बरसों पुरानी बात है।
मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव में 72 साल की गोमती बाई रहती थीं।
पति का देहांत हुए पंद्रह साल हो चुके थे। एक बेटा था—रमेश। वही उनका सहारा था।
रमेश शहर में मजदूरी करता था और महीने में एक-दो बार घर आ जाता था।
गोमती बाई पूरे गाँव में अपनी ईमानदारी के लिए जानी जाती थीं।
लेकिन एक दिन ऐसा हुआ कि उनकी पूरी जिंदगी पर दाग लग गया।
गाँव के सबसे अमीर आदमी धर्मपाल चौधरी के घर से पाँच लाख रुपये और कुछ सोने के गहने गायब हो गए।
पूरा गाँव हैरान था।
चोरी किसने की?
कई दिन तक खोजबीन हुई।
फिर किसी ने बताया कि चोरी वाली रात गोमती बाई चौधरी के घर के पास दिखाई दी थीं।
बस...
इतनी सी बात ने आग में घी डाल दिया।
लोग फुसफुसाने लगे।
"गरीबी ने आखिर ईमानदारी हरा दी।"
"बुढ़ापे में लालच आ गया होगा।"
"कौन सोच सकता था कि गोमती ऐसा करेंगी?"
पंचायत बैठी।
सबके सामने गोमती बाई को बुलाया गया।
धर्मपाल चौधरी गरजकर बोले—
"सच-सच बता दो। पैसा कहाँ छिपाया है?"
गोमती बाई चुप रहीं।
सरपंच ने पूछा—
"तुम उस रात वहाँ थीं?"
गोमती बाई ने धीरे से कहा—
"हाँ।"
बस...
यही सुनते ही पूरा गाँव उनके खिलाफ हो गया।
"देखा! खुद मान रही है।"
"चोर है।"
"पुलिस को सौंप दो।"
लेकिन गोमती बाई ने न चोरी मानी, न सफाई दी।
सिर्फ इतना बोलीं—
"जिस दिन समय आएगा, सच खुद सामने आ जाएगा।"
लोगों ने इसे अपराधी की चाल समझा।
उस दिन के बाद उनका जीना मुश्किल हो गया।
कुएँ पर औरतें बात करना बंद कर देतीं।
बच्चे उन्हें देखकर "चोर दादी" कहकर भाग जाते।
दुकानदार उधार देना तो दूर, ठीक से बात तक नहीं करते।
सबसे ज्यादा दर्द उन्हें तब हुआ जब उनका अपना बेटा रमेश भी उनसे नाराज़ हो गया।
"अम्मा, अगर आपने कुछ किया है तो मुझे बता दो। मैं किसी तरह मामला संभाल लूँगा।"
गोमती बाई की आँखें भर आईं।
"बेटा, अगर तेरी माँ चोर होती तो तुझे ईमानदारी सिखाने का हक नहीं रखती।"
रमेश चुप हो गया, लेकिन उसके मन का शक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
समय गुजरता गया।
दो साल बीत गए।
गोमती बाई अकेली पड़ गईं।
फिर एक दिन अचानक उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई।
डॉक्टर ने कहा—
"शायद ज्यादा समय नहीं है।"
यह खबर पूरे गाँव में फैल गई।
मरने से एक दिन पहले गोमती बाई ने सरपंच को बुलाया।
कहा—
"कल पूरे गाँव को बुला लेना। मुझे सबके सामने एक बात कहनी है।"
अगले दिन पंचायत चौपाल पर लगी।
पूरा गाँव जमा था।
बीच में गोमती बाई चारपाई पर लेटी थीं।
उनके पास एक पुराना लोहे का बक्सा रखा था।
धर्मपाल चौधरी भी आए हुए थे।
गोमती बाई ने काँपते हाथों से बक्से की चाबी सरपंच को दी।
"इसे सबके सामने खोलिए।"
बक्सा खुला।
अंदर पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और एक कपड़े की पोटली थी।
पोटली खुली।
उसमें वही गहने थे जो दो साल पहले चोरी हुए थे।
पूरा गाँव सन्न रह गया।
धर्मपाल चौधरी उछल पड़े।
"देखा! मैं कहता था ना, चोरी इसी ने की थी!"
