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Tuesday, 24 March 2026

आयुर्वेद में पीपल पर चढ़ी हुई गिलोय को सबसे उत्तम और प्रभावशाली माना जाता है।

आयुर्वेद में पीपल पर चढ़ी हुई गिलोय को सबसे उत्तम और प्रभावशाली माना जाता है। गिलोय एक ऐसी बेल है जिसमें यह गुण होता है कि वह जिस पेड़ पर चढ़ती है, उसके औषधीय गुणों को भी अपने अंदर समाहित कर लेती है।

जब गिलोय पीपल के पेड़ पर चढ़ती है, तो इसमें गिलोय के अपने गुणों के साथ-साथ पीपल के रक्त शोधक (Blood Purifying) और श्वसन तंत्र (Respiratory) को मजबूती देने वाले गुण भी मिल जाते हैं।

पीपल वाली गिलोय के विशेष फायदे: 𝐇𝐞𝐥𝐥𝐨 𝐔𝐩𝐜𝐡𝐚𝐫 

अमृत के समान रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity):
पीपल की ऊर्जा और गिलोय की शक्ति मिलकर शरीर की इम्यूनिटी को कई गुना बढ़ा देती है। यह बार-बार होने वाले संक्रमण और मौसमी बीमारियों से लड़ने में शरीर को फौलाद जैसा बना देती है।

फेफड़ों और सांस के रोगों में रामबाण:
पीपल ऑक्सीजन का भंडार है। जब गिलोय इस पर चढ़ती है, तो इसका काढ़ा दमा (Asthma), पुरानी खांसी और फेफड़ों की जकड़न को दूर करने में साधारण गिलोय से कहीं ज्यादा असरदार होता है।

रक्त की शुद्धि (Blood Purification):

पीपल के औषधीय गुण खून को साफ करने और चर्म रोगों (Skin Diseases) को दूर करने में सहायक होते हैं। पीपल वाली गिलोय का सेवन करने से चेहरे पर चमक आती है और कील-मुंहासे जड़ से खत्म होते हैं।

पुराने बुखार और जोड़ों के दर्द में राहत:

चाहे कितना भी पुराना बुखार (Chronic Fever) हो या गठिया (Arthritis) का दर्द, पीपल पर चढ़ी गिलोय की डंडी का काढ़ा सूजन को कम करता है और यूरिक एसिड को नियंत्रित करने में मदद करता है।

हृदय स्वास्थ्य और तनाव में कमी: 

उपयोग का सही तरीका:

ताजी डंडी: पीपल पर चढ़ी गिलोय की एक छोटी डंडी (अंगूठे जितनी मोटी) लेकर उसे कूट लें।

काढ़ा: इसे दो गिलास पानी में तब तक उबालें जब तक पानी आधा न रह जाए।

सेवन:

इसे छानकर गुनगुना होने पर सुबह खाली पेट पीना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है।

एक छोटा सुझाव: चूंकि आपके पास नर्सरी का अनुभव है, आप इसकी पहचान पर एक छोटी वीडियो भी बना सकते हैं। लोग अक्सर 'नीम गिलोय' के बारे में जानते हैं, लेकिन 'पीपल वाली गिलोय' की जानकारी उनके लिए काफी नई और कीमती हो सकती है।

पीपल को हृदय के लिए बहुत लाभकारी माना गया है। इस गिलोय का सेवन कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने और मानसिक तनाव (Stress) को कम करने में भी मदद करता है।

Tuesday, 17 February 2026

केवाँच: ख़तरनाक मगर बड़े काम की!



केवाँच: ख़तरनाक मगर बड़े काम की!

बहुत ही अनोखे गुण और अवगुण रखने वाली एक वनस्पति के विषय में जानकारी साझा करने जा रही हूँ आज मैं, पर उससे पहले बचपन में सुनी अकबर-बीरबल की एक मनोरंजक कहानी से आपको अवगत कराना चाहूँगी। वह कहानी इसी अनोखी बेल पर आधारित है और उसे पढ़कर आपको अवश्य ही आनन्द आयेगा।

तो कहानी के अनुसार हुआ कुछ यूँ था कि बादशाह अकबर हमेशा बीरबल का इस बात पर मज़ाक उड़ाया करते थे कि तुम लोग हर किसी को माता यानी माँ मान लेते हो, जैसे गौमाता, गंगा मैया, तुलसी मैया आदि-आदि!

एक दिन सुबह-सुबह दोनों साथ-साथ बगीचे की सैर कर रहे थे और बादशाह ने फिर यही बात छेड़ दी। बीरबल ने इस बार मन ही मन उन्हें सही सबक सिखाने की सोच ली।

उन्होंने चलते-चलते एक पौधे को झुककर प्रणाम किया फिर आगे बढ़ गये। पूछने पर कह दिया कि ये तुलसी हैं, हमारी माता!
अकबर हँसते हुए तत्काल आगे बढ़े और बीरबल को चिढ़ाने के लिए उस पौधे को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। ऐसा दो-तीन बार हुआ।

अबकी बार बीरबल दूसरी दिशा की ओर मुड़ गये और थोड़ी दूरी पर जाकर सुनहरी फलियों से लदी एक सुन्दर बेल को झुककर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर वहीं खड़े हो गये। पीछे-पीछे बादशाह आये और फिर से अपनी हरकत दुहरायी, आगे बढ़कर दोनों हाथों से बेल को जकड़ कर उखाड़ा और दूर फेंक दिया।

बस! कुछ क्षण ही बीते थे कि बादशाह के शरीर में भयंकर खुजली होनी शुरू हो गयी। और शुरू क्या हुई, बढ़ती चली गयी, बढ़ती ही चली गयी।
पता है क्यों?

क्योंकि वह केवाँच की बेल थी।😀😀

थोड़ी ही देर में खुजाते-खुजाते बादशाह की हालत बुरी हो गयी। शरीर की त्वचा एकदम से लाल हो गयी, जगह-जगह फफोले पड़ गये और पीड़ा व जलन की तो सीमा ही न रही।

"अरे बीरबल ये कौनसी माता थीं तुम्हारी, ये क्या कर दिया?"

अकबर ने जब रोते हुए पूछा तो बीरबल ने जवाब दिया, 

"हुजूर ये माता नहीं, पिता जी थे...तुलसी तो मैया थीं, माता होने के नाते क्षमाशील थीं, उन्होंने आपकी धृष्टता माफ कर दी लेकिन अफसोस पिताजी नहीं कर पाये!"

