'दो जून की रोटी'
'दो जून की रोटी' (या 2 जून की रोटी) एक बेहद लोकप्रिय हिंदी/अवधी मुहावरा हैं। इसका अर्थ कैलेंडर की 2 जून की तारीख से बिल्कुल नहीं है।इस मुहावरे का सीधा और सटीक अर्थ हैं
" दो समय का भरपेट भोजन "
( प्रातः और सायं का भोजन प्रसाद / खाना )
" जून " का अभिप्राय, अर्थ या तात्पर्य : अवधी भाषा में 'जून' का अर्थ 'समय' या 'वक्त' होता हैं ।
किसी गरीब या मजदूर के लिए दोनों वक्त का भोजन जुटाना एक बहुत बड़ा संघर्ष होता हैं। जब किसी को दोनों वक्त की रोटी नसीब हो जाती है, तो उसे 'दो जून की रोटी' मिलना कहा जाता है।
कवि प्रभातकुमार"प्रभात" हापुड़ वालों ने इसका मार्मिक कविता के माध्यम से शब्द चित्रण किया हैं -
दो जून की रोटी मांग रही,
भूखे पेट की आग।
ज्वाला सी धधकती धरती,
आसमां उगलता आग।
नंगे पांव, फटे वस्त्र,
जलता बदन,नहीं कहीं छांव
किंतु तनिक नहीं परवाह।
दो जून की रोटी मांग रही,
भूखे पेट की आग।
खाली कटोरा, खाली हाथ,
भूखे बच्चों की
सिसकती आवाज,
बस अब यही एक अरमान,
कभी सोए न भूखा,
किसी माँ का लाल।
दो जून की रोटी मांग रही
भूखे पेट की आग।
(सोशल मिडिया ए आई एवं अंतर्जाल से संकलित)
2 जून 2026
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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