देखिये आजकल कुछ बचा नहीं है ।
मूल बात को सबने खो दिया है ।
शास्त्र कहता है कि जिस पुरुष के वर्ण को बतलाने वाला जो लक्षण कहा गया है , वह यदि दूसरे वर्ण वाले में भी मिले तो उसे भी उसी वर्ण वाला जानना चाहिए ।।
पहले के समय में लक्षण और गुणों से एक ही पिता की संतानों को ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र हुआ करते थे , जिसे वर्ण बोला जाता था ।
अगर उसकी वृत्ति पवित्रता , शुद्ध आचरण , भगवद प्रेम , शास्त्रों का पठन पाठन इत्यादि है तो उसे ब्राह्मण बोला जाता था ।
अगर उसकी वृत्ति शासन करने की , युद्ध कला में माहिर , रक्षण आदि की वृत्ति है तो उसे क्षत्रिय ।
अगर उसकी उपरोक्त दोनों में से कोई न होकर धन उपार्जन में है और उसे व्यापार आदि में रुचि है तो वैश्य ।
और जिनकी रुचि उपरोक्त किसी में नहीं थी , जिनमें कोई गुण नहीं था , आचरण अपवित्र था , अपराधी स्वभाव वाले थे , उनका द्विज संस्कार नहीं किया गया , उसे शुद्र बोला गया ।
पहले ऐसे ही होता था ।
बहुत उदाहरण हैं शास्त्रों में ।
जैसे -
राजा प्रियव्रत के 10 पुत्र हुए - आग्नीध्र , इध्मजिह्न , यज्ञबाहु , महावीर , हिरण्यरेता, धृतपृष्ठ, सवन , मेधातिथि , वीतिहोत्र और कवि ।
कवि , महावीर और सवन ये तीनों नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनकर #ब्राह्मण हो गए ।
राजा प्रियव्रत के राजा आग्नीध्र हुए , उनके पुत्र राजा नाभि हुए , इनके पुत्र भगवान ऋषभ हुए ।
देखिये ये सब क्षत्रिय वृत्ति के ।
राजा ऋषभ ने राज्य किया तब तक वे क्षत्रिय थे , जब उन्होंने वन् में प्रस्थान किया तो #ब्राह्मणत्व धारण किया ।
अब इसमें देखिये ।
राजा ऋषभ के 100 पुत्र थे ।
सबसे बड़े भरत जिनके नाम पर भारतवर्ष पड़ा ।
इनके 9 पुत्र हुए जो योगीश्वर हो गए और #ब्राह्मण बन गए ।
81 पुत्र इनके कर्मकांडी ब्राह्मण हो गए ।
बाकी के 9 पुत्र क्षत्रिय हुए जिन्होंने राज्य किया और राजा बने ।
अब आगे और सुनिए ।
राजा प्राचीनबर्हि के 10 पुत्र हुए जिन्हें प्रचेता कहा जाता है , सब ब्राह्मण हो गए । देखिये #क्षत्रिय से #ब्राह्मण हो गए ।
मनुपुत्र करुष से कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्न हुए । वे बड़े ही ब्राह्मण भक्त और धर्मप्रेमी थे ।
मनुपुत्र धृष्ट से धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए और अंत में वह इसी शरीर से #ब्राह्मण बन गए ।
कश्यप ऋषि के पुत्र हुए विवस्वान ।
विवस्वान के श्राद्धदेव मनु हुए ।
मनु से 10 पुत्र हुए ।।
यहाँ देखते जाईये ब्राह्मण से क्षत्रिय , क्षत्रिय से ब्राह्मण , शूद्र , वैश्य सब बन रहे हैं ।
मनुपुत्र नरिष्यन्त हुए । इनसे चित्रसेन हुए ।
इनसे ऋक्ष हुए ।
ऋक्ष से मीढ़वान ।
मीढ़वान से कूर्च
कूर्च से इन्द्रसेन
इन्द्रसेन से वीतिहोत्र ।
वीतिहोत्र से सत्यश्रवा
सत्यश्रवा से उरुश्रवा
उरुश्रवा से देवदत्त
देवदत्त से अग्निवेश्य
