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Monday, 11 May 2026

शूद्र ! तुम श्रेष्ठ हो !

शूद्र ! तुम श्रेष्ठ हो ! 
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विष्णुपुराण के छटे अंश के दूसरे अध्याय में पराशर ऋषि ने वेदव्यास के जीवन के इस प्रसंग का उल्लेख किया है ! मुनियों के मन में कलियुग के धर्म का प्रश्न घुमड़ रहा था ! प्रश्न के समाधान के लिए वे वेदव्यास के पास आये ! वेदव्यास उस समय गंगा-स्नान कर रहे थे ! यह देख कर मुनिजन एक वृक्ष के नीचे बैठ कर उनकी प्रतीक्षा करने लगे !वेदव्यास ने एक डुबकी ली और उठे , कहा - शूद्रस्साधु: कलिस्साधुरित्येवं शृण्वतां वच: ! बात सुनो , कलियुग श्रेष्ठ है और शूद्र श्रेष्ठ है !फिर से डुबकी ली और बोले - साधु साध्विति चोत्थाय शूद्र धन्योsसि चाब्रवीत्‌ ! साधु ,साधु शूद्र तुम धन्य हो! वेदव्यास ने फिर से डुबकी ली और फिर कहा - योषित: साधु धन्यास्तास्ताभ्यो धन्यतरोsस्ति क: !स्त्रियाँ धन्य हैं , उनसे अधिक धन्य कौन हैं ? 
महर्षि व्यास जोर-जोर से ताली बजा-बजाकर शूद्रों और स्त्रियों की जय बोल रहे हैं ! कलियुग महान है , शूद्र महान हैं और स्त्री महान हैं !इस प्रकार व्यास ने कलियुग की श्रेष्ठता , शूद्र की श्रेष्ठता तथा स्त्रियों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है !

आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल ने कई जगह पर इतिहास से जकड़े हुए आदमी को वापुरा प्राणी कहा है । क्यों ? इसलिए कि अब तक लिखा गया भारत का अधिकांश इतिहास राजसत्ताओं द्वारा लिखाया गया है ।मुगल-दरबार के इतिहासकारों ने मुगलों का जयजयकार किया ,ब्रिटिश-इतिहासकारों ने कहा कि आर्य बाहर से आये थे , यदि हम भी बाहर से आ गये तो इसमें नया क्या है?

आर्य शब्द इतना पुराना है किन्तु प्रजाति के अर्थ में उसका प्रयोग कहीं नहीं है ! उन्होंने मजहब के ऐसे पेच डाल दिये कि लडते रहो ! जाति के आधार पर राजनीति करने वाले सत्ता में आये तब उनका जयजयकार करने- वाले इतिहासकारों ने कहा कि यहां तो जाति और वर्ण आपस में लडते-झगडते ही रहे हैं , सो प्रत्येक जाति और वर्ण एक दूसरे से घृणा करते रहो , लडो और बदला लो ! भेदभाव को स्थायी बनाने के लिये सत्ता इतिहास की ऐसी व्याख्या को प्रोत्साहित करती है,जिसे पढ कर कच्चा मन एक दूसरी जाति से नफरत करे । लोकजीवन की एकता को खंड-खंड करना उसका अभीष्ट होता है , सत्ता को जनता की एकता से डर लगता है इसके लिये सत्ता जनता को विभक्त करती है , बांटती है । इस कार्य में मदद करने के लिये वह विद्वानों को उपकृत करती है, अलंकारों से सम्मानित करती है ।सत्ता के हजार हाथ हैं ।जो इतिहासकार सत्ता से ही पुरस्कृत और प्रेरित होते हैं ,सत्ता के गीत गाते हैं , उन्हें जनता के इतिहास का क्या करना है ? 
जनता की एकता को तोड़ना , जनता को लड़वाना , घृणा और वैमनस्य का विस्तार करना , मिथ्या-सिद्धान्तों के स्टैचू खड़े करने में यह कथित "इतिहास "सत्ता के बहुत काम आता है ।एक बात तो यह है कि वर्तमान से लोगों का ध्यान बहक कर इतिहास के अतीत में चला जाता है ,एक जाति , वर्ग , समुदाय यह समझने लग जाता है कि मेरे दु:खों का कारण दूसरी जाति , वर्ग या समुदाय है , इसे खत्म करो । ऐसा इतिहास बदला लेने के लिए उकसाता है !
