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Thursday, 30 April 2026

सभी देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र।

सभी देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र। 

ॐ भूर्भुव स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
शिव गायत्री,,ॐ महादेवाय विद्महे, रुद्रमुर्तय धीमहि तन्नो शिव: प्रचोदयात
रूद्र गायत्री मन्त्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र: प्रचोदयात!
ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, सहस्राक्षाय महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्
दत्तात्रय गायत्री,,,दत्तात्रेय हरे कृष्ण उन्मत्तानन्ददायक दिगंबर मुने बाल पिशाच ज्ञानसागर ॐ गुरु दत्त नमो नम:
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अवधूताय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे योगीश्वराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दिगम्बराय विद्महे योगीश्वराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे दिगम्बराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अत्रीपुत्राय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
गणेश गायत्री...ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्र तुन्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात!
षन्मुख गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि, तन्नो षन्मुख: प्रचोदयात!
नन्दी गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्र तुन्डाय धीमहि, तन्नो नन्दी: प्रचोदयात!

सूर्य गायत्री,,ॐ अदित्याय विद्महे भास्कराए धीमहि तन्नो भानु: प्रचोदयात

ॐ आदित्याय च विद्महे प्रभाकराय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात

ॐ आदित्याय विद्महॆ दिवाकराय धीमही तन्नॊ सूर्यः प्रचॊदयात्

ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि !तन्नो सूर्य: प्रचोदयात !

ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पासहस्थाया धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात !

चन्द्र गायत्री,,ॐ अमृतंग अन्गाये विद्ममहे कलारुपाय धीमहि,तन्नो सोम प्रचोदयात

ॐ अत्रि पुत्राय विद्महे सागरोद्भवाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्

ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृत तत्वाय धीमहि, तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात!

मंगल (भौम) गायत्री,,,ॐ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि, तन्नो भौम: प्रचोदयात

ॐ क्षिति पुत्राय विद्महे लोहितान्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात्

बुध गायत्री,,ॐ सौम्यरुपाय विद्महे वानेशाय च धीमहि, तन्नो सौम्य प्रचोदयात

ॐ चन्द्र पुत्राय विद्महे रोहिनि प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात्

गुरु गायत्र,,ॐ अन्गिर्साय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि, तन्नो जीव: प्रचोदयात

ॐ अंगिरोजाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात्

ॐ गुरु देवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि, तन्नो गुरु: प्रचोदयात!

शुक्र गायत्री,,ॐ भृगुजाय विद्महे दिव्यदेहाय, धीमहि तन्नो शुक्र: प्रचोदयात

ॐ भृगुपुत्राय विद्महे श्वेतवाहनाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्

शनि गायत्री,,ॐ भग्भवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो सौरी:प्रचोदयात

ॐ कृष्णांगाय विद्महॆ रविपुत्राय धीमही तन्नॊ सौरिः प्रचॊदयात्

राहू गायत्र,,,ॐ शिरोरुपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि, तन्नो राहू:प्रचोदयात

ॐ नील वर्णाय विद्महे सौंहिकेयाय धीमहि तन्नॊ राहुः प्रचोदयात्

केतु गायत्री,,,ॐ पद्मपुत्राय विद्महे अम्रितेसाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात

ॐ धूम्र वर्णाय विद्महे कपोत वाहनाय धीमहि, तन्नो केतुः प्रचोदयात्

ब्रम्हा गायत्र,,,ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात!

नारायण गायत्री,,,ॐ नारायाणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।

विष्णु गायत्री ,,ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु: प्रचोदयात !

ॐ नारायण: विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो नारायण: प्रचोदयात !

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो नारायण प्रचोदयात् ।

श्री निवास गायत्री,,ॐ निरन्जनाय विद्महे निरापासाय धीमहि तन्नो श्रीनिवास प्रचोदयात् ।

कृष्ण गायत्री,,,ॐ देवकिनन्दनाय विद्ममहे, वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण:प्रचोदयात

ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्। गोपाल गायत्री

ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजन वल्लभाय धीमहि, तन्नो गोपाल: प्रचोदयात

परशुराम गायत्री,,,ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नो परशुराम प्रचोदयात नृसिंह गायत्री

ॐ उग्रनृसिंहाय (नरसिंहाय) विद्महे वज्रनखाय धीमहि, तन्नो नृसिंह: (नरसिंह) प्रचोदयात

ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो नृसिंहः (नरसिंह) प्रचोदयात

ॐ नरहसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात

ॐ नरहसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो सिंह प्रचोदयात हयग्रीव गायत्री

ॐ वाणीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हयग्रीव :प्रचोदयात

राम गायत्री,,,ॐ दाशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो राम: प्रचोदयात!

