ओ के आगे ३ की संख्या उसमें विद्यमान प्लुत को प्रदर्शित करने के लिये है। ह्रस्व की १ मात्रा, दीर्घ की २ मात्रा और प्लुत की ३ मात्राएँ होती हैं। ओम् के सन्दर्भ में यह प्लुत, व्याकरण के नियमानुसार तब होता है, जब ओम् का उच्चारण वेदपाठ के प्रारम्भ में हो रहा हो अथवा वैकल्पिक तौर पर जपयज्ञ में हो रहा हो। जैसे कि यदि आप ऋग्वेद का पाठ प्रारम्भ कर रहे हैं, तो सर्वप्रथम ओ३म् की ध्वनि लगायी जाती है। वेदारम्भ में यह नियम कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में स्पष्ट निरूपित है। उस समय ओम् की ध्वनि का प्लुत उच्चारण किया जाता है, जिसको प्रदर्शित करने का तरीका है - ओ३म्।
महर्षि पाणिनि अष्टाध्यायी में कहते हैं - "ओमभ्यादाने", जिससे स्पष्ट होता है कि ॐ को प्लुत अभ्यादान (वेदपाठ के आरम्भ) में होता है। अगले ही सूत्र में पाणिनि "ये यज्ञकर्मणि" कह रहे हैं, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि अयज्ञकर्म के सम्बन्ध हेतु यह सिद्धान्त नहीं है। अमरकोश में 'स्याद् अभ्यादानमुद्घात आरम्भः' इस प्रमाण में भी लिखा है - 'आभिमुख्येन आदानम्'। यह व्युत्पत्ति भी इसी का संकेत करती है। काशिका आदि में भी 'अभ्यादानम् - प्रारम्भः' कहते हुए इसी सिद्धान्त की स्वीकृति प्रत्यक्षदृष्ट है। गोपथ ब्राह्मण में भी कहा है - "तिस्रो मात्राः अभ्यादाने हि..." (१।१।२७)। अभ्यादान सबसे पूर्व के आरम्भ को कहते हैं। अतः प्लुत सहित ओम् का प्रयोग वेदसंहिता के सबसे पूर्व के आरम्भ में ही किया जाना चाहिए व प्राचीन काल से किया जाता रहा हैं।
वेद भी इसके प्रमाण हैं। वेदों में भी प्रमुखता से ओम् ही प्राप्त होता है, ओ३म् नहीं। जब देव सविता अनुज्ञा दे रहे हैं, तो देखिये क्या कह रहे हैं - "विश्वे देवास इह मादयन्ताम् ओम् प्रतिष्ठ"। वे "मादयन्ताम् ओ३म् प्रतिष्ठ" नहीं कह रहे हैं। इसी प्रकार कृष्ण यजुर्वेदीय कठोपनिषद् में - "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ओमित्येतत्।" यहाँ भी "ओ३मित्येतत्" नहीं कहा है। "ओम् क्रतो स्मर कृतं स्मर।" (यजुः०) तथा "ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आगत। दाश्वांसो दाशुषः सुतम्।" (ऋग्वेद)। अर्थात् ऋग्वेद सहित सब वेदों से अन्य भी अनेक प्रमाण दिये जा सकते हैं, जहाँ (ओ३म्) नहीं लिखा गया है।
अतः सब प्रकार से सिद्ध है कि अभ्यादान अर्थात् वेदपाठ के आरम्भ के अतिरिक्त एवं जपयज्ञ के अतिरिक्त, ऋचाओं से भिन्न अन्यत्र सर्वत्र ओम् को ओ३म् लिखना, आर्यसमाजियों का कपोलकल्पित, वेद-व्याकरण-विरुद्ध पाखण्ड मात्र है।
अब चूँकि आर्यसमाजी न तो पाणिनि आदि महर्षियों को मानते हैं, न व्याकरण को, और न ही ये वेदों को मानते हैं। अतः यहाँ दयानन्द का भी प्रमाण देना आवश्यक है। दयानन्द ने भी अपने भाष्य में 'ओमभ्यादाने' इस पाणिनीय सूत्र पर कहा है कि - "अभ्यादान अर्थात् प्रारम्भ अर्थ में जहाँ ओम् का प्रयोग किया जाता है, वहाँ प्लुत का प्रयोग होता है।" एवं इसका उदाहरण देते हुए दयानन्द ने दो वेदमन्त्र लिखे हैं - "ओ३म् इषे त्वा ऊर्जे त्वा" एवं "ओ३म् अग्निमीळे पुरोहितम्"।
ये दोनों मन्त्र ही वेदसंहिता के आरम्भ के हैं एवं वहाँ पर दयानन्द ने भी 'अभ्यादान' का अर्थ 'आरम्भ' ही किया है। अतः यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि प्लुत सहित ओ३म् का प्रयोग सर्वत्र नहीं है। इसीलिये सिद्धान्तकौमुदी में "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म" तथा काशिका में "ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत" यह उदाहरण दिया गया है।
अतः आजकल जो मूर्ख आर्यसमाजी सर्वत्र ओम् को प्लुत सहित लिखते हैं, वह अनार्ष एवं अशास्त्रीय व्यवहार है। इनमें इतनी भी बुद्धि नहीं कि प्लुत का चिह्न (३) उच्चारण अर्थात् बोलने का द्योतक है; उसका प्रत्येक स्थान पर लिखना भी व्यर्थ है। किन्तु आर्यसमाजियों द्वारा केवल हिन्दुओं से अलग दिखने हेतु, उनके विरोध में दिखने हेतु एवं अपने पंथ की विशिष्टता दिखाने हेतु यह अनार्ष व्यवहार किया जाता है।
इन समाजियों की शास्त्रों के प्रति एवं हिन्दुओं के प्रति घृणा तथा घोर मूर्खता का सबसे बड़ा उदाहरण तब देखने में आता है, जब आर्यसमाज के पंडित लेखराम पूर्णतः प्रामाणिक, वेदों में प्रयुक्त 'ओम्' शब्द को भी अशुद्ध कह देते हैं एवं ओ३म् को शुद्ध बताकर अपनी धूर्तता और जाहिलता का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत कर देते हैं। वेदमन्त्रों में भी ये अपनी इच्छा से ओम् के स्थान पर ओ३म् लिख देते हैं।
शचीन्द्र शर्मा
8/7/2026
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