बहुत समय पहले, विंध्याचल के घने वनों के मध्य एक प्राचीन श्मशान था, जहाँ सूर्यास्त के बाद कोई जाने का साहस नहीं करता था। कहते हैं कि वहाँ रात्रि के तृतीय प्रहर में अदृश्य शक्तियाँ जागृत हो जाती थीं। उसी स्थान पर एक वृद्ध तांत्रिक निवास करता था, जिसे लोग केवल “भैरवनाथ” के नाम से जानते थे।
भैरवनाथ वर्षों से ऐसी शक्ति की साधना कर रहा था जो भय, शत्रु और मायिक बंधनों को नष्ट कर सके। अनेक सिद्धियाँ प्राप्त करने के बाद भी उसे अनुभव होता था कि कोई अंतिम द्वार अब भी बंद है। तब उसे अपने गुरु द्वारा दिया गया एक गुप्त मंत्र स्मरण हुआ—एक ऐसा मंत्र जिसका उच्चारण केवल अमावस्या की रात्रि में, श्मशान के मध्य, अग्नि और रक्तचंदन के साथ किया जा सकता था।
अमावस्या की आधी रात, चारों ओर जलती चिताओं के बीच, भैरवनाथ ने काले कुशासन पर बैठकर अनुष्ठान प्रारंभ किया। उसके चारों ओर खोपड़ियों का मंडल बनाया गया था, मध्य में अग्नि प्रज्वलित थी और सामने काले तेंदुए की आकृति अंकित थी। जैसे-जैसे मंत्रोच्चार तेज हुआ, श्मशान की हवा भारी होने लगी। वृक्षों की शाखाएँ बिना हवा के हिलने लगीं और दूर से किसी हिंसक पशु की गर्जना सुनाई देने लगी।
तभी अग्नि की ज्वालाओं के मध्य एक विशाल काला तेंदुआ प्रकट हुआ, जिसकी आँखें अंगारों की भाँति चमक रही थीं। उसके ऊपर विराजमान थीं त्रिशिरा चामुंडेश्वरी—तीन मुख, रक्तमयी जिह्वाएँ, मुंडमाला और दिव्य प्रकाश से दीप्त श्वेत स्वरूप। उनके प्रकट होते ही सम्पूर्ण श्मशान काँप उठा।
भैरवनाथ ने जैसे ही नेत्र उठाए, देवी के एक मुख ने क्रोध से उसे देखा, दूसरे ने करुणा से और तीसरे ने मौन रहकर उसके मन को पढ़ लिया। देवी ने कहा—
“जो भय को जीतना चाहता है, उसे पहले अपने भीतर के अंधकार में उतरना होगा।”
इतना कहते ही तेंदुए ने गर्जना की और अग्नि की लपटें आकाश तक उठ गईं। उस क्षण भैरवनाथ को अनुभव हुआ कि उसके भीतर वर्षों से छिपा भय, क्रोध और मोह धीरे-धीरे भस्म हो रहा है।
कहते हैं उस रात्रि के बाद भैरवनाथ साधारण तांत्रिक नहीं रहा। उसकी दृष्टि इतनी प्रखर हो गई कि वह व्यक्ति के भीतर की नकारात्मक ऊर्जा को मात्र देखकर पहचान लेता था। परंतु उसने कभी उस शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया, क्योंकि देवी ने उसे चेतावनी दी थी—
“यह शक्ति केवल संरक्षण और जागरण के लिए है, अहंकार के लिए नहीं।”
तभी से यह माना जाता है कि जो साधक पूर्ण श्रद्धा, संयम और निडरता के साथ इस देवी का ध्यान करता है, उसे भीतर अद्भुत आत्मबल और अदृश्य सुरक्षा का अनुभव होने लगता है।
स्तोत्र
श्वेतवर्णा त्रिशिरा देवी कृष्णव्याघ्रसमाश्रिता।
मुंडमालाविभूषिता खड्गत्रिशूलधारिणी॥
रात्रिचर्याप्रिया घोरा मायाजालविनाशिनी।
भूतप्रेतपिशाचघ्नी साधकानां हितायिनी॥
व्याघ्रवाहिनि कालिके भयदुःखनिवारिणि।
त्रिनेत्रे चामुण्डरूपे सर्वसिद्धिप्रदायिनि॥
अज्ञानतिमिरं हन्त्रीं रक्तजिह्वां भयंकरीम्।
शरणागतवत्सलां देवीं वन्दे त्रिशिरां शिवाम्॥
नमामीशमीशान
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