दुर्गा सप्तशती का अर्थ है — सात सौ। सप्त = सात, शती = सौ। मार्कंडेय पुराण के 81 से 93वें अध्याय में ये 700 श्लोक हैं। लोग इसे चंडी पाठ, देवी माहात्म्य भी कहते हैं।
पर ये सिर्फ संख्या नहीं है। 700 श्लोक तीन हिस्सों में बंटे हैं, और तीन हिस्से तीन गुणों को दर्शाते हैं —
प्रथम चरित्र (अध्याय 1): महाकाली — तमोगुण का नाश। 1 श्लोक से 104 तक।
मध्यम चरित्र (अध्याय 2-4): महालक्ष्मी — रजोगुण का संतुलन। 105 से 324 तक।
उत्तम चरित्र (अध्याय 5-13): महासरस्वती — सतोगुण का उदय। 325 से 700 तक।
यही कारण है कि सप्तशती को पढ़ना सिर्फ राक्षस वध की कथा नहीं, अपने भीतर के आलस, अहंकार और अज्ञान को मारना है।
2. कथा शुरू होती है राजा और वैश्य से
कहानी राजा सुरथ और समाधि नाम के वैश्य से शुरू होती है। दोनों सब कुछ हार चुके हैं। राजा का राज्य छिन गया, वैश्य को परिवार ने निकाल दिया। दोनों जंगल में मेधा ऋषि के आश्रम पहुँचते हैं।
वो पूछते हैं — "हम जानते हैं सब माया है, फिर भी मोह क्यों नहीं छूटता?"
ऋषि मुस्कुराते हैं और कहते हैं — "ये महामाया का खेल है। वही देवी जो बंधन देती है, वही मुक्ति भी देती है।"
फिर ऋषि तीन कहानियाँ सुनाते हैं। यही दुर्गा सप्तशती है।
3. पहली कहानी — मधु-कैटभ और योगनिद्रा
सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु शेषनाग पर सो रहे हैं। उनके कान के मैल से दो राक्षस पैदा होते हैं — मधु और कैटभ। वो ब्रह्मा जी को मारने दौड़ते हैं।
ब्रह्मा जी विष्णु को जगाते हैं, पर विष्णु योगनिद्रा में हैं। तब ब्रह्मा जी देवी की स्तुति करते हैं — यही प्रसिद्ध रात्रि सूक्त है।
देवी प्रकट होती हैं, विष्णु की नींद तोड़ती हैं। विष्णु 5000 साल तक लड़ते हैं। अंत में देवी की माया से राक्षस मोहित होकर वरदान मांग बैठते हैं कि "जहाँ जल न हो वहाँ मारो।" विष्णु उन्हें जांघ पर रख कर सुदर्शन से वध करते हैं।
अर्थ क्या है? मधु का अर्थ है मीठा, कैटभ का अर्थ है कड़वा। मीठा लोभ और कड़वा क्रोध। ये दोनों हमारे कान के मैल की तरह रोज़ पैदा होते हैं। जब तक हम योगनिद्रा यानी अचेतन में हैं, ये हमें मारते हैं। देवी जागरण है — चेतना।
इसीलिए प्रथम चरित्र में कवच, अर्गला, कीलक पढ़ा जाता है। कवच शरीर की रक्षा, अर्गला दरवाजा बंद करना, कीलक मंत्र को कीलना।
4. दूसरी कहानी — महिषासुर वध
देवताओं को महिषासुर ने स्वर्ग से निकाल दिया। महिष का अर्थ भैंसा — जड़ता, अहंकार, जो न सुनता है न समझता।
सब देवता ब्रह्मा, विष्णु, शिव के पास गए। उनके क्रोध से तेज निकला। उस तेज से एक स्त्री बनी — दुर्गा। हर देवता ने अपना अस्त्र दिया। शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, इंद्र ने वज्र, हिमालय ने सवारी के लिए सिंह।
नौ दिन युद्ध चला। महिष रूप बदलता रहा — भैंसा, सिंह, हाथी, मनुष्य। अंत में देवी ने त्रिशूल से उसका हृदय भेदा।
ये मध्यम चरित्र है। यहाँ 2 से 4 अध्याय में युद्ध का वर्णन है। यहीं से नवरात्रि का असली रूप आता है। महालक्ष्मी यहाँ धन नहीं, शक्ति का संतुलन हैं।
लोग पूछते हैं — देवी ने इतना श्रृंगार क्यों किया? क्योंकि रजोगुण को रजोगुण से ही जीतना पड़ता है। अहंकार को सुंदरता, नीति और बल तीनों से हराया जाता है।
5. तीसरी कहानी — शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज
ये सबसे लंबी कथा है। शुंभ और निशुंभ दो भाई। उन्होंने तप से वरदान लिया कि कोई पुरुष उन्हें न मार सके।
उन्होंने इंद्र को हराया। देवता हिमालय पर गए और देवी को पुकारा। पार्वती जी गंगा स्नान कर रही थीं। उनके शरीर से एक और देवी निकलीं — कौशिकी, अंबिका। पार्वती काली पड़ गईं, इसलिए काली कहलाईं।
शुंभ के दूत सुग्रीव और धूम्रलोचन आए। देवी ने कहा, "जो मुझे युद्ध में जीतेगा, मैं उसी से विवाह करूँगी।" धूम्रलोचन ने हमला किया, देवी ने हुंकार से भस्म कर दिया।
