कर गई।

रूस के पीटर द ग्रेट को अपने अलावा और किसी का दाढ़ी रखना पसंद नहीं था। इसलिये उसने प्रति दाढ़ी सौ रूबल का सालाना टैक्स लगा दिया था। दाढ़ी प्रेमियों ने फिर भी दाढ़ी रखना नहीं छोड़ा ,पर इसी बहाने सरकारी ख़ज़ाना भरा और पीटर की दाढ़ी और लंबी और खुशहाल हुई।

पर दाढ़ी पहचान भी बनती ही है इंसान की। अरस्तू को लोगों ने उनकी दाढ़ी की वजह से सुना। टैगोर की दाढ़ी ने उनके अंदर के कवि को निखारा। ईसा मसीह ने भी सराहा इसे और मार्क्स और लेनिन ने भी इसे तवज्जो दी । इब्राहीम लिंकन पहले दाढ़ी रखते नहीं थे ,पर एक बच्ची के सुझाव पर उन्होंने ऐसा करना शुरू किया। दाढ़ी रखते ही वे थोड़े बहुत दर्शनीय हो गये ,अमेरिकियो को तो वो इतने पसंद आए कि उन्हें राष्ट्रपति चुन लिया।

हमारे यहाँ के बहुत से लोग अपनी और देश की अर्थव्यवस्था से ज्यादा अपनी दाढ़ी की चिंता करते हैं। और ऐसा इसलिये है क्योंकि दाढ़ी को सजा संवार कर रखने वाले मर्द लड़कियों को ज़्यादा भाते है। वैसे तितर-बितर ,निराश दाढ़ी के पीछे भी कोई लड़की ही छुपी होती है। ज़ाहिर है हिंदुस्तान की नब्बे फ़ीसदी दाढ़ियों की वजह भी लड़कियाँ ही है। वे ना होती तो दाढ़ियों को कोई पूछने वाला ना होता।

रोज दाढ़ी छीलने वाले ,कभी भी दढ़ियलों की बराबरी नहीं कर सकते। उनकी गिनती नाबालिगों मे होती है। छिले हुए अंडे माने जाते है वो ,और उन्हें देखते ही झुके कंधों वाले सरकारी बाबू याद आते हैं। पर शुक्र है भगवान का कि ऐसे लड़के अब सरकारी नौकरियों की ही तरह ग़ायब होते जा रहे हैं। 

दाढी रखने वाले उसे सजाने संवारने पर ढेरों रूपये भी खर्च करते हैं। हर गली के नुक्कड़ पर खुले ब्यूटी सेलूनों के पेट भी दाढ़ी वालो की वजह से ही पल रहे हैं। उन्होंने दाढ़ी को रखने की ,उसे तराशने के इतने सारे तरीक़े और क़िस्में इजाद कर डाली है कि कुत्ते और गुलाबों की क़िस्में पीछे छूट गई है।

पुराने जमाने मे चोरों की बिरादरी की आचार संहिता के मुताबिक़ हर चोर को अपनी दाढ़ी में तिनका रखना ज़रूरी होता था। पर यह बात पुलिस वालो को भी पता चल गई। ऐसे मे चतुर चोरों ने अपनी दाढ़ी मे तिनका रखना बंद कर दिया। पर पुलिस तक यह बात पहुँच नहीं सकी। पुलिस सुधार हो नहीं सके बरसों से ऐसे में वो आज भी पुराने ढर्रे पर चल रही है। वो मौक़ा मिलते ही किसी भी दाढ़ी मे हाथ डाल देती है। तिनका तलाशती है ,और तिनका मिलते ही उसे जेल मे डालकर अपनी ड्यूटी पूरी कर लेती है। पुलिस बहुत बार अपनी तरफ से भी तिनके डाल दिया करती है दाढ़ियों मे। ऐसे में दाढ़ी रखने वाले को चाहिये कि घर से निकलने के पहले अपनी दाढ़ी की अच्छी तरह जाँच पड़ताल कर ले।और जब भी निकलें पुलिस से वाजिब दूरी बनाए रखें। 