असहनीय कष्ट से मुक्ति का उपाय भी बीरबल ने जो बताया और बादशाह ने 'मरता क्या न करता' वाली हालत में अपनाया, वह था, गाय के ताजे गोबर का पूरे शरीर में लेपन करके रगड़-रगड़ कर नहाना, जिसके बाद ही राहत मिल सकी।

इस गोबर वाले उपाय को आप मज़ाक न समझ लें, यह सच में काम करता है। मुझे प्रायमरी स्कूल के समय की एक घटना याद है जहाँ स्कूल में किसी ने कुछ बच्चों की बैठने वाली जगह पर यह केवाँच लगा दी थी और मेरा व मेरी सहेली का छोटा भाई उसकी चपेट में आ गये थे। दोनों छोटे बच्चे बुरी तरह से रोते हुए घर लाये गये थे, और दोनों को सहेली की माँ ने इसी तरीक़े से नहला कर ठीक किया था!🤗🤗

संलग्न चित्रों में देखें एक बार, कितना सुन्दर सलोना रूप है इसकी फलियों का! सुनहरी छटा कितनी ध्यानाकर्षक है, फूल भी कितने सुन्दर हैं। लेकिन गुण! बाबा रे बाबा! कोई इसका शिकार न बने!🙅🙅

हिन्दी में केवाँच, कौंच या कपिकच्छु के नाम से जानी जाने वाली यह, सेम और मटर वाली फैबेसी (Fabaceae) फैमिली की एक फलीदार बेल है जिसका वानस्पतिक नाम मुकुना प्रुरिएंस (Mucuna pruriens) है।

वैसे तो इसका मूल उद्गम दक्षिणी चीन और पूर्वी भारत है, जहाँ इसे हरी सब्जी के रूप में उगाया जाता था। अब यह अफ्रीका, उष्णकटिबन्धीय एशिया, कैरिबियन, दक्षिण अमेरिका और प्रशान्त द्वीपों में व्यापक रूप से फैल गया है, जहाँ यह प्राकृतिक रूप से भी उगता है और उपयोग के लिए खेती भी की जाती है। भारत में यह सूखे पथरीले जंगलों, झाड़ियों और मैदानी इलाकों में जंगली तौर पर उगता पाया जाता है।

यह वास्तव में एक वार्षिक चढ़ने वाली बेल होती है, जिसकी लम्बाई 15-20 फुट तक हो सकती है। इसके पत्ते सेम फली के पत्तों की तरह ट्राईफोलिएट यानी तीन पत्तियों के समूह में होते हैं। फूल सफेद, गुलाबी या बैंगनी, और फलियाँ मोटी गूदेदार होती हैं, जो भूरे या सुनहरे काँटेदार रोमों यानी ट्राइकोम्स से ढँकी रहती हैं। इसके बीज चमकदार काले या भूरे रंग के होते हैं।

यह केवाँच खतरनाक इस कारण से है कि फलियों और पत्तियों पर मौजूद ट्राइकोम्स में मुकुनेन (mucunain) नामक प्रोटीन और सेरोटोनिन होते हैं, जो त्वचा से सीधे सम्पर्क होने पर तीव्र खुजली, लालिमा, सूजन और फफोले जैसे लक्षण पैदा करते हैं और आसानी से ठीक नहीं होते।

इसके कच्चे बीजों के सेवन से भी विषाक्तता हो सकती है, जिसके कारण उल्टी, पाचनतंत्र में गड़बड़ी या अन्य समस्याएँ सामने आ सकती हैं।

लेकिन इसकी फली और बीजों से मिलने वाले लाभ की बात करें, तो इसके बीजों में एल-डोपा (L-DOPA) प्रचुर मात्रा में होता है, जो पार्किंसन रोग के इलाज में उपयोगी है।

साथ ही यह पौरुष दुर्बलता, तंत्रिका विकार, अवसाद, मूड स्विंग, शरीर में किसी भी कारण से आयी सूजन कम करने और कामोद्दीपक के रूप में काम करता है। 
लम्बे समय से आयुर्वेद में कौंच पाक प्रसिद्ध है जिसे शरीर के वात और पित्त दोष सन्तुलित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है वह इसी केवाँच के बीजों से बनाया जाता है। यह मांसपेशियों को आराम देता है, रक्त प्रवाह बढ़ाता है, साथ ही साँप के काटने पर भी उपयोगी है।

उपयोग से पहले बीजों को भूनकर, उबालकर या किसी अन्य विधि से संसाधित यानी प्रोसेस करना जरूरी है ताकि इसकी विषाक्तता दूर हो जाये। आयुर्वेदिक दवाओं में इसे पाउडर या अर्क के रूप में उपयोग किया जाता है, जैसे फ़ूड सप्लीमेंट्स वगैरह में।

पार्किंसन के उपचार के लिए डॉक्टर की सलाह से ही इसकी निश्चित मात्रा ली जानी चाहिए। भोजन में आटे या सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है, किन्तु जिन्हें लिवर या किडनी सम्बन्धित समस्या हो, उन्हें और गर्भवती, स्तनपान कराने वाली स्त्रियों को इसके प्रयोग से बचना चाहिए, ऐसा आयुर्वेद के वैद्य सलाह देते हैं।

यदि अनजाने में या दुर्घटनावश केवाँच के रोम लगने से तेज खुजली हो तो प्रभावित स्थान को सौम्य साबुन और पानी से धोना चाहिए और साफ सूखे कपड़े से हल्के हाथों से पोंछकर कैलेमाइन लोशन या हाइड्रोकोर्टिसोन क्रीम लगाना चाहिए।

अधिक गम्भीर स्थिति होने पर एण्टीहिस्टामाइन लेना चाहिए जो गोली, सिरप, स्प्रे और ड्रॉप के रूप में मेडिकल स्टोर में उपलब्ध होते हैं। किसी भी स्थिति में नाखूनों से खुजलाने या खरोंचने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण और बढ़कर समस्या गम्भीर कर सकती है।

जान लीजिए कि दोधारी तलवार की तरह है यह केवाँच, एक तरफ इतनी सुन्दर, पौष्टिक और उपयोगी, वहीं दूसरी ओर इतनी भयंकर और ख़तरनाक! इसके साथ सावधानी से डील करने की जरूरत है, समझ लें!😊😊

