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Tuesday, 9 June 2026

मायड़ भाषा रे ज्ञान री बातां पोथियां में मिळणी कठिण हैं !

*रगड़-रगड़ पग धोवती*
राजस्थानी रै अेक मसूर लोकगीत ‘*बुगला ढारा सूं उड जाजे रे..मैं मतवाळी नार बेवड़ो भरवा दीजे रे*’ री मीठी धुन रो आलाप करतो भाई सतपाल जियां ई बाबोसा री चौकी चढ्यो तो बठै बैठा सगळा बोल्या आवण दै....आवण दै। बडो मीठो गावै भाई..जोरदार। आपरी तारीफ सुण’र राजी होवतां सतपाल गीत री आगली ओळी उगेरी- *‘‘रगड़-रगड़ पग धोवती, थोड़ा करती ऊंचा*’’। लोग बोल्या-वाह! वाह!! आवण दो-आवण दो। इत्तै में तो बाबोसा सतपाल नैं टोक्यो अर बोल्या कठै सूं सीख्यो रे ओ गीत? ‘ *थोड़ा करती ऊंचा’* रो अरथ समझ में आवै है के? कितरो फोरो अर अश्लील अरथ हुवै। बापड़ै गीत री भद्द पीट दी। सही ओळी है- *तोड़ा करती ऊंचा*’। *‘तोड़ा’ लुगायां रै पगां में पैरण रो गहणो है।* जठै पाजेब परीजै, बठै ई तोड़ा पैरीज्या करै। कामणी पाणी में रगड़-रगड़’र पग धोवै जद ‘तोड़ां’ नैं ऊंचा करल्यै, जिणसूं वांरै टूटण रो डर कोनी रैवै। सगळा बोल्या म्हे तो सदा सूं ‘थोड़ा करती ऊंचा’ ई समझ्यो अर ओ ई गायो। ओ ‘तोड़ा’ तो आज ई सुण्यो। खेतो कैवण लाग्यो जणा तो आपां इण गीत री बेजां तुड़ी करी है इत्ता दिन अर अब कुणसी रुकै। सेठजी वाळो बिगाड़ है, हुयो के हुयां ई जावैलो। आ तो अेक है, इसी और ई घणी डफोळायां करता हुवांला आपां। कन्नै बैठो कान्हो बोल्यो आपणो के दोस? सुणा जकी ई तो सीखां। आपणी भाषा राजस्थानी नैं मानता नीं होवण सूं इणरा सबद आपां सूं अळगा होता जाय रिया है। जे मानता नीं मिली तो ‘तोड़ा’ अर ‘थोड़ा’ रा मोकळा ‘फोड़ा’ पड़णा है। ना गीतां रो कीं सरूप बचैला अर ना रीतां रो क्यूंकै आपणी समूची परम्परावां अर रिवाजां सूं जुड़्या गीत तो राजस्थानी में ई है। आपणै बडेरां री संचेड़ी आ सांवठी पूंजी होळै-होळै मुट्ठी में भरेड़ी रेत दाईं फिसळती जाय री है। पछै हाथ झड़का’र रैवणै सिवाय कोई चारो ई नीं बचैला।
बाबोसा बोल्या कानूड़ो साव साची बात कैय रियो है। *जे भाषा मरगी नीं तो आपां गूंगा हुयोड़ा सांसां रो भार ढोया भलांई।* मन री बात कोई नैं कैय नीं सकांला तो पछै जीवण में सार के रैसी। मायड़ भाषा सूं कटण रै कारण इयांकली गळतियां रो होवणो सुभाविक है। अै जाणबूझ’र कोई कोनी करै, अणजाणपणै में ई हुया करै रे खेता! जको सबद आपणी जाणकारी में नीं हुवै, उणरी ठौड़ आपणो जाण्यो-पिताण्यो सबद ले लेवै अर पछै वो ई बरतीजण लाग ज्यावै। इयांकली मोकळी भूलां आपां रोजीनां करां पण जाणकारी नीं होवण सूं आपां नैं बै अखरै कोनी।
आपणो अेक घणो प्रसिद्ध गीत है *‘धीमो चाल रे बायरिया’’*। सगळां रो सुणेड़ै है नीं। हां-हां, ओ तो रोजीनां सुणां। केसेटां में बाजै ओ तो। बाबोसा बोल्या तो बताओ आ पूरी ओळी। फतजी कैयो-आ तो म्हैं ई बताद्यूं। *‘‘धीमै चाल रे बायरिया, झालो सैयो नहीं जाय’’*। बाबोसा कैयो बेटी रा बाप तूं तो किरसाण है। तूं तो *झालै’ अर ‘झोलै*’ में फरक समझै। बायरो कुणसो झालो देवै अर जे झालो देवै तो पछै उणनैं सहण करण में के जोर आवै। झालो तो दूर सूं दिरीजै। कोई धक्को थोड़ो ई है, जको सहीजै कोनी? मूळ रूप में बायरो चालै जद फसलां नैं झोलो मारै। हरी-भरी लहलहावती फसलां अेकै समचै मुरझाय ज्यावै। बायरै री उण कुराफात नैं झोलो कहीजै। मोकळी कैबतां है ‘झोलै’ सारू। छोटी-छोटी बायल्यां गीत गावै-झोला मती लागज्यो म्हारी मतीरै री बेल। आपणै नागौर रा तो कवि कानदान जी आपरै अमर गीत ‘सीखड़ली’ में झोलो अर झालो दोनूं सबदां नैं अेकै सागै काम में लेवै अर आंरो आछो अरथ उघाडै-
*रथड़ै चढ़तोड़ी पाछल फेर, सहेल्यां नैं झालो दियो।*
*कूं-कूं छाई बाजर हरियै खेत, जाणै जियां झोलो बियो’’*
तो अबै जाण्या कै बायरो झोलो देवै, झालो नीं पण जे आपणा गायक कलाकार अणसमझी में झालो गावै तो पछै टाबरिया तो वो ई सीखसी। बियां भी गांव-किरसाण नैं छोड’र बाकी वाळा तो झोलो क्यूं देखै अर क्यूं समझै? सतपाल कैयो जणा तो राफारोळ घणी है बाबोसा, म्हैं तो खुद ई झालो गावतो आयो हूं आज ताणी।