सत्ता की छत्रछाया में लिखा गया इतिहास जाल ही नहीं , जंजाल है ,जैसे आतंकवादी अपने घर में अवैध अस्त्र और विस्फोटक बनाने का काम करते हैं , वैसे ही ये इतिहास भी अवैध अस्त्र और विस्फोटक का काम करता है ।वर्तमान से ध्यान हटाने के लिये आज हम इतिहास में शत्रुताओं को खोज रहे हैं ताकि घृणा-विद्वेष का प्रसार किया जासके । जातियों को जातियों से और मजहब को मजहब से लडाया जा सके ।राजनैतिक-मतवाद की पुष्टि करने के लिये वे लोग इतिहास के खेत में जाति और धर्म- वैमनस्य के जहर की खेती कर रहे हैं ,किन्तु क्या यहां सामंजस्य-समन्वय का अमृत था ही नहीं? देखें तो सही भारत के लोकजीवन में अन्तर्भुक्तियों का इतिहास कितना व्यापक है? 
सम्राटों ,बादशाहों ,सम्राटों ,बादशाहों , आक्रान्ताओं और दुर्दान्त-दस्युओं ने लोकजीवन, लोकसंस्कृति और लोकधर्म को कुचलने में क्या कसर छोडी थी? लोक-आस्था के केन्द्रों को बार-बार घायल किया ,लोक के विश्वास पर प्रहार किया !धरती पर कितनी बार खून की नदियां बहीं ?कितनी बार आग बरसी ?कितने लंकाकांड , महाभारत और देवासुर-संग्राम हुए ? इसकी गिनती शायद संसार का सबसे बडा इतिहासकार भी न बता पाये !किन्तु यह बात आबाल-वृद्ध, नरनारी सभी बता सकते हैं कि भय और आतंक की बर्बर-सत्ता के सामने लोक की सत्ता हमेशा जीती है !सभी बता सकते हैं कि रावण हर बार हारा है और राम हर बार जीता है ।लोकजीवन के इतिहास की कसौटी तो लोकदृष्टि ही है । लोकपरंपरा अर्थात्‌ सामूहिकता , समष्टि का भाव , सामूहिक-स्मृतियाँ ! महत्त्व तो सामूहिकता का है ! वह सामान्य तत्त्व है ! सामान्यमनुष्य की सामान्यता दायरों से बाहर है!धर्म,वर्ग,वर्ण,ऊंचनीच,राजा-रंक ऊपर के छिलके हैं,उपाधियां हैं। उनके भीतर जो मनुष्य है,आप यों कहें>मनुष्य के भीतर का मनुष्य! 
जनता का इतिहास केवल द्वन्द्व का ही नहीं समायोजन , समन्वय और सामंजस्य का भी है , समायोजन , समन्वय और सामंजस्य न होता तो भारत को राष्ट्र कैसे कहा जाता ??राष्ट्र का तात्पर्य है भारत की शत-सहस्र मानव-जातियों की एकता। समानसामूहिक-स्मृतियां,समान-आनुवंशिकता,सहिष्णुता,सह-अस्तित्व। एक साथ जिंदा रहना और इतिहास के उतार-चढाव में समान अनुभूतियों से गुजरना। हितों का संघर्ष बार-बार हुआ है,बार-बार होता रहेगा किंतु समायोजन संघर्ष से बडा सत्य है। समस्त इतिहास गवाही दे रहा है ,आदमी और आदमी का संबंध अनंतानंत भौतिक-मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का परिणाम है।भारत की धरती के कण-कण से,एक-एक पोखर-तालाब,नदी,सरोवर,पहाड से इस धरती के जन का जो तादात्म्य है,वह किसी कानून के भय ने पैदा नहीं किया।वह लोकजीवन की उस अनादि परंपरा का संविधान है,जिसमें राजा-प्रजा एक घाट पर नहाते रहे हैं। कोई लोक को आधार बना सके,सामंजस्य-भाव को खोज सके,समष्टि-चेतना को खोज सके। क्या यहां युद्ध ही होते रहे?क्या सत्ता का ही इतिहास होता है?आम -आदमी के जीवन का निरंतर प्रवाह नहीं होता? क्या भलमनसाहत नहीं होती?क्या सर्वजनहित नहीं होता?क्या आप सर्वजन,समष्टिजन,सामान्यजन का इतिहास नहीं लिख सकते? 
डा . विद्यानिवास मिश्र कहते थे कि "इतिहास का उद्देश्य लोगों को प्रतिशोध के लिए प्रेरित करना नहीं है , न ही पिछले आक्रान्ताओं के अत्याचार का प्रतिशोध के लिए उकसाना है , न व्यतीत की गौरवगाथा में इतना आमग्न ही करना है कि वर्तमान की क्षमता ही सिकुड़ जाय ! इतिहास देशकाल की ऐसी समझ है , जो मनुष्य को उसकी शक्ति से परिचित कराये और उसकी स्वतन्त्रता सुनिश्चित करती रहे !"