क्या आपने भी इसे कभी कहीं देखा है या आपका भी इससे कभी पाला पड़ा है? या आपने भी इसकी कभी सब्जी खायी है? या फिर यह आपके लिए बिल्कुल नयी चीज है?
जो भी हो, इससे सम्बन्धित अपने अनुभवों और राय से मुझे अवगत करवाइयेगा। साथ ही आपको आलेख में दी गयी जानकारी यदि अच्छी लगी हो तो कमेंट और शेयर द्वारा मेरा उत्साहवर्धन भी अवश्य कीजियेगा! आपका दिन शुभ हो!🙏🙏💐💐
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©𝓝𝓮𝓮𝓵𝓪𝓶 𝓢𝓸𝓾𝓻𝓪𝓫𝓱 नीलम सौरभ रायपुर, छत्तीसगढ़
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वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Monday, 9 February 2026

वज्रदंती

#वज्रदंती #पौधा (Vajradanti Plant) जिसे हिंदी में वज्रदंती, संस्कृत में वज्रदन्ती और अंग्रेज़ी में #Toothache #medicinal #Plant या Acmella भी कहते हैं।
यह एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है, खासकर दाँतों और मसूड़ों के रोगों में अत्यंत उपयोगी माना जाता है।

🌿 पहचान (Identification).......⭐⭐⭐⭐

✅स्वरूप👉🏻छोटा हर्बल पौधा
✅पत्तियाँ👉🏻हरी, चिकनी, हल्की दाँतेदार किनारी
✅फूल👉🏻पीले रंग के, छोटा गोल स्पंज जैसा
✅बीज👉🏻काले और छोटे आकार के
✅स्वाद👉🏻हल्का तीखा और सुन्न करने वाला
✅जब फूल को मुँह में रखा जाए तो हल्की झनझनाहट और सुन्नता महसूस होती है — यही इसका औषधीय प्रभाव है।
🌍 कहाँ पाया जाता है??????,,,✳️✳️✳️✳️
 ✅भारत, श्रीलंका, नेपाल और दक्षिण एशिया में मुख्य रूप से पाया जाता है।
 ✅ जंगलों, पहाड़ी क्षेत्रों और खेतों के किनारों पर स्वतः उगता है।
🍂 पारंपरिक मान्यता (Old Beliefs)..🍁🍁🍁🍁🍁
 👉 आयुर्वेद में इसे दाँतों और मसूड़ों का सबसे शक्तिशाली पौधा माना गया है।
 👉प्राचीन वैद्य इसका उपयोग दंतमंजन बनाने में करते थे।
 👉 माना जाता था कि यह दाँतों को वज्र (हीरे) जैसा मजबूत बनाता है – इसी से इसका नाम वज्रदंती पड़ा।

✨ औषधीय गुण (Medicinal Benefits)...✳️✳️✳️✳️

✔️ दाँत दर्द में तुरंत आराम
✔️ मसूड़ों की सूजन (Gingivitis) में लाभकारी
✔️ पायरिया और बदबूदार सांस दूर करता है
✔️ दाँतों को मजबूत बनाता है
✔️ बैक्टीरिया और संक्रमण को रोकता है
✔️ हड्डियों और दाँतों में कैल्शियम अवशोषण बढ़ाता है
✔️ फंगल और बैक्टीरियल इंफेक्शन में उपयोगी

🪥 उपयोग (How to Use)...😁😁😁😁

1️⃣ कच्चे फूल चबाना..🍁🍁🍁🍁🍁
 👉1–2 फूल चबाने से
👉मसूड़ों की सूजन कम
👉दर्द में तुरंत आराम

2️⃣ जड़ों का काढ़ा......🍃🍃🍃🍃🍃🍃
 👉आधा कप पानी में जड़ उबालकर कुल्ला करना → पायरिया और बदबू में लाभकारी।

3️⃣ दंतमंजन (Tooth Powder),,,,,🦷🦷🦷🦷

👉वज्रदंती पाउडर + लौंग पाउडर + सेंधा नमक मसूड़ों को मजबूत करता है।

4️⃣ आयुर्वेदिक तेल
 👉 वज्रदंती तेल मसूड़ों में लगाने से रक्तसंचार बढ़ता है और दाँत मजबूत होते हैं।


🌱 ✳️✳️खेती (Cultivation)✳️✳️✳️✳️✳️

✅मिट्टी👉🏻रेतीली या दोमट
,✅धूप👉🏻आंशिक धूप, पूरी छाया भी चलेगी
✅पानी👉🏻मध्यम
✅तापमान👉🏻18–35°C

कटिंग या बीज द्वारा बहुत आसानी से उगता है।
⚠️ सावधानी....🚫🚫🚫
 ✅अधिक मात्रा में सेवन से मुँह ज्यादा सुन्न हो सकता है।
 ✅गर्भवती महिलाएँ या छोटे बच्चों को सेवन कराने से पहले वैद्य की सलाह जरूरी।
 
🌼निष्कर्ष🌼
वज्रदंती पौधा प्रकृति द्वारा दिया गया शक्तिशाली हर्बल टूथ केयर प्लांट है।
यह दाँतों, मसूड़ों, बदबू, और पायरिया जैसी समस्याओं में अत्यंत लाभकारी है और आज भी कई आयुर्वेदिक टूथपेस्ट में इसका उपयोग होता है।


साभार - सोनी गोवर्धन 

संदर्भ -https://www.facebook.com/share/p/1CmknjcEtT/

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Sunday, 8 February 2026

क्षिरणी (खिरनी) वृक्ष का महत्व।

#क्षिरिणी के पेंड़ विलुप्त होते जा रहे हैं। 
इसके वृक्ष विशालकाय एवं विशाल शाखा प्रशाखाओं वाले होते हैं। 
इसे #राजदान भी कहा जाता है 
क्योंकि यह 
#राजा-#महाराजाओं का #प्रिय #फल था और इसीलिए इसका नाम #राजदान पड़ा। 
आम बोलचाल की भाषा में इसे #खिरनी कहा जाता है। 
इसके फल #पौष्टिक गुणों से भरपूर होते हैं। 
इसके #फलों_में_दूध होता है। 
इसके #तने_से_गोंद भी निकलता है जो विभिन्न आयुर्वेद की औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त होता है। 
पुरुषों के #शुक्र_दौर्बल्य के लिए यह #अनोखा_फल है। 
इस पेंड़ के संरक्षण की आवश्यकता है क्योंकि अब यह पेंड़ विलुप्ति के कगार पर हैं। 
हमारे विद्यालय के सामने गुलाबबाड़ी में इसके बहुत पेंड़ थे जो अब नहीं दिखाई देते। 
🌹हरे कृष्ण 🌹
Dr. Rajpoot ~ 9452 319 885
साभार - आधुनिक आयुर्वेद 

