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Friday, 28 August 2026

जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामिश्री राघवाचार्य जी महाराज की 'अनार्योन्मूलन' के प्रति सम्मति -

जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामिश्री राघवाचार्य जी महाराज की 'अनार्योन्मूलन' के प्रति सम्मति - 

शुभाशयाः 

श्रुतिस्मृतिप्रतिपाद्य व्यवस्था ही धर्म है। तद्‌व्यतिरिक्त आचरण जो धर्म समझ कर किया जाए, वह धर्म नहीं है अपितु धर्माभास है। धर्म और धर्माभास के भेद को समझ कर धर्म का ग्रहण और धर्माभास (अधर्म) का त्याग सामान्य आस्तिक जन के लिए कठिन प्रतीत होता है तथा विधर्मियों के कुतर्क एवं उनके बकवास भरे ग्रन्थ सामान्य व्यक्ति को और भ्रमित कर देते हैं।

इस समय कलि के प्रभाव के कारण चारों तरफ से सनातन वैदिक धर्म पर प्रहार हो रहा है। सरकारें भी इसी को प्रोत्साहन दे रही हैं। समय समय पर आचार्यों ने सनातन धर्म के मानबिन्दुओं की रक्षा में आगे आकर शास्त्रार्थ एवं ग्रन्थ रचना के माध्यम से विधर्मियों को उत्तर दिया है। आज भी प्रामाणिक धर्माचार्य गण चाहे फिर वो वैष्णव हों, शाक्त हों या शैव, सभी आचार्य एक मत से वैदिक मर्यादा वर्णाश्रम धर्म, रोटी-बेटी की रक्षा में सतत प्रयत्नशील हैं। हमारे परम सुहृत् शास्त्रनिष्ठ परम विद्वान् स्वामी श्रीभागवतानन्द गुरु (श्रीनिग्रहाचार्य) जी मुखर एवं निर्भय होकर अपने वक्तव्यों के द्वारा विधर्मियों का मानमर्दन करते ही रहते हैं। 

श्रीस्वामी जी के द्वारा मुझे ज्ञात हुआ कि युवा विद्वान्, धर्मनिष्ठ श्री शचीन्द्र शर्मा जी के द्वारा "अनार्योन्मूलनम्" नामक ग्रन्थ की रचना हुई है। इस ग्रन्थ में विद्वान् लेखक ने सुन्दर युक्तियों के द्वारा आर्य के नाम पर प्रसिद्धि पाने वाले अनार्यों का समूलोच्छेद किया है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ऐसे निष्ठावान् विद्वानों के रहते सनातन वैदिक धर्म पर आँच नहीं आयेगी, ऐसे विद्वान् ही सनातन धर्मावलम्बियों के सम्बल हैं। भगवान् राजराजेश्वर श्रीजानकी नाथ जी के चरणों में यही प्रार्थना है कि सदा आप का अभ्युदय हो। "अनार्योन्मूलनम्" यह ग्रन्थ सभी सनातनियों के लिए सङ्ग्रहणीय है एवं सभी सनातन धर्मावलम्बियों को इसका अनुशीलन करना चाहिए ।

~• परिपूर्णमङ्गलानुशासनम् ~• 
       जयतु जयतु अस्तु

       ~ राघवाचार्य:

(जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामिश्री राघवाचार्य जी महाराज)

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