भारत के चिन्तन में समष्टि की दृष्टि कितनी गहरी है ! सब के लिए सब जी रहे हैं . लोकमें सब हैं,लोक सबका आश्रय है,विभिन्न जाति,बिरादरी,वर्ण,वर्ग,पंथ लोक में जन्म लेते हैं,लोक में ही समा जाते हैं ।हजारों साल पहले हमारे देश की लोकमेधा ने विराटपुरुष की संकल्पना की थी , जो सहस्रशीर्ष ,सहस्रनेत्र ,सहस्रबाहु,और सहस्रपात है। उसमें कोटि-कोटि युगों का अन्तर्भाव है! विभिन्न जाति, वर्ग, वर्ण, धर्म उसके हाथ,पैर, नाक, कान, आंख, पेट, पीठ इत्यादि अंग हैं परन्तु वे सभी अंग अविच्छिन्न हैं तथा एक-दूसरे के लिये हैं । वे भिन्न हैं ही नहीं !वे सब के लिये सब हैं।इस सब के बीच जो नाम-रूप का भेद ,सीमा और असमानता है, वह दीखती तो है किन्तु वह तात्विक नहीं है! उसकी एकात्मसत्ता ही लोकसत्ता है !सर्वजन- सत्ता, सामान्यजनसत्ता, समष्टिजनसत्ता ! जीवन की अविच्छिन्नता !आज की भाषा में कहें तो यह समष्टि सत्ता है । इस संकल्पना का मूलतत्व आधारभूत एकता है । विविधता में एकता की अदम्य खोज ।लेकिन संस्कृति की कुत्सित व्याख्या करने वाले "अभिधार्थ" पर अटक जाते हैं कि पैर से जन्म लिया अथवा मुख से जन्म लिया ? अरे , जन्म तो वहीं से हुआ , जहाँ से होता है , लेकिन उस मूढ़मति को क्या कहा जाय , जो रूपक की व्यंजना नहीं समझ सकते या समझना नहीं चाहते ।
भागवत -धर्म ने वर्ण को अस्वीकार कर दिया था । भागवत में एक जगह नहीं , कितने ही प्रसंगों में कहा गया है कि बड़प्पन का अभिमान रखने वाला ब्राह्मण अपने को भी पवित्र नहीं कर सकता है , जबकि भक्ति-युक्त चांडाल अपने कुल को पवित्र कर देता है । [भागवत ७-९-१०]
भागवत का मूल- स्वर मनुष्यता का स्वर है -किरात-हूणान्ध्र पुलिन्द पुक्कसा आभीर कंका यवना खसादय:।येs न्येs पि पापास्तत्पाद आश्रयात्‌ शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम:। किरात, -हूण, आन्ध्र , पुलिन्द , पुक्कस, आभीर , कंक , यवना, खस आदि सभी के समन्वय का विराट- आयोजन ।
उपासकों , भक्तों के शिविर नहीं होते ।शिविर तो उन आलोचकों के होते हैं जो राजसत्ता का प्रसाद पाने के प्रार्थी हैं !वे उन भक्तों और उपासकों को भी अपने झंडे के नीचे लाने के लिये तत्पर रहते हैं ।कबीर और तुलसी को जाति के आधार पर बांटना , कबीर और तुलसी का नाम लेकर इतिहास में जातिगत-शत्रुताओं को खोजना ताकि घृणा-विद्वेष का प्रसार किया जासके । जातियों को जातियों से और मजहब को मजहब से लडाया जा सके ,जातियुद्ध चलता रहे!!लेकिन भारत के कोटि कोटि जन कबीर और तुलसी दोनों की वाणियों में अपने जीवन की ऊर्जा प्राप्त करते रहे हैं, आज भी कबीर तुलसी की वाणी लोक के आंगन में एक ही कंठ में गूंज रही हैं ॥ लोक के उस स्वर में कबीर और तुलसी दो नहीं हैं ,भिन्न नहीं हैं । लोक को कबीर उतने ही प्यारे हैं ,तुलसी भी उतने ही प्यारे हैं , सूर और मीरा ,दादू ,नाभा, नानक ,रैदास लोकमानस की गहराई में बसे हैं । यही लोकदृष्टि को समीक्षा का एकमात्र प्रतिमान है । आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम कबीर के साथ उसी तरह जुड़ा है जैसे तुलसीदास के साथ रामचंद्र शुक्‍ल का। हिंदी में द्विवेदीजी पहले आदमी हैं जिन्‍होंने यह घोषणा करने का साहस किया कि ''हिंदी साहित्‍य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्‍यक्तित्‍व लेकर कोई लेखक उत्‍पन्‍न नहीं हुआ। महिमा में यह व्‍यक्तित्‍व केवल एक ही प्रतिद्वन्‍द्वी जानता है, तुलसीदास।'' (कबीर, पृ. 222)