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Saturday, 31 January 2026

हड़जोड़, जिसे आयुर्वेद में "अस्थि संहारक” कहा गया है। हजारों वर्षों से इसका उपयोग हड्डियों, जोड़ों और मांसपेशियों से जुड़ी समस्याओं के उपचार में किया जाता रहा है।

हमारी धरती पर ऐसी बहुत सी दुर्लभ औषधियाँ पायी जाती हैं, जो किसी वरदान से कम नहीं होतीं। उन्हीं में से एक है हड़जोड़, जिसे आयुर्वेद में "अस्थि संहारक” कहा गया है। हजारों वर्षों से इसका उपयोग हड्डियों, जोड़ों और मांसपेशियों से जुड़ी समस्याओं के उपचार में किया जाता रहा है। 

हड़जोड़ का वैज्ञानिक नाम Cissus quadrangularis है। यह एक बेलनुमा, चौकोर तने वाला पौधा होता है, जिसे भारत के कई हिस्सों में हड़जोड़, हड्डी जोड़, वज्रवल्ली जैसे नामों से जाना जाता है। इसकी जड़, तना और पत्तियाँ—तीनों ही औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं।

🌿 🌿हड़जोड़ (अस्थि संहारक) के औषधीय उपयोग

✅️ हड्डी जोड़ने में लाभकारी :-
हड़जोड़ टूटी हुई हड्डियों को प्राकृतिक रूप से जोड़ने में मदद करता है। यह हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं को सक्रिय करता है,जिससे फ्रैक्चर जल्दी भरता है और सूजन व दर्द में राहत मिलती है।

✅️ जोड़ों के दर्द और आर्थराइटिस में सहायक :-
इसमें मौजूद सूजनरोधी गुण जोड़ों की सूजन, जकड़न और दर्द को कम करते हैं। बुजुर्गों में होने वाली हड्डियों की कमजोरी और ऑस्टियोपोरोसिस में भी यह उपयोगी माना जाता है।

✅️ मांसपेशियों और चोटों की रिकवरी में सहायक :-
मोच, खिंचाव या खेलकूद से लगी चोटों में हड़जोड़ रिकवरी प्रक्रिया को तेज करता है। इसके पत्तों की हल्की गर्म सिकाई से दर्द में आराम मिलता है।

✅️ पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद :-
हड़जोड़ गैस, अपच, पेट फूलना और कब्ज जैसी समस्याओं में लाभ देता है। यह पाचन अग्नि को मजबूत करता है और भूख बढ़ाने में मदद करता है।

✅️ अस्थमा व श्वसन रोगों में उपयोगी :-
यह फेफड़ों को मजबूत करता है और सांस की समस्या में सहायक माना जाता है।

✅️ ब्लड शुगर व वजन नियंत्रण में सहायक :-
हड़जोड़ ब्लड शुगर को संतुलित रखने में मदद करता है और मेटाबॉलिज्म सुधारकर वजन नियंत्रण में भी सहायक हो सकता है।

✅️ महिलाओं के लिए लाभकारी :-
यह मासिक धर्म के दौरान होने वाले पेट दर्द और ऐंठन को कम करने में मदद करता है तथा हार्मोनल संतुलन को सपोर्ट करता है।
आयुर्वेद में इससे निर्मित औषधियों को उपयोग में लाया जाता है,जो सरलता से उपलब्ध है और सेवन करने में भी आसानी होती है।

🛑 ध्यान रखें 

हड़जोड़ एक शक्तिशाली आयुर्वेदिक औषधि है। इसका अधिक मात्रा में या गलत तरीके से सेवन नुकसानदायक हो सकता है। हृदय रोगियों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को इसका सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए।
अनुराधा बंसल 

Thursday, 29 January 2026

सिंहपर्णी ( डैंडेलियन ) सूजन व शरीर में जलभराव अद्वितीय लाभकारी

👇🏾डैंडेलियन ▪️:- सिंहपर्णी सूजन व शरीर में जलभराव अद्वितीय लाभ 
सिंहपर्णी को डैंडेलियन भी कहते हैं. यह एक जंगली पौधा है. सिंहपर्णी के पत्तों के दाँत आमतौर पर पीछे की ओर होते हैं. सिंहपर्णी के नाम की उत्पत्ति फ़्रेंच शब्द 'डेंट डी लायन' से हुई है जिसका मतलब है 'शेर का दाँत'. 
सिंहपर्णी के पत्ते गहरे हरे रंग के और लंबे होते हैं. 
इनके पत्तों के किनारे दाँतेदार होते हैं व टूटने पर इनके पत्तों से दूधिया रस निकलता है. 
सिंहपर्णी के फूल चमकीले पीले रंग के होते हैं. 
 इसके फूलों का सिर एकल डंठल पर होता है तथा इसके के फूलों का सिर 15 इंच तक लंबे चिकने डंठल पर बनता है तथा फूलों का सिर अनेक छोटे पुष्पों से बना होता है. पकने पर फूल सफेद रंग के रेशमी बीजों में बदल जाते हैं जो हवा चलने से दूर दूर उड़ जाते हैं 

यह एक प्राकृतिक मूत्र वर्धक है, सिंहपर्णी की जड़ें शरीर में उपस्थित अधिक तरल पदार्थ के उपापचय में सहायता कर, शरीर में हो रही सूजन व जलन को समाप्त करती है। विशेष रूप से यह शरीर के निचले भाग जैसे की पैर में सूजन कम करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। इसमें अच्छी मात्रा में पोटैशियम निहित है जो शरीर में सोडियम के स्तर को संतुलित कर सूजन एवं जलन से छुटकारा दिलाने में सहायक है।
सूजन व जलन से राहत पाने के लिए रोजाना जब तक सूजन ठीक ना हो जाए, दिन में दो से तीन बार सिंहपर्णी की चाय पिएं। मात्रा सूखा चूर्ण एक चम्मच एक कप पानी में उबालकर ताजा जड़ दो तीन इंच के करीब 

