बच्चों को मध्यान भोजन दिया जा रहा है। बच्चों को बढ़िया मध्यान्ह भोजन मिल रहा है। यह नवनियुक्त शिक्षक मध्यान्ह भोजन का प्रभारी है। इस शिक्षक की पारिवारिक स्थिति मांग करती है कि इस ज्यादा पैसा कमाना चाहिए। लेकिन वेतन उस जरूरत को पूरी करने में समर्थ नहीं है।
प्रभारी शिक्षक कभी-कभी खुद से बात करता है। अपनी अंतरात्मा से बात करता है। उसने अपनी दुविधा का एक बढ़िया समाधान निकाला है। अंग्रेजी में इसे 'विन-विन सॉल्यूशन' कहते हैं।
इस सॉल्यूशन को समझने के लिए पहले स्कूल की स्थिति समझते हैं। ज्यादातर बच्चे अनुपस्थित रहते हैं। मध्यान भोजन की वजह से कुछ उपस्थिति बढ़ती है। लेकिन फिर भी गैरहाजिर बच्चों की संख्या काफी है। शिक्षा विभाग चाहता है कि ज्यादा बच्चों की उपस्थिति हो।
शिक्षक ने जितने बच्चे वास्तव में उपस्थित हैं उससे बढ़ाकर रजिस्टर में उपस्थिति दिखा दी। बढ़ी हुई उपस्थिति से ज्यादा दाल खरीदना संभव हो सका। बिल बना ढ़ाई किलो दाल का। पर वास्तव में दाल सिर्फ दो किलो खरीदी गई। आधा किलो दाल के पैसे शिक्षक ने अपनी जेब में डाल लिए। ऐसा कुछ महीनों तक हुआ।
इस दौरान शिक्षक के अंतरात्मा उससे उसे कठघरे में खड़ा करती थी। शिक्षक अपने बचाव में तकरीर करता "मैं इतना काबिल हूं। मेरे समान कार्य वाले को मुझे आठ गुना ज्यादा वेतन मिल रहा है। मेरी आर्थिक स्थिति मुझे ऐसा करने की मांग करती है। शिक्षा विभाग भी तो ज्यादा उपस्थिति की मांग करता है। सो, शिक्षा विभाग भी खुश। उस फर्जी उपस्थिति से खरीदे गए अतिरिक्त दाल के पैसे मेरे जेब में। मैं भी खुश। बच्चों के भोजन की गुणवत्ता में भी समझौता नहीं हुआ। सो उनके भी दुखी होने का कोई कारण नहीं। लिहाजा, मैं निर्दोष हूं।"
अर्धचेतन अंतरात्मा ने कोई निर्णय नहीं सुनाया। शिक्षक का तबादला कुछ दिनों बाद नजदीक के ही उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हो गया। शिक्षक ने कुछ दिनों में वह नौकरी छोड़ दी। उसे उसकी योग्यता अनुसार नौकरी मिल गई। कुछ दिनों में शिक्षक की विपन्नता भी दूर हो गई। आज वह शिक्षक इंदौर में रहता है और अपनी आर्थिक स्थिति से संतुष्ट है।
वर्ष 2026। इंदौर का शासकीय माध्यमिक विद्यालय राऊ। वही शिक्षक आज अपनी बेटी का स्थानांतरण प्रमाण पत्र लेने आया है। विद्यालय में बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जा रहा है। भोजन में दाल भी मिलनी चाहिए। लेकिन भोजन से दाल गायब है।
संयोग से विद्यालय में भोजन की गुणवत्ता का निरीक्षण करने वाली प्रभारी शिक्षिका भी मौजूद है। शिक्षक ने शिकायत दर्ज करवाई कि आज के भोजन में दाल नहीं दी गई है।
वह शिक्षक 'प्रहलाद पाण्डेय' लोगों से कुछ कहना चाहता है।
धर्म की परीक्षा विपत्ति में ही होती है। क्योंकि तथाकथित विपत्ति के समय अपने धर्म की रक्षा करने में वह शिक्षक असफल रहा है इसलिए वह कहता है कि यदि आपके सामने विपत्ति आए तो आप अपने धर्म का साथ मत छोड़िए। क्योंकि विपत्ति एक दिन समाप्त हो जाएगी। आर्थिक तंगी समाप्त हो जाएगी। भोग करने की इच्छा समाप्त हो सकती है। यदि भोग करने की इच्छा रही भी, तो भोग करने के साधन, शरीर, शिथिल पड़ जाएंगे। पर आपके द्वारा किया गया अधर्म आपकी अंतरात्मा को तब तक झकझोरता रहेगा जब तक आप पश्चाताप की अग्नि में जलकर उस पाप से मुक्ति नहीं पा लेते। आप अपने धर्म को तर्कसंगत या न्याय संगत ठहरने के लिए कितने ही भंडारे, दान पुण्य क्यों न कर ले, उस अधर्म का अपराध बोध जीवनपर्यंत आप पर रहेगा। आप चाहेंगे कि आपको उसकी सजा मिले ताकि आप उससे उऋण हो सके। उस टीस को कम करने के लिए अपनी त्रुटि, पाप, अधर्म को स्वीकार करने पर कुछ कमी तो अवश्य आ जाएगी।
इसके लिए पहला कदम है अपनी अंतरात्मा को जगाइए।
(फोटो इंदौर के शासकीय माध्यमिक विद्यालय श्रमिक कॉलोनी राऊ की है)
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✍️ प्रहलाद पांडे
दिनांक 3/7/2026 ईस्वी
शुक्रवार,मिति आषाढ़ कृष्ण ३ विक्रम संवत २०८३
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