  सत्ता की राजनीति करने वाले सत्ता के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे ? वे किस सीमा तक जा सकते हैं , इसकी कल्पना करना भी कठिन है । उन सत्ताधीशों के आश्रित रहने वाले लोग साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उपद्रव कर रहे हैं । महात्मागांधी और गौडसे विवाद हो अथवा गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को लेकर उठाया गया विवाद । उन लोगों का अभीष्ट साहित्य-संस्कृति नहीं , वोट-बैंक है, और उस वोट-बैंक के लिए वे लोकजीवन और लोकमानस की परंपरागत एकता को छिन्न-विच्छिन्न करने को तत्पर हैं । वे नहीं सोच सकते कि उनकी इस स्वार्थ-नीति का दुष्प्रभाव अन्तत: निर्बल-वर्ग पर ही होगा । इस स्वार्थ-नीति का दुष्प्रभाव लोकतन्त्र पर होगा । स्वतन्त्रता के आन्दोलन ने समष्टिवाद के रूप में लोकतन्त्र की अवधारणा का प्रतिपादन किया था , यदि इस समष्टिवाद को तिलांजलि दे दी गयी तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त [ मात्स्य-न्याय ]को कौन रोक पायेगा ? आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ में शक्ति का सिद्धान्त ही तो है , जिसके कारण केवल छह देशों को विशेषाधिकार [वीटो] मिला हुआ है । 
दलितविमर्श अच्छी बात है ,परन्तु मन में करुणा और प्रेम के साथ हो ! वोटों के निहितस्वार्थ की वजह से जातिद्वेष और वर्णद्वेष को भडकाने के लिये भ्रम बहुत फैलाया जा रहा है । भारत के चिन्तन पर विचार करें , जीवन- दर्शन को देखें - दलित और शास्त्रचिंतन घी-बूरे की तरह व्याप्त है।भारतीयसंस्कृति के महान व्याख्याता नारद हैं ,वे दासीपुत्र हैं । भागवत में नारद ने अपने पूर्व-जीवन के चित्र दिये हैं ।भारतीयसंस्कृति के महान व्याख्याता वाल्मीकि हैं। भारतीयसंस्कृति के महान व्याख्याता वेदव्यास हैं , निषादकन्या [ दासी-वत] के पुत्र , नीतिशास्त्र के व्याख्याता विदुर दासीपुत्र हैं, । हनुमान वानर गणगोत्र के आदिवासी हैं ।शबरीकथा रामकथा के मर्म का प्रसंग है।कंस की दासी ने अन्त:पुर की कहानी कृष्ण को बता दी थी,वह विद्रोह भाव से सुलग रही थी।विद्या के लिये कठोर तप स्वाध्याय ,समर्पण , संतोष, नि:स्पृह - भाव की आवश्यकता है , जातिकी नहीं ! इसके प्रमाण वेदों मे ही हैं , कितने ही तत्त्वद्रष्टा शूद्र हैं !जाति नहीं कर्म आगे बढाता है : ऋग्वेद,मंडल१०,सूक्त३०-३४ का द्रष्टा है >कवष ऐलूष। यह शूद्र था।जुआरी भी था ।इसने अक्षसूक्त भी लिखा था ,जिसमें इसने अपने से ही कहा है कि >मत खेल जुआ।इसका एक सूक्त विश्वेदेवा को समर्पित है। एक अपां- नपात को।सरस्वतीनदी के तट पर जब सोमयाग हुआ, तब ब्राह्मणों ने इसे दास्या:पुत्र: कह कर बाहर कर दिया। यह कुछ दूरी पर जाकर बैठ गया।अपां- नपात की स्तुति की।संयोग से सरस्वती का प्रवाह इसके चारों ओर आ गया । वह स्थल परिसारक- तीर्थ माना गया। इसने ब्राह्मणों को बताया कि जाति नहीं कर्म आगे बढाता है।इसके बेटे तुरकावषेय की गणना बडे विद्वानों में हुई।इसी प्रकार इतरा का पुत्र ऐतरेय शूद्र था।