बाबोसा बोल्यां गीतां दाईं कैबतां में भी घालमेल हुयोड़ी है। जियां अेक कैबत आपां बोलता ई रैवां ‘*धोबी को कुत्तो, घर को न घाट को’। असल में धोबी रै कुत्तै सूं के काम? गधो हुवै तो समझ में आवै कै घर सूं घाट पर जावै तो कपड़ा लाद ले ज्यावै अर पाछो घरै आवै तो गीला कपड़ां री गांठड़ी उण माथै घाल ल्यावै। कुत्तै सूं वो कुणसी रुखाळी करवावै? धोबी रै घरै तो जे चोर भी लागै तो दूजा ई रोवै, उणरो के ऊजड़ै? *असल में धोबी कपड़ा धोवण सारू जको सोटो या डंडो राखै, उणनैं कुतको कैवै।* कई जाग्यां उणनैं थापी भी कैवै। कुल मिला’र कपड़ां नैं कूटण सारू काम में लियो जावण वाळो अेक लाठी नूमा औजार हुवै-‘कुतको’। धोबी घर सूं जावै जद इणनैं आपरै साथै घाट पर लेज्यावै क्यूंकै उणसूं कूट्यां ई कपड़ां रो मैल छूटै। घाट सूं घरै आवै जद उणनै साथै ल्यावणो पड़ै, नीं तो कोई और उठा लेज्यावै। इण खातर कहीजै कै-*धोबी रो कुतको घर को न घाट को।* अबै आपां ‘कुतको’ जाणां कोनी अर ‘कुत्तो’ आपणै साव सैंधो। इण कारण ‘कुतको’ छूटग्यो अर ‘कुत्तो' बोलीजण लागग्यो। अबै कोई आ बात बतावै तो ई लोग मानै कोनी क्यूंकै किताबां तकात में ‘कुत्तो’ ई छापीजै अर ओ ई पढ़ाईजै। जदकै साव अणपढ़ गांवेड़ी लोग भी प्रसंगबस बोलै कै *‘कुतको बडी किताब, लांठा ई लटका करै*’ मतलब कै कुतको यानी सोटै सूं डरता सगळा लटका करै। ख्यातनाम कवि *बांकीदास आसिया* तो आपरै अेक दूहै में इणरो दाखलो देवतां लिखै-बिगड़ेल रो इलाज फगत कुतकै सूं ई हुवै- *बतळायो बिगड़ै विदर, और दिये इकलाब/वाट चलावण विदर नूं, कुतको बडी किताब’’*। सगळा बोल्या वाह बाबोसा वाह। बिगड़ेल तो कुतकै सूं ई ताबै आवै, बाकी किताबां तो उणरै कीं काम करै नीं।
कानू बोल्यो भाई सौ बातां री अेक बात है- *गीतां अर कैबतां में इयांकला घालमेल मायड़भाषा सूं हुयोड़ी दूरी रा फळ है।* इण बिगाड़ नैं रोकण रो अेक ई उपाय है-राजस्थानी भाषा नैं राज री मानता। पछै सगळा गीतां रो लिखित रूप सामै आ जासी, कैबतां री विरोळ हुसी। भाषा रो मानक रूप तैयार हुज्यासी। बाबोसा कैयो खासा मोड़ो हुग्यो, अबै आज री हथाई संपूरण करां। राम राम सा...
*डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’*
प्राचार्य-राजकीय कन्या महाविद्यालय, लाडनूं
घणी गेहरी ओर साची लिखी सा हुकुम , अर्थ रो अनर्थ करण जग लाग रह्यो है हरेक गीत , केबा ने असली रंग सु बेरंग कर दिया है। Sanjay Sharma 

