### ## 1. राजा री फौज और अंधो सिपाही (पैलो मोटो परचो)
बात जुनाणी है, जणा महाराज चतुरदास जी बुटाटी रै झाड़-झांखां (जंगलों) में धुणी रमां'र तपस्या कर्यो करता। उण बखत उण रस्ते सूं एक राजा री फौज निकल रही ही। फौज रो एक सिपाही आँखों सूं आंधो हो और उण नै लकवो भी मार गयो हो, जणै उणने घोड़ा माथै बांध'र लाया करता।
फौज जणा बुटाटी कनै विश्राम कर्यो, तो राजा महाराज री धुणी माथै गयो और हाथ जोड़'र बोल्यो—*"हे संत! म्हारो आ सिपाही जंग रो मोटो सूरवीर है, पण आंख्यां री रोशनी चली गयी और आंग (शरीर) टूट गयो। कृपा करो।"*
महाराज चतुरदास जी आंख खोल्या, धुणी सूं **एक चिमटी भभूत** उठाई और उण सिपाही री आंख्यां माथै और लकवा वाळा आंग माथै लगा दी। चमत्कार ओ होयो सा, कि सिपाही उण इच पल में 'जय चतुरदास जी री' बोल'र बैठ गयो! उणरी आंख्यां री जोत पाछी आ गयी और हाथ-पग चालण ढुक गया। राजा ओ परचो देख'र महाराज रै चरणां में गिर गयो।
### ## 2. सात फेऱ्यां री रीत और बूढ़े मिनख री लाठी
एक बार एक बूढो मिनख, जको बिल्कुल खाट (पलंग) पकड़ रख्यो हो, उणरा बेटा उणने खाट समेत बुटाटी ले'र आया। मिनख रो आधा सूं बेसी शरीर पत्थर ज्यूँ कड़क हो गयो हो, न बोल सकतो न हिल सकतो।
मंदिर रा पुजारी कया—*"महाराज माथै भरोसो राखो और सात दिन री फेरी शुरू करो।"*
* **पैली और दूजी फेरी:** बेटा बाप ने गोदी में उठा'र परिक्रमा दिलवाई।
* **तीजी और चैथी फेरी:** बूढ़े मिनख रै शरीर में थोड़ी सुगबुगाहट हुई, उणरा हाथ हिलण ढुक गया।
* **पाँचवी फेरी:** मिनख अपणै बेटां रो हाथ पकड़'र हळके-हळके पाँव धरती माथै टिकायो।
* **छठी फेरी:** उण लाठी रो सहारो लियो।
* **सातवीं फेरी:** ज्यूँ ही सातवीं फेरी पूरी हुई, बूढो मिनख लाठी ने फैंक दियो और खुद दौड़'र महाराज री समाधि रै ढोक दे दी! उणरी आँखों सूं आंसू बगण ढुक गया। ओ कोई एक दिन री बात कोनी सा, बुटाटी में आज भी हर महीने इणिया का सैंकड़ों परचा आँखों देख्या मिले है।
### ## 3. गूंगी जीभ रो बोलणो
लकवा सिर्फ हाथ-पग में ही कोनी आवै, कई बार जीभ माथै भी आ जावै, जण सूं मिनख गूंगो हो जावै। एक बार एक छोटी बच्ची ने लकवो मार गयो और उणरी जीभ बिल्कुल बंद हो गयी। घरका रो-रो'र बेहाल हो गयो। बिकानेर-जोधपुर का सगा डॉक्टर दिखा दिया, पण कोई आराम कोनी मिल्यो।
थक-हार'र वे बुटाटी आया। महाराज री आरती रो संपुट (भजन) चाल रह्यो हो। बच्ची समाधि कनै बैठी ही। पुजारी जी आरती रो दीवो फिरा'र **चमत्कारी तेल री दो बूंद** उण बच्ची री जीभ माथै टपकाई।
तेल री बूंद जीभ माथै गिरतां ही, उण बच्ची रै शरीर में एक करंट सो आयो और वा जोर सूं चिल्लाई—*"मां... म्हारा चतुरदास जी महाराज!"* जो बच्ची सालां सूं गूंगी ही, वा बोलण ढुक गयी। पूरा मंदिर परिसर में महाराज रा जयकारा गूंज गया।
> **"धिन-धिन तपोभूमि बुटाटी, जठै मिटै हर रोग री माटी।**
> **चतुरदास जी रा परचा भारी, चरणां में आवै दुनिया सारी।"**
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### ## आज रो साच (2026 में भी परचो)
साचा मानो सा, आज सायन्स इतनी आगे बढ़ गयी है, पण बुटाटी धाम में आज भी न कोई डॉक्टर है, न कोई अंग्रेजी दवाई। बस महाराज री **आरती री भभूत, समाधि री पवित्र माटी (रज), तेल री मालिश और वो सात दिन री फेरी**। जका मिनख व्हीलचेयर माथै आवे है, वे सात दिन बाद हँसता-कूदता अपणै घराँ पाछा जावै है। ओ महाराज चतुरदास जी रो वो अमर आशीर्वाद है, जको सदियों बाद आज भी मारवाड़ री साख बढ़ा रह्यो है।
**चतुरदास जी महाराज और बुटाटी धाम** की कहानी राजस्थान के नागौर जिले (मेड़ता के पास) की एक ऐसी चमत्कारी और पावन गाथा है, जो आस्था, सेवा और असाध्य रोगों से मुक्ति का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाती है। यह कहानी आज से लगभग 500 साल पुरानी है।
आइए जानते हैं संत चतुरदास जी महाराज के जीवन और बुटाटी धाम की महिमा की पूरी कहानी:
### ## 1. कौन थे संत चतुरदास जी महाराज?
संत चतुरदास जी महाराज का जन्म मारवाड़ की पावन धरती पर एक चारण परिवार में हुआ था। वे शुरुआत से ही सांसारिक मोह-माया से दूर, ईश्वर भक्ति और जन-सेवा में लीन रहते थे। घूमते-घूमते उन्होंने नागौर के **बुटाटी गाँव** को अपनी तपोभूमि बनाया।
वे एक सिद्ध संत थे। उन्होंने यहाँ के जंगलों में कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी साधना इतनी उच्च कोटि की थी कि उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज था।
### ## 2. सेवा का संकल्प और लकवे (Paralysis) का इलाज
एक बार बुटाटी गाँव और आसपास के क्षेत्रों में कई लोग लकवे (पैरालिसिस) की बीमारी से पीड़ित थे। उस दौर में इस बीमारी का कोई सटीक इलाज नहीं था और पीड़ित व्यक्ति पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता था।
संत चतुरदास जी महाराज से लोगों का यह कष्ट देखा नहीं गया। उन्होंने अपनी कठिन तपस्या से प्राप्त सिद्धियों और ईश्वर की भक्ति को पूरी तरह से इन बीमार लोगों की **सेवा** में समर्पित कर दिया। वे अपनी दिव्य शक्तियों, जड़ी-बूटियों और आशीर्वाद से लकवे के रोगियों को ठीक करने लगे। उन्होंने प्रण लिया कि वे जीते जी किसी भी लाचार को अपने दर से निराश नहीं लौटने देंगे।
### ## 3. जीवित समाधि और अमर आशीर्वाद
बरसों तक जन-सेवा करने के बाद, जब चतुरदास जी महाराज का अंतिम समय निकट आया, तो उन्होंने बुटाटी धाम में ही **जीवित समाधि** ले ली।
समाधि लेने से पहले उन्होंने अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया कि—*"मैं भले ही सशरीर तुम्हारे बीच न रहूँ, लेकिन मेरी समाधि हमेशा जागृत रहेगी। जो भी कोई लकवे से पीड़ित व्यक्ति मेरी समाधि पर आएगा और श्रद्धा से फेरी (परिक्रमा) लगाएगा, वह पूरी तरह ठीक होकर अपने पैरों पर लौट जाएगा।"*
### ## 4. आज भी जारी है चमत्कार: बुटाटी धाम की महिमा
चतुरदास जी महाराज के समाधि लेने के सदियों बाद आज भी बुटाटी धाम में वही 'चमत्कार' और सेवा भाव देखने को मिलता है। यहाँ इलाज की एक अनोखी परंपरा है:
* **7 दिनों की परिक्रमा (फेरी):** यहाँ लकवे से पीड़ित मरीजों को लगातार 7 दिनों तक सुबह और शाम महाराज जी की समाधि की परिक्रमा दिलवाई जाती है।
* **भभूत और तेल की मालिश:** मंदिर की अखंड जोत की छाई (भभूत) और विशेष तेल से मरीज के प्रभावित अंगों पर मालिश की जाती है।
* **पूरी तरह निशुल्क सेवा:** यहाँ न तो कोई डॉक्टर है, न कोई दवाई और न ही कोई फीस ली जाती है। मंदिर की तरफ से मरीजों और उनके परिजनों के रहने और खाने (निशुल्क भोजनशाला) की पूरी व्यवस्था की जाती है।
देश भर से जो मरीज स्ट्रेचर या व्हीलचेयर पर आते हैं, वे यहाँ 7 दिनों की फेरी पूरी होने के बाद अपने पैरों पर चलकर वापस लौटते हैं।
### ## निष्कर्ष
जहाँ मेड़ता की मीराबाई ने 'प्रेम और त्याग' की मिसाल पेश की, वहीं उनके पास ही बुटाटी धाम के चतुरदास जी महाराज ने **'सेवा और लोक-कल्याण'** का ऐसा दीप जलाया, जिसकी लौ सदियों बाद आज भी लाखों दुखी लोगों के जीवन में उजाला कर रही है।
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