महाभारत में धर्मव्याध की कथा और व्याधगीता है । महाभारत के वनपर्व में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथा है >>> धर्मव्याध की ! यह व्याध मांसविक्रेता है ! और ब्राह्मण -पुत्र इसकी खोज करता है , और पूछते पूछते इसकी मांस की दूकान पर आता है और इससे प्रार्थना करता है , कि मुझे धर्म का उपदेश करो ! कहानी यों है कि ब्राह्मण -पुत्र शास्त्र का अध्ययन करता है और तपस्या भी करता है ! एक दिन एक पक्षी ने इस पर बीठ कर दी , तो ब्राह्मण -पुत्र के मन में विकार आया , उसने क्रोध से उस पक्षी को देखा और पक्षी जल कर जमीन पर गिर पड़ा ! ब्राह्मण -पुत्र ने सोचा कि यह मेरे तप और शास्त्रज्ञान का ही परिणाम है , अब मुझे सिद्धि मिल गयी है ! अब वह किसी ग्राम में गया और किसी द्वार पर नारायण हरि’ कह कर भिक्षा माँगी ! अन्दर से आवाज आयी - ठहरिए महाराज! ब्राह्मण -पुत्र ने थोड़ी देर खड़े होकर प्रतीक्षा की तथा फिर कहा - नारायण हरि’ ! फिर अन्दर से आवाज आयी - महाराज! ठहरिए - मैं अभी आ रही हूँ। जब तीसरी बार नारायण हरि’कहने पर भी कोई नहीं आया तो ब्राह्मण -पुत्र के मन में विकार आया - उसने कहा कि - तुझे पता नहीं, मैं कौन हूँ, मेरी अवमानना कर रही है तू? तभी अन्दर से वह माँ बोली - मुझे पता है ब्राह्मण -पुत्र ! लेकिन आप यह न समझना कि मैं वह पक्षी हूँ जिसको आप देखेंगे और वह जल जाएगा।ब्राह्मण -पुत्र तो विस्मित हो गया !थोड़ी देर बाद माँ भिक्षा लेकर आई। ब्राह्मण -पुत्र बोला , माँ भिक्षा बाद में लूँगा , पहले आप वह रहस्य समझाइये कि यह सब आपने कैसे जाना ?
 माँ ने कहा, मेरे पास इतना समय नहीं है कि आपको बताऊँ। आप अपनी भिक्षा लीजिए और यदि आपको इस विषय में जानना है तो मिथिला में चले जाइए, वहाँ पर एक वैश्य रहते हैं, वे आपको बता देंगे । ब्राह्मणपुत्र वैश्य के पास गया, वह अपने व्यवसाय में लगा हुआ था और वहाँ उसने वही जिज्ञासा की !उसने देखा और कहा आइए! पण्डित जी! बैठ जाइए! वह बैठ गया। थोड़ी देर के बाद ब्राह्मण कहने लगा मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। वैश्य ने कहा, जी हाँ - आपको उस स्त्री ने मेरे पास भेजा है क्योंकि आपने देखकर चिड़ा जला दिया है।वैश्य ने भी कह दिया कि अभी तो मेरे पास समय नहीं, यदि बहुत जरूरी हो तो आप मांसविक्रेता व्याध के पास चले जाइये ! वह आपको सारी बात समझा देगा।वह ब्राह्मणपुत्र व्याध के पास गया तो वह मांस काट-काट कर बेच रहा था। व्याध बोला - आइए पंडित जी! बैठिए! आपको सेठजी ने भेजा है। कोई बात नहीं, विराजिए। अभी मैं अपना काम कर रहा हूँ, बाद में आपसे बात करूँगा। ब्राह्मण बड़ा हैरान हुआ। अब बैठ गया वहीं, सोचने लगा अब कहीं नहीं जाना, यहीं निर्णय हो जाएगा। सायंकाल जब हो गयी तो व्याध ने अपनी दुकान बन्द की, पण्डित जी को लिया और अपने घर की ओर चल दिया। ब्राह्मण व्याध से पूछने लगा कि आप किस देव की उपासना करते हैं जो आपको इतना बोध है। उसने कहा कि चलो वह देव मैं आपको दिखा रहा हूँ। पण्डित जी बड़ी उत्सुकता के साथ उसके घर पहुँचे तो देखा व्याध के वृद्ध माता और पिता एक पंलग पर बैठे हुए थे। व्याध ने जाते ही उनको दण्डवत् प्रणाम किया। उनके चरण धोए, उनकी सेवा की और भोजन कराया। पण्डित कुछ कहने लगा तो व्याध बोला - आप बैठिए, पहले मैं अपने देवताओं की पूजा कर लूँ, बाद में आपसे बात करूँगा। पहले मातृदेवो भव फिर पितृ देवो भव और आचार्य देवो भव तब अतिथि देवो भव, आपका तो चौथा नम्बर है भगवन्! अब वह ब्राह्मण विचार करने लगा कि यह तो शास्त्र का ज्ञाता है।धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में न तो उसने वर्ण को ही महत्त्व दिया और न पुरुष को और न उम्र को ! साधना और आचरण का महत्त्व है !
