ये महाशय यदि भगतसिंह के इतने ही प्रशंसक अब बन रहे हैं तो यह जान लें कि भगतसिंह ने ‘मतवाला’ नामक एक देशभक्त साप्ताहिक अख़बार में 15 और 22 नवंबर 1924 के दो अंकों में ‘विश्वप्रेम’ नामक लेख सावरकर की तारीफ़ में ही लिखा था और उन सब आलोचनाओं का जवाब दिया था जो ऐसे महाशय आज उछालते रहते हैं।
राहुल फ़ाउंडेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज’ ( पृष्ठ 93) से पता लगता है कि यह लेख भगतसिंह ने बलवंतसिंह के छद्मनाम से लिखा था।
भारत के क्रांतिकारी अपने नेता के टैक्टिकल निर्णय को ज़्यादा अच्छी तरह समझ रहे थे।
भगतसिंह यहीं नहीं रुके। 1928 के अगस्त में उन्होंने ‘कीर्ति’
नामक एक क्रांतिपक्षी अख़बार में मार्च से अक्टूबर 1928 तक ‘आज़ादी की शहादतें’ नामक एक लंबी लेख श्रृंखला में भगतसिंह ने बताया कि कैसे सावरकर ने लंदन में इंडिया हाउस बनाया जो क्रांतिकारियों का गढ़ बन गया, कैसे सावरकर ने मदनलाल धींगरा को उनके मिशन पर निर्भीक होकर आगे बढ़ने पर प्रेरित किया। कैसे कर्जन वायली की हत्या के लिए रवाना होने से पूर्व धींगरा और सावरकर दोनों ने एक दूसरे का आलिंगन किया, दोनों की आँखों में आँसू थे, कितने अमूल्य और अमिट आँसू। कायर लोग उन लोगों की भावनाओं के बारे में क्या जानें जो मृत्यु से नहीं डरते। कायर लोग कैसे जानेंगे कि वे लोग कितने पवित्र, कितने श्रद्धापात्र, कितने उच्च होते हैं जो देश के लिए अपनी ज़िंदगी लुटा देते हैं।( वही, पृष्ठ 166-168)
भगतसिंह काल की प्रेरणा से शायद ऐसे ही महाशयों के लिए ये सब लिख रहे थे।
सावरकर की 1857 वाली पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद कराने वाले भी भगतसिंह थे। उनके पहले लाला हरदयाल और उनके बाद सुभाष चंद्र बोस ने इसके संस्करण प्रकाशित करवाये थे।
इन महाशय को भगतसिंह की ‘जेल डायरी’ पढ़ लेनी चाहिए थी। उसमें वे सावरकर की ‘हिंदूपदपादशाही’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि ‘ कोई आदमी राजनीतिक गुलामी से कभी भी आज़ाद हो सकता है पर सांस्कृतिक दासता की बेड़ियों को तोड़ पाना मुश्किल है।’
भगवतीचरण वोरा को पढ़ो कि दुर्गादास को कि भगतसिंह तत्कालीन भारत में सबसे ज़्यादा किसकी प्रशंसा करते थे, तो
पता चलेगा सावरकर को। दुर्गादास बताते हैं कि जब उन्होंने पूछा कि क्रांतिकारी मार्ग को समझने के लिये क्या करना चाहिए तो भगतसिंह ने तीन पुस्तकें पढ़ने की सलाह दी थी। उनमें से भारत की एक ही पुस्तक उन्होंने सुझाई थी— लाइफ ऑफ बैरिस्टर सावरकर। बुखारिन और प्रेओब्रेजेंस्की की The ABC of Communism (1920) और डेनियल ब्रीन की My Fight for Irish Freedom( 1924) दो अन्य पुस्तकें थीं।
इतिहासकार मलविंदरजीतसिंह बताते हैं कि वीर सावरकर की ‘हिंदूपदपादशाही’ वह पुस्तक थी जो उन पुस्तकों में से थी जो उन्होंने जमकर पढ़ी थी। सुखदेव की गिरफ़्तारी के बाद जब इन लोगों के अड्डों पर छापे पड़े तो पुलिस के द्वारा जप्त पुस्तकों में यह पुस्तक मिलती थी। भगतसिंह की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में यह पुस्तक ‘मस्ट रीड‘ थी।
भगतसिंह 1928 में सावरकर से रत्नागिरी में आकर भेंट भी किये थे। यह चक्कर क्या था? 1929 को वे बम विस्फोट कर देते हैं। ऐसा ही सुभाष के साथ था। सावरकर से मिलने के छह माह बाद वे भारत से बाहर निकल कर आज़ाद हिंद फ़ौज वाला रास्ता अपनाते हैं। क्या होता था सावरकर से भेंट में?
जब भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव को फॉंसी हुई, तब सावरकर के रत्नागिरी वाले घर में भगवा झंडा उतार कर काला झंडा फहराया गया था।
उनकी मृत्यु पर सावरकर की कविता उनकी भावनाओं का प्रमाण है।
हा भगतसिंग, हाय हा
जाशि आजि, फांशी आम्हांस्तवचि वीरा, हाय हा!
राजगुरू तूं, हाय हा!
राष्ट्र समरी, वीर कुमरा पडसि झुंजत, हाय हा!
हाय हा, जयजय अहा!
हाय हायचि आजची, उदयीकच्या जिंकी जया
राजमुकुटा तो धरी
मृत्युच्या मुकुटासि आधी बांधी जो जन निजशिरीं !
शस्त्र धरुचि अम्हि स्वतः
धरुनि जें तूं समरिं शत्रुशि मरसि मारीत मारतां !
अधम तरि तो कोणता ?
हेतुच्या तव वीरतेची जो न वंदिल शुद्धता II
जा हुतात्म्यांनो, अहा !
साक्ष ठेवुनि शपथ घेतों आम्हि उरलों तें पहा !
शस्त्रसंगर चंड हा
झुंजावुनि कीं, जिंकुची स्वातंत्र्यविजयासी पहा !
हा भगतसिंग, हाय हा
लेकिन महाशयों की दासता की बेड़ियाँ महाशयों को रास आ गईं हैं तो भगतसिंह भी क्या करें?
वे तो भगतसिंह की इस हैंडराइटिंग को भी नकार दें जो सावरकर को उद्धृत करती हैं:
साभार - Arun kumar Upadhyay ( 11/5/2026)
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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