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Sunday, 5 July 2026

ऋग्वेद के १।२।१ मंत्र का आर्याभिनव में अर्थ पर शचीन्द्र शर्मा के द्वारा ईश्वर और मूर्ति भोग पर शास्त्रार्थ रुपी पोस्ट

दयानन्द अपनी आर्याभिविनय नामक पुस्तक में ऋग्वेद के १।२।१ मंत्र के अर्थ में लिखते हैं - "हम लोगों ने अपनी अल्प-शक्ति से सोमवल्ली आदि औषधियों का उत्तम रस तैयार किया है, और जो कुछ भी हमारे श्रेष्ठ पदार्थ हैं, आपके लिए अलंकृत अर्थात् उत्तम रीति से हमने बनाए हैं, आपको समर्पित किए गए हैं। उनको आप स्वीकार करो, सर्वात्मा से पान करो।"

शचीन्द्र - अब इन अनार्यसमाजियों की मूर्खता व दोगलापन देखिए कि इनके अनुसार इनका ईश्वर इनके निवेदन करने पर इनका गिलोय का काढ़ा पीने मटकते हुए चला आएगा, किन्तु इनके अनुसार हमारे वेदोक्त सत्यसंकल्प, सर्वसमर्थ, भक्तवत्सल भगवान हमारे द्वारा निवेदित सुगंधित मिष्ठानों को स्वीकार करने नहीं आएँगे।

इस मंत्र के अर्थ में दयानन्द ईश्वर को गिलोय का काढ़ा, मालपुए, हलुआ, खीर और आदि समर्पित कर रहे हैं। दयानन्दी बताएँ कि क्या वह परमात्मा भूखा-प्यासा घूमता है? अतः इस वेदमंत्र के दयानन्द द्वारा किए गए अर्थ से ही हिन्दुओं के मूर्ति के माध्यम से परमात्मा को भोग आदि लगाने की वेदमूलकता सिद्ध होती है।

अनार्यसमाजी - "इस मंत्र में 'पाहि' है, इसका अर्थ पीना नहीं है। यहाँ यदि 'पा पाने' धातु का प्रयोग होता, तो 'पिब' लिखा जाता। 'पाहि' तो 'पा रक्षणे' का होता है, 'पा पाने' का नहीं। अतः यहाँ पीने की बात नहीं है।"

शचीन्द्र - यह आपने दयानन्द के लिखे पर जूता मारा। अब वेद में लौकिक व्याकरण क्यो घुसा रहे हो? 'व्यत्ययो बहुलम्' तथा 'बहुलं छन्दसि' आदि पाणिनीय सूत्रों के अनुसार वैदिक प्रयोगों में विकरणों आदि का व्यत्यय हो जाता है। उदाहरणार्थ, वेद में 'हनति' रूप में अदादिगणीय धातु होते हुए भी शप् का लुक् नहीं हुआ है। इसी प्रकार अदादिगण से भिन्न धातुओं के साथ भी कहीं-कहीं शप् का लुक् मान्य किया गया है। 'पाहि' उसी प्रकार का एक वैदिक प्रयोग है। यहाँ 'पिब' रूप में स्थित शप् का लुक् हो जाने तथा उसके शित् न रहने के कारण 'पिब' आदेश की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई और रूप 'पाहि' बन गया। अतः यहाँ मूल धातु 'पा (पाने)' ही है, इसलिए इसका अर्थ भी 'पिब' अर्थात् 'पियो' ही ग्रहण किया जाएगा।

निरुक्त में भी 'तेषां पिब, शृणु नो ह्वानम्' ऐसा पाठ प्राप्त होता है। यहाँ 'तान्' के स्थान पर 'तेषाम्' का प्रयोग 'चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि' इस पाणिनीय नियम के अनुसार षष्ठी-विभक्ति में हुआ माना गया है। इसलिए इस स्थल पर 'पिब' अर्थात् पीने का ही प्रसंग स्पष्ट रूप से उपस्थित है। इसके अतिरिक्त अगले मंत्र में 'वायो तव सोमपीतये' पद भी आया है, जहाँ 'सोमपीतये' स्वयं सोमपान का बोध कराता है। अतः यह स्पष्ट है कि स्वामी दयानन्द ने भी इस संदर्भ में पानार्थक अर्थ को ही स्वीकार किया है।

