ये दयानंदी गिरोह वाले लड़के लड़कियों को समझाते हैं कि - "माता-पिता अगर तुम्हारे विवाह करने को नहीं मान रहे हैं तो वे माता-पिता कुएँ में पड़े" (अपनी पुस्तक में दयानंद ने भी माता-पिताओं के लिए यही शब्द प्रयुक्त किया है - माता-पिता कुएँ में पड़े) - और ऐसा कहकर, कुल छह-सात हजार रुपए के लालच में ये बस उनके दो कागज देखकर उनका विवाह करा देते हैं। किस्से ऐसे भी आए हैं कि मुसलमान ने हिन्दू नाम से फर्जी आधार कार्ड बनाया और आर्यसमाज मंदिर में जाकर हिन्दू लड़की से शादी कर ली। और यह दयानंदी गिरोह न केवल उस लड़की के बलात्कार का सर्टिफिकेट उस लड़के को दे देता है, बल्कि यह तक सुनने में आया है कि इनकी कुछ संस्थाएं तो घर से भागे लड़के-लड़कियों का विवाह कराकर वहीं सेक्स करने के लिए कमरा भी दे देते हैं, उनसे अधिक पैसे लेकर। कहते हैं कि - हो सकता है घर वाले शादी को न मानें, इसलिए सुहागरात भी यहीं माना डालो, ताकि तुम्हारे माँ बाप फिर विवश हो जाएँ।
अगस्त 2025 का मामला है। एक मुस्लिम जेहादी ने नाबालिग हिन्दू लड़की का अपहरण किया, उसे बहलाया-फुसलाया, उसके साथ बलात्कार किया और नकली कागजों के साथ जाकर आर्यसमाज में जाकर शादी कर ली, और इनकी शादी करा भी दी गई। यह मामला हाईकोर्ट में पहुँचा था।
भोपाल का मामला था, जिसमें एक लड़की ने अपने ममेरे भाई से जाकर आर्यसमाज में विवाह कर लिया। उसकी माँ थाने में फूट-फूटकर रो रही थी, और लड़की कह रही थी कि आज से उसकी तीनों बहनें व माँ-बाप उसके लिए मर गए।
ऐसा ही एक मामला दिल्ली में हुआ। इसमें आर्यसमाज ने एक भाई-बहन की शादी करा दी थी। लेकिन लड़की के परिवार ने विवाह को नहीं माना और वे कार्यवाही करने की बात करने लगे। तब वहाँ के दयानंदी गिरोह के विवाह कराने वाले की बेटी ने अपने साथ गुंडों को ले जाकर इस परिवार पर हमला करके उन्हें घायल कर दिया था।
ऐसे अनेक मामले आए दिन अखबारों में छपते आए हैं। यह दयानंदी रैकेट लड़के-लड़कियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले कागजों को भी वेरिफाई नहीं करता है। इनको चाहिए बस वे सात-आठ हजार रुपए और वे लड़के-लड़कियाँ इनके पंथ में शामिल हो जाएँ, जिससे इनकी संख्या बढ़े। बस इतना ही चाहिए इनको।
मित्रों, एक लड़की के पिता का हृदय बड़ा कोमल हो जाता है। यह निर्विवादित सत्य है कि एक पिता के अन्तर्मन में जैसा स्नेह पुत्री के लिए होता है, वैसा संसार में अन्य किसी के लिए नहीं होता, भले ही वह उसे प्रकट करे या न करे। पुत्री उसके लिए गौरव होती है। माता पुत्री के भविष्य के लिए सपने सँजोती है। फिर वह लड़की एक दिन बिना कुछ विचार किए लड़के के साथ भाग जाती है। उसकी आयु ऐसी होती है कि वह इतना कुछ नहीं सोच-समझ पाती है।
तब इन दुष्ट दयानंदी गिरोह वालों को करना तो यह चाहिए कि उन लड़के-लड़कियों को समझाएँ, उनके परिवार से बात करें। यह देखें कि यह निर्णय उन्होंने क्षणिक आवेश या किसी छल के कारण तो नहीं लिया है। किन्तु ये कुछ नहीं देखते, कुछ नहीं समझाते। बल्कि उन्हें और भड़काकर माता-पिता के विरुद्ध कर देते हैं।
अनेक वीडियो इंटरनेट पर हैं, कोई भी जाकर देख सकता है। फिर थाने में वह बाप फफक-फफककर रोते हुए अपनी पगड़ी को लड़की के पैरों में रखता है कि - "मेरी इज्जत को नीलाम मत करो।" वह लड़की, जिसे इनका सहयोग प्राप्त होता है, सारी शर्म और भय इनके सहयोग से दूर हो जाते हैं। उसे अपना रोता और झुका हुआ बाप भी दिखाई नहीं देता।
और लड़की के पीछे खड़े यही आर्यसमाजी गिरोह वाले हँसा करते हैं। इनके लिए यह दयानंद और इनके पंथ की जीत है।आज तक ऐसे लाखो हिन्दू लड़कियों के माता पिता के सम्मान की हत्या आर्यसमाज करवा चुका हैं। भारत में ईसाईयत को वेद और समाज सुधार के नाम पर फैलाने में जितना ज़ोर इस संस्था ने लगाया है उतना अन्य किसी ने नहीं।
साभार - शचीन्द्र शर्मा ( 7 October 2026 ईस्वी )
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