त्रैलोक्य गायत्रीॐ त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे आत्मारामाय धीमहि, तन्नो विष्णु: प्रचोदयात!

हंसा गायत्री,,,ॐ परम्ह्न्साय विद्महे महा हंसाय धीमहि तन्नो हंस: प्रचोदयात

ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हंसः प्रचोदयात्।

सुदर्शन गायत्री,,ॐ सुदर्शनाय विद्महे हेतिराजाय धीमहि। तन्नश्चक्रः प्रचोदयात्।

वराह गायत्री,,ॐ धनुर्धराय विद्महे वक्रदंष्ट्राय धीमहि तन्नो वराह प्रचोदयात्।

ॐ भू: रक्षकाय विद्महे श्रीकराय धीमहि तन्नो वराह प्रचोदयात्

ॐ भू-वराहाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो क्रोध प्रचोदयात्

मत्स्य गायत्री,,ॐ तत्पुरुशाय विद्महे माहा-मीनाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात ।

वेङ्कटेश गायत्री,,ॐ श्री निलायाय विद्महे वेङ्कटेशाय धीमहि तन्नो हारि: प्रचोदयात् ।

राजागोपाल गायत्री...ॐ तत्पुरुशाय विद्महे सन्तान पुत्राय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ।

कूर्म गायत्री,,ॐ कच्छपेसाय विद्महे माहाबलाय धीमहि तन्नो कूर्म प्रचोदयात् ।

वामन गायत्री,,ॐ तप रूपाय विद्महे श्रृष्टिकर्ताय धीमहि तन्नो वामन प्रचोदयात् ।

बलराम गायत्री..ॐ अश्त्रहस्ताय विद्महे पीताम्वराय धीमहि तन्नो बलराम प्रचोदयात् ।

कल्कि गायत्री,,ॐ भूमि नेत्राय विद्महे माहापुरुशाय धीमहि तन्नो कल्कि प्रचोदयात् ।

लक्ष्मी गायत्री,,ॐ महालाक्ष्मये विधमहे, विष्णु प्रियाय धीमहि तन्नो लक्ष्मी:प्रचोदयात

ॐ नमो भाग्य लक्ष्मी च विदमहे, अस्ट लक्ष्मी च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात

राधा गायत्री,,,ॐ वृषभानु: जायै विद्महे, कृष्णप्रियाय धीमहि तन्नो राधा :प्रचोदयात

ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि, तन्नो राधिका प्रचोदयात!

तुलसी गायत्री,,,ॐ श्री तुलस्यये विद्महे, विष्णुप्रियाय धीमहि तन्नो वृंदा:प्रचोदयात

ॐ त्रिपुराय विद्महे तुलसीपत्राय धीमहि, तन्नो तुलसी प्रचोदयात!

लक्ष्मी गायत्री,,ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णु पत्न्ये [यै] च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात! जानकी गायत्री

ॐ जनकजायै विद्महे राम प्रियायै धीमहि, तन्नो सीता प्रचोदयात!

सीता गायत्री,,ॐ जनक नंदिन्ये विद्महे भुमिजाय धीमहि तन्नो सीता :प्रचोदयात

लक्ष्मण गायत्री,,ॐ दासरथये विद्महे अलाबेलाय धीमहि, तन्नो लक्ष्मण प्रचोदयात!

हनुमान गायत्री,,ॐ अन्जनीजाय विद्महे वायु पुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान प्रचोदयात!

गरुड़ गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्ण वरणाय धीमहि, तन्नो गरुड़: प्रचोदयात!

सरस्वती गायत्री,,ॐ वाग देव्यै विद्महे काम राज्या धीमहि तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात|

ॐ ऐं वाग्देव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

इन्द्र गायत्री,,ॐ सहस्त्र नेत्राए विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नो इन्द्र:प्रचोदयात

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहत्राक्षाय धीमहि, तन्नो इंद्र: प्रचोदयात

अग्नि गायत्री,,ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्नि मध्ये धीमहि, तन्नो अग्नि प्रचोदयात!

