समझ में आया तो बच जाओगे।
एक प्रसिद्ध मंदिर था जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते थे। मन्दिर की ख्याति और उसमे आने वाला चढ़ावा दोनों में वृद्धि होने लगी।
धीरे धीरे मन्दिर की चर्चा उस शहर में रहने वाले भिखारियों के कानों में पड़ी, भिखारियों को उस मन्दिर में खजाना नजर आने लगा। दिन प्रतिदिन भिखारियों की संख्या मन्दिर के इर्द गिर्द बढ़ने लगी और मंदिर की सुरक्षा कमेटी इससे आंखे मूंदे रही। कमेटी का मानना था कि अगर मन्दिर में आने वाले श्रद्धालु उन्हें भीख दे रहे है तो ये पुण्य का काम है और मानव सेवा है।
इस अनदेखी का परिणाम ये हुवा की बेहतर जीवन जी रहे भिखारी अन्य शहरों से अपने परिचितों को भी बुलाने लगे और उस इलाके में बसाते रहे। स्थिति ये होने लगी कि मंदिर में श्रद्धालुओं से अधिक भिखारी हो गए और उनको मिलने वाली भीख कम होने लगी। इस वजह से भिखारी उग्र होने लगे और जबरन भिक्षा वसूली करने लगे। इस चक्कर मे आये दिन फसाद और श्रद्धालुओं से बदतमीजी बढ़ने लगी।
अब सुरक्षा कमेटी ने सख्त रवैया अपनाया और भिखारियों को खदेड़ना आरम्भ किया। लेकिन भिखारी यूनियन टस से मस न हुई। संख्या बल से वो अपराजेय सिद्ध हुवे।
कमेटी ने एक अन्य तरीका अपनाने की सोची। कमेटी ने प्रस्ताव रखा कि अन्य शहरों से आये भिखारियों को वापस भेज दिया जाए और स्थानीय भिखारी पुनः उस मंदिर के जरिये अपना जीवन स्तर बेहतर करें।
यूनियन में चर्चा हुइ, सर्वसम्म्मत्ति से एक बिंदु पर उनका मत स्थिर हुवा की अगर संख्या कम हुई तो उसके बाद सुरक्षा कमेटी हमे यहां से भागने पर मजबूर कर देगी।
बस स्थानीय भिखारी अड़ गए कि जो बाहरी है उन्हें भी मान्यता दी जाए अन्यथा मंदिर को नुकसान पहुंचाएंगे और आने वाले श्रद्धालुओं पर हमला करेंगे।
नतीजा शून्य रहा और स्थिति बिगड़ने लगी। इस अराजकता से घबराकर श्रद्धालुओ ने मंदिर जाना बंद कर दिया और मंदिर धीरे धीरे खंडहर बनता गया।
भिखारियों के आतंक से भयभीत श्रद्धालुओ ने अपने ही मंदिर को त्याग दिया क्योंकि सुरक्षा कमेटी अमानवीय तरीके अपनाने से पीछे हट चुकी थी।
लेकिन बात यही खत्म नही होने वाली, शहर में बहुत से समृद्ध मंदिर शेष है व भिखारी उधर का रुख कभी भी कर सकते है।
श्रद्धालु कब तक अपनी श्रद्धा से समझौता करेंगे व अपनी ही पुण्यभूमि का त्याग करते रहेंगे ???
यह सिर्फ एक कहानी नही है। समझ में आया तो बच जाओगे। आंख मीच दी तो आने वाली पीढ़ी आपको क्षमा नही करेगी।
साभार - Jain Dinesh
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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