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Thursday, 9 July 2026

मत पंथ समाजो में ईश्वर के नाम पर "व्यक्ति पूजा" आरंभ हो जाती हैं।

मेरा जन्मस्थान हरियाणा में सिरसा के पास है तो मैंने बचपन से ही राम-रहीम के अनुयायियों को बहुत करीब से देखा है। मेरे दादाजी गीताप्रेस का कल्याण अंक और स्वामी रामसुखदास जी की किताबें नियमित रूप से पढ़ा करते थे। उन्होंने ही धीरे-धीरे मुझे धार्मिक साहित्य की तरफ उन्मुख किया था जिसका असर ये है कि आज-तक कभी अंडा भी नही चखा और आज भी समयानुकूल परिष्कार के साथ अध्ययन की वो यात्रा अनवरत जारी है......

उनकी अक्सर राम-रहीम के अनुयायियों के साथ बहस हो जाया करती थी और राम-रहीम के अनुयायी इस्लामिक कट्टरपंथीयों की तरह अपने बाबा के विरुद्ध एक शब्द भी सुनने को राजी नहीं होते थे।

आखिर क्या कारण है कि भारत का भोला-भाला कृषक समाज इन बाबाओं व डेरों के चक्कर में पड़ जाता है?....

● हमारी वैदिक धारा का जो उपनिषदीय ज्ञान था। उस ज्ञान को हम आम जनता तक पहुंचाने में पूरी तरह असफल हो गए हैं। उपनिषदीय ज्ञान केवल अभिजात और बहुत पढ़े-लिखे लोगों तक ही सीमित होकर रह गया है। साहित्य में भी आनन्द सर, मनोज श्रीवास्तव सर जैसे इक्के-दुक्के विद्वान लोग इस ज्ञान परम्परा को आगे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, उनको कितना हिन्दी का आम पाठक पढ़ रहा है? 
केवल मुठ्ठी भर लोग ही उनको पढ़ रहे हैं।
अथर्वा को लेकर ही मुझे न जाने कितने लोगों ने कहा कि तुम्हारे कहने से किताब खरीद तो ली लेकिन समझ नहीं पा रहे हैं।
इसमें लेखक का दोष नहीं है। दोष हमारा ही है क्योंकि हम उस ज्ञान परम्परा से पूरी तरह से कट गए हैं इसलिए समझ नहीं पा रहें हैं और परिणाम स्वरूप हम मूढ़ताओं की माला पहनाने वाले बाबाओं की शरण में चले जाते हैं।

● आम गरीब जनता चमत्कार से प्रभावित होती है और साधन-सपन्न जनता विचार से प्रभावित होती है इसलिए आपने देखा होगा कि चमत्कार वाले बाबाओं के पास अधिकतर गरीब जनता जाती है और रजनीश जैसे बाबा के पास साधन-सम्पन्न लोग जाते थे।
जिस देश में दो किलो धान के बदले लोग कन्वर्ट हो जाते हो। ऐसी अभावग्रस्त जनता के मनोविज्ञान को पकड़ना बहुत आसान है। बस एक दो चमत्कार दिखा दो, सत्संग करवा दो और फिर भेड़-चाल शुरू।

● भारत के सामुहिक अवचेतन में भक्ति का कॉन्सेप्ट बहुत गहरे से पैठा हुआ है। अब वो भक्ति धीरे-धीरे कब सगुण ईश्वर से फिसलकर किसी जीवित व्यक्ति पर केंद्रित हो जाती है। लोगों को पता ही नही चलता।
मेरे जैसा अज्ञेयवादी जब इस तरह की व्यक्तिपूजा देखता है तो कोफ्त सी होती है।
ईश्वर प्राप्ति के दो मार्ग और भी है लेकिन उस पर चलने के लिए बहुत मेधा व प्रज्ञा चाहिए, बहुत पुरुषार्थ व परिश्रम चाहिए।
लोग इसलिए भक्ति का एक सरल सा मार्ग खोज लेते हैं और उसमें भी सबसे निकृष्ट सकाम भक्ति का मार्ग खोज लेते हैं।
लोग बेचारें करे भी तो क्या?
जीवन ही इतना अभावग्रस्त है कि भोगवादी एंग्जाइटी उनसे ऐसा करवा लेती है और इसी एंग्जाइटी की भेड़ से हमारे बाबा लोग पूरी ऊन उतार लेते हैं।

और भी बहुत सारे कारण है। पोस्ट लम्बी हो जाएगी इसलिए अभी इतना ही बाकी समय मिलने पर लिखूंगा।

शुभ देपावत जी

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