दूसरे शब्द ढूंगे पर आते हैं। देखो साहब, आप किसी के स्वागत में बड़े अदब से कहते हैं ‘‘आइये आइये साहब, तषरीफ़ लाइये’’ या बड़े-बड़े भव्य सेट पर सुना होगा ‘‘आलमपनाह तषरीफ़ ला रहे हैं।’’ अब साहब तषरीफ़ का सही अर्थ है मल द्वार का घेरा। अब वो तो बड़ा सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर चुका, मैंने अपनी स्थानीय भाषा में ढूंगे और पून कह दिया तो असभ्य हो गया। तो सुनो पष्चिमी राजस्थान में तो सासू अपनी बहू से इतना ऊंचे स्वर में कहती है कि पूरे गांव में सुनाई पड़ जाए ‘‘अए बीनणी, था रे गीगल्या रा ढूंगा कित्ति देर उं भण्ड्योड़ा है, धोवणा कोनि के?’’
लगे हाथ पून से संबंधित एक सत्य घटना भी बता दूं। पाली मारवाड़ में महाराष्ट्र के पूना शहर की एक बहु ने गांव की सासुओं के पूछने पर बताया ‘‘मेरे पूना में बस चलती है, ट्राम चलती है, ट्रेन चलती है, मेट्रो चलती है, हवाई जहाज चलते हैं।’’
खुसर-फुसर करती एक महिला ने दूसरी के कान में कहा ‘‘ईं का पूनां मं तो पतो कोनि काॅई-काॅई चालऽ, म्हारा पूनां मं तो खाज चालऽ।’’
अब आप रचना का आनंद लो, जो वास्तव में ममता दीदी के लिये तुरत-फुरत केवल एक पंक्ति की प्रतिक्रिया थी। क्या? वो आप समझ जाएंगे।
होम करतां हाथ जळग्या कृष्णा आंबेड़करजी समझा साद
गधा न गुलकंद खवायो गायकवाडजी डिग्र्यां दीनी लाद
पथ भूल्यां सत छूटियो, सत छूट्यां मत अर पतहीन व्हेया
पंथनिरपेक्ष सबद कोढ़ बणग्यो संविधान रो नान्हों सो दाद
जाति, वर्ण, वर्ग, अर भाषा मं बंट्यो धरा रो सनातन धर्म
बाकी बचो आरक्षण खाग्यो काढ़ दीनो म्हारा देस रो काद
डाक्टर इंजीनियर काजी बणग्या आवऽ न कक्का रो पून
कांटा दूणा हरिया हो रिया अर सूख्या फूल बणग्या खाद
तुंबा अर धोतरा रा बीज बोया अब आस करऽ गुलाब री
मोह मद रा जायाजामता क्यूं न जग मं करता फरे रम्माद
माया, ममता जीजी बहनजी रेव्हता, जीव रो जळापो रही
भांड़ा भांडती अर हांड़ती फरी जाणे बांदरी खाई हो आद
गू खाती झख मारती रही बुआजी बणता ही पोळी बैठगी
अब ढूंगा ऊंचा करती ख़ुद रा पाद रो, लेती रइजे स्वाद
अयांई होती आई छऽ, काई धरियो न यां बातां मं ज़मीर
भवां भेळी करो लगाओ खेचरी सुणता रह्वो अनहद नाद
साभार हुकम सिंह (Hukam Singh) fb tus 5/5/26 815am
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