अग्निवेश्य ब्राह्मण निकल गए । बहुत बड़े महर्षि हुए , ये जातुकर्णा के नाम से विख्यात हुए ।
ब्राह्मणों का अग्निवेश्यायन गोत्र उन्हीं से चला ।
अब आगे सुनिए और ।
मनुपुत्र दिष्ट हुए । इनसे नाभाग हुए ।
नाभाग वैश्य हो गए ।
नाभाग से वत्स्प्रीति । वतस्प्रीति से प्रांशु ।
प्रांशु से प्रमति ।
प्रमति से खनित्र ।
खनित्र से चाक्षुष ।
चाक्षुष से विविशन्ति
इनसे रम्भ । रम्भ से खनिनेत्र ।
खनिनेत्र से क्रंधम ।
क्रंधम से अविक्षित ।
अविक्षित से राजा मरुत हुए जो चक्रवर्ती सम्राट हुए ।।
मतलब क्षत्रिय से वैश्य फिर वैश्य से क्षत्रिय ।
और बताऊँ तो सुनिए ।
राजा अक्रिय जो क्षत्रिय थे , उनके पुत्र से ब्राह्मण वंश चला ।
और सुनिए ।
विश्वामित्र क्षत्रिय थे , वह ब्राह्मण हो गए ।
इन्होंने ही गायत्री मंत्र को प्रकट किया था ।
और इन्हीं विश्वामित्र के 49 पुत्र #म्लेच्छ हो गए ।
#शूद्र भी नहीं , म्लेच्छ हो गए । मतलब और नीचे गिर गए ।।
और देखिये अभी ।
मन्युपुत्र गर्ग से शिनि और शिनि से गार्ग्य का जन्म हुआ ।
गार्ग्य क्षत्रिय था , फिर भी उससे ब्राह्मण वंश चला ।।
महावीर्य का पुत्र था दुरित्क्षय ।
इनके तीन पुत्र हुए ।
त्र्यारुणि , कवि और पुष्करिणी ।
ये तीनों ब्राह्मण हो गए ।
बृहत्क्षत्र का पुत्र हस्ती ।
इसी ने हस्तिनापुर बसाया ।
हस्ती के तीन पुत्र हुए ।
अजमीढ़ , द्विमीढ़ और पुरुमीढ़ ।
अजमीढ़ के पुत्र ब्राह्मण हो गए ।
भाग्यर्शव के पाँच पुत्र हुए । पांचों पांच देश का शासन करने में समर्थ थे , इसलिए पांचाल कहलाये ।।
इनमें से मुद्गल से मौद्गल्य नामक ब्राह्मण गोत्र की उत्पत्ति हुई ।।
नाभागारिष्ट का जो पुत्र हुआ , उसने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया ।
वह अपने क्षत्रिय वंश की स्थापना कर ब्राह्मण कर्म में प्रवृत्त हो गया ।
धृष्ट से धारष्ट हुए , वे क्षत्रिय थे लेकिन वह बाद में ब्राह्मण बन गए ।
करुष के पुत्र कारूष क्षत्रिय हो गए ।
राजा पृषध को ग़लती से बछड़े की हत्या करने पर उनके गुरु ने उन्हें शूद्र होने का शाप दे दिया ।।
ऐसे बहुत उदाहरण हैं ।
लेकिन क्या हुआ कालांतर में आते आते ब्राह्मण ब्राह्मण में ही विवाह करने लगे क्योंकि वह उनके आचार विचार से मेल खाते थे ।
ऐसे ही क्षत्रियों का हुआ ।
ऐसे ही वैश्यों का ।
फिर बचे शूद्र तो उन्होंने भी वैसे ही करना शुरू कर दिया ।
जिससे एक Blood की शुद्धता बनती चली गयी ।
blood clan या रक्त वर्ण के अनुसार सब हो गया ।
अब यह कलियुग में यह हो गया कि उसी प्रकार से सब जातियों में विभाजित हो गए ।
लोग मूल स्वरूप भूल गए और अपने ही clan में विवाह और आदान प्रदान हो गया ।।
आज उसी का यह विकृत रूप हो गया ।
आज ब्राह्मण वर्ग में जन्मे दारू , नशा , वेश्यावृत्ति करने पर भी यह शूद्र न होकर ब्राह्मण ही बने रहे ।
भले इनको एक शास्त्र की line तक न आती हो ।
बस यह है कि रक्त शुद्धता के कारण यह ब्राह्मण से सुशोभित किये जाते हैं ।