युरिनरी ट्रैक इंफेक्शन में ये गज़ब औषधि है 
सिंहपर्णी बहुत ही सक्षम मूत्रवर्धक होते हैं जो किडनी एवं मूत्र पथ में उपस्थित एवं एकत्रित विषाक्त प्रदार्थों का नाश कर, मूत्र सम्बंधित विकारों से बचाव करते हैं !सिंहपर्णी की जड़ें मूत्र की मात्रा के उत्पादन को नियमित कर किडनी को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने में मदद करती हैं। यह मूत्र पथ में विकसित हो रहे हानिकारक जीवाणुओं का नाश कर मूत्र-सम्बंधित विकारों को शरीर में आने से रोकती हैं। यह मूत्राशय सम्बंधित विकारों का भी एक सफल उपचार हैं। पेशाब की नली या मूत्राशय में फंसीं पथरी निकालने में बहुत सहायक है 
सिंहपर्णी अग्न्याशय की कोशिकाओं को सक्रिय करता है और शरीर में इंसुलिन के उत्पादन को बढाने में मदद करता है। यह ब्लड शुगर की आवश्यक मात्रा को बनाए रखने में भी मदद करता है। दरअसल सिंहपर्णी में मूत्र वर्धक गुण होते हैं, जिसकी वजह से शरीर में मौजूद अतिरिक्त शुगर को बाहर निकालने में सक्षम बनाता है। अगर अग्न्याशय इंसुलिन को प्रभावी ढंग से संसाधित नहीं कर पाता है, तो शरीर में ग्लूकोज का ठीक से उपयोग नहीं हो पाता है और रक्तप्रवाह में जमा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप मधुमेह होता है। चाय, जूस आदि के रूप में सिंह पर्णी के निरंतर उपयोग से इस बीमारी का इलाज किया जा सकता है।
इसके सेवन से त्वचा में आकर्षक रंग लाया जा सकता है। बता दें कि यदि इसकी टहनी को बीच में से तोड़ा जाए तो इसके अंदर दूधिया सफेद जैसा रस निकलता है जो त्वचा के लिए बहुमूल्य है तथा इसके पीले फूलों का रस भी सौंदर्य प्रसाधनों में बहुतायत में प्रयोग होता है। इस रस का उपयोग अगर त्वचा पर किया जाए तो त्वचा में खुजली और जलन की समस्या दूर हो जाएगी। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि इसका रस आंखों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

सिंहपर्णी में विटामिन-सी और ल्यूटोलिन भी प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है। विटामिन-सी और ल्यूटोलिन में कैंसर पैदा करने वाले मुक्त कणों को ख़त्म करने के गुण होते है। यही वजह है कि सिंहपर्णी शरीर को डिटॉक्सीफाई तो करता ही है, साथ ही ट्यूमर के विकास और कैंसर कोशिकाओं की प्रगति को भी रोकता है। चूंकि ल्यूटोलिन कैंसर कोशिकाओं को ख़त्म करने में सहायक है इस वजह से सिंहपर्णी के सेवन से कैंसर कोशिकाओं के प्रजनन गुण ख़त्म हो जाते हैं। यह प्रोस्टेट कैंसर के खिलाफ सबसे सफल औषधियों में सिंहपर्णी की गिनती की जाती है।
साभार 

Tuesday, 23 December 2025

जायफल से चिकित्सा - सर दर्द माइग्रेन, मुंह के छाले, खांसी जुकाम और चेहरे का तेज

॥ॐ॥
जायफल को पत्थर पर घिसकर चन्दन की तरह सर पर लगा लें 
सिर दर्द माइग्रेन में आराम मिलेगा ।

छाले हो रहें तो थोड़ा आधे चने बराबर सा घिस कर एक गिलास पानी में मिलाकर कुल्ले करें आराम आयेगा।

खांसी नजला जुकाम नजला कफ हो तो चने के दाने बराबर घिस कर छाती पर लगा लो। तीन दिन में ठीक होगा 

यदि मुह पर तेज नहीं हो तो धूप में काला पड़ जाता हैं जायफल घिसकर कर चेहरे पर उबटन की तरह लगा लें आधा घंटे बाद रगड़ कर उतार दें ।मुख खिल जायेगा।

साभार -
✍️ निशांत गुप्ता 
https://www.facebook.com/share/r/1EMa3ea2er/

वयं राष्ट्रे जागृयाम

Monday, 22 December 2025

खांसी झुखांम के लिए रामबाण औषधि " त्रिकटु "

आयुर्वेद में 'त्रिकटु' (Trikatu)🌿 को एक अत्यंत प्रभावशाली और आधारभूत औषधि माना गया है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, 'त्रिकटु' का अर्थ है 'तीन कटु' (तीखे) पदार्थ। यह मुख्य रूप से तीन मसालों का समान मिश्रण है: सोंठ (सूखा अदरक), काली मिर्च और पिप्पली (Long Pepper)
यहाँ त्रिकटु के प्रमुख आयुर्वेदिक लाभों का विवरण दिया गया है:
1. पाचन तंत्र के लिए वरदान (Digestive Health)
त्रिकटु को आयुर्वेद में 'दीपन' (अग्नि बढ़ाने वाला) और 'पाचन' (भोजन पचाने वाला) माना गया है
अग्नि प्रदीप्त करना: यह जठराग्नि (Digestive Fire) को सक्रिय करता है, जिससे भूख न लगने की समस्या दूर होती है
अपच और गैस: यह पेट फूलने (bloating), गैस और भारीपन को कम करने में सहायक है
पोषक तत्वों का अवशोषण: यह शरीर में अन्य औषधियों और भोजन के पोषक तत्वों के बेहतर अवशोषण (Bioavailability) में मदद करता है।
2. श्वसन संबंधी रोगों में लाभकारी (Respiratory Support)
त्रिकटु में कफ को संतुलित करने के गुण होते हैं
कफ नाशक: यह छाती और फेफड़ों में जमे अतिरिक्त कफ को ढीला करके बाहर निकालने में मदद करता है
सर्दी-खांसी: पुरानी खांसी, जुकाम और साइनस की समस्या में शहद के साथ इसका सेवन रामबाण की तरह काम करता है
3. मेटाबॉलिज्म और वजन घटाने में सहायक (Weight Management)
वसा का दहन: त्रिकटु शरीर के मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, जिससे अतिरिक्त वसा (Fat) को जलाने में मदद मिलती है
कोलेस्ट्रॉल: यह शरीर से हानिकारक टॉक्सिन्स (आमा) को बाहर निकालता है और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में मदद करता है
4. रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity Boost)
इसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो संक्रमण से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं और सूजन को कम करते हैं
त्रिकटु का उपयोग कैसे करें.....?
मात्रा: आमतौर पर 500 मिलीग्राम से 1 ग्राम (एक चुटकी)
तरीका: इसे गुनगुने पानी या शहद के साथ लेना सबसे प्रभावी माना जाता है।
समय: इसे भोजन से पहले (भूख बढ़ाने के लिए) या भोजन के बाद (पाचन के लिए) लिया जा सकता है
सावधानी (Cautions)
चूंकि त्रिकटु की तासीर बहुत गर्म होती है, इसलिए निम्नलिखित स्थितियों में सावधानी बरतें:
पित्त प्रकृति: जिन लोगों को एसिडिटी, सीने में जलन या अल्सर की समस्या है, उन्हें इसके सेवन से बचना चाहिए
गर्भावस्था: गर्भवती महिलाओं को इसका सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए
गर्म मौसम: भीषण गर्मी में इसका प्रयोग सीमित मात्रा में करें।