इतिहास में हम देख सकते हैं कि अनेक मुनिपत्नियाँ शूद्र-कन्या थीं ।शिवजी के गण वे सभी कबीले थे , जिनको बाद में अनार्य अथवा शूद्र भी कहा गया था ।दक्षके यज्ञमें शिव नहीं बुलाये गये, और शिव-विहीन यज्ञ भूत-प्रेत-प्रमथादि द्वारा विध्वस्त हुआ , इसी से समझा जा सकता है कि शिव उस समय तक आर्येतर-जातियों के देवता थे !
शास्त्र का लोकतात्त्विक-अनुसंधान करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ब्राह्मण को ही उपदेश का अधिकार हो ,,ऐसी बात नहीं है !
अस्पृश्य-पूजा ::कई आलवार अस्पृश्य कही जाने वाली जातियों में उत्पन्न हुए थे । ये श्रीवैष्णव-सम्प्रदाय के आदिगुरु माने जाते हैं , उन मन्दिरों में इनकी मूर्तियों की पूजा भी होती है !८वीं शताब्दी के आसपास ! दक्षिण-भारत ।कावेरी तीर ।श्रीरंगनाथमंदिर । तिरुप्पान अंत्यज था ,उसके तमिलगीत ??उदाहरण हैं कि पीडा कैसे राग बन जाती है?जहर कैसे अमृत बन जाता है? ऐसी थी उन गीतों की मधुरता! ब्राह्मण लोग उसे नीच कहते थे । वह रंगनाथ के द्वार पर झाडू लगाता था ।एक दिन देर हो गयी, तो श्रीनिवासने कहा >अशुभदर्शन ! मुझे दोबारा नहाना पडेगा !महामुनिसारंग ने इसे सुन लिया था । धनुर्मास की बैकुंठएकादशी के दिन उत्तरद्वार खुला, मान्यता थी कि उस द्वार से निकलने वाला बैकुंठ जाता है,इस लिये बहुत भीड थी । सारंगमुनि तिरुप्पान अंत्यज के झोंपडे में गये -तिरुप्पान, आज तुझे श्री रंगनाथ बुला रहे हैं । तिरुप्पान अंत्यज बोला - नहीं जाऊंगा , देवता! वे अपवित्र हो जायेंगे !उत्सव में बाधा होगी , नहीं,नहीं नहीं जाऊंगा !!!मुनि ने कहा -मेरे प्रभु का आदेश है !!तिरुप्पान , तुझे चलना ही होगा ! सारंगमुनि ने तिरुप्पान को कंधे पर उठा लिया ,आल्वार तिरुप्पान के गीतों में भक्ति का मानववाद है ॥
शूद्रमुनि शठकोप :दक्षिण में तृनेवली -जनपद में एक सामवेदीय ब्राह्मण था -मधुर , यह कवि भी था । मधुर तीर्थयात्रा पर थे , मार्ग में इन्होंने इमली का पेड़ देखा ,उसके नीचे एक तपस्वी के दर्शन हुए ।इन्होंने तपस्वी से प्रार्थना की कि -मुझे शिष्य के रूप में उपदेश करें । ये तपस्वी और कोई नहीं , शूद्रमुनि शठकोप { बारह आलवारों में से एक } ही थे । मधुरकवि ने ही शठकोप के तत्त्वोपदेशों का संग्रह किया था और मधुरकवि ने ही उसे तिरुवायमौलि नाम से ग्रन्थ का रूप प्रदान किया था ।मधुर कवि के शिष्य थे - परांकुशाचार्य ।इन्हीं परांकुशपूर्ण जी से नाथमुनि को शठकोप के तत्त्वोपदेश प्राप्त हुए थे ।इन्हीं नाथमुनि के पुत्र थे - ईश्वरमुनि , ईश्वरमुनि के पुत्र थे यामुनाचार्य !रामानुज यामुनमुनि की पौत्री के पुत्र भी थे तथा शिष्य भी थे ।यामुनाचार्य ने जो तीन आदेश रामानुज को दिये थे ,उनमें से एक था -शठकोप मुनि की सहस्रगीतिका के भाष्य की रचना ।यह रचना रामानुज ने कुरुकेश के माध्यम से पूर्ण की थी ।आचार्य क्षितिमोहन सेन ने अपने निबन्ध " नाना संस्कृतियों का संगम" में लिखा है कि "दक्षिण में वैष्णवों और शैवोंमें बहुत-से प्राचीन भक्त अन्त्यज और शूद्र जाति के हैं । वैष्णवाचार्यों के बहुत-से आदिगुरु हीन कही जानेवाली नाना जातियों में उत्पन्न हुए थे। सातानी लोग ऐसे ही दीन शूद्र हैं, जो वैष्णव मन्दिरोंके सेवक हैं। सातानीका मूल शब्द है सात्तादवन अर्थात् शिखा-सूत्र- विहीन ।