मित्रता हैं बेमोल -
बात उन दिनों की है जब श्री चैतन्य महाप्रभु नवद्वीप में ‘निमाई’ के नाम से जाने जाते थे। व्याकरण की शिक्षा के पश्चात वे न्यायशास्त्र लिख रहे थे। संयोगवश उन्हीं दिनों निमाई के सहपाठी मित्र श्री रघुनाथ जी भी न्यायशास्त्र पर ही ‘दीधिति’ नामक उस महान ग्रंथ की संरचना में तल्लीन थे जिसे आगे चलकर विद्या का प्रख्यात ग्रंथ माना गया। श्री रघुनाथ जी को अपने इस ग्रंथ के विद्वतापूर्ण लेखन पर बहुत आत्माभिमान था।
विचित्र संयोग देखिये कि उन्हीं दिनों किसी कार्य विशेष से दोनों मित्रों को एक ही नाव मंे बैठकर कहीं बाहर जाना पड़ा। दोनों मित्र परस्पर पुराने दिनों की सुखद यादों को बटोर-बटोर कर अपने हृदयों को आह्लाद से भर रहे थे। यकायक रघुनाथजी के हाथ में अपने मित्र निमाई का संरचनाधीन न्यायशास्त्र आ गया और वे उसे पढ़ने लगे । निमाई द्वारा लिखे इस ग्रंथ को वे ज्यों ज्यों पढ़ते जा रहे थे त्यों त्यों उनके चेहरे के खुशनुमा भाव क्षीण होते जा रहे थे। विद्वतापूर्ण लेखन के लिए आत्ममुग्ध एवं आत्म गौरवान्वित रघुनाथजी के चहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। पढ़ते पढ़ते उन्हें यह निश्चयपूर्वक लगने लगा कि निमाई के इस ग्रंथ के सामने उनका स्वयं का लिखा ग्रंथ नितान्त तुच्छ है। लाख रोकते हुए भी श्री रघुनाथ जी की वो आंखे जो पल भर पहले खुशी से चहक रही थीं अब खुद को ग्लानि केे आंसू बहाने से रोक नहीं पा रहीं थीं। मित्र की अन्तर्व्यथा समझने में सरल हृदयी निमाई ने क्षण मात्र की भी देर नहीं की।
पलक झपकते ही निमाई ने अपने मित्र श्री रघुनाथजी के हाथ से अपना नव रचित ग्रंथ खींच लिया और जब तक मित्र को पूरी बात समझ में आती उससे पहले ही अपने नव रचित ग्रंथ को धीरे से नदी में यह कहते हुए बहा दिया कि
‘‘जो ग्रंथ मेरे मित्र को संताप देने का कारण बने, उसे अस्तित्व में ही नहीं आना चाहिये।’’
आनन फानन में घटी इस घटना से जहां एक ओर श्री रघुनाथ जी हक्के बक्के रह गये और उनकी जिह्वा से एक शब्द भी नहीं फूट पड़ा, वहीं दूसरी ओर निमाई के सौम्य चेहरे पर कान्ति और गहरे आत्म संतोष की दिव्य रेखाएं और भी गहरी और उज्ज्वलतर हो उठीं। मानो वातावरण में महासंत तुलसीदास के इस दोहे -
*जो ना मित्र दुख होई दुखारी ।*
*तिन्हें बिलोकत पातक भारी।।*
से सावचेत होकर मित्र व्यथा के समग्र भाव जीवंत होकर स्वयं कह उठे हों -‘निमाई तुम्हारी जय हो ।
तुमने तो मित्र के मन की अनकही अछन्तर्व्यथा को समझकर ही न केवल स्वयं को पातकी की उपमा से बचा लिया बल्कि अपनी मित्रता को सर्वप्रशंसनीय और धन्यभागी बना दिया। तुम धन्य हो!
तुम्हारी मित्रता धन्य है !!’’
मित्रता की महिमा में चार चांद लगाने वाली एक कहावत है कि मित्र के लिए जान देना इतना मुश्किल नही हैं जितना मुश्किल ऐसे मित्र को खोजना , जिसके लिए जान दी जा सके।
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