जल गायत्री,,ॐ जलबिंबाय विद्महे नील पुरुषाय धीमहि, तन्नो अम्बु: प्रकोदयात!

आकाश गायत्री,,ॐ आकाशाय च विद्महे नभो देवाय धीमहि, तन्नो गगनं प्रचोदयात!

वायु गायत्,,ॐ पवन पुरुषाय विद्महे सहस्त्र मूर्त्ये च धीमहि, तन्नो वायु: प्रचोदयात!

यम् गायत्री,,ॐ सुर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यम् :प्रचोदयात

वरुण गायत्री,,ॐ जल बिम्बाय विद्महे नील पुरु शाय धीमहि तन्नो वरुण :प्रचोदयात

काम गायत्री,,ॐ मन्मथेशाय विद्महे काम देवाय धीमहि, तन्नो अनंग प्रचोदयात!

पृथ्वी गायत्री,,ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्र मूरतयै धीमहि तन्नो पृथ्वी :प्रचोदयात

ॐ पृथ्वी देव्यै च विद्महे सहस्र मूर्त्ये च धीमहि, तन्नो मही प्रचोदयात

ॐम् तत् पुरुशाय विद्महए आम्रिथ कलस हस्ताय धेएमहि टन्नो ढन्वन्त्रि प्रसोदयात्

ॐम् आदिव्ऐध्याय विद्महए आरोग्य अनुग्रहाय धेएमहि टन्नो धन्वन्त्रि प्रसोदयात्

धन्वंतरी गायत्री मंत्र ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्. ll

धन्वंतरी गायत्री मंत्र ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्.

1 ॐ गिरिजाये विद्महे शिवप्रियाय धीमहि तन्नो दुर्गा :प्रचोदयात

त्वरिता गायत्री मन्त्र या श्री: स्वयम स्वकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:

पापात्मनां कृतधियां हृद्येशु बुद्धि: |

श्रृद्धा शतां कुलजन प्रभवस्य लज्जा,

ता त्वां नतास्म परिपालय देवि विश्वं ||

2 ॐ त्वरिता देव्यै च विद्महे महानित्यायै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

महिष मर्द्दिनी गायत्र मन्त्र 3 
ॐ महिषमर्द्दियै च दुर्गायै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

मातंगी गायत्री मन्त्र 4 
ॐ मातं गये मतंग्ये [यै] च उच्छिष्ट चाण्डाल्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

बागला मुखी गायत्री मन्त्र 5 
ॐ बागला मुख्यं च विद्महे स्तंभिन्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

धूमावती गायत्री मन्त्र 6 
ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिन्यै च धीमहि, तन्नो धूमा प्रचोदयात !

छिन्नमस्ता गायत्री मन्त्र 7 
ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

भैरवी गायत्री मन्त्र 8 
ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

भुवनेश्वरी गायत्री मन्त्र 9 
ॐ नारायन्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

त्रिपुर सुंदरी गायत्री मन्त्र 10
 ॐ त्रिपुरा दैव्यै विद्महे क्लीं कामेश्वर्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

तारा गायत्री मन्त्र 11 
ॐ तारायै च विद्महे महोग्रायै च धीमहि, सौस्तन्न: क्लिन्नै प्रचोदयात!

काली गायत्री मन्त्र 12 
ॐ कालिकायै च विद्महे श्मशान वासिन्यै धीमहि, तन्नो अगोरा प्रचोदयात!

अन्नपूर्णा गायत्र मन्त्र 13 
ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि, तन्नो अन्नपूर्णा प्रचोदयात!
गौरी गायत्री मन्त्र 14 
ॐ सुभगार्यै च विद्महे काम मालायै धीमहि, तन्नो गौरी प्रचोदयात!
देवी गायत्री मन्त्र 15 
ॐ देव्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

शक्ति गायत्री मन्त्र 16 
ॐ सर्व सम्मोहिन्यै विद्महे विश्वनन्यै धीमहि, शक्ति प्रचोदयात

Saturday, 18 April 2026

गायत्री मंत्र को सार्वजनिक रूप से बोलना पाप है। वास्तव में 'पाप-पुण्य' से बड़ा इसके पीछे का Acoustics (ध्वनि विज्ञान) है।