ये लोग संस्कृत शास्त्रकी अपेक्षा बारह वैष्णव भक्तों या आलवारोंके ग्रन्थ 'नालायिरा-प्रबन्धम्' को प्रमाण मानते हैं। रामानुजने मन्दिरके कार्य में सात्तिनवनों और सात्तदवनों को नियुक्त किया था । सात्तिनवन ब्राह्मण हैं. और. सात्तादवन शूद्र ! (Mysore Tribes and Castes, Vol. IV, P .591]इन सब विष्णु मन्दिरों में जिन ब्राह्मणोंने शुरू-शुरू में प्रवेश किया था, वे भी समाजमें प्रतिष्ठा खो चुके हैं। मारक लोग वैष्णव मन्दिरके सेवक हैं । यद्यपि वे पहले ब्राह्मण थे; पर अब समाजमें उनके ब्राह्मणत्वका दावा अस्वीकृत हो चुका है ""जगन्नाथ मन्दिर की परंपरा का सूत्र 'दैत ' या शबर जाति से जाकर जुड़ता है ।
आदिशंकराचार्य के जीवन का प्रसंग है कि जब वे काशी में गंगास्नान करके आगे बढे तब चार कुत्तों से घिरा एक चांडाल उनके मार्गमें आ कर खडा हो गया। आचार्य ने उसे दूर हटने को कहा >>गच्छ! गच्छ ! तब चांडाल बोला -हे आचार्य , हटो, हटो कह कर आप किसे दूर हटाना चाहते हैं ?
अन्नमय शरीर से अन्नमय शरीर को दूर हटाना चाहते हैं अथवा शरीर में स्थित उस चैतन्य से चैतन्य को दूर करना चाहते हैं !इन शब्दों के द्वारा आप किसे दूर करना चाहते हैं ?समस्त जगत में सच्चिदानन्द व्याप्त है,आश्चर्य है कि अद्वैतवादी स्पर्शास्पर्श का विचार कर रहे हैं?
आदिशंकराचार्य ने सोचा और संकल्प किया कि चांडाल के रूप में स्वयं विश्वनाथ ने ही मुझे यह तत्वबोध दिया है।आचार्य ने जिन श्लोकों से चांडाल वेशधारी भगवान् विश्वनाथ की स्तुति की वे श्लोक "मनीषा पंचकम्‌" के नाम से प्रसिद्ध हैं ।सैवाहं न च दृश्य वस्त्विति दृढ प्रज्ञापि यस्यास्ति चेच्चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ! अर्थात्‌ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में जो चेतना अपने को अभिव्यक्त कर रही है , । मैं स्वयं उसी चेतना में ओतप्रोत हूँ ,जिस दृढबुद्धि पुरुष की दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व आत्मरूप से प्रकाशित हो रहा है ,वह चाहे ब्राह्मण हो अथवा चांडाल हो मेरे लिए वह वन्दनीय गुरु है ,यह मेरी दृढ निष्ठा है ।
काशी के पंडितों ने रैदास से कहा > तू जिन पूजै सालिगराम। शालिग्राम की पूजा का अधिकार तुमको नहीं है। फिर जब बात आगे बढी तो रीवां नरेश वीरसिंहदेव के सामने पंचायत हुई और शालिग्राम रैदास की गोद में विराजमान हुए। हालांकि रैदास ने अपनी जाति को छिपाया नहीं >जाति ओछी पांति ओछी ओछा कसब हमारा~~“कहि रैदास चमारा। किन्तु रैदास के लिये जाति का अस्तित्व था ही कहां? आचारनिष्ठ ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करते थे।स्वयं रैदास ने ही लिखा है कि > आचारसहित विप्र करहिं दंडवत तिन तनै रविदास दासानुदासा।भारत में उससमय वर्णव्यवस्था तो थी, पर रविदास की नाम- साधना के आगे वह नतमस्तक हो गयी थी। जाति-पांति के कठोर बन्धन कच्चेसूत के तरह चटक गये थे।रविदास कहते हैं कि हम थे तो अपूज्य पर पूज्य बन गये >हम अपूजि पूजि भये हरि तें नाम अनूपम गाया।उनकी तन्मयता इस कोटि की थी > प्रभुजी तुम चंदन हम पानी।जाकी अंग-अंग वास समानी।राणासांगा की रानी झालीराणी ने इन्हें चित्तौड बुलवाया था।इनके आशीर्वाद के साथ मीरा और भोज का परिणय हुआ था।