यह ऐसे ही हो गया कि किसी का पिता IAS बन गया तो उसका अनपढ़ पुत्र भी स्वयं को आईएएस मान रहा है ।
किसी के पिता प्रधानमंत्री जनता की मूर्खता और भावुकता के कारण बन गए तो उस राहुल गांधी को आज भी प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जाता है , यह जाति ही है जो जन्म लेने से आई है उस कुल में भले वह उसकी योग्यता न रखता हो ।
ये जितने POLITICIANS हैं , अखिलेश यादव , तेजस्वी यादव से लेकर अन्य जो परिवार के कारण अध्यक्ष पद लिए बैठे हैं , वह सब जाति ही तो पालन कर रहे हैं ।
रही सही कसर दम्भी लोगों ने जातियों के नाम पर उत्पात मचाना शुरू कर दिया और स्वयं की श्रष्ठता का दम्भ भरने लगे भले उनके पास एक भी लक्षण उस वर्ण के न हों ।
जब से यह जन्म पर आधारित हो गया , यह जातियाँ बन गयी और वर्ण ध्वस्त हो गया जो मूल तत्त्व था इसका ।
नहीं तो आज भी यह प्रथा है ।
आज हमारा गाँव ब्राह्मणों का है , लेकिन अगर किसी के चरित्र के विषय मे पता लग जाता है तो उसके यहाँ पानी तक पिया जाता ।।
उसको गाँव से बाहर तक निकाल दिया जाता है ।
आज भी हमारे यहाँ गांव में एक ब्राह्मण थे वह characterless थे , आज वह मर भी गए हैं तो उनके लड़के को जो अब 60 वर्ष की उम्र पहुंच गयी है , उनको आसन नहीं दिया जाता ।।
और पानी उनको मिट्टी के भरुके में दिया जाता है ।
अपने पात्र में उनको कोई पानी तक नहीं पिलाता । घर में किसी के वह घुस नहीं सकते ।।
तो ऐसा नहीं है कि यह शूद्रों के साथ ही किया जाता है ।
यह ब्राह्मणों में भी है ।
हमारे यहाँ के एक जानकार थे , युवावस्था में उन्होंने ग़लत लड़कों की संगति में आकर मांस खा लिया था ।
मुझे याद है उनकी माता जी ने उनको 28 दिन तक जब तक वीर्य शुद्ध नहीं हो जाता , तब तक उनको पत्तल में भोजन दिया जाता रहा । उनका खाट , बिस्तर सब अलग कर दिया गया था और वह खेत में सोते थे ।
तो यह रहा है शुरू से ।
यही कारण रहा कि शूद्रों को अलग थलग रखा जाता था ।
क्योंकि इनके आचरण में ही यह सब रहता ही रहता था ।।
लेकिन आज तो सब गड्डमगड्ड हो गया है ।
आज लक्षण , गुण और आचरण से नहीं बल्कि कुल से सब हो रहा है ।
भले शूद्र वर्ण में कोई सही आचरण या वृत्ति वाला व्यक्ति ही क्यों न पैदा हो रहा हो , वह भी गेहूं के साथ घुन की तरह पिस जाता है ।
लेकिन ऐसा भी नहीं रहा ।
संत रैदास जी चमार जाति से थे ।
लेकिन उन्हीं सन्त रैदास से हज़ारों ब्राह्मणों ने दीक्षा ली थी ।
और इनको भक्तमाल में स्थान मिला ।
यह सब जातियों का स्वरूप बिगड़ चुका है ।
अब वैसे भी लोग डरते हैं रक्त शुद्धता को लेकर ।
तो यह सब इसी तरह बन गया ।
लेकिन यह जातियाँ वर्ण इत्यादि का भगवद क्षेत्र में प्रवेश पूर्णतः वर्जित है ।
जातियाँ बस समाज तक है ।
इसके बाद भगवान के क्षेत्र में इनका कोई महत्व नहीं है ।