"कल्पना कीजिए, आपके हाथ में एक ऐसा रिमोट कंट्रोल लग जाए जिससे आप सीधे ब्रह्मांड के 'मेन सर्वर' को कमांड दे सकें। क्या आप उस रिमोट का पासवर्ड सरेआम चिल्लाएंगे? जिसे दुनिया 'गायत्री मंत्र' कहती है, वह असल में महर्षि विश्वामित्र द्वारा खोजा गया वही 'कॉस्मिक पासवर्ड' है। लेकिन आज सनातन धर्म के गलियारों में एक बहस छिड़ी है—कोई कहता है इसे सरेआम मत बोलो, कोई कहता है स्त्रियाँ इसे न छुएं। क्या यह वाकई कोई 'पाबंदी' है या इसके पीछे छिपा है कोई ऐसा खतरनाक विज्ञान, जिससे हमारे पूर्वज हमें बचाना चाहते थे? आइए, सपना शर्मा जी के इस चुभते हुए सवाल के जरिए आज गायत्री के उस 'ब्लैक बॉक्स' को खोलते हैं, जिसे समझना हर सनातनी के लिए अनिवार्य है।"



#सपना शर्मा जी, 
सादर प्रणाम 🙏 यह प्रश्न सिर्फ आपका नहीं है करोड़ों सनातनियों का है । आइए एक साथ ही शंका का समाधान अभी के देते हैं.....।

अक्सर लोग कहते हैं कि गायत्री मंत्र को सार्वजनिक रूप से बोलना पाप है। असल में 'पाप-पुण्य' से बड़ा इसके पीछे का Acoustics (ध्वनि विज्ञान) है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। अगर आप एक पत्थर को तालाब में फेंकें, तो लहरें चारों तरफ फैलकर शांत हो जाती हैं। लेकिन अगर आप उसी ऊर्जा को एक संकरी पाइप (लेजर) में डाल दें, तो वह लोहे को भी काट सकती है।
बाहर बोलना (Broadcasting): जब हम मंत्र को चिल्लाकर बोलते हैं, तो उसकी ध्वनि तरंगे (Sound Waves) बाहरी वातावरण में बिखर जाती हैं। यह 'प्रसारण' तो है, लेकिन 'साधना' नहीं।
भीतर जपना (Internal Resonance): जब आप बिना होंठ हिलाए मंत्र जपती हैं, तो वह ध्वनि आपके मस्तिष्क के भीतर 'इको' (Echo) पैदा करती है। यह कंपन सीधे आपकी पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) को चोट करता है, जिसे 'तीसरी आँख' भी कहते हैं।

मौन जप इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह आपके शरीर के भीतर एक 'साइलेंट धमाका' करता है जो आपकी बुद्धि को धार देता है। सार्वजनिक रूप से बोलने पर उसकी 'प्रभावी शक्ति' (Potential Energy) खत्म हो जाती है।

 स्त्रियों को मनाही: सुरक्षा कवच या बेड़ियाँ?
यह सबसे ज्यादा चुभने वाला सवाल है। पुराने समय में पंडितों ने स्त्रियों को मना किया, तो उसके पीछे कोई नफरत नहीं, बल्कि एक 'बायोलॉजिकल डर' था। इसे बिना किसी लाग-लपेट के समझिए।

गायत्री मंत्र को 'सौर ऊर्जा' (सूर्य की शक्ति) माना जाता है। यह शरीर में बहुत ज्यादा 'उष्णता' (Heat) और 'विद्युत' पैदा करता है। स्त्री का शरीर प्रकृति ने सृजन (बच्चे को जन्म देने) के लिए बनाया है। उनका हार्मोनल ढांचा पुरुषों के मुकाबले बहुत अधिक संवेदनशील और जटिल होता है। पुराने ऋषियों को डर था कि गायत्री की यह 'प्रचंड ऊर्जा' स्त्रियों के मासिक चक्र (Menstrual Cycle) और उनके प्रजनन अंगों की कोमलता को नुकसान पहुँचा सकती है।
उदाहरण: जैसे एक नाजुक और कीमती मशीन को बहुत हाई-वोल्टेज के स्टेबलाइजर की जरूरत होती है, वैसे ही ऋषियों ने इसे एक 'सेफ्टी प्रोटोकॉल' की तरह लागू किया था।

