संघ के एकात्मता स्तोत्र में फुले, ठक्कर बापा तथा अम्बेडकर की स्तुति है जो सनातन धर्म के विरोधी थे।
सुभाषः प्रणवानन्दः क्रान्तिवीरो विनायकः
ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः ॥३०॥
संघशक्तिप्रणेतारौ केशवो माधवस्तथा
स्मरणीयाः सदैवैते नवचैतन्यदायकाः ॥३१॥
ज्योतिबा फुले की पुस्तक गुलामगिरी के अनुसार ब्राह्मण मूल भारतीय नहीं थे। वे बाहरी (आर्य) थे, जो लगभग ३०००-३५०० वर्ष पहले भारत आए। फुले ने लिखा कि ये लोग ईरान क्षेत्र (आर्यावर्त के बाहर) से आए और यहाँ के मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) पर अधिकार जमाया। उन्होंने मनुस्मृति जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामाजिक वर्चस्व स्थापित किया। यह स्पष्ट रूप से इसाई मत के प्रचार के लिए भारत विरोधी कहानी थी, जिसका प्रचार अशिक्षितों के माध्यम से किया गया। आज तक किसी भी ग्रीक, इरानी या भारतीय साहित्य में आर्यों के बाहर से आगमन का कोई उल्लेख नहीं मिला है। खानों में काम करने के लिए अफ्रीका से मजदूर आये थे जिनके वंशज भारत के खनिज क्षेत्रों में बसे हुए हैं। उनका चेहरा देखने से ही अफ्रीकी मूल स्पष्ट है। आज भी उनकी उपाधियां वही हैं, जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं। किन्तु बाहरी लोगों को मूल निवासी तथा मूल निवासियों को बाहरी बना दिया। हिरण्यगर्भ सूक्त में स्पष्ट लिखा है-यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा (ऋक्, १०/१२१/६)-भारत के हिमालय का ही वर्णन है। केवल भारत की नदियों का ही उल्लेख है। फुले ने अंग्रेज गुरुओं से भी अधिक झूठ का प्रचार किया कि केवल ब्राह्मण बाहर से आये थे। यह मूर्खता तथा झूठ की सीमा है। केवल ब्राह्मणों का समाज १ दिन भी नहीं चल सकता है। उनके भोजन के लिए खेती कौन करेगा, घर कौन बनायेगा, पानी के लिए कुंआ कौन खोदेगा? ब्राह्मण समाज स्वयं ही नहीं जीवित रह सकता, दूसरों को कैसे पराजित कर सकता है? उनकी नकल में चितपावन अपने को ग्रीक, शाकद्वीपी अपने को मिस्र, आस्ट्रेलिया या दक्षिण यूरोप का बता रहे हैं, जहां इसका कोई उल्लेख नहीं है कि केवल ब्राह्मणों का समाज वहां था।
Arun Kumar Upadhyay
SUN 4 October 2026 FB Post
No comments:
Post a Comment