पश्चिम का मानववाद मनुष्य को आधारभूत इकाई मान कर चला है ,जबकि भारत का दर्शन जीवात्मा [प्राणिमात्र ] को आधारभूत इकाई मान कर चलता है । अद्वैत-दर्शन है , एक ही ब्रह्म है , एक ही परमात्मा है । जब दूसरा कोई है ही नहीं तब पराया कौन हो सकता है ? नानकदेव का उद्घोष है -कुदरत के सब बन्दे । एक नूर से सब जग उपजा कौन भले को मन्दे ।स्वामीविवेकानन्द ने सवर्ण-असवर्ण के भेद को मिटाने के लिये एक सूत्र दिया था कि यदि शूद्र संस्कृत का पांडित्य अर्जित कर लें ,तो वे ब्राह्मण के साथ खडे हो सकते हैं क्योंकि वे जान लेंगे कि वेद के ऋषियों में शूद्र भी थे ।
डा. रामविलासशर्मा ने मनुस्मृति को लेकर प्रश्न उठाया था [ साहित्य-अमृत दिसंबर १९९९ पृ२२] कि-""मनुस्मृति में शूद्रों के बारे में जो कुछ कहा गया है ,उसमें कितने ही अन्तर्विरोध हैं । अगर कहीं शूद्र राजा हो , तो ब्राह्मण को उस राज्य में नहीं रहना चाहिये ।सवाल यह है कि अगर उस समय शूद्रों की हालत इतनी बुरी थी, तो शूद्र राजा कैसे बन जाते थे ?नाटक के सभी रंगकर्मी शूद्र थे और शूद्रों के लिये विद्याध्ययन वर्जित था , तो वे नाटक कैसे खेल लेते थे ?मनुस्मृति एक ब्राह्मण का स्वप्न-मात्र है , उसके नियम ज्यों के त्यों कहीं माने जाते थे या नहीं ?मनुस्मृति से यह सिद्ध नहीं हो जाता !""फ़िर विचार करने की बात यह है कि मनुस्मृति के अनुसार जन्म से तो सब शूद्र ही हैं, जब चित्त का संस्कार होता है, तो वह दूसरा जन्म है, सभ्यता, शिष्टता, सदाचार, सामाजिकता, संयम, नियम आदि से संस्कार होता है.दूसरे जन्म के कारण वह द्विज कहलाता है।जन्मना जायते शूद्र: संस्काराज्जायते द्विज: !मनु कहते हैं कि -कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को।शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रतां।क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च।इसी प्रकार विद्या और योग्यता के अनुसार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं।विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्णों में जा सकती हैं।मनुस्मृति१०\६५
डा.सम्पूर्णानन्द ने लिखा है कि शूद्र कहलाना आज किसी को अच्छा नहीं लगता, किन्तु आजभी करोडों व्यक्ति ऐसे हैं ,जिनकी बुद्धि विशेष उठती नहीं, उनकी इतनी ही इच्छा होती है कि सुख से खाने-पहनने को मिल जाय, बालबच्चों को कष्ट न हो,काम करें और पड कर सो रहें!
एक नयी वर्णव्यवस्था का उदय हो रहा है ! वर्णव्यवस्था का दोष क्या है ? असमानता ! विषमता ! क्योंकि असमानता और विषमता ही वर्ग , वर्ण और जाति का कारण तत्त्व है , मूल तत्त्व है , बीज है ! जब कभी वर्ण रहे होंगे ,तब रहे होंगे ! अब इस समय तो ऐसा लगता है कि हम सभी जो जनता में हैं , वे तो असवर्ण या शूद्र हैं तथा धनबली,बाहुबली,नेता,नौकरशाह और आश्रमवाले भगवान , ये सब वर्णवाले हैं । साधारण जनता शूद्र है दलित है , जो कदम -कदम पर पिस रही है?कर्ण, शंबूक, एकलव्य आज भी शिक्षा और न्याय पाने के लिये संघर्षरत हैं , जो बलवान है, वह आज भी निर्बल को पीसे दे रहा है! हालांकि संविधान है,वह देख भी रहा है?

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