द्वापर युग मे जब युद्धिष्ठिर ने यज्ञ सम्पन्न किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने एक शंख लाकर रख दिया कि जब आपके राज्य में सभी भगवद्प्रेमी और ब्राह्मण भोजन कर लेंगे तो यह स्वतः बजकर यज्ञ पूर्ण कर देगा ।
सभी राज्य के ब्राह्मणों को भोजन करवा दिया गया लेकिन शंख नहीं बजा ।
तो भगवान तो अंतर्यामी हैं ही । उन्होंने युद्धिष्ठिर से कहा कि तुम्हारे राज्य में एक मेहतर है श्वपच वाल्मीकि । बस वही रह गया । भीम अर्जुन इत्यादि सब जायें और उसे आदरपूर्वक ले आएं ।।
भगवान की आज्ञा से भीम अर्जुन इत्यादि सब गए उसके झोपड़ी में ।
वह डर गया और रोने लगा कि मैं तो सड़क पर झाड़ू लगाने वाला व्यक्ति हूँ ।
लेकिन वह भगवान का बहुत बड़ा भक्त था बस छुपकर रहता था ।
कभी out नहीं होने दिया कि वह इस स्तर का है ।
लेकिन भीम अर्जुन उसे अपनी पालकी में स्वयं ढोकर राजमहल ले आये ।।
भगवान ने द्रौपदी से कहा कि इनके लिए तुम विभिन्न पकवान बनाओ ।
द्रौपदी ने ही परोसा ।
तो जब वह खाने लगे तो , शंख बजकर फिर चुप हो गया ।
अब श्रीकृष्ण ने कहा अरे अब क्या बात है ।
तो शंख की ओर क्रोध करके देखा तो शंख ने कहा कि भगवन मेरा कोई दोष नहीं , आप द्रौपदी से पूँछे ।
द्रौपदी ने बताया हाँ कि मेरे मन मे यह आया की पूरे दिन भर से मैं विभिन्न पकवान बना रही हूं और ये सभी पकवानों को एकसाथ मिलाकर खाने लगे तो इनको स्वाद कैसे पता लगेगा , मेरा परिश्रम बेकार जाते हुए देखकर मैंने सोचा कि है तो ये श्वपच वाल्मीकि जाति का ही न , इसे भोजन करना कहाँ आएगा ।
तो इसका कारण पूछा श्रीकृष्ण ने वाल्मीकि से कि भगवन आप बतायें आपने ऐसा क्यों किया कि सभी व्यंजनों को एक साथ मिलाकर खा रहे हैं ।
तो उन्होंने बताया कि प्रभु आपने पा लिया बस इसी को प्रसाद समझकर मैं इसे प्राप्त कर रहा था। अलग अलग भोजन करता तो सबका अलग अलग रस आता तो उसमें प्रसाद की भावना तिरोहित हो जाती और जिह्वा का रस ही रह जाता ।।
यह सुनकर द्रौपदी के मन में श्रद्धा हुई और उन्होंने प्रणाम किया ।
तब शंख ने बजकर यज्ञ की पूर्णाहुति की ।
इन्हीं शास्त्रों को सही सही न पढ़कर जय भीम प्रजाति जलाती , थूकती और चप्पल मारती है ।
अगर मन में कुछ जानने की अभिलाशा होती तो वह स्वयं किसी ब्राह्मण के पास जाकर इस सबका रहस्य पूछते ।।
आज इसीलिए यह सब इतनी वैमनस्यता आ गयी है ।
हाँ यह जानता हूँ कि हमारे यहाँ भी किसी को चाहे ब्राह्मण ही क्यों न हो , उसने कोई अपराध किया होता था तो सरपंच उसका घोड़ा पर बैठने का अधिकार , दाढ़ी मूंछ , पगड़ी पहनने का अधिकार छीन लिया जाता था और उन्हें गाँव से बहुत दूर कर दिया जाता था । उसको उसके वर्ण से भी च्युत कर दिया जाता था ।
यह उनका दंड होता था ।
जो आज एक प्रथा के रूप में विकसित हो गयी ।
अब उनके पूरे कुल को बहिष्कृत दृष्टि से देखा जाता है ।
जो कि पूरी तरह ग़लत है ।
ऐसा नहीं होता कि अपराधी के वंश में अपराधी ही जन्म लेगा ।।