तिनका हो और उस तक कोई पहुँच ना सके तो आपको कुछ भी करने की पूरी छूट होती है। पहले के जमाने मे लोगों के पास दाढ़ी बढ़ाने की यह एक माकूल वजह थी। दाढ़ी उन्हें ऋषि मुनि ,दार्शनिक वाला लुक देती थी। ऐसा करते ही दूसरे लोग उनकी इज़्ज़त करने लगते थे। उस जमाने मे भी दाढ़ी लुच्चों को सारे धतकरम करने की सुविधा प्रदान करती थी। और दाढ़ी अपनी यह ज़िम्मेदारी आज भी निभा रही है।

दाढ़ी झुर्रियों के साथ नियत भी छुपा लेती है। लड़कों को तो हैंडसम और स्मार्ट बनाती ही है ,बुजुर्गों को भी कन्याओं के सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देने का मौक़ा उपलब्ध कराती है। दाढ़ी ,रखने वाले के व्यक्तित्व को गरिमामय बनाती है। लोग उन पर भरोसा करने लगते हैं। दाढ़ी रखते ही चोरों की गिनती साहूकारों मे होने लगती है। दाढी आपको रौबदार ,चतुर और विचारक दिखा सकती है। यह दाढ़ी का ही प्रताप है कि आप कितनी भी लंबी लंबी छोड़े ,लोग आपकी तरफ़ ध्यान देने पर मजबूर हो जाते है। आप लोगों को अपनी दाढ़ी मे उलझा कर उनका ध्यान बटा सकते है और फिर वो सब कुछ कर सकते है जो करना चाहते हैं।

दाढ़ी से जनता प्रभावित होती क्यों है ? दरअसल दाढ़ी प्रतीक है,ज्ञान,विद्रोह,शक्ति ,गंभीरता ,रचनात्मकता और आध्यात्मिकता की। ऐसे में दाढ़ी को नमस्कार किया जाता है। दाढी कामयाबी की सीढ़ी है। दाढ़ी रखने के और भी सैकड़ों फ़ायदे है ,ऐसे मे मेरी सलाह यही है आपको। यदि अब तक दाढ़ी रखी नहीं है तो अब रख लें। ज़माना दाढ़ी का ही रहा है हमेशा से और हमेशा बना रहेगा ये तय है। 

इस दाढ़ी चर्चा की वजह भी जान लें अब। मेरे दोस्त ओमप्रकाश श्रीवास्तव आजकल सपत्नीक नर्मदा परिक्रमा कर रहे है। इस दौरान उन्होंने अपनी दाढ़ी को बढ़ने की पूरी छूट दे रखी है। बढ़ती दाढ़ी विद्वान ओपी के व्यक्तित्व को आदरणीय टाईप बनाने में भरसक मदद कर रही है।और बढ़ती दाढ़ी की वजह से ही उनके चरण स्पर्श करने वालो की गिनती भी बढ़ती जा रही है। मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि आईएएस रहे ओपी बहुत जल्दी मशहूर बाबाओं की फ़ेहरिस्त में सिरमौर होंगे ,और इसका थोड़ा सा क्रेडिट उनकी फहराती लहराती भव्य दाढ़ी के खाते मे भी होगा। 

मुकेश नेमा
दाढ़ी का वैशिष्ट्यावाद- शानदार सर 
श्रीवास्तव सर साधुमना तो हमेशा से ही थे,
अब पूर्णतः साधु हो गए - आर सी त्रिवेदी 

सर,सादर नमस्ते। दाढ़ी पर आपका यह आलेख बहुत सुंदर है।आपको इस आलेख के लिए दाढ़ी पर बहुत लम्बे समय तक शोध करना पड़ा होगा। यह आलेख व्यंग्य के रूप में वर्तमान सामाजिक,राजनीतिक परिवेश पर एक करारा तमाचा है।सादर।🙏😊🌷 अखिलेश सिंह 

इतने विकट मिशन में धर्मपत्नी का साथ भी मिल गया यह ज्यादा आश्चर्यजनक और सम्मानजनक है🤣 इस दाढ़ी बढ़ाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि पुराने लोग पहचान ना सके जो सिर्फ काम के लिए आते थे और नए लोगों से मिलना हो जाए,🙏 पंकज 

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