मेरे सीनियर अधिकारी कोई 55 वर्ष के रहे होंगे। हेडमास्टर थे शायद। हड़बड़ाकर खड़े हो गए और अधिकारी महोदय को नमस्ते ठोंका। नमस्ते में सम्मान कम भय ज्यादा था। मैं बैठे-बैठे गिनती का कार्य करता रहा। सीईओ साहब को मेरा खड़े होकर नमस्ते ना करना नागवार गुजरा।
बोले "क्या तुम्हें इतनी भी तमीज नहीं है कि अपने सीनियर अधिकारी का खड़े होकर सम्मान करो?"
मैंने बैठे-बैठे ही जवाब दिया, "क्या मेरे सीनियर अधिकारी को इतनी भी तमीज नहीं है कि रात आठ बजे वे तन्मयता से अपने कर्तव्य का पालन करने वाले कर्मचारी की तारीफ करने के बजाय उससे खड़े होने की अपेक्षा कर रहे हैं?"
सीईओ साहब अब आग बबूला होते हुए मुझे मेरी औकात दिखाते हुए बोले, "होगे कोई शिक्षाकर्मी!"
मैं मतपत्रों की गिनती भूल चुका था। सो खड़ा हो गया और उनकी आंखों में आंखें डालकर कहा, "जी हां, संविदा शिक्षक हूं। नियमित शिक्षकों की नियुक्तियां पिछले कुछ सालों से नहीं निकली है। यदि निकलतीं तो मैं भी नियमित कर्मचारी होता।"
अब तो साहब लाजवाब होते हुए बोले, "ज्यादा बात न करो, तुम्हारी उम्र के मेरे दो लड़के हैं।"
साहब ऊंचे थे। मैं ठिंगना था। साहब सर झुकाए हुए सुन रहे थे जब मैंने सर उठाकर कहा, "यह तो कोई योग्यता ना हुई सर। यदि मेरी उम्र आपके बराबर होती तो दो क्या, मैं चार बच्चे पैदा कर देता।"
साहब तमतमाते हुए चले गए।
इस घटना का उल्लेख मैंने अपने मित्रों, रिश्तेदारों से कुछ एक बार किया। बड़े अभिमान और आत्मश्लाघा के साथ।
पर अब मैं खुद भी जब एक अधिकारी/महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दूसरे संस्थानों में जाता हूं, तो एक दुबकी, अलसाई, उनींदी सी इच्छा होती है सम्मान की। लेकिन यदि वे अपने कार्य में तन्मय है तो सम्मान पाने की इस उनींदी सी इच्छा को मैं सुला देता हूं फिर दोबारा कभी किसी अवसर पर अर्धचेतन होने के लिए।
सम्मान पाने की इच्छा बड़ी स्वाभाविक है। लेकिन सम्मान की इच्छा कब, कैसे और किससे हो यह जानना आवश्यक और उपयोगी है।
सामान्यतः व्यक्ति परिचित लोगों से ही सम्मान की इच्छा करता है। परिचित लोगों से सम्मान मिलने से खुशी होती है। अपरिचित लोगों से सम्मान मिलने में अत्यंत खुशी होती है। अपने से छोटों से सम्मान प्राप्त करने में अच्छा लगता है। अपने से बड़े और प्रतिभाशाली लोगों से सम्मान प्राप्त करने में बहुत अच्छा लगता है। स्वार्थ सिद्धि हेतु किया गया सम्मान दिल को खटकता है। निःस्वार्थ भाव से किया गया सम्मान हृदय को स्पर्श करता है।
यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि सम्मान किसका किया जा रहा है। एक अधिकारी बहुत खुश हो सकतीं है क्योंकि बहुत से लोग उनका सम्मान करते हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि यह सम्मान कदाचित उनके पद का हो, न कि उनके व्यक्तित्व का। इसलिए अक्सर ऐसा होता है की पद जाने के बाद सम्मान भी चला जाता है। जिन्होंने विचार, कर्म, और वाणी के माध्यम से सचमुच पद में रहते हुए अच्छा कार्य किया है, पद छूटने के बाद भी उनका सम्मान बना रहता है।
जब कोई अच्छा कार्य करें तो उसकी सम्मान प्राप्त करने की इच्छा स्वाभाविक है, मानवीय है। अच्छा कार्य करने के उपरांत भी सम्मान की इच्छा ना होना दैवीय है। बिना योग्यता अर्जित किए सम्मान की इच्छा एक विकार है, राक्षसी प्रवृत्ति है।
सम्मान करना और सम्मान की अभिव्यक्ति करना दोनों अलग-अलग हो सकते हैं। हो सकता है कि किसी व्यक्ति के प्रति आप सम्मान का भाव रखते हैं लेकिन आप अभिवादन या अन्य तरह से इसे अभिव्यक्त नहीं करते तो मैं समझता हूं यह सम्मान करना नहीं हुआ। इसे मैं कृपण प्रवृत्ति कहूंगा।
उम्र के उस दौर में इसी कृपणतावश मैं सीईओ साहब का सम्मान करने में विफल रहा। उस पूरे घटनाक्रम को इस तरह भी देखा जा सकता था "मेरे वरिष्ठ अधिकारी कितने कर्तव्यनिष्ठ हैं कि रात आठ बजे हमारा कुशलक्षेम और व्यवस्था देखने के लिए स्वयं यहां आए हैं। चलूं, मैं खड़े होकर इनका सम्मान करूं।"
कुछ सालों बाद मुझे ऐसा एहसास हो गया था। और तब से मैं अपरिचित लोगों से जी नमस्ते और राम-राम करने लगा हूं। और नमस्ते का अर्थ - मेरे भीतर का ईश्वर तुम्हारे भीतर थे ईश्वर को प्रणाम करता है - भी पता चल गया इसी दौरान।
लेख लिखते लिखते सम्मान की मूर्छित इच्छा फिर चेत आई है। इसलिए इसे प्रकाशन हेतु अपने मित्र को भेज रहा हूं।
-✍️प्रहलाद पाण्डेय
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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