फिर चंड-मुंड आए। देवी ने भौंह टेढ़ी की, उससे काली प्रकट हुईं। काली ने दोनों का सिर काटा। इसलिए देवी का नाम चामुंडा पड़ा।
फिर आया रक्तबीज। उसे वरदान था — खून की हर बूंद से नया राक्षस बनेगा। देवी ने काली को कहा, "मुँह फैलाओ।" काली ने हर बूंद पी ली, रक्तबीज सूख गया।
ये क्या सिखाता है? शुंभ मतलब 'मैं', निशुंभ मतलब 'मेरा'। अहंकार के दो रूप। रक्तबीज है विचारों का जाल — एक नकारात्मक सोच को दबाओ तो सौ पैदा होते हैं। उसे मारने का एक ही तरीका है — साक्षी भाव, काली की तरह पी जाओ, प्रतिक्रिया मत दो।
अंत में शुंभ अकेला बचा। उसने कहा, "तुम अकेली नहीं, सब देवियों की शक्ति लेकर लड़ी हो।" देवी ने कहा, "मैं ही सब हूँ।" और सब देवियाँ उनमें समा गईं। फिर एक-एक युद्ध में शुंभ मारा गया।
6. सप्तशती पढ़ने की सही विधि
पंडित लोग कहते हैं बिना विधि के मत पढ़ो। विधि डराने के लिए नहीं, मन को तैयार करने के लिए है।
क्रम:
विनियोग — संकल्प
न्यास — हाथ और शरीर पर मंत्र रखना
कवच — 47 श्लोक, रक्षा
अर्गला स्तोत्र — 25 श्लोक, बाधा हटाना
कीलक — 14 श्लोक, मंत्र को खोलना
रात्रि सूक्त, देवी सूक्त
फिर 13 अध्याय
अंत में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र, क्षमा प्रार्थना
एक साधारण गृहस्थ के लिए रोज़ पूरी पाठ कठिन है। इसलिए:
संकट में: सिर्फ कवच + अध्याय 1, 4, 5, 11
नवरात्रि में: एक दिन एक चरित्र
रोज़: सिद्ध कुंजिका स्तोत्र। कहा जाता है कुंजिका पढ़ने से पूरी सप्तशती का फल मिलता है।
7. असली शक्ति कहाँ है
लोग सोचते हैं सप्तशती चमत्कार करती है। करती है, पर कैसे?
पहला — ध्वनि। संस्कृत के बीज मंत्र — ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे — नाद योग है। 'ऐं' सरस्वती, ज्ञान। 'ह्रीं' महालक्ष्मी, शुद्धि। 'क्लीं' महाकाली, क्रिया। जब तुम इसे लय से पढ़ते हो, मस्तिष्क की अल्फा तरंगें बढ़ती हैं। डर कम होता है।
दूसरा — कहानी। हम सब सुरथ हैं — राज्य गया। समाधि हैं — परिवार ने ठुकराया। हम मधु-कैटभ से लड़ते हैं — आलस और गुस्सा। महिषासुर से — जिद। रक्तबीज से — चिंता।
तीसरा — भक्ति। मेधा ऋषि कहते हैं, "सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी।" वही देवी विद्या बन कर मुक्ति देती हैं, अविद्या बन कर बंधन।
8. एक सच्ची घटना जैसी कथा
बनारस के एक पंडित जी बताते थे। 1990 में उनकी बेटी को टाइफाइड हुआ। डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए। वो रोज़ रात में ICU के बाहर बैठ कर अध्याय 11 पढ़ते — नारायणी स्तुति।
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके...
11वें दिन लड़की ने आँख खोली। डॉक्टर ने कहा मिरेकल। पंडित जी ने कहा, "नहीं, माँ ने सुना।"
मैं इसे अंधविश्वास नहीं कहता। जब तुम 700 बार 'तुम ही हो' कहते हो, तो मन हार मानना छोड़ देता है। और जहाँ मन नहीं हारता, शरीर लड़ता है।
9. कैसे शुरू करें
तुम्हें संस्कृत नहीं आती तो भी शुरू करो। हिंदी में अर्थ पढ़ो।
पहले दिन: नहा कर लाल आसन पर बैठो। एक दीपक। हाथ में जल लो, बोलो — "मैं अपने भीतर के भय को जीतने के लिए पाठ कर रहा हूँ।" फिर कवच पढ़ो।
कवच में हर अंग की रक्षा माँगी गई है — जिह्वां मे सरस्वती अवतु — मेरी जीभ की रक्षा सरस्वती करें। सोचो, अगर जीभ संभल जाए तो आधे झगड़े खत्म।
सप्तशती कोई जादू की किताब नहीं, आईना है। तुम पढ़ते हो महिषासुर वध, और अचानक समझ आता है — अरे, ये जिद तो मुझमें है।
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उसके 700 श्लोकों पर 7000 टीकाएँ लिखी गई हैं। शंकराचार्य ने कहा, "चंडी पाठ से बड़ा कोई स्तोत्र नहीं।"
Raksha Bharti
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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