जी आ मायड़ भाषा रे ज्ञान री बातां पोथियां में मिळणी कठण है 
बहुत ही बढ़िया 🙏 Navdeep N Puri

गुरुजी आप तो गुरु गरिमामय जीवन में एक अच्छे कवि की भूमिका अदा कर रहे है।आपने जिन शब्दों के सही अर्थ व सही जगह प्रयुक्त करने का स्पष्टीकरण दिया है वह सराहनीय है। शब्दों की औचित्यता की ओर हमे आप ले गये है।ऐसी स्पष्ट टिप्पणी या शब्द सारगर्भिता कोई प्रस्तुत नही करता है।आपका अमूल्य ज्ञान हमे मिलता रहे ।जय गुरुदेव ।जय कविराज ।।
Poonamaram Chodhary 

मायड़ भाषा को बेजोड़ पैरवी की उदाहरण सहित मार्मिक अपील और ,कहावतों गीतों का सही भावार्थ हेतु आभार कविराज।

पर ये सरकारें कभी नहीं चाहती ऐसे मान्यता देना ।
चाहे केंद्र की हो या राज्य की ।
कोई इस पर बात नहीं करना चाहता है 
जबकि 
राजस्थान शूर वीरों की भौम रही है
कवियों, और महान कलाकरो की भी स्थली रहने के बाद भी यहां की भाषा को मान्यता न देना ।

और गुजराती बंगाली आसामी ,मराठी ,कनड़ , तमिल जैसी अनेकों बोलियों को भाषा का दर्द आजादी के साथ ही दे दिया गया ।

यह एक साजिश के तहत हे पिछड़ा रखने की एक साजिश रच गई होगी।
ताकि 

इस जुझारू माटी के लोग का मुकाबला करना मुश्किल न हो जाए शायद यही कारण रहा कि बाकी राज्य ने मिलकर हमे मायड़ भाषा में पीछे रख दियाव।

इस पर हमे सोचना होगा एक जुट होकर आवाज उठानी होगी 
हमारे नेताओं को दुत्कारना होगा कि मायड भाषा का मान नहीं तो कोई वोट नहीं 
Nimbaram Manav

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