केवाँच: ख़तरनाक मगर बड़े काम की!
बहुत ही अनोखे गुण और अवगुण रखने वाली एक वनस्पति के विषय में जानकारी साझा करने जा रही हूँ आज मैं, पर उससे पहले बचपन में सुनी अकबर-बीरबल की एक मनोरंजक कहानी से आपको अवगत कराना चाहूँगी। वह कहानी इसी अनोखी बेल पर आधारित है और उसे पढ़कर आपको अवश्य ही आनन्द आयेगा।
तो कहानी के अनुसार हुआ कुछ यूँ था कि बादशाह अकबर हमेशा बीरबल का इस बात पर मज़ाक उड़ाया करते थे कि तुम लोग हर किसी को माता यानी माँ मान लेते हो, जैसे गौमाता, गंगा मैया, तुलसी मैया आदि-आदि!
एक दिन सुबह-सुबह दोनों साथ-साथ बगीचे की सैर कर रहे थे और बादशाह ने फिर यही बात छेड़ दी। बीरबल ने इस बार मन ही मन उन्हें सही सबक सिखाने की सोच ली।
उन्होंने चलते-चलते एक पौधे को झुककर प्रणाम किया फिर आगे बढ़ गये। पूछने पर कह दिया कि ये तुलसी हैं, हमारी माता!
अकबर हँसते हुए तत्काल आगे बढ़े और बीरबल को चिढ़ाने के लिए उस पौधे को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। ऐसा दो-तीन बार हुआ।
अबकी बार बीरबल दूसरी दिशा की ओर मुड़ गये और थोड़ी दूरी पर जाकर सुनहरी फलियों से लदी एक सुन्दर बेल को झुककर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर वहीं खड़े हो गये। पीछे-पीछे बादशाह आये और फिर से अपनी हरकत दुहरायी, आगे बढ़कर दोनों हाथों से बेल को जकड़ कर उखाड़ा और दूर फेंक दिया।
बस! कुछ क्षण ही बीते थे कि बादशाह के शरीर में भयंकर खुजली होनी शुरू हो गयी। और शुरू क्या हुई, बढ़ती चली गयी, बढ़ती ही चली गयी।
पता है क्यों?
क्योंकि वह केवाँच की बेल थी।😀😀
थोड़ी ही देर में खुजाते-खुजाते बादशाह की हालत बुरी हो गयी। शरीर की त्वचा एकदम से लाल हो गयी, जगह-जगह फफोले पड़ गये और पीड़ा व जलन की तो सीमा ही न रही।
"अरे बीरबल ये कौनसी माता थीं तुम्हारी, ये क्या कर दिया?"
अकबर ने जब रोते हुए पूछा तो बीरबल ने जवाब दिया,
"हुजूर ये माता नहीं, पिता जी थे...तुलसी तो मैया थीं, माता होने के नाते क्षमाशील थीं, उन्होंने आपकी धृष्टता माफ कर दी लेकिन अफसोस पिताजी नहीं कर पाये!"
असहनीय कष्ट से मुक्ति का उपाय भी बीरबल ने जो बताया और बादशाह ने 'मरता क्या न करता' वाली हालत में अपनाया, वह था, गाय के ताजे गोबर का पूरे शरीर में लेपन करके रगड़-रगड़ कर नहाना, जिसके बाद ही राहत मिल सकी।
इस गोबर वाले उपाय को आप मज़ाक न समझ लें, यह सच में काम करता है। मुझे प्रायमरी स्कूल के समय की एक घटना याद है जहाँ स्कूल में किसी ने कुछ बच्चों की बैठने वाली जगह पर यह केवाँच लगा दी थी और मेरा व मेरी सहेली का छोटा भाई उसकी चपेट में आ गये थे। दोनों छोटे बच्चे बुरी तरह से रोते हुए घर लाये गये थे, और दोनों को सहेली की माँ ने इसी तरीक़े से नहला कर ठीक किया था!🤗🤗
संलग्न चित्रों में देखें एक बार, कितना सुन्दर सलोना रूप है इसकी फलियों का! सुनहरी छटा कितनी ध्यानाकर्षक है, फूल भी कितने सुन्दर हैं। लेकिन गुण! बाबा रे बाबा! कोई इसका शिकार न बने!🙅🙅
हिन्दी में केवाँच, कौंच या कपिकच्छु के नाम से जानी जाने वाली यह, सेम और मटर वाली फैबेसी (Fabaceae) फैमिली की एक फलीदार बेल है जिसका वानस्पतिक नाम मुकुना प्रुरिएंस (Mucuna pruriens) है।
वैसे तो इसका मूल उद्गम दक्षिणी चीन और पूर्वी भारत है, जहाँ इसे हरी सब्जी के रूप में उगाया जाता था। अब यह अफ्रीका, उष्णकटिबन्धीय एशिया, कैरिबियन, दक्षिण अमेरिका और प्रशान्त द्वीपों में व्यापक रूप से फैल गया है, जहाँ यह प्राकृतिक रूप से भी उगता है और उपयोग के लिए खेती भी की जाती है। भारत में यह सूखे पथरीले जंगलों, झाड़ियों और मैदानी इलाकों में जंगली तौर पर उगता पाया जाता है।