     साभार - ✍️Shivdal Trust Baba Ji
                 वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Friday, 19 December 2025

बुढ़ापे की लाठी - विधारा ।

बुढ़ापे की लाठी (वृद्धदारूक) विधारा,,,,।।।।
विधारा,,,,,,,,

विधारा को कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि घावपत्ता, अधोगुडा, समुद्रशोख, हाथीलता, वृद्धदारुक,, अर्गेरिया, एलीफ़ेंट क्रीपर, ऊनी मॉर्निंग ग्लोरी, हवाईयन बेबी वुडरोज़, सिल्की हाथी ग्लोरी, समुद्रबेल, गुगुलिक, और चंद्रपदा. विधारा एक सदाबहार लता है. यह भारतीय उपमहाद्वीप की देशज है ,विधारा के पत्तों की आकृति पान के पत्तों जैसी होती है,विधारा के फूल बैंगनी रंग के होते हैं,विधारा के फूल, पत्ते, और शाखाओं में कई तरह के स्वास्थ्यवर्धक गुण होते हैं।

विधारा की जड़ से लेकर तना और पत्तियों तक का इस्तेमाल कई बीमारियों को दूर करने में किया जाता है।
विधारा में एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटी-इंफ़्लेमेटरी, एनालजेसिक, हेपाटोप्रोटेक्टिव और एफ़्रोडिसिएक गुण पाए जाते हैं।

विधारा नसों के पोर-पोर को खोलने में टॉनिक का काम करता है।विधारा पुरुषों में स्टेमिना को बढ़ाता है। 

विधारा महिलाओं के लिए भी फ़ायदेमंद है, विधारा का इस्तेमाल जोड़ों का दर्द, गठिया, बवासीर, सूजन, डायबिटीज, खाँसी, पेट के कीड़े, सिफलिश, एनीमिया, मिरगी, मैनिया, दर्द और दस्त में किया जाता है। विधारा की जड़ पेशाब के रोगों तथा त्वचा संबंधी रोगों और बुखार दूर करने में उपयोगी होती है। 
जड़ का एथेनॉलिक सार सूजन दूर करने के साथ-साथ घाव को भरता है। इसकी जड़ के चूर्ण का मेथेनॉल सर दर्द और सूजन को समाप्त करता है। इसके फूलों का ऐथेनॉल सार उपयुक्त मात्रा में लिए जाने पर घावों को भरता है।

विधारा स्वाद में कड़वा, तीखा, कसैला तथा गर्म प्रकृति का होता है। यह जल्द पचता है और भोजन को भी पचाता है। विधारा के प्रयोग से कफ तथा वात शान्त होता है। यह औषधि पुरुषों में शुक्राणुओं को बढ़ाती है और वीर्य को गाढ़ा करती है। इसके सेवन से हड्डियां मजबूत होती हैं, सातों धातु पुष्ट होते हैं और मनुष्य बलवान तथा तेजस्वी होकर लम्बी आयु तक जवान बना रहता है। सिर में दर्द में विधारा की जड़ को चावल के पानी के साथ पीसकर माथे में यानी ललाट पर लगाने से सिर दर्द ठीक हो जाता है।

 कई बार पेट में फोड़ा हो जाता है जिसमें बहुत सारे छेद होते हैं। इन्हें दबाने से इनमें से पस भी निकलता है। ऐसे फोड़े को विद्रधि यानी बहुछिद्रिल फोड़ा या कार्बंकल कहते हैं। ऐसे फोड़े पर विधारा की जड़ को पीसकर लगाने से फोड़ा ठीक हो जाता है।

विधारा, भल्लातक तथा सोंठ, तीनों द्रव्यों को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस 2-4 ग्राम चूर्ण का सेवन गुड़ के साथ करने से बवासीर रोग में लाभ होता है मधुमेह यानी डायबीटिजके मरीज आज लगभग हर किसी के घर में है विधारा डायबीटिज में तो लाभ पहुँचाता ही है, साथ ही यह धातुओं को पुष्ट करके इसे होने से भी रोकता है। विधारा का सेवन करने से मधुमेह होने की संभावना घट जाएगी और शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ेगी। इसके लिए एक से दो ग्राम विधारा चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करना चाहिए। इससे पूयमेह यानी गोनोरिया में भी लाभ होता है।मूत्रकृच्छ्र रोग में पेशाब में जलन और दर्द होता है। पेशाब की मात्रा भी कम होती है। 

विधारा पेशाब को बढ़ाता है और जलन तथा दर्द में आराम दिलाता है। दो भाग विधारा की जड़ के चूर्ण में एक भाग गाय का दूध मिलाकर सेवन करें। अवश्य लाभ होगा यदि गर्भधारण करने में सफलता नहीं मिल रही हो तो विधारा का सेवन करें। विधारा तथा प्लक्ष की जड़ के काढ़े को एक वर्ष तक प्रतिदिन सुबह सेवन करें। इससे स्त्री के गर्भवती होने की सम्भावना बढ़ जाती है ।पेट में दर्द मुख्यतः अपच, कब्ज और गैस के कारण ही होता है। विधारा भोजन को भी पचाता है, कब्ज को भी दूर करता है। विधारा वात यानी गैस को भी नष्ट करता है। पेट दर्द को ठीक करना हो तो विधारा के पत्तों के 5-10 मिली रस में शहद मिलाकर सेवन करें। 
निश्चित लाभ होगा।सफेद प्रदर यानी ल्यूकोरिया स्त्रियों में संक्रमण के कारण योनी से सफेद पानी जाने की एक बीमारी है। समय पर चिकित्सा न किए जाने पर स्त्रियों में काफी कमजोरी आ जाती है। 

विधारा चूर्ण को ठंडे या सामान्य जल के साथ सेवन करने से सफेद प्रदर में लाभ होता है ,पक्षाघात यानी लकवा का एक प्रकार है। अर्धांग पक्षाघात में शरीर का बाँया या दाँया भाग लकवे का शिकार हो जाता है। विधारा की जड़ एवं कई अन्य घटक द्रव्यों के द्वारा बनाए अजमोदादि चूर्ण का सेवन करने से अर्धांग पक्षाघात में लाभ होता है।विधारा मूल में बराबर भाग शतावर मूल मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 15-30 मिली मात्रा में पीने से गठिया में लाभ होता है।
विधारा की जड़ का काढ़ा बना लें। इसे 15-30 मिली मात्रा में पीने से अथवा 1-2 ग्राम विधारा की जड़ के चूर्ण का सेवन करने से जोड़ों के दर्द, आमवात यानी रयूमैटिस अर्थराइटिस तथा सभी प्रकार की सूजन में लाभ होता है।