मगर आज की स्त्री का जीवन, खान-पान और उसकी मानसिक शक्ति बदल चुकी है। अगर कोई स्त्री इसे सही विधि (मौन और शांत भाव) से करती है, तो वह ऊर्जा उसे नुकसान नहीं, बल्कि 'दिव्यता' प्रदान करती है।

 गुरु का कान में मंत्र देना: 'पर्सनल वाई-फाई पासवर्ड'
यज्ञोपवीत में जो कान में मंत्र दिया जाता है, वह असल में 'सॉफ्टवेयर इंस्टॉलेशन' है।
गुरु जानते हैं कि गायत्री एक 'ब्रह्मांडीय कोड' है। अगर यह कोड सबको पता चल जाए और लोग इसे बिना तैयारी के (बिना शुद्धि के) इस्तेमाल करें, तो इसके परिणाम विपरीत हो सकते हैं। इसलिए इसे 'कान' में दिया जाता है ताकि वह आपके सीधे 'सब-कॉन्शस माइंड' में जाकर बैठे। यह वैसा ही है जैसे बैंक का पासवर्ड—जितना छिपा रहेगा, आपका खाता उतना ही सुरक्षित रहेगा।

सपना जी, असल में बात 'अधिकार' की नहीं, 'पात्रता' की है।
मंत्र कोई मनोरंजन नहीं है: इसे अंताक्षरी की तरह सड़कों पर गाना इसकी गरिमा को कम करना है।
शुद्धि और विधि, आप स्त्री हों या पुरुष, अगर आप गंदे मन से या सिर्फ दिखावे के लिए इसे जप रहे हैं, तो वह गलत है।
मौन ही मंत्र है। अगर आप इसे मन में जप रही हैं, तो आप दुनिया की सबसे शक्तिशाली 'टेक्नोलॉजी' का इस्तेमाल कर रही हैं। इसके लिए आपको किसी पंडित या समाज की अनुमति की जरूरत नहीं है, क्योंकि आपका ईश्वर आपके भीतर बैठा है।

मेरा विश्लेषण यही कहता है प्राचीन नियम 'रोकने' के लिए नहीं, 'संभालने' के लिए बनाए गए थे। लेकिन समय के साथ हमने 'नियम' तो याद रखे, पर उनके पीछे का 'विज्ञान' भूल गए। गायत्री माँ है, और माँ अपने बेटे या बेटी में कभी फर्क नहीं करती, बस वह चाहती है कि उसके बच्चे उस 'बिजली' (शक्ति) को छूने से पहले खुद को सुरक्षित करना सीख लें।
आशा है, सपना जी और अन्य पाठकों को इस 'वृहद विश्लेषण' से उत्तर मिल गया होगा। गायत्री केवल पढ़ने की चीज नहीं, इसे अपनी सांसों में उतारने की कला है।

"अंत में, बात न अधिकार की है, न पाबंदी की—बात तो केवल 'अलाइनमेंट' की है। जब आप गायत्री को मन में जपते हैं, तो आप केवल शब्द नहीं दोहरा रहे होते, बल्कि आप अपनी रीढ़ की हड्डी को एक 'एंटीना' बनाकर उस विराट सत्ता से सिग्नल रिसीव कर रहे होते हैं।
स्त्री हो या पुरुष, जब आपकी आँखें बंद होती हैं और भीतर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' की गूंज उठती है, तब आपका शरीर मांस-मज्जा का पुतला नहीं रहता; वह एक 'लाइव ट्रांसमीटर' बन जाता है। पुराने नियम 'दीवारें' नहीं थे, वे 'कवच' थे ताकि आप इस महा-ऊर्जा को संभाल सकें। लेकिन याद रखिए, माँ कभी अपने बच्चों में भेद नहीं करती। वह तो बस चाहती है कि आप उसे 'रटें' नहीं, बल्कि उसके साथ 'सिंक' (Sync) हो जाएं। जिस दिन आपका 'मैं' मिट जाएगा, उस दिन मंत्र अपने आप अनलॉक हो जाएगा। फिर आप मंत्र पढ़ेंगे नहीं, आप खुद एक 'मंत्र' बन जाएंगे—प्रकाशवान, ओजस्वी और अजेय!"

"गायत्री को होंठों से बाहर निकालोगे तो 'शोर' बन जाएगी, और अगर मन के भीतर उतार लोगे तो 'ब्रह्मांड' बन जाएगी!"



सादर,
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 

 #GayatriMantra #AncientTechnology