भीड़ में शोर मच गया।
लेकिन तभी गोमती बाई बोलीं—
"अभी सब कुछ नहीं देखा तुम लोगों ने।"
उन्होंने एक पुरानी डायरी निकलवाई।
डायरी के बीच में एक पत्र रखा था।
"इसे जोर से पढ़ो।"
सरपंच ने पढ़ना शुरू किया।
पत्र धर्मपाल चौधरी के छोटे बेटे महेन्द्र का था।
जो दो साल पहले घर छोड़कर कहीं चला गया था।
पत्र पढ़ते-पढ़ते सरपंच की आवाज काँपने लगी।
पत्र में लिखा था—
"पिताजी, मैं आपके गहने और पैसे लेकर जा रहा हूँ। मैंने जुए में बहुत कर्ज कर लिया है। अगर सच सामने आया तो आपकी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।"
"गोमती काकी ने मुझे चोरी करते देख लिया था। उन्होंने मुझे पकड़ लिया। मैं उनके पैरों में गिर पड़ा। मैंने कहा अगर आप मुझे पुलिस के हवाले कर देंगी तो पिताजी सदमे से मर जाएँगे।"
"उन्होंने मुझे जाने दिया, लेकिन गहने और बाकी सामान अपने पास रख लिया ताकि एक दिन सच सामने ला सकें।"
"उन्होंने कहा— जब तक मैं खुद लौटकर अपने अपराध को स्वीकार न करूँ, तब तक वे किसी से कुछ नहीं कहेंगी।"
पूरा चौपाल सन्नाटे में डूब गया।
धर्मपाल चौधरी का चेहरा पीला पड़ गया।
गोमती बाई ने धीमे स्वर में कहा—
"उस रात मैंने चोरी नहीं की थी... मैंने एक बाप को टूटने से बचाया था।"
सबकी आँखें झुक गईं।
"अगर मैं सच बता देती, तो तुम्हारा बेटा जेल जाता। तुम शायद सदमे से मर जाते। मैंने सोचा था वह लौट आएगा और अपनी गलती मान लेगा।"
"लेकिन वह कभी नहीं लौटा।"
धर्मपाल चौधरी रो पड़े।
"गोमती... मैंने तुझे चोर कहा... पूरे गाँव के सामने अपमानित किया..."
गोमती बाई मुस्कुराईं।
"दर्द तो हुआ था चौधरी... बहुत हुआ था। लेकिन किसी की जिंदगी बचाने की कीमत अगर बदनामी थी... तो मुझे मंजूर थी।"
भीड़ में कई लोग रो रहे थे।
रमेश अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा।
"अम्मा... मैं भी आप पर शक करता रहा..."
गोमती बाई ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"बेटा, दुनिया का सबसे भारी बोझ गलत इल्जाम नहीं होता... अपने लोगों का अविश्वास होता है।"
उस शाम पूरा गाँव रो रहा था।
और उसी रात...
गोमती बाई हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गईं।
अगले दिन उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।
धर्मपाल चौधरी नंगे पैर सबसे आगे चल रहे थे।
श्मशान पहुँचकर उन्होंने सबके सामने कहा—
"आज हमने एक औरत नहीं खोई... हमने इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल खो दी।"
कुछ महीनों बाद गाँव के चौक में गोमती बाई की एक छोटी सी प्रतिमा लगाई गई।
उसके नीचे सिर्फ एक पंक्ति लिखी गई—
"कभी-कभी सबसे बड़ा त्याग सच बोलना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी बचाने के लिए चुप रहना होता है।"
और जब भी गाँव में किसी पर बिना सबूत आरोप लगाने की बात होती, लोग उस प्रतिमा की तरफ देखकर चुप हो जाते।
क्योंकि उन्हें याद आ जाता था कि एक बार उन्होंने एक देवी को चोर समझ लिया था। ❤️
Vandna Tripathi ✍️
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