 निरुक्त में श्री यास्क कहते हैं - "दर्शनीया इमे सोमाः अलंकृताः, तेषां पिब।" यहाँ 'पाहि' का अर्थ 'पिब' है। अतः उक्त मंत्र में दयानन्द के भी अर्थ से परमात्मा का सोमरस और लड्डू-कचौड़ी खाने के लिए आवाहन करना सिद्ध हुआ।

सत्यार्थ प्रकाश के ११वें समुल्लास में दयानन्द ने लिखा है कि - "वेद में परमात्मा के आवाहन-विसर्जन करने का एक भी शब्द नहीं है।" दयानन्द की यह बात भी उनके किए इस अर्थ से ही झूठी सिद्ध हो गई, क्योंकि इस वेदमंत्र में सोमरस का पान कराने के लिए परमात्मा का आवाहन स्वयं दयानन्द ने ही किया है। निरुक्त भी इसका समर्थन कर रहा है।

वेद का अन्य प्रमाण भी देखे - ऋग्वेद ५।५१।५ का मंत्र हैं - "वायवायाहि वीतये जुषाणो हव्यदातये। पिबा सुतस्य।" । दयानन्द ने आर्याभिविनय में यहाँ 'वायु' का अर्थ परमात्मा किया है। इस मंत्र में 'पिबा सुतस्य' का सीधा अर्थ है - "हे वायो! आओ और सोमरस का पान करो।" यहाँ 'सुत' सोमरस का ही एक प्रसिद्ध नाम है। व्याकरण की दृष्टि से 'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव' के अनुसार कर्म के अर्थ में भी षष्ठी-विभक्ति का प्रयोग स्वीकार किया गया है। इसलिए 'सुतस्य' का सम्बन्ध भी पान के विषय से ही है। इस प्रकार यह मंत्र भी स्पष्ट करता है कि 'पाहि' का अभिप्राय 'पिब' अर्थात् पीना ही है। और जब पान की क्रिया का उल्लेख है, तो वह मुख द्वारा ही संपन्न होती है। अतःइस वर्णन से परमात्मा का दिव्य आकार का होना भी सिद्ध होता हैं।

एवं एक स्थान पर रखे सोमरस को पीने के लिए परमात्मा को भी एकदेशी होना पड़ेगा। तो सर्वदेशी का सर्वदेशत्व भी बना रहे और उसे एकदेशी मानकर उसकी पूजा करना, यही मूर्तिपूजा का सिद्धान्त है। अतः इस वेदमंत्र से परमात्मा का आवाहन करना, उन्हें भोग लगाना, पेय पदार्थ समर्पित करना वेदसम्मत सिद्ध हुआ, और वह भी उस वेदमंत्र से ही, जिसका अर्थ स्वयं दयानन्द करके गए हैं।

अतः मूर्तिपूजा और परमात्मा का आवाहन तो वेदसम्मत सिद्ध होते हैं, और मूर्तिपूजा-अवतारवाद विरोधी दयानन्दी सिद्धान्त अवैदिक, विरोधाभाभासी और भ्रमपूर्ण सिद्ध होते हैं। आखिर झूठ को कहाँ तक बचाया जाए, सत्य को कहाँ तक छिपाया जाए?
✍️ शचीन्द्र शर्मा 
5/7/2026 फेसबुक पोस्ट रविवार आषाढ़ कृष्ण ५ विक्रय संवत २०८३ 
आर्याभिविनय पुस्तक में दयानन्द का लिखा हुआ अर्थ। यह भी ध्यान रहे कि "सर्वात्मा" शब्द भी इस पुस्तक में नहीं था, बाद में दयानंदियों ने जब ये छापी पुस्तक तो इसमें प्रक्षेप किया कि कही वैदिक सिद्धान्त सिद्ध न हो जाए , किन्तु इससे भी इनकी जान नहीं छूटती हैं। 
- शचीन्द्र शर्मा  @followers के लिए टिप्पणी 

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