सेक्सी राधा
थोड़ी देर पहले अन्तरराष्ट्रीय- ख्याति के कलाविद डा नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने वाट्सऐप पर एक पोस्ट भेजी और आग्रह किया कि इसे अवश्य पढ़ें । पढ़नी ही थी ,पढ़ भी ली । स्वामी हरिदासजी के केलिमाल पर छह साल तक अध्ययन-अनुसंधान करता रहा हूँ , हर दूसरे-तीसरे दिन ऐसे सवाल आते रहे थे ,इसलिए इस पोस्ट को पढ़ कर मुझे कोई अचरज नहीं हुआ । डा अद्वैतवादिनी कौल के साथ जब भी विमर्श होता तब इन बिन्दुओं को लेकर हास-परिहास हो जाता । कपिलाजी ने तो बहुत स्पष्ट ही कर दिया था , आज बाजारवादी सभ्यता आक्रामक है और बाजारवाद देह को मनुष्यजीवन की परमावधि मानता है । आत्मा और अन्तश्चेतना से उसकी पहचान भी नहीं है । अतीन्द्रिय-अवधारणा को समझ पाना उनके कोर्स के बाहर है। बिहारिनदेव जी ने उदाहरण दिया - हीरा की परख कहा जानें मूरी बेचन हारौ ।मूली बेचने वाला हीरा की परख क्या जानें ? उस बेचारे ने हीरा को मामूली पत्थर समझा और बाँट बना लिया ।उससे यह आशा भी हम कैसे कर सकते हैं ?
सेक्स या रति मनुष्य की मूलप्रवृत्ति है । यह प्रवृत्ति पशुओं-पक्षियों आदि में भी होती है लेकिन मनुष्य उसका उदात्तीकरण कर लेता है । रति प्रवृत्ति को आधार बना कर आधुनिक-युग में फ्रायड ने मनुष्य जीवन की व्याख्या की है और प्राचीनकाल में वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में एक सूत्र दिया था- तदात्मकत्वात्कलानां अर्थात् समस्त कला-वैभव के विस्तार का बीज काम है । हालाँकि अंग्रेजी शब्द सेक्स काम का पर्यायवाची नहीं है और काम के लिए अंग्रेजी में दूसरा कोई शब्द है भी नहीं । काम से कमनीयता बनती है , कामना शब्द बनता है , काम्य शब्द बनता है । कामेश्वर और कामेश्वरी उपास्य तत्त्व हैं । संगीत नृत्य चित्रकला मूर्तिकला का असीम विस्तार उस रति बीज का वृक्ष और वन है । वही प्रवृत्ति जब भाव बनती है तब प्रेम के सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप बनते हैं - पुहुप वास ते पातरा । इस प्रेम को लेकर एक पुस्तक क्या, पुस्तकालय बने हुए हैं । समस्त भक्तिकाल के साहित्य ,संगीत , कला का विस्तार प्रेम का ही विस्तार है । प्रेम पर कोई कितना कहेगा , यह तो डूबने का विषय है । अब मनुष्य की प्रकृति का सवाल है , यदि राजस और तामस-प्रकृति में है तो उसी शब्द का दूसरा अर्थ ग्रहण करेगा और सात्विक मन:स्थिति में है तो उसका अर्थ भिन्न हो जायेगा । सेक्सी राधा और "वासना भरा कृष्ण" कहने वाला आदमी मूली बेचने वाला है ,उसकी गति देह और इन्द्रिय तक ही है , वह बेचारा क्या जानें कि संगीत के राग क्या हैं ? राग प्रेम की उद्दाम अवस्था का नाम है ।काम वहां पराजित है ! वहाँ देह नहीं है , इन्द्रिय कहाँ है ?सेक्स नहीं है ।वासना का ज्वार नहीं है । पशुधर्म नहीं है । जयदेव की बात आत्मराज्य की बात है , चेतना की वह अवस्था , जहां मन और इन्द्रिय का शासन नहीं है । निधिवन राज की जय कहियै।कृष्ण अप्राकृत मदन हैं । कामदेव प्राकृत मदन है । आत्मेन्द्रिय प्रीति इच्छा तार नाम काम , कृष्णेन्द्रिय प्रीति इच्छा तार नाम प्रेम ।सौन्दर्य और प्रेम दो नहीं हैं। प्रेम की प्रतीति सौन्दर्य है। प्रेम ही सौन्दर्य में व्यक्त होता है और उसे देखकर स्वयं ही उमंगता है। जैसे-जैसे उमंगता है, वैसे- वैसे सौन्दर्य की अभिवृद्धि होती है सौन्दर्य में नव-नवोन्मेष होता है। जब सौन्दर्य में नवोन्मेष होता है तो प्रेम की लालसा बढ़ती है, प्यास बढ़ती है। वृक्ष में बीज और बीज में वृक्ष, यही लीला है, यही निरवधि नित्य- विहार है। प्रेम की ठौर सौन्दर्य है और सौन्दर्य की ठौर प्रेम है । सौन्दर्य का स्वभाव ही प्रतिक्षण नवीनता -जब जब देखों तेरौ मुख तब तब नयौ नयौ लागत , ऐसौ भ्रम होत मैं कबहु देख्यौ न री । कौन बात जो अबही और अबही और अबही और । जनम अवधि हम रूप निहारिल नयन न तिरपित भेल - विद्यापति । ध्यान देने की बात है कि देश का लोकमानस जयदेव के पदों का गायन करता है , नाचता है , आनन्द में विभोर हो जाता है , उसने कभी नहीं कहा कि यह अश्लीलता है , प्रेम सौंदर्य माधुर्य आनंद रस को कोई अश्लील क्यों कहेगा ?
ये बेचारे बुद्धिजीवी , मति मारी गई है,इनको अकल अजीरन रोग है, लेकिन ये महाकवि जयदेव और गीतगोविन्द से घिन करें तो इनकी समझ है, हम तो इनसे घिन करेंगे नहीं ; क्यों करें?
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