इनको मंदिरों से प्रवेश वर्जित कर दिया गया था क्योंकि यह मंदिरों में बिना शुद्धता धारण किये हुए प्रवेश कर जाते थे ।
मांस रक्त चमड़ा आदि का कार्य करते हुए भी यह अशुचि अवश्था में ही मन्दिर की मर्यादा भंग कर देते थे ।
पहले शुद्र मन्दिर से स्वर्ण आदि चुरा ले जाते थे ।
इसीलिए स्वर्ण चोरी को 5 महापाप की श्रेणी में रखा गया ।
तभी से यह परम्परा के नाम पर विकसित होता चला गया और पूर्वजों के अपराधों को लेकर उनके सन्ततितियों को भी लपेट लिया गया ।
तो बस यही होता है कि सब चीजें समय के साथ स्वरूप बिगाड़ लेती हैं और एक ग़लत परम्परा के नाम पर बन जाती हैं ।
लेकिन अब वह बात नहीं रही है ।
धीरे धीरे यह सब समाप्त हो रहा है ।
आज भी सनातन धर्म सभी वर्णों को साथ लेकर चलती है ।।
शूद्र वर्णों का भी उतना ही महत्व है जितना सबका है ।
इनको प्रजा बोला जाता है ।
विवाह में यह जितना माँग ले , सब इनको दिया जाता है ।
अरे बस विवाह में थाली बजाने तक का इनको वस्त्र , सोने की अंगूठी , कई बोरे अनाज तक दिया जाता है ।
किसी का भी विवाह हो तो 1 लाख से ऊपर बटाई होती है प्रजा के लिए जिसमें इनको धोती साड़ी सब दिया जाता है ।
अगर 1 बीघा खेती होगी तो इनके लिए 1 बिस्सा ऐसे ही छोड़ दिया जाता है अनाज का कि ये इनका हिस्सा है ।
अस्तु । सार यही है कि कालांतर में सबका स्वरूप बिगड़ जाता है ।
मुख्य है भगवद भक्ति और भगवान के मार्ग पर जो चल गया , वह चांडाल उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ है जो गुटखा खाकर पैर पूजवा रहा है ।।
बहुत से कथावाचक जो कि कई मेरे मित्र भी हैं , अपनी अज्ञानता का परिचय जातिगत श्रेष्ठता को लेकर कर रहे हैं और द्वेष फैला रहे हैं , वह बिचारे अपनी छोटी बुद्धि के मारे हैं । उनको कुछ नहीं पता , उनको जाति और वर्ण तक में भेद नहीं पता तो उनको क्या ही कहा जाय ।
लेकिन इससे कुछ नहीं मिलेगा ।
कितना भी श्रेष्ठ बन लो , मरने के बाद यह नहीं पूछा जाएगा कि यह ब्राह्मण था या शूद्र । उसे उसके कर्मों के अनुसार दण्ड और पुरस्कार मिलेगा । अपितु 50 Extra कोड़े उस ब्राह्मण को लगाए जायेंगे जो ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद भी पशुवत कार्य करता रहा और समाज को जोड़ने की बजाय जातिगत विषमता फैलाकर लोगों को भगवद तत्त्व से विमुख करने में लगा रहा ।
मुझे अच्छी तरह पता है कि जातीय विदूषक और दम्भी इस पोस्ट पर गालियाँ देंगे और इसको पढ़कर भी इसको आगे प्रसारित नहीं करेंगे लेकिन यह सदा से होता आया है कि पूरे सोशल मीडिया पर यही पोस्ट घूमती मिलेगी विभिन्न नामों से और बड़े बड़े न्यूज channels पर इसी तथ्य को लेकर debate किये जाते हैं ।।
फिर भी बहुत से लोग हैं जो मुझे जानते हैं और वही इन सब बातों का प्रचार प्रसार करेंगे ।
इतना लंबा पढ़ने के लिए धन्यवाद ।
- @topfans
(श्वेताभ पाठक)
30/6/2026
Shwetabh Pathak Shwet Prem Ras
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