आर्यसमाजी - ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खंड अध्याय 72 में कहा गया है कि कृष्ण ने कुब्जा से संभोग करके वीर्याधान किया। अब कहिए, क्या पुराण ने कृष्ण को व्यभिचारी नहीं बनाया?
शचीन्द्र - इस प्रकरण में श्रीकृष्ण और कुब्जा के लिए पद प्रयुक्त हुआ है - "दंपत्ती रतिपण्डितौ"। दंपति शब्द पति-पत्नी के लिए संस्कृत में प्रयुक्त हुआ करता है, अवैध संबंध स्थापित करने वालो के लिए नहीं। यानि किसी आर्यसमाजी के घर की नियोगिनी, स्वामी दयानन्द के अनुसार, ग्यारह पुरुष नियोग के लिए चुन लेगी, तो ये सब दंपति नहीं कहलाए जाते हैं। पति-पत्नी ही दंपति कहे जाते हैं, जो कि यहाँ कहे गए हैं। अतः दंपति अगर समागम करें, तब वह व्यभिचार कहा हुआ?
एवं यदि पुराणकार व्यभिचार दिखाना चाहते, तो अगम्या, व्यभिचार आदि शब्दों का प्रयोग करते, किन्तु दंपति शब्द प्रयुक्त किया। इसके अतिरिक्त इस प्रकरण में 'भर्ता', 'कान्त', 'कान्ता', 'दंपति' आदि शब्द जो प्रयुक्त हुए हैं, वे व्यभिचार में प्रयुक्त नहीं होते हैं। अतः स्पष्ट है कि पुराण या पुराणकार यहाँ व्यभिचार नहीं कह रहे हैं, किन्तु आर्यसमाजी ही बलात् श्रीकृष्ण को व्यभिचारी कहना चाहते हैं।
एवं पूर्वापर प्रकरण भी देखा जाना चाहिए, उसे छोड़कर निष्कर्ष निकालना अन्याय है। नियम है - "सन्दिग्धेषु वाक्येषु प्रकरणं बलवत्तरम्।" अर्थात् यदि संदेह हो, तो सम्पूर्ण प्रकरण से वास्तविक अभिप्राय प्रकट होता है।
इसी प्रकरण में वर्णित है कि शूर्पणखा ने भगवान् को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए उत्कट इच्छा से तप किया। तब ब्रह्माजी ने वरदान दिया था - "जन्मान्तरे च भर्तारं प्राप्स्यसि त्वं वरानने"
अर्थात् अगले जन्म में भगवान् तेरे पति होंगे। यही शूर्पणखा अगले जन्म में कुब्जा हुई - "देहं तत्याज सा वह्नौ सा च कुब्जा बभूव ह"
अतः यहाँ कोई आकस्मिक अवैध संबंध का प्रकरण नहीं है, न ही व्यभिचार है। पूर्वजन्म के वरदान की सिद्धि का यह प्रसंग है, जिसमें भगवान् पति-रूप में कुब्जा को प्राप्त हुए।
अब विचार करें, क्या आर्यसमाजी इसी प्रकरण की इस कथा को मानेंगे? उत्तर है - नहीं। वे पुराण की इस कथा को नहीं मानेंगे, किन्तु इसी प्रकरण के एक अंश को मानकर श्रीकृष्ण और पुराण पर दोष लगाएंगे क्योंकि इनका उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण और पुराण पर दोष लगाना ही है।
अतः यहाँ न तो व्यभिचार कहा गया है और न हुआ है? संबंध की वैधता का निर्णय शारीरिक संयोग के वर्णन से नहीं, उसके शास्त्रीय और प्रसंगगत स्वरूप से निश्चित होता है।
दरअसल ये मूर्ख शृंगार को ही व्यभिचार समझ लेते हैं। ऐसा नहीं होता है। महाभारत में दुष्यन्त और शकुन्तला के गान्धर्व-विवाह का वर्णन है, उसे कहीं व्यभिचार नहीं कहा गया है।
यह भी देखना चाहिए कि इस पुराण में श्रीकृष्ण को ब्रह्म माना गया है। तब इस दृष्टि से भी विचार करना होगा। वीर्याधान शब्द में 'वीर्य' का अर्थ क्या होगा, जिसका आधान कुब्जा में किया गया?
यह वही वीर्य है, जिसके लिए आर्यसमाजियों की महिलाएँ परमात्मा से प्रार्थना करती हैं - "वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि"
तब क्या समाजी महिलाएँ अपने परमात्मा से शारीरिक वीर्य को अपने शरीर में प्रविष्ट कराने की प्रार्थना कर रही होती हैं?
इसी वीर्य का आधान श्रीकृष्ण ने कुब्जा में किया। फलस्वरूप उसकी सद्गति का यहाँ वर्णन है।
इस प्रकरण का परिणाम परमगति प्रकट हुआ है, कामतृप्ति नहीं। क्योंकि किसी भी कथा या प्रकरण का उद्देश्य यदि काम-भोग आदि दिखाना हो, तो भला निष्कर्ष मोक्ष, भगवत्प्राप्ति आदि क्यों उपसंहार में होगा?
अतः ब्रह्मवैवर्त पुराण के कुब्जा-प्रसंग से श्रीकृष्ण व्यभिचारी सिद्ध नहीं होते,किन्तु ऐसा झूठा आक्षेप करने वाले दयानन्दी अवश्य दयानन्द के कथित एकादश-नियोग-रूपी व्यभिचार से उत्पन्न हुए लगते हैं, अतः इन्हें सर्वत्र व्यभिचार ही दिखता है। नियम है - "तात्पर्यस्य ग्रहणम्" - ग्रंथकार का अभिप्रेत अर्थ भाव ग्रहण करना चाहिए, किन्तु ये मूर्ख सदैव उल्टा अर्थ ही ग्रहण करते हैं।
✍️ शचीन्द्र शर्मा
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