विधारा के पत्तों की सब्जी बनाकर खाने से वात के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द आदि विकार ठीक होते है।..
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Thursday, 18 December 2025

लहसुन से हो जायेगा कायाकल्प _ बिना पढ़े मत छोड़ना

लहसुन से हो जायेगा कायाकल्प _ बिना पढ़े मत छोड़ना 
लहसुन की उत्पत्ति मध्य एशिया से मानी जाती है। आज लहसुन भारत, चीन, फिलीपीन्स, ब्राजील, मैक्सिको आदि सभी देशों में बहुत बड़े पैमाने पर पैदा होता है,,,।

लहसुन में खनिज एवं विटामिनों की काफी अधिक मात्रा होती है। इसमें आयोडीन, गंधक, क्लोरीन, कैल्शियम, फाॅस्फोरस, लोहा, विटामिन ‘सी’ ‘बी’ काफी मात्रा में पाए जाते हैं।

रोग निवारक गुणों में लहसुन का प्रयोग दमा, बहरापन, कोढ़, छाती में बलगम, बुखार, पेट के कीड़े, यकृत के रोग, हृदय रोग, रक्त-विकार, वीर्य-विकार, क्षय आदि रोगों में लाभकारी है।

आयुर्वेद के आचार्यों का मानना है कि लहसुन के प्रयोग से कई प्रकार के रोगों से बचा जा सकता है। शारीरिक शक्ति और वीर्यवर्द्धन में लाभकारी है। यह पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक, गर्म, पाचक, मल-निष्कासक तीक्ष्ण तथा मधुर है।

लहसुन के गुणों की आधुनिक खोज भी प्राचीन विचारों की पुष्टि करती है। लहसुन को हृदय रोगों में ‘अमृत’ की संज्ञा दी गई है।

विभिन्न रोगों में लहसुन का उपयोग
क्षय रोग
10, 12 तुर्रियों को पाव भर दूध में अच्छी तरह उबाल लें। तुर्रियों को खाकर दूध पीने से तपेदिक व क्षय रोग में आराम मिलता है।

फेफड़े के रोग
यदि फेफड़े के पर्दे पर अधिक तरल जमा होने से सांस लेने में कठिनाई हो और ज्वर हो तो लहसुन पीसकर आटे में इसकी पुलटिस बनाकर दर्द वाले स्थान पर बांधने से आराम मिलता है।

दमा रोग
लहसुन का रस गुन-गुने पानी में मिलाकर पीने से सांस का दर्द दूर होता है। लहसुन की दो तुर्रियों को देशी घी में भूनकर दिन में दो बार खाने से श्वांस के कष्ट दूर होते हैं। शहद में लहसुन का रस मिलाकर चाटने से भी रोगी को आराम मिलता है। दमे के दौरे में भी लहसुन का रस व शहद मिलाकर चाटने से दौरे का कष्ट दूर होता है।

लहसुन दूध में उबालकर रात को पीने से दमा में लाभ होता है।
लहसुन को सिरके में उबालकर ठंडा कर शहद मिलाकर पीने से दमे के रोगी को लाभ होता है।
लहसुन छाती के सभी रोगों में लाभदायक है, यह सांस व दमे पर नकेल डालता है।

पाचन तंत्र
पेट के रोग के लिए लहसुन बहुत लाभदायक है। यह गैस और अम्लता की शिकायत दूर करता है। लहसुन के प्रयोग से आंतों में पाचक रस उत्पन्न होते हैं तथा पेट के रोगों को समाप्त करने में सहायता मिलती है। इसका प्रभाव शरीर में विद्यमान विष को दूर करता है। आंतों और पेट में किसी भी प्रकार से संक्रमण से उत्पन्न सूजन समाप्त हो जाती है। लहसुन में पाया जाने वाला एन्टीसेप्टिक तत्व संक्रामक रोगों से रोकथाम करता है।

पेट का कैंसर
पेट में कैंसर होने की स्थिति में पानी में लहसुन को पीसकर कुछ समय रोगी को पिलाते रहने से पेट से कैंसर दूर हो जाता है।अमाशय का फोड़ा

अमाशय में यदि कोई फोड़ा हो जाए तो ऐसी स्थिति में भी लहसुन का प्रयोग करने से रोगी को लाभ होता है। ऐसे में लहसुन की दो तीन तुर्रियां चबाकर खानी चाहिए।

पेट के कीड़े
पेट दर्द, पेचिश, दस्तों में भी लहसुन का प्रयोग लाभदायक है। पेट के रोगों में लहसुन के कैप्सूल भी उलपब्ध हैं। लहसुन से आंतों के विषाणु नष्ट होते हैं।

हृदय रोग
हृदय रोग के लिए लहसुन को ‘अमृत’ की संज्ञा दी गई है। हृदय रोग का मुख्य कारण रक्त वाहिनियों, धमनियों का सिकुड़ जाना है और इनसे कोलेस्ट्राॅल जम जाता है जिसके कारण शरीर में रक्त-प्रवाह ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। लहसुन के प्रयोग से सिकुड़ी हुई अथवा रुकी हुई धमनियां साफ हो जाती हैं और व्यक्ति हृदय रोग से मुक्ति पा लेता है।

लहसुन की दो तीन तुर्रियां चबा लेने से हार्ट फेल होने की नौबत नहीं आती, ऐसे में नियमित लहसुन दूध के साथ प्रयोग करना चाहिए। लहसुन के सेवन से हृदय पर पड़ने वाला गैस का दबाव कम होता है। यह कोलेस्ट्राॅल को समाप्त करता है तथा हृदय रोगी को नया जीवन देता है।

रक्त चाप
लहसुन का प्रयोग रक्त को पतला करता है इसलिए उच्च रक्तचाप से बचाता है। उच्च रक्तचाप का प्रमुख कारण भी धमनियों का संकुचित होना है। लहसुन के प्रयोग से धमनियों की सिकुड़न समाप्त हो जाती है। लहसुन, पुदीना, जीरा, धनिया, काली मिर्च, सेंधा नमक की चटनी खाने से रक्तचाप कम होता है।

