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हरिदास बाबा पर श्रीकृष्ण की बरसती कृपा
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पुरी की वह शांत और पवित्र सुबह थी जब मंदिर के ऊंचे शिखर पर लहराता पतितपावन ध्वज समुद्र की हवा के साथ धीरे-धीरे झूम रहा था।
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बड़ा डांड पर अभी भीड़ कम थी, लेकिन मंदिर के भीतर शंखनाद और घंटियों की ध्वनि गूंजने लगी थी। भगवान जगन्नाथ के रसोईघर में उस दिन बहुत हलचल थी।
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विशाल मिट्टी के चूल्हों पर बड़े-बड़े मटकों में दूध उबल रहा था। सेवक इधर-उधर भाग रहे थे क्योंकि आज महाप्रभु के लिए विशेष भोग तैयार होना था।
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कहते हैं, पुरी की रसोई केवल भोजन पकाने की जगह नहीं, बल्कि स्वयं देवी अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है। यहां बनने वाला हर व्यंजन पहले भगवान के प्रेम से भरता है, फिर भक्तों तक प्रसाद बनकर पहुंचता है।
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उसी विशाल रसोई के एक कोने में एक वृद्ध सेवक बैठा था जिसका नाम हरिदास था। वह बचपन से ही भगवान जगन्नाथ की सेवा करता आया था। उसके हाथों में अद्भुत स्वाद था और लोग कहते थे कि उसके बनाए भोग में कोई ऐसी दिव्यता होती थी जिसे खाकर मन को अजीब शांति मिलती थी।
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उस दिन हरिदास बड़े प्रेम से दूध उबाल रहा था। उसके मन में बस एक ही इच्छा थी—आज वह महाप्रभु को ऐसी रबड़ी बनाकर खिलाएगा कि स्वयं भगवान भी प्रसन्न हो जाएंगे।
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वह लगातार लकड़ी की बड़ी करछी से दूध चलाता जा रहा था और धीमे स्वर में गा रहा था—“जय जगन्नाथ स्वामी… नयनपथगामी भवतु मे…”
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लेकिन तभी अचानक तेज हवा का एक झोंका आया। चूल्हे की आग कुछ ज्यादा भड़क गई और उबलते हुए दूध में नींबू का पानी गिर पड़ा जो पास में रखा था। अगले ही पल पूरा दूध फट गया।
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सफेद मलाईदार दूध टूटकर पानी और छेने में बदल गया। हरिदास कुछ पल के लिए वहीं स्तब्ध खड़ा रह गया। उसकी आंखें फैल गईं। इतने सारे दूध का खराब हो जाना उसके लिए किसी बड़े नुकसान से कम नहीं था।
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वह घबराकर सिर पकड़कर बैठ गया। “अरे दयानिधि… यह क्या हो गया? मैं तो आपको रबड़ी का भोग लगाना चाहता था… अब क्या करूं?” उसकी आवाज भर्रा गई।
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कुछ देर तक वह टूटे हुए मन से उस फटे दूध को देखता रहा। लेकिन फिर अचानक उसके भीतर एक शांत विचार आया।
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उसे लगा जैसे कोई मधुर आवाज उसके कानों में कह रही हो—“हरिदास… जो हुआ है, उसमें भी मेरी इच्छा छिपी है।”
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उसने धीरे से आंसू पोंछे और भगवान की मूर्ति की तरफ हाथ जोड़ दिए। “प्रभु… अगर यह आपकी इच्छा है, तो अब इसी से कुछ अच्छा बनाऊंगा।”
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उसने बड़े प्रेम से फटे हुए दूध का सारा पानी अलग किया। अब उसके सामने मुलायम और ताजा छेना बचा था। वह इतना नरम था कि हाथ लगाते ही पिघलने लगता।
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हरिदास के चेहरे पर हल्की मुस्कान लौट आई। उसने उस छेने को बड़े कांसे के थाल में रखा और उसमें खूब सारी देशी खांड और मिश्री मिलाई। फिर दोनों हाथों से उसे धीरे-धीरे मसलने लगा।
