काली के 108 नामों की माला में यह नाम एक मोड़ है। अब तक देवी को काल, कपालिनी, कामेश्वरी, कामकान्ता कहा गया — सब नाम उसके होने को बताते थे। 'कुंजेश्वरगामिनी' पहली बार उसके चलने को बताता है। वह सिंहासन पर बैठी नहीं रहती, वह उठती है और निकुंज की ओर जाती है।
नामावली में इसका ठिकाना
शाक्त परंपरा की सूची में क्रम ऐसा चलता है:
33. ॐ कामेश्वर्यै नमः
34. ॐ कामकान्तायै नमः
35. ॐ कुञ्जेश्वरगामिन्यै नमः
तीन नाम मिलकर एक कथा बनाते हैं। पहले देवी इच्छा की स्वामिनी बनी, फिर इच्छा की प्रिया बनी, अब वही इच्छा उसे खींच कर कुंज तक ले जा रही है।
शब्द के भीतर तीन दरवाज़े
कुञ्ज संस्कृत में केवल 'झाड़ी' नहीं है। यह वह घना लता-मंडप है जहाँ बाहर की आँख नहीं पहुँचती। वृंदावन में इसे निकुंज कहते हैं, तंत्र में इसे हृदय-गुहा कहते हैं, शैव आगमों में इसे अरण्य।
ईश्वर यहाँ किसी मंदिर के देवता का पद नहीं, संबंध का संकेत है। कुंज का ईश्वर वह है जो उस एकांत में रमता है — वैष्णवों के लिए कुंजबिहारी कृष्ण, शाक्तों के लिए अरण्य-वासी भैरव-शिव।
गामिनी पुल्लिंग 'गामी' का स्त्री रूप है। इसका अर्थ केवल 'जाने वाली' नहीं, 'लगातार गति में रहने वाली' है। गामिनी ठहरती नहीं, वह मार्ग बनाती है।
इसलिए पूरा अर्थ बनता है — "वह शक्ति जो अपने प्रिय के एकांत कुंज की ओर स्वयं चल पड़ती है।"
पाठ-भेद की एक जरूरी बात
कुछ तांत्रिक पांडुलिपियों में यही नाम 'ॐ कुञ्जरेश्वरगामिन्यै नमः' मिलता है। वहाँ अर्थ बदल जाता है — "हाथियों के राजा के समान चलने वाली"। टीकाकार लिखते हैं, यह काली की गज-गामिनी चाल, उसकी स्थिर और भव्य उपस्थिति को दर्शाता है।
दोनों पाठ विरोधी नहीं, पूरक हैं। एक में देवी प्रेम के कारण चलती है, दूसरे में शक्ति के कारण। साधक को दोनों याद रखने चाहिए — भक्ति बिना गति नहीं, और गति बिना गरिमा नहीं।
पौराणिक झलकियाँ
वृंदावन की राधा — राधा को शास्त्रों में 'कुंजेश्वरी' कहा गया है। जब काली को कुंजेश्वरगामिनी कहते हैं, तो शैव-शाक्त और वैष्णव धाराएँ मिल जाती हैं। वही देवी जो श्मशान में मुंडमाला पहनती है, वही यमुना के कुंज में नूपुर पहन कर दौड़ती है।
कामाख्या का नीलांचल वन — असम के नीलांचल पर्वत पर देवी का पीठ घने कुंजों से घिरा है। तांत्रिक कहते हैं, अम्बुवाची के समय देवी स्वयं 'गामिनी' होकर वन-वन घूमती हैं, इसलिए उन दिनों मंदिर के द्वार बंद रहते हैं।
दक्षिण का चिदंबरम — वहाँ शिव 'तिल्लई वन के स्वामी' हैं। देवी काली तिल्लई काली के रूप में उन्हीं वनों में नृत्य करती हुई पहुँचती हैं।
तंत्र-दृष्टि — कुंज भीतर है
श्रीविद्या में कुंज को छह चक्रों के बीच के सूक्ष्म मार्ग कहा गया है। कुंडलिनी जब मूलाधार से उठती है, वह सीधी रेखा में नहीं जाती, वह लता की तरह घुमाव लेती है — यही कुंज-गमन है।
गामिनी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शक्ति को केवल जागृत करना पर्याप्त नहीं, उसे प्रिय की ओर ले जाना पड़ता है। बिना गमन के जागरण श्मशान में अटक जाता है, गमन के साथ वह निकुंज में उत्सव बन जाता है।
इसी कारण 'कामेश्वरी' के बाद 'गामिनी' आती है। पहले इच्छा पर अधिकार, फिर इच्छा का सौंदर्य, फिर उस सौंदर्य को लेकर चल पड़ना।
साधना — कैसे जपें
यह नाम पुस्तकीय जप से अधिक चलने-फिरने की साधना माँगता है।
समय: प्रदोष काल या ब्रह्ममुहूर्त से पहले का धुंधलका, जब वन में प्रकाश और अंधेरा मिलते हैं।
विधि:
किसी बगीचे, तुलसी-क्यारी या घर के भीतर रखे पौधे के पास धीरे-धीरे परिक्रमा करें
प्रत्येक कदम पर मन में 'ॐ कुञ्जेश्वरगामिन्यै नमः' कहें, तेज़ आवाज़ नहीं, भीतर की ध्वनि
27, 54 या 108 कदम तक चलें। गिनती माला से नहीं, पैरों से होगी
चलते समय कल्पना न करें कि देवी आपके पास आ रही है, कल्पना करें कि आप देवी के साथ जा रहे हैं
भाव: जप का उद्देश्य कुछ माँगना नहीं, दिशा बदलना है। जब मन भटकता है, वह श्मशान की ओर जाता है — चिंता, तुलना, पश्चाताप। गामिनी का स्मरण उसे कुंज की ओर मोड़ देता है — एकांत, सुगंध, प्रतीक्षा।
मनोविज्ञान की भाषा में
आधुनिक अर्थ में कुंज आपका 'इनर सैंक्चुअरी' है — वह मानसिक स्थान जहाँ आप बिना प्रदर्शन के होते हैं। ईश्वर वह मूल्य है जिसे आप सबसे अधिक प्रेम करते हैं — सत्य, करुणा, सृजन। गामिनी वह क्रिया है जो आपको स्क्रॉलिंग, शोर और भीड़ से उठा कर उस मूल्य तक ले जाती है।
इसलिए यह मंत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से काम करता है जो ध्यान में बैठ नहीं पाते। उन्हें बैठने को नहीं कहा गया, चलने को कहा गया है।
तीन नामों की माला रोज़ कैसे पहनें
सुबह उठते ही:
एक बार 'ॐ कामेश्वर्यै नमः' — आज मेरी इच्छाएँ मेरी स्वामिनी के अधीन रहें
एक बार 'ॐ कामकान्तायै नमः' — वही इच्छाएँ सुंदर हों, प्रेम योग्य हों
फिर चलते-चलते 'ॐ कुञ्जेश्वरगामिन्यै नमः' — मैं उन्हें लेकर अपने भीतर के कुंज तक जाऊँ
यह क्रम इच्छा को न मारता है, न उछालता है। वह उसे घर ले जाता है।
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कुंजेश्वरगामिनी का रहस्य यही है कि देवी दूर किसी पीठ पर नहीं बैठी। वह हर बार जब आप भीड़ से हट कर एकांत की ओर पहला कदम बढ़ाते हैं, आपके साथ-साथ चल पड़ती है। नूपुर की ध्वनि सुनाई न दे तो भी, पत्तों का हिलना बता देता है — कोई आया है, और वह आप ही हैं।
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