जोड़ों के दर्द
लहसुन के प्रयोग से जोड़ों के दर्द मंे कमी आती है,इससे जोड़ों की सूजन कम होती है, दर्द व सूजन वाले स्थान पर लहसुन का रस लगाने से दर्द कम हो जाता है सूजन दूर होती है। जिन्हें लहसुन की गंध से परहेज है वे रात को लहसुन को घोलकर पानी में भिगोकर सुबह धोकर खाएं। आजकल लहसुन के कैप्सूल भी बाजार में उपलब्ध हैं, उनका प्रयोग किया जा सकता है।

कैंसर
लहसुन का रस कैंसर में लाभदायक होता है। पानी में लहसुन का रस मिलाकर पीने से कैंसर में फायदा होता है, कैंसर की रसौली भी लहसुन के रस के सेवन से नष्ट हो जाती है।

नपुंसकता
किसी भी तरह से प्रयोग किया गया लहसुन नपंुसकता दूर करता है। नपंुसक लोगों को 15-20 लहसुन की तुर्रियों को घी में तलकर खाना चाहिए।

लहसुन के रस को शहद के साथ सेवन करने से भी नपुंसकता दूर होती है।
नंपुसक व्यक्ति लहसुन की तुर्रियों को दूध से उबालकर भी सेवन कर लाभ उठा सकते हैं।
त्वचा विकार
लहसुन का प्रयोग त्वचा के विकारों को भी दूर करता है। लहसुन को चेहरे पर दिन में कई बार मलने से कील मुहांसे दूर होते हैं, आंखों के नीचे के काले धब्बे लहसुन रगड़ने से धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। किसी भी प्रकार के दाग-धब्बे दूर करने में लहसुन लाभदायक है। सौंदर्यवर्धक के रूप में लहसुन का प्रयोग ‘अमृत’ है।

घाव के सड़ने या कीड़े पड़ने पर
शरीर पर कहीं घाव होने पर लहसुन का रस लगाने पर घाव जल्दी ठीक हो जाता है, घाव में कीड़े नहीं पड़ते हैं।

गुम चोट
गुम चोट में भी लहसुन लाभकारी है। लहसुन की तुर्रियों को नमक के साथ पीसकर गुम चोट वाले स्थान पर बांधने से लाभ होता है।

नोट
तीन वर्ष से कम आयु के शिशु को लहसुन नहीं देना चाहिए, किसी भी रोग के लिए लहसुन का प्रयोग करने के लिए किसी चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह लेना हितकर होगा।

लहसुन के अन्य प्रयोग
जहरीले कीड़े के काटने पर भी लहसुन का रस लगाने से विष का प्रभाव दूर हो जाता है।
गले की ग्रंथियांे की सूजन में लहसुन चबाकर खाने से सूजन दूर हो जाती है।
कुकुर खांसी, काली खांसी, फेफड़ों से खून आने पर लहसुन की कलियां चूसने से लाभ होता है।

लहसुन खाने से निमोनिया में भी आराम होता है।
पीलिया में भी लहसुन का प्रयोग लाभकारी है।
लहसुन को तेल में पकाकर उस तेल को ठंडाकर मालिश करने से त्वचा की खुजली मिट जाती है और त्वचा ठीक हो जाती है।
मिर्गी की बेहोशी दूर करने के लिए लहसुन के रस को नाक में टपकाना चाहिए।

लहसुन का नियमित सेवन बुढ़ापे को दूर रखता है।
लहसुन मेधाशक्ति को बढ़ाता है और नेत्रों के लिए भी हितकर है।
लहसुन में विद्यमान एलाइसिन, ऐजोन तथा गंधक तत्व शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करता है
Shivdal Trust Baba Ji

Friday, 12 December 2025

कटेरी (कंटकारी) अपने औषधीय गुण और उपयोग

कटेरी (कंटकारी) अपने औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है, जो खांसी, अस्थमा, बुखार, पेट दर्द, लिवर और त्वचा रोगों में फायदेमंद है; यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है, पाचन सुधारती है, सूजन कम करती है और श्वसन संबंधी समस्याओं, जैसे बलगम और सांस लेने में कठिनाई में राहत देती है, जिसके लिए इसके फूल, जड़ और फल का उपयोग काढ़े, चूर्ण या लेप के रूप में किया जाता है. 
कटेरी के प्रमुख औषधीय गुण और उपयोग:
श्वसन स्वास्थ्य (Respiratory Health):
खांसी, सर्दी, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस में बलगम साफ कर राहत देती है.
इसके फूलों का चूर्ण शहद के साथ या जड़ का काढ़ा पीने से फायदा होता है.
पाचन (Digestion):
पाचन अग्नि को उत्तेजित करती है, गैस, सूजन और कब्ज कम करती है.
पाचन सुधारने के लिए जड़ का चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लिया जाता है.
दर्द और सूजन (Pain & Inflammation):
गठिया, जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द में सूजन-रोधी गुणों के कारण लाभकारी है.
पत्तियों का पेस्ट लगाने या काढ़े से कुल्ला करने से दांत दर्द में आराम मिलता है.
रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity):
एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है.
त्वचा और बाल (Skin & Hair):
मुंहासे और त्वचा संक्रमण में पत्तों का पेस्ट लगाने से लाभ होता है.
गंजेपन और बालों के झड़ने को रोकने के लिए इसके रस को शहद के साथ सिर पर लगाते हैं.
अन्य लाभ:
सिरदर्द: फल के रस का लेप माथे पर लगाने से आराम मिलता है.
लिवर: लिवर को स्वस्थ रखती है और शरीर से विषाक्त पदार्थ निकालती है.
आंखें: आंखों के दर्द और लालिमा में पत्तियों का लेप फायदेमंद है. 
उपयोग के तरीके:
काढ़ा: खांसी और बुखार के लिए जड़ या फल का काढ़ा बनाते हैं.
चूर्ण: पाचन और खांसी के लिए फूलों या जड़ का चूर्ण.
पेस्ट/लेप: पत्तियों का पेस्ट त्वचा और आंखों पर लगाते हैं.
धुआं: दांत दर्द के लिए बीजों का धुआं लेते हैं. 
सावधानी: किसी भी औषधीय पौधे का उपयोग करने से पहले, विशेषकर यदि आप गर्भवती हैं या कोई अन्य दवा ले रही हैं, तो किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लेना महत्वपूर्ण है.
साभार -लाईलाज बिमारी का इलाज - फेसबुक पेज 
संदर्भ - https://www.facebook.com/share/p/19vjWs7wXf/

वयं राष्ट्रे जागृयाम