यह वास्तव में एक वार्षिक चढ़ने वाली बेल होती है, जिसकी लम्बाई 15-20 फुट तक हो सकती है। इसके पत्ते सेम फली के पत्तों की तरह ट्राईफोलिएट यानी तीन पत्तियों के समूह में होते हैं। फूल सफेद, गुलाबी या बैंगनी, और फलियाँ मोटी गूदेदार होती हैं, जो भूरे या सुनहरे काँटेदार रोमों यानी ट्राइकोम्स से ढँकी रहती हैं। इसके बीज चमकदार काले या भूरे रंग के होते हैं।
यह केवाँच खतरनाक इस कारण से है कि फलियों और पत्तियों पर मौजूद ट्राइकोम्स में मुकुनेन (mucunain) नामक प्रोटीन और सेरोटोनिन होते हैं, जो त्वचा से सीधे सम्पर्क होने पर तीव्र खुजली, लालिमा, सूजन और फफोले जैसे लक्षण पैदा करते हैं और आसानी से ठीक नहीं होते।
इसके कच्चे बीजों के सेवन से भी विषाक्तता हो सकती है, जिसके कारण उल्टी, पाचनतंत्र में गड़बड़ी या अन्य समस्याएँ सामने आ सकती हैं।
लेकिन इसकी फली और बीजों से मिलने वाले लाभ की बात करें, तो इसके बीजों में एल-डोपा (L-DOPA) प्रचुर मात्रा में होता है, जो पार्किंसन रोग के इलाज में उपयोगी है।
साथ ही यह पौरुष दुर्बलता, तंत्रिका विकार, अवसाद, मूड स्विंग, शरीर में किसी भी कारण से आयी सूजन कम करने और कामोद्दीपक के रूप में काम करता है।
लम्बे समय से आयुर्वेद में कौंच पाक प्रसिद्ध है जिसे शरीर के वात और पित्त दोष सन्तुलित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है वह इसी केवाँच के बीजों से बनाया जाता है। यह मांसपेशियों को आराम देता है, रक्त प्रवाह बढ़ाता है, साथ ही साँप के काटने पर भी उपयोगी है।
उपयोग से पहले बीजों को भूनकर, उबालकर या किसी अन्य विधि से संसाधित यानी प्रोसेस करना जरूरी है ताकि इसकी विषाक्तता दूर हो जाये। आयुर्वेदिक दवाओं में इसे पाउडर या अर्क के रूप में उपयोग किया जाता है, जैसे फ़ूड सप्लीमेंट्स वगैरह में।
पार्किंसन के उपचार के लिए डॉक्टर की सलाह से ही इसकी निश्चित मात्रा ली जानी चाहिए। भोजन में आटे या सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है, किन्तु जिन्हें लिवर या किडनी सम्बन्धित समस्या हो, उन्हें और गर्भवती, स्तनपान कराने वाली स्त्रियों को इसके प्रयोग से बचना चाहिए, ऐसा आयुर्वेद के वैद्य सलाह देते हैं।
यदि अनजाने में या दुर्घटनावश केवाँच के रोम लगने से तेज खुजली हो तो प्रभावित स्थान को सौम्य साबुन और पानी से धोना चाहिए और साफ सूखे कपड़े से हल्के हाथों से पोंछकर कैलेमाइन लोशन या हाइड्रोकोर्टिसोन क्रीम लगाना चाहिए।
अधिक गम्भीर स्थिति होने पर एण्टीहिस्टामाइन लेना चाहिए जो गोली, सिरप, स्प्रे और ड्रॉप के रूप में मेडिकल स्टोर में उपलब्ध होते हैं। किसी भी स्थिति में नाखूनों से खुजलाने या खरोंचने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण और बढ़कर समस्या गम्भीर कर सकती है।
जान लीजिए कि दोधारी तलवार की तरह है यह केवाँच, एक तरफ इतनी सुन्दर, पौष्टिक और उपयोगी, वहीं दूसरी ओर इतनी भयंकर और ख़तरनाक! इसके साथ सावधानी से डील करने की जरूरत है, समझ लें!😊😊
क्या आपने भी इसे कभी कहीं देखा है या आपका भी इससे कभी पाला पड़ा है? या आपने भी इसकी कभी सब्जी खायी है? या फिर यह आपके लिए बिल्कुल नयी चीज है?
जो भी हो, इससे सम्बन्धित अपने अनुभवों और राय से मुझे अवगत करवाइयेगा। साथ ही आपको आलेख में दी गयी जानकारी यदि अच्छी लगी हो तो कमेंट और शेयर द्वारा मेरा उत्साहवर्धन भी अवश्य कीजियेगा! आपका दिन शुभ हो!🙏🙏💐💐
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©𝓝𝓮𝓮𝓵𝓪𝓶 𝓢𝓸𝓾𝓻𝓪𝓫𝓱 नीलम सौरभ रायपुर, छत्तीसगढ़
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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