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वह बार-बार ध्यान रख रहा था कि उसमें एक भी गांठ ना रह जाए। उसके हाथ चलते जा रहे थे और होंठों पर भजन बह रहा था। पूरा रसोईघर इलायची और ताजे छेने की मीठी खुशबू से भरने लगा।
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कुछ देर बाद उसने उस मिश्रण को घी लगी हुई बड़ी पीतल की थाली में फैलाया। ऊपर से थोड़ा और घी लगाया ताकि पकने के बाद उसका रंग सुंदर सुनहरा हो जाए।
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फिर उसने उसमें इलायची पाउडर और थोड़ा सा कपूर मिलाया। जैसे ही वह मिश्रण चूल्हे की धीमी आंच पर रखा गया, उसकी खुशबू पूरे मंदिर में फैलने लगी।
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आसपास के सेवक भी हैरान होकर उधर देखने लगे। धीरे-धीरे सफेद छेना अपना रंग बदलने लगा। ऊपर से हल्का भूरा और सुनहरा, किनारों से कुरकुरा और बीच में नरम। ऐसा लग रहा था जैसे साधारण छेना धीरे-धीरे किसी दिव्य प्रसाद में बदल रहा हो।
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हरिदास उस थाली को बड़ी श्रद्धा से देख रहा था। उसकी आंखों में चमक थी। “वाह प्रभु… आपकी लीला भी अद्भुत है। जो चीज मुझे नुकसान लग रही थी, उसी से इतना सुंदर भोग बन गया।”
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थोड़ी देर बाद उसने सावधानी से वह गर्म और सुगंधित मिठाई बाहर निकाली। ऊपर हल्की दरारें पड़ चुकी थीं और भीतर से वह अभी भी रसदार थी। उसकी खुशबू इतनी मोहक थी कि लगता था जैसे पूरा वातावरण मीठे आनंद से भर गया हो।
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जब वह भोग भगवान जगन्नाथ के सामने चढ़ाया गया, तो मंदिर के मुख्य पुजारी भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने ऐसा स्वाद पहले कभी नहीं चखा था।
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बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी हुई थी और जैसे ही प्रसाद बांटा गया, हर कोई उसकी प्रशंसा करने लगा। किसी ने कहा, “इतना स्वादिष्ट प्रसाद मैंने जीवन में कभी नहीं खाया।” कोई बोला, “इसमें तो जैसे स्वयं महाप्रभु का आशीर्वाद घुला हुआ है।”
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उसी रात हरिदास को एक अद्भुत स्वप्न आया। उसने देखा कि भगवान जगन्नाथ अपने बाल रूप में मुस्कुरा रहे हैं। उनके हाथ में वही सुनहरा छेना पोड़ा था।
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कान्हा ने हंसते हुए कहा, “हरिदास… तुम रबड़ी बनाना चाहते थे, लेकिन मुझे तो यह नया भोग ज्यादा प्रिय लगा। याद रखो, जब भक्त सच्चे मन से सेवा करता है, तब उसकी गलती भी मेरे लिए प्रसाद बन जाती है।”
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अगली सुबह जब हरिदास जागा तो उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार वे दुख के नहीं, आनंद के आंसू थे। उसी दिन से वह नया भोग “छेना पोड़ा” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
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धीरे-धीरे उसकी महिमा पूरे ओडिशा में फैल गई। लोग दूर-दूर से उसे प्रसाद के रूप में पाने आने लगे। लेकिन बहुत कम लोग जानते थे कि इस प्रसिद्ध मिठाई का जन्म किसी शाही रसोई में नहीं, बल्कि एक भक्त की टूटी हुई उम्मीद और भगवान पर उसके अटूट विश्वास से हुआ था।
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कहते हैं, आज भी जब पुरी की गलियों में ताजा छेना पोड़ा पकता है और उसकी मीठी खुशबू हवा में फैलती है, तो ऐसा लगता है जैसे स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ मुस्कुराकर अपने भक्तों से कह रहे हों.. “भक्ति में बनाई गई हर साधारण चीज मेरे लिए सबसे प्रिय प्रसाद बन जाती है…